
मेरी रसोई : पौष्टिकता से भरपूर हैं पहाड़ी व्यंजन
सुनीता भट्ट पैन्यूली
किसी भी समाज का दर्पण उसके अवशेषात्मक प्रमाण अथार्त उसकी लोक-संस्कृति, लोकगीत, लोक नृत्य और उसका खान-पान हैं. उस समाज की संस्कृति, परंपराओं और सभ्यताओं की बात करना तब तक अधूरा ज़िक्र है जब तक हम उस विशेष सामाजिक परिवेश के खान-पान अथवा ज़ायके का ज़िक्र न करें. खान-पान दरअसल महज़ उदरस्थ करना ही नहीं उसके प्रच्छन्न हमारे पूर्वजों का मनोविज्ञान उनके जीवन की दास्तां भी हैं.
खाद्य पदार्थ और उससे बने व्यंजनों की उत्पत्तियों का इतिहास इतना आसान नहीं रहा होगा निश्चित ही इसका कारण संभवतः प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों में भोजन जुटाने की ज़द्दोज़हद, ज़िंदा रहने की प्रत्याशा रही होगी.
खान-पान और भोज्य पदार्थ परिचायक भी हैं उस विशिष्ट समाज के भौगोलिक वातावरण उसकी विषमता और उससे सामंजस्यता की जहां शहरों से सुदूर बसाहत,आर्थिक कमज़ोरी और पौष्टिक अन्न की अनुपलब्धता शायद कारण रहा ह...









