साहित्‍य-संस्कृति

पहाड़ से राजभवन तक : पद्म भूषण भगत सिंह कोश्यारी की सार्वजनिक सेवा की प्रेरक यात्रा

पहाड़ से राजभवन तक : पद्म भूषण भगत सिंह कोश्यारी की सार्वजनिक सेवा की प्रेरक यात्रा

देहरादून, समसामयिक, साहित्‍य-संस्कृति
 डॉ देवी लाल असिस्टेंट प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय देवभूमि उत्तराखंड की मनोरम वादियां, जहाँ हवाएं परिवर्तन और आकांक्षाओं की सुधबुधाहाट लिए बहती है, वहां एक नाम देवभूमि की राजनीती में बड़े ही आदर के साथ लिया जाता है - भगत सिंह कोश्यारी एक अनुभवी राजनीतिज्ञ, शिक्षक, पत्रकार, और संघ विचारक, कोशियारी जी का बागेश्वर जिले के एक छोटे से गांव से लेकर राजभवन तक का सफर सेवा के प्रति समर्पित जीवन का प्रतिक है। 17 जून 1942 में बागेश्वर जिले के एक साधारण किसान परिवार में जन्मे कोश्यारी जी के प्रारंभिक वर्ष पहाड़ी क्षेत्र की सादगी, ढृढ़ता, और समृद्ध सांस्कृतिक परिवेश से प्रभावित थे। उन्होंने अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नाकोत्तर की उपाधि प्राप्त की और छात्र संघ के महासचिव भी रहे, जिससे राजनीतिक चेतना की नींव पड़ी। सक्रिय राजनीती में पूर्णकालिक रूप से पहले उन्होंने एक शिक्षक के रू...
सुमित्रानंदन पंत जयंती: लेखक गांव में बोले डॉ. कुमार विश्वास- किताबों से जुड़ें युवा

सुमित्रानंदन पंत जयंती: लेखक गांव में बोले डॉ. कुमार विश्वास- किताबों से जुड़ें युवा

देहरादून, साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, देहरादून “मैं तुम्हें सपने देने आया हूं, बेचने नहीं. लेखक गांव जैसे स्थान ही उन सपनों को संस्कार और दिशा देते हैं.” यह बात प्रख्यात कवि एवं कथावाचक डॉ. कुमार विश्वास ने देश के पहले लेखक गांव, थानो में आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी के दौरान कही. उन्होंने कहा कि लेखक गांव केवल एक स्थान नहीं, बल्कि भारतीय साहित्य, संस्कृति और संवेदनाओं का ऐसा जीवंत केंद्र बनता जा रहा है, जहां नई पीढ़ी अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा प्राप्त कर रही है. प्रकृति के सुकुमार कवि एवं छायावाद के प्रमुख स्तंभ सुमित्रानंदन पंत की जयंती के अवसर पर लेखक गांव स्थित नालंदा पुस्तकालय एवं अटल प्रेक्षागृह में “सुमित्रानंदन पंत साहित्य पर्यटन पथ” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई. कार्यक्रम उत्तराखंड भाषा संस्थान, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय तथा लेखक गांव के संयुक्त तत्वावधान में संपन्न हुआ.कार्यक...
विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

विलुप्ति की कगार पर पहाड़ की पारंपरिक आभूषण संस्कृति: ‘बुलाक’ से ‘खगाली’ तक खोती विरासत

उत्तरकाशी, साहित्‍य-संस्कृति
नीरजउत्तराखंडी, पुरोला, उत्तरकाशीहिमालयी क्षेत्रों- विशेषकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों की पारंपरिक आभूषण संस्कृति आज धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर पहुंचती जा रही है. कभी महिलाओं की पहचान और सामाजिक स्थिति का प्रतीक रहे ये आभूषण अब आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी चमक खोते नजर आ रहे हैं. परंपरा में बसती थी पहचान पहाड़ों में आभूषण केवल सजावट नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं. ‘बुलाक’ (नाक का आभूषण), ‘मुर्की’ (कानों का छोटा गहना), ‘लाबी’ और ‘खगाली’ जैसे आभूषण पीढ़ी-दर-पीढ़ी विरासत के रूप में संजोए जाते थे. इन गहनों का संबंध केवल सौंदर्य से ही नहीं, बल्कि जीवन के विभिन्न संस्कारों—जैसे विवाह, त्योहार और पारिवारिक आयोजनों से भी गहराई से जुड़ा रहा है. कई आभूषण वैवाहिक स्थिति और आर्थिक सम्पन्नता के प्रतीक माने जाते थे.‘बुलाक’ से ‘मु...
ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

ढांटु: महिला के सिर की सर्वोच्च आन-बान-शान

देहरादून, साहित्‍य-संस्कृति, हिमालयन अरोमा
 फकीरा सिंह चौहान स्नेही वरिष्ठ कवि, गायक कलाकार तथा गीतकार ग्राम गोरछा, जौनसार जौनसारी विवाहित महिलाओं के सिर पर धारण किया जाने वाला ढांटु मात्र एक रंगीन कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि गौरव और गरिमा की पहचान है। जौनसार-बावर, रवांई-जौनपुर, बंगाण, बिनार तथा हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्रों में सिर पर ढांटु बांधना केवल एक परिधान या आवरण नहीं, बल्कि मान-सम्मान, स्वाभिमान, मर्यादा और जिम्मेदारी का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है। ढांटु धारण करने की परंपरा विरासत, संस्कृति और नारीत्व की गरिमा को दर्शाती है। इसे नारी स्वाभिमान का मुकुट और सिर की शोभा माना जाता है। किसी के सामने सम्मानपूर्वक ढांटु उतारना विश्वास, जिम्मेदारी तथा क्षमा-याचना का अत्यंत महत्वपूर्ण संकेत माना जाता है। जौनसार-बावर क्षेत्र में विवाहित महिलाओं के लिए ढांटु धारण करना सामाजिक प्रतिष्ठा, सम्मान और गौरव का प्रतीक है...
राष्ट्रीय नवोन्मेष और विकसित भारत की संकल्पना

राष्ट्रीय नवोन्मेष और विकसित भारत की संकल्पना

साहित्‍य-संस्कृति
  नव वर्ष (1 जनवरी 2026) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा   पिछले एक दशक में भारत की छवि निश्चित रूप से एक सशक्त देश के रूप में निखरी है. नए वर्ष में इस बदलते भारत के भविष्य के बारे में सोचते हुए हमें देश की समृद्ध प्राचीन सभ्यता और आधुनिक राष्ट्र राज्य की संकल्पना दोनों को ध्यान में रखना होगा. लोक की स्मृति में अभी भी नैतिक और न्यायपूर्ण शासन के लिए राम-राज्य की अमिट छवि क़ायम है. न केवल 1950 में लागू भारत के संविधान की मूल प्रति में मौलिक अधिकारों वाले अध्याय के आरंभ में राम का चित्र अंकित किया गया था बल्कि 2025 में अक्टूबर तक 22 करोड़ लोग अयोध्या में राम लला के दर्शन कर चुके हैं. साल के अंत तक यह संख्या 50 करोड़ हो सकती है. इसलिए जहाँ वैश्वीकरण के अनुकूल आकांक्षाओं को ध्यान में रखना होगा वहीं नैति...
ऊर्जा-संकट से बचने लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण!   

ऊर्जा-संकट से बचने लिए जरूरी है ऊर्जा संरक्षण!  

साहित्‍य-संस्कृति
  ऊर्जा संरक्षण दिवस (14 दिसंबर 2025) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा   ऊर्जा के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। भौतिक नियम बताता है कि ऊर्जा न पैदा की सकती है न समाप्त ;  उसका सिर्फ़ रूपांतरण ही होता है। मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ इस मायावी ऊर्जा पर ही टिकी हुई हैं। ऊर्जा ही अपना रूप बदल-बदल कर हमारी कल्पनाओं को साकार करती है। सामान्यत: अदृश्य सी रहने वाली ऊर्जा हमारे दृश्य जगत को रचते हुए हर जगह हावी है। ऊर्जा के नए नए स्रोत खोजे जाते रहे हैं जो आणविक ऊर्जा तक पहुँचे हैं। ईंधन से भोजन बनाने में ही नहीं उसके लिए प्रयोग में आने वाली सामग्री हम तक पहुचे इसके लिए हर कदम पर जरूरी मशीन, उर्बरक, पानी सबके लिए अलग-अलग तरह से ऊर्जा की ज़रूरत पड़ती है। ऐसे ही परिवहन, मौसम से सुरक्षा और वस्तुओं के ...
“वंदे मातरम्” है भारत की साकार अंतश्चेतना

“वंदे मातरम्” है भारत की साकार अंतश्चेतना

समसामयिक, साहित्‍य-संस्कृति
 प्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  वैश्विक स्तर पर भारत सदियों से अनेक देशों के लिए आकर्षण का केंद्र बना रहा है. यह तथ्य अनेक साक्ष्यों से बहुश: प्रमाणित है कि प्राचीन भारत की भौतिक समृद्धि से प्रभावित हो खिंचे आए विदेशी आक्रान्ताओं ने भारत का अनेक प्रकार से शोषण और दोहन किया और अनैतिक ढंग से विभिन्न क्षेत्रों में और विभिन्न अवधि के लिए अपना अनधिकृत आधिपत्य जमाया. इस प्रक्रिया में भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य और जीवन पद्धति में अनेक परिवर्तन आए. इस श्रृंखला की अंतिम कड़ी के रूप में बर्तानवी (अंग्रेजी )उपनिवेश की लगभग दो सौ वर्षों की त्रासदी थी. यह इस अर्थ में विशेष अर्थ रखती है कि इस दौर में देश को न केवल भौतिक और आर्थिक क्षति पहुँची अपितु दुर्भाव के साथ उसमें मानसिक रूप से भी बदलाव भी लाया गया. शिक्षा के क्षे...
सरदार पटेल की संकल्पना का भारत

सरदार पटेल की संकल्पना का भारत

साहित्‍य-संस्कृति
  सरदार पटेल की जयंती पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  स्वतंत्रता संग्राम में देश को आज़ादी तो मिली परंतु ऐतिहासिक परिस्थितियों के फलस्वरूप अखंड भारत विभाजित भी हुआ. इससे राष्ट्र-निर्माण की एक विकट चुनौती उत्पन्न हुई . सरदार पटेल ने भारतीय संघ के निर्माण को संभव बनाया. अद्भुत कूटनीतिक परिपक्वता का परिचय देते हुए उन्होंने पाँच सौ से अधिक प्राचीन रियासतों का भारत में विलय कराया. विविधता में एकता स्थापित करने वाला उनका यज्ञ आर्यावर्त के भारत नामक नए संस्करण का कारण बना. इस संरचनात्मक आधार के निर्माण के साथ भारत की एकता का ताना-बाना बुनने का कार्य सरदार पटेल ने किया. राष्ट्र-भावना को केंद्रीय महत्व देते हुए उन्होंने प्रशासनिक कार्य तंत्र विकसित किया. मूलतः गांधी दृष्टि के अनुरूप वह सभी नागरिकों के मध्य ...
बंठ्या माने आपड़ गां, निपणु दूध साजी छां…

बंठ्या माने आपड़ गां, निपणु दूध साजी छां…

साहित्‍य-संस्कृति
राजस्थान में राष्ट्रीय बाल कविगोष्ठी में रवांल्टी बाल कविता का हुआ पाठ महावीर रवांल्टा को मिला श्यामसुंदर नागला स्मृति राष्ट्रीय बालवाटिका सृजन सम्मान-2025हिमांतर ब्यूरोशिक्षा, साहित्य एवं सांस्कृतिक संस्कार की मासिक पत्रिका 'बालवाटिका', राजस्थान साहित्य अकादमी और विनायक विद्यापीठ,भूणास (भीलवाड़ा) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित 26 वीं राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी एवं सम्मान समारोह में महावीर रवांल्टा को बाल साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय अवदान के लिए श्यामसुन्दर नागला स्मृति राष्ट्रीय बालवाटिका सृजन सम्मान-2025 से सम्मानित किया गया जिसमें समारोह के संयोजक एवं 'बालवाटिका' के संपादक डॉ भैंरूलाल गर्ग, 'बालप्रहरी'  के संपादक उदय किरौला, डॉ श्याम सुन्दर भट्ट, पूर्व अध्यक्ष नगर विकास न्यास लक्ष्मी नारायण डाड, प्रधानमंत्री साहित्य मंडल श्रीनाथद्वारा श्याम प्रकाश देवपुरा, राजेन्द्र...
हिंदी पखवाड़ा 2025: उत्तराखंड की पत्रकारिता के तीन संपादक

हिंदी पखवाड़ा 2025: उत्तराखंड की पत्रकारिता के तीन संपादक

साहित्‍य-संस्कृति
 हिमांशु जोशीहिंदी पखवाड़ा केवल भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि उन लोगों को याद करने का समय भी है जिन्होंने हिंदी को समाज की सशक्त आवाज़ बनाया. उत्तराखंड जैसे छोटे से राज्य ने भी हिंदी पत्रकारिता को ऐसे तीन संपादक दिए जिनका काम राष्ट्रीय स्तर तक सम्मानित हुआ. राजीव लोचन साह ने नैनीताल समाचार के माध्यम से हिंदी को आंदोलनों और लोकसंस्कृति से जोड़ा. बद्रीदत्त कसनियाल ने अपनी ज़मीनी रिपोर्टिंग से पहाड़ के सवालों को हिंदी पत्रकारिता की मुख्यधारा में पहुँचाया. नवीन जोशी ने भले ही कर्मभूमि बाहर बनाई हो, लेकिन उनकी रचनाएं और संपादन उत्तराखंड की संवेदनाओं से जुड़कर हिंदी को नया विस्तार देते रहे. इन तीनों ने अपने-अपने तरीके से हिंदी पत्रकारिता को समृद्ध किया और उसे व्यवसाय नहीं बल्कि सामाजिक दायित्व साबित किया.राजीव लोचन साह: आंदोलन और पत्रकारिता का कॉकटेल 'नैनीताल समाचार' के संपादक...