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कविताएं

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रात है, ढल जाएगी

अल्फ़ाज़ बहुत वीरान है, रात है, ढल जाएगी, आफ़त है, क़यामत because है, टल जाएगी. खौफ़ का दरिया because उबाल मार रहा है, किनारा कोई न because नजर आ रहा है. है विश्वास भरा because हौसलों के सागर में, तूफान में किश्ती because मेरी संभल जाएगी. बहुत वीरान है, because रात है, ढल जाएगी, आफ़त […]
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प्रेम मात्र पा लेना तो नहीं…

सपना भट्ट कविता कई मायनों में जीवन राग भी है. व्यक्ति के जीवन का व्यक्त- अव्यक्त, दुःख-सुख, प्रेम- वियोग, संघर्ष- सफलता की ध्वनि काव्य में सुनाई देती है. भले ही ‘लेखक की मृत्यु’ की घोषणा हुए पाँच दशक गुजर गए हों लेकिन रचना को आज भी लेखक के संघर्ष और जीवन-अनुभवों से काट कर नहीं […]
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मां, तेरे दूध को सिर्फ दूध नहीं कहूंगी…

विश्‍व स्‍तनपान सप्‍ताह (1 अगस्त से 7 अगस्त) इस बार की थीम ‘स्‍तनपान की रक्षा करें- एक साझा जिम्‍मेदारी’ है। इस थीम का उद्देश्‍य लोगों को स्‍तनपान के लाभ बताना और उसके प्रति लोगों को जागरूक करना है। इसी उपलक्ष्य नीलम पांडेय ‘नील’ की कविता मां, तेरे दूध को सिर्फ दूध नहीं कहूंगी….. मां, तेरे […]
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पाती प्रेम की

यामिनी नयन गुप्ता इतिहास के पन्नों में जाकर कालातीत होने को अभिशप्त हो गई परीपाटी चिट्ठियों की वह सुनहरा दौर, डाकिए का इंतजार साइकिल की घंटी डाक लाया का शोर, अब नजर नहीं आतीं लाल रंग की पत्र पेटियां प्रियतम की पाती का दौर; बूढ़ी आंखों की प्रतीक्षा कुशलक्षेम का समाचार, गौने की राह तकती […]
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अपेक्षा/उपेक्षा

निमिषा सिंघल अपेक्षाएं पांव फैलाती हैं… जमाती हैं अधिकार, दुखों की जननी का हैं एक अनोखा…. संसार। जब नहीं प्राप्त कर पाती सम्मान, बढ़ जाता है क्रोध… आरम्पार, दुख कहकर नहीं आता.. बस आ जाता है पांव पसार। उलझी हुई रस्सी सी अपेक्षाएं खुद में उलझ.. सिरा गुमा देती हैं। भरी नहीं इच्छाओं की गगरी…. […]
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होली के रंग…

होली पर की कल्याण सिंह चौहान दो कविताएं  1. होली के रंग रंग ले रंग ले, तन रंग ले, तन रंग ले, तु मन रंग ले, होली के रंग रंग ले।। रंग ले रंग ले…. रंग ले रंग ले, दुनिया के रंग ले रंग ले, रंग ले रंग ले, दुनिया अपने रंग रंग ले, रंग […]
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उड़ान

डॉ. दीपशिखा वो भी उड़ना चाहती है. बचपन से ही चिड़िया, तितली और परिंदे उसे आकर्षित करते. वो बना माँ की ओढ़नी को पंख, मारा करती कूद ऊँचाई से. उसे पता था वो ऐसे उड़ नहीं पायेगी फिर भी रोज़ करती रही प्रयास. एक ही खेल बार-बार. उसने उम्मीद ना छोड़ी, एक पल नहीं, कभी नहीं. उम्मीद उसे आज भी है, बहुत है मगर अब वो ऐसे असफल प्रयास नहीं करती.
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आंदोलन के नाम पर अराजकता

उमेद सिंह बजेठा गणतंत्र दिवस हमारा पर्व है, सभी धर्मों संप्रदायों का गर्व है. हमने ही जय जवान तथा, जय किसान का नारा दिया. फिर क्यों आज किसान ने, जवान पर तलवार से प्रहार किया. लाल किला राष्ट्रीय स्मारक है, राष्ट्र के गौरव का प्रतीक है. इसकी सुरक्षा व सम्मान प्रत्येक, भारतीय का कर्तव्य पुनीत […]
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क्यों रिश्तों को छीन रहे हो?

भुवन चन्द्र पन्त छीन लिया है अमन चैन सब, जब से तुमने पांव पसारे। हर घर में मेहमान बने हो, सिरहाने पर सांझ-सकारे।। भुला दिये हैं तुमने अब तो, रिश्तों के संवाद सुरीले। सारे रिश्ते धता बताकर, बन बैठे हो मित्र छबीले।। सब के घर में रहने पर भी, ऐसी खामोशी है छाई। बतियाते हैं […]
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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ!

सुधा भारद्वाज “निराकृति” अबोध भूली बाल स्वभाव वह… बहती थी सरिता सम वह… क्या सोच उसे समाज की… कुछ अजब रूढ़ी रिवाज की… परिणाम छूटी शि क्षा उसकी… नही हुई पूरी कोई आस उसकी… सपने देखे बहुत बड़े-बड़े थे… रिश्ते तब सब आन अड़े थे… छूट गयी सभी सखी सहेली… जीवन बना था एक पहेली… […]