
जब खेतों से लौटती है गौरा : सातूं-आठूं में अन्न, बेटी और पहाड़ की स्मृति
प्रकाश चन्द्र पुनेठा
सिलपाटा, पिथौरागढ़
भादो की पंचमी से अष्टमी तक चलने वाला कुमाऊं का यह लोकपर्व केवल गौरा-महेश्वर की आराधना नहीं, बल्कि अन्न, कृषि-चक्र, स्त्री-स्मृति और सामुदायिक जीवन का उत्सव भी है।
पहाड़ में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होते। वे मौसम के साथ आते हैं, खेतों के साथ बदलते हैं और घर-परिवार के रिश्तों में अपना अर्थ खोजते हैं। कुछ पर्व ऐसे भी हैं, जिनमें देवता और मनुष्य के बीच की दूरी बहुत कम रह जाती है। गौरा-महेश्वर का सातूं-आठूं ऐसा ही एक लोकपर्व है।
कुमाऊं के सीमांत अंचल, विशेषकर पिथौरागढ़ में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी से शुरू होकर सप्तमी और अष्टमी तक चलने वाला यह पर्व अपने भीतर पहाड़ के जीवन की कई परतें समेटे हुए है। इसे शिव-पार्वती अर्थात गौरा-महेश्वर से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके अनुष्ठानों में जितनी जगह देवताओं की है, उतनी ही खेत की मिट्टी, अन...









