August 12, 2020
उत्तराखंड समाज/संस्कृति

घर ही नहीं, मन को भी ज्योर्तिमय करता है ‘भद्याऊ’

  • दिनेश रावत

वर्षा काल की हरियाली कितना आनंदित करती है। बात गांव, घरों के आस-पास की हो, चाहे दूर-दराज़ पहाड़ियों की। आकाश से बरसती बूंदों का स्पर्श और धरती का प्रेम, पोषण पाकर वनस्पति जगत का नन्हा-सा नन्हा पौधा भी मानो प्रकृति का श्रृंगार करने को दिन दुगुनी, रात चैगुनी कामना के साथ आतुर, विस्तार पा रहा हो, तभी नज़र आती है धरती अनेकानेक वनस्पतियों से सुसज्जित। खेतों में लहलहाती फसलें जहां मन को मदमस्त कर देती है तो गांव, घरों के आस-पास खेतों, खलियानों, आंगन, गली, चैबारों में उगी अत्यधिक घास-फूस, झाड़ियां अनावश्यक परेशानी का सबब भी बन जाती हैं। बरसात के इस मौसम में चाद तो मानो कई-कई दिनों के लिए खुद को बादलों की गोद में छुपा लेता है। कीट-पतंग, सांप, चूहों की प्रजातियों को देख भी आभास होता है मानो अतिरेक विस्तार पा लिया हो। घरों के आस-पास तैयार मक्का, ककड़ी आदि की फसलों को देख जंगली जानवर भी इनका रसास्वादन करने को गांव, घरों की ओर बढ़ने लगते हैं। यानी आनंद व भय की सांझी तस्वीर लिए श्रावण व भाद्रपद मास लोकवासियों के लिए कौतुहल का खासा अवसर होता है। ग्राम्य जन-जीवन मूलतः कृषि एवं पशुपालन आधारित होता है इसलिए इनकी देखभाल व हिफाजत भी आवश्यक हो जाती है। एक ही मकान की ऊपरी मंजिल में पारिवारिकजनों का निवास और नीचली मंजिल में पशु—मवशियों को रखे जाने के कारण उन्हें रात के अंधेरे में भी कई बार चारा-पति देने, दूध दोहने आदि कार्यों से ऊपर-नीचे चढ़ना उतरना पड़ता है। घुप्प अंधकार से घिरी रातों में विषैले कीटों का डर तथा चीढ़ियां चढ़ने-उतरने की सुविधा के लिए लोक मनीशियों द्वारा तात्कालिक समय में ही ऐसा विकल्प तलाशा गया जो विद्युत व्यवस्था के चलते वर्तमान में भले ही अधिक प्रसांगिक एवं उपयोगी न लगता हो परन्तु इसके मूल में निहित संकल्पना को समझने के लिए हमें उसे काल में जाना होगा, जब शाम होते ही समूचा पहाड़ अंधेरे की काली चादर ओड़ लेता था। पहाड़ी अंचल में दूर-दूर बसे छोटे-बड़ें गांव, घरों में अपनी उपस्थिति का एहसास करवाने के लिए भाद्रपद माह में घरों के बाहर जलते ‘भदयाऊ’ ही एक मात्र विकल्प हुआ करते थे, इन्हीं के सहारे ग्राम्य वर्षा ऋतु में घर-बाहर के काम निपटाया करते थे।

भद्याऊ विषमताओं में साम्यता स्थापित करते हुए हास-परिहास, उमंग, उत्साह एवं उल्लास से भरा एक ऐसा पर्व है, जिसके मूल में लोकवासियों का व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समाहित है। भाद्रपद के इस त्यौहार को समूचे रवांई में समान रूप से मनाया जाता है किंतु स्थान विशेष के आधार पर मोरी क्षेत्र में इसे ‘चीड़ा’ के रूप में जाना जाता है।

 

यह लोकवासियों की विशिष्टता ही रही है कि जीवन की व्यस्तम दिनचर्या एवं प्रतिकुल मौसम को भी पर्व, त्यौहार, उत्सव मनाकर अनुकूल बना लेते थे। लोकवासियों की इसी विशिष्टता का प्रतिफल है भाद्रपद मास में मनाया जाने वाला ‘भद्याऊ’। भद्याऊ विषमताओं में साम्यता स्थापित करते हुए हास-परिहास, उमंग, उत्साह एवं उल्लास से भरा एक ऐसा पर्व है, जिसके मूल में लोकवासियों का व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समाहित है। भाद्रपद के इस त्यौहार को समूचे रवांई में समान रूप से मनाया जाता है किंतु स्थान विशेष के आधार पर मोरी क्षेत्र में इसे ‘चीड़ा’ के रूप में जाना जाता है।

उल्लेखनीय है कि सामाजिक एवं सांस्कृतिक विशिष्टता के धनी रवांई क्षेत्र के लोकपर्वों में प्रमुखता से शामिल भद्याऊ आमूल-चूक परिवर्तन के साथ आज भी अपना वजूद बनाए हुए है। प्रचलित परम्परानुसार लोकवासी श्रावण मास अवसान एवं भाद्रपद आरम्भ यानी संक्रांति के दिन अपने-अपने घरों के मुख्य द्वार पर भद्याऊ लगाते हैं। घर की देहरी पर भदयाऊ स्थापित करने के लिए ‘दर्बा’ नामक एक विशेष प्रकार की वनस्पति या घास को उपयोग में लाया जाता है, जो घरों के आस-पास ही आसानी से उपलब्ध हो जाती है। भद्याऊ के लिए साफ-सुधरी जगह पर उगे दुर्बा को समूल उखाड़ कर उपयोग में लाने की परम्परा है। जड़ से शिखर तक यह किसी भी प्रकार से क्षति ग्रस्त नहीं होना दर्बा चयन का मुख्य मापदंड है। भदयाऊ स्थापना हेतु कुछ खास लोक व्यंजन जैसे पांच दोहरी रोटियां अर्थात ‘दुनल्यिा’, मौसमानुकूल सभी प्रकार की मिश्रित सब्जी तथा बिना पानी मिले दूध की खीर विशेष रूप से बनायी जाती है।

भादौं क मैना कि समलौण

संक्रांति के दिन सूर्यास्त होते-होते क्षेत्रवासी भद्याऊ पूजन की तैयारी में जूट जाते हैं और अंधेरा होते ही सभी घरों में भदयाऊ अपने वजूद में आ जाता है। भदयाऊ स्थापना के लिए समूल लाये गये दर्बा के शिखर भाग को आगे तथा मूल को पीछे की ओर रखा जाता है। दर्बा की जड़ों में फंसी मिट्टी को हटाने की बजाय इसमें जौ के बीज अंकुरण हेतु डाल कर ऊपर से स्लेटनुमा पत्थर से ढक दिया जाता है। स्थान शुद्धिकरण हेतु संबंधित स्थान का गंगाजल, जल, गौमुत्र एवं दुग्ध इत्यादि से परिवार के मुखिया द्वारा शुद्धिकरण कर भदयाऊ स्थापित किया जाता है। मुखिया के साथ पारिवारिक बच्चे हाथों में देवदार, कैल, चीड़ की लकड़ी के छिल्कों की मसाल रूपी प्रज्जलित बंडल थामें उत्साहित होकर सजोश ‘‘भद्याओऽऽ, भद्याओ!! हमारऽ भितरऽ क मुस-बिराव, सब्बा …..क दारक नओ।’’ (…. के स्थान पर वे अपने ही किसी पड़ोसी साथी के नाम का उच्चारित करते हैं, जो स्थान विशेष के आधार पर भिन्न-भिन्न होता है।) पंक्तियों को दोहराते हुए छिलकों के बंडल को भदयाऊ के ऊपर रख देते हैं। आस-पड़ोस के बच्चों में भदयाऊ के ऊपर छिलके जलाते हुए हास-परिहास व मनरंजन का यह दौर महीने भर जारी रहता है। रवांई क्षेत्र के नौगांव, पुरोला क्षेत्र के बच्चे जहां ‘‘भद्याओऽऽ, भद्याओ!! हमारऽ भितरऽ क मुस-बिराव, सब्बा …..क दारक दौड़ौऽ।’’ तो इसी क्षेत्रांतर्गत मोरी क्षेत्र में इन्हें कुछ इस प्रकार बोला जाता है: ‘‘चिचांडो-भदरोवों मेर चीड़ जलिगू, तेर चीड़ हिसगु,’’, ‘तेर चीड़ गाड़ी-गाड़ऽ, मेरअ चीड़ धारी-धारऽ’’…।

घुप्प तिमिर में घर के बाहर जलते भद्याऊ से घर का बाहरी हिस्सा ही आभामय नहीं होता बल्कि बाल मुख से फुटती स्वर लहरियां भी अद्वितीय आनंद व उल्लास का एहसास कराती हैं। मुखिया द्वारा दूप, दीप, नैवेद्य, गंध, अक्षत, पत्र-पुष्प द्वारा पूजा-अर्चना करते हुए भोज्य पदार्थों का भोग लगाकर भद्याऊ स्थापना की रस्म पूरी होती है। पूरे महीने भर अंधेरा होते ही नित्य इस पर जलते छिल्के रखे जाते हैं और भाद्रपद समाप्ति पर इस पुनः विविधत पूज कर विस्थापित कर दिया जाता है।

लोक प्रचलित भद्याऊ परम्परा को यदि व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक कसौटी पर कसने का प्रयास किया जाये तो वर्तमान में बिजली की उपलब्धता के चलते इसके महत्व को भले ही कमत्तर आंका जाये लेकिन तात्कालिक काल खंडों पर दृष्टिपात करने से इससे मूल में निहित व्यवहारिक एवं वैज्ञानिक पक्ष पर किसी भी प्रकार से शक की कोई गुंजाइश शेष नहीं दिखती है। इसलिए सारतः कहा जा सकता है कि भदयाऊ अंधकार से प्रकाश, निराशा से आशाओं की ओर लौटने का एक प्रमुख लोकपर्व है, जिसकी जीवन्तता को बनाये रखना हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी बनती है।

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