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श्रावणी : बादल को घिरते देखा है…

श्रावणी : बादल को घिरते देखा है…

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मंजू दिल से… भाग-21 मंजू काला मेघों की तासीर परखने की ऋतु है सावन व आंखें यदि उपजने वाले दुःख के कारण अविरल बरसें या प्रसन्नता के कारण झूमकर बरस पड़ें, याद सावन की ही आती है. सावन मिलन का भी विग्रह है और विरह का भी, हम उसे अपने-अपने भाव से पूज सकते हैं. सावन मन की वह भागवत है जिसके आनंद को हमारा मन बांचता है और वह गीतगोविंद है जिसकी हरेक अष्टपदी के हरेक शब्द पर देह का रोम-रोम थिरकता है. सावन की झड़ी में बरसने वाली हर बूंद में नृत्य की पुलक समाई रहती है. ये बरसती नहीं थिरकती है... सच में! वैदिक ऋषि वर्षा के देवता पर्जन्य की पिता के रूप में अभ्यर्थना करता है, वाल्मीकि मेघमाल को ऐसी सीढ़ी कहते हैं जिस पर चढ़कर कुटज और अर्जुन की माला से हम सूर्य का अभिनंदन कर सकते हैं. ‘मृच्छकटिकम्’ में शूद्रक गरजते मेघ, आंधी और कौंधती बिजली को आकाश की डरावनी जम्हाई कहते हैं और भर्तृहरि से लेकर जयदे...
 भारत की कृषि कहावतें: कहे घाघ के सुन भडूरी!

 भारत की कृषि कहावतें: कहे घाघ के सुन भडूरी!

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मंजू दिल से… भाग-32 मंजू काला कुछ पखवाड़े पहले की बात है, सुबह की चाय सुड़कते हुए एक समाचार ने मेरा ध्यान आकर्षित किया था कि  कृषि विभाग किसानों को मौसम अनुमान करने के लिए  कहावतें पढा रहा है, पढकर मुझ जैसी आधुनिका का आश्चर्य चकित होना लाजमी था,   उत्सुकता वश मैंने पड़ताल की तो  पाया कि सदियों पहले हमारे देश में  कृषि के संबंध में कुछ मुहावरे  कहे गये हैं!   मैंने जब गहराई से इन कहावतों की बाबत जानकारी इकट्ठा की तो समझ गयी की  ये  मुहावरे,  कहावतें, लोकोक्तियाँ  हमारे देश की कृषक संस्कृति  को बयां करती है,  इनमें ज्ञान भरा होता है। वैसे अरबी भाषा में एक कहावत है-, "अल-मिस्लफ़िल कलाम कल-मिल्ह फ़िततआम"  यानी बातों में-कहावतों या मुहावरों और उक्तियों की उतनी ही ज़रूरत है जितनी की खाने में नमक की।"    ग्रामीण लोक अपनी बात में वजन पैदा करने के लिए अक्सर  इन  मुहावरों का इस्तेमाल करते है...
बूंदेली “सावनी” और चपेटे

बूंदेली “सावनी” और चपेटे

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मंजू दिल से… भाग-31 मंजू काला लोकजीवन की सरिता सुख और दुःख के दो किनारों के बीच निरंतर बहती रहती है. यह सही है कि लोकोत्सव सुख के तट पर उगे हरे-भरे वृक्ष हैं, जो अपनी खुराक सुख-दुःख से बँधी जलराशि से ही लेते हैं, लेकिन यह भी असत्य नहीं है कि दुःख का किनारा टूट जाने पर सरिता की अस्मिता खत्म हो जाती है और फिर वृक्षों के उगने का सवाल ही नहीं उठता. मतलब यह है कि लोकोत्सवों का जन्म जीवन की उन घटनाओं से जुड़ा हुआ है, जो सुख-दुःख पर निर्भर न होकर उनकी उपयोगिता के महत्त्व से संबद्ध हैं. राम् नवमी और जन्माष्टमी राम और कृष्ण के महत्कार्यों और लोकादर्शों को सामने रखकर मनायी जाती हैं. महापुरुषों की जयंतियाँ मृतकों के प्रति श्रद्धा -सम्मान का नैवेद्य है. मृतकों या उनकी स्मृति से जुड़ी दुःख की अनुभूति धीरे-धीरे उनके कार्यों, आदर्शों और तज्जन्य यश पर केन्द्रित होकर सुखात्मक हो जाती है. फिर इस देश की ...
राग मल्हार : करे, बादरा, घटा घना घोर

राग मल्हार : करे, बादरा, घटा घना घोर

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मंजू दिल से… भाग-30 मंजू काला पावस ऋतु में मल्हार अंग के रागों का गायन-वादन अत्यन्त सुखदायी होता है. वर्षाकालीन सभी रागों में सबसे प्राचीन राग मेघ मल्हार माना जाता है. काफी थाट का यह राग औड़व-औड़व जाति का होता है, अर्थात इसके आरोह और अवरोह में 5-5 स्वरों का प्रयोग होता है. गांधार और धैवत स्वरों का प्रयोग नहीं होता. समर्थ कलासाधक कभी-कभी परिवर्तन के तौर पर गांधार स्वर का प्रयोग करते हैं. भातखंडे जी ने अपने ‘संगीत-शास्त्र’ ग्रंथ में भी यह उल्लेख किया है कि कोई-कोई कोमल गांधार का प्रयोग भी करते हैं. लखनऊ के वरिष्ठ संगीत-शिक्षक और शास्त्र-अध्येता पंडित मिलन देवनाथ के अनुसार लगभग एक शताब्दी पूर्व राग मेघ में कोमल गांधार का प्रयोग होता था. आज भी कुछ घरानों की गायकी में यह प्रयोग मिलता है.. ऋतुओं में से पावस एक महत्वपूर्ण व उपयोगी ऋतु है. यह जीवन दायिनी ऋतु है. अन्न-जल और धान्य का बरखा...
बारहमासा : विरह और मिलन की क्रियाओं का चित्रण!

बारहमासा : विरह और मिलन की क्रियाओं का चित्रण!

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मंजू दिल से… भाग-29 मंजू काला फ़ागुन महीना... फूली सरसों... आम झरे.. अमराई.... मै अंगना में चूप- चूप देखूँ ऋतु बसंत की आई.....!!!!!   ऋतु ...बसन्त की आई! फ़ागुन का महीना... सरकती ठंड की फुरफुरी,  गुन- गुन-गुनाता मौसम,  सप्तपदी के फेरों सीं "दें" लगाती ऋतुएँ औऱ वनों के बीच बुराँश कचनार-   आह  टेशू  भी फूल उठें होंगे शायद!  अरे भाई,  पत्तों से भरी डालियों पर फ़ाख्ता भी बोल रही होगी शायद.! मेरे प्यारे पहाड़ों के गदेरों में चातकी भी बोल रही होगी मालूम!? पीले पड़ते गेहूँ, जौ के खेतों में, कफू  भी उड़ रही होगी शायद, औऱ... और,  सरसों की  वल्लरियों पर...मधुकरियाँ भी गुनती होंगी.....शायद! किसी रमणी का पति परदेश से अभी आया नहीं होगा शायद, युद्धरत होगा शायद, भूल गया होगा अपनी प्रिया को, शायद, वह पंछियों से शिकायत करती होगी शायद औऱ ऐसी ही विरहणी नायिका के लिये “बारह मासा”   लिखा होगा ...
शिवरात्रि विशेष  : भारत में प्रेम का प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर शिव!

शिवरात्रि विशेष : भारत में प्रेम का प्रतीक हैं अर्धनारीश्वर शिव!

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अरूप में रूप:  शिव-  सौंदर्यम मंजू दिल से… भाग-27 मंजू काला खेले मसाने में होरी चिदंबर खेले मसाने में होरी भूत- पिशाच बटोरे दिगंबर खेले मसाने में होरी! शिव का नाद करने से पहले मै एक विचत्र होली का वर्णन करना चाहती हूँ! वह विचित्र होली है जिसे भगवान शिव खेलते हैं, वो भी काशी के मणिकर्णिका घाट पर! रंग एकादशी के दूसरे दिन काशी में स्थित श्मशान पर  चिताओं की भस्मी के साथ होली खेलने की एक अनूठी परंपरा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार इस परंपरा की शुरुआत शंकरजी से ही मानी जाती है। मान्यताओं के अनुसार- जब भगवान शिव, पार्वती का गौना कराने के लिए आये थे तो उनके साथ भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष गन्धर्व, किन्नर जीव जंतु आदि  थे,  और  उन्होंने वहीं मणिकर्णिका पर होलिकोत्सव - श्मशान पर चिताओं की भस्मी से  खेल कर मनाया! लखि सुंदर फागुनी छटा के मन से रंग-गुलाल हटा के चिता, भस्म भर झोरी दिगंबर...
राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

राग-बसंत बहार  और बावरा बैजू

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मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 26वीं किस्त… म...
चंद्रशिला: राम, रावण और चंद्रमा ने जहां तपस्या कर शिव को किया प्रसन्न!

चंद्रशिला: राम, रावण और चंद्रमा ने जहां तपस्या कर शिव को किया प्रसन्न!

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यात्रा वृत्तांत  जे पी मैठाणी/फोटो– पूनम पल्लवी पहाड़ अडिग हैं – तुंग यानी पर्वत या चोटी के शीर्ष के साथ. यात्रा आगे जारी है – चन्द्रशिला की ओर , जो 2 किलोमीटर ऊपर है – तुंगनाथ मंदिर से . पिछले लेख में मैंने – आप सभी को श्री तुंगनाथ शिव मंदिर के बारे में बताया था - अभी हमने श्री तुंगनाथ के दर्शन किये – पाँव बुरी तरह से ठन्डे हो गए हैं, जूते बदलने वाले स्थान पर बहुत भीड़ है मंदिर के दाहिने ओर छोटे – छोटी कटुवा पत्थर के  पांडवों के मंदिर भी है. तुंगनाथ मंदिर के मुख्य द्वार के ठीक सामने जो नंदी विराजमान है लगता है बेहद शांत हैं , उनके सारे शरीर पर चन्दन, लाल पिठाई (रौली)  चांवल पोत दिए गए हैं, भक्त नंदी के कान में मंत्र या अपने अपने मनोकामना की प्रार्थना कर रहे हैं  ऐसा ही ठीक मैंने भी किया  जीवन में पहली बार पर माँगा कुछ नहीं. इस सारे परिदृश्य  और शिव के जयकारों के बीच हमने मंदिर प्र...
आस्था के पथ पर मेरी गोमुख यात्रा…

आस्था के पथ पर मेरी गोमुख यात्रा…

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यात्रावृत्तांत डॉ कपिल पंवार गंगा नदी, सांस्कृतिक वैभव, श्रद्धा एवं आस्था की प्रतीक मानी जाती हैं. सदियों से भारतीय समाज के हर वर्ग और समुदाय ने अपनी भावनात्मक ऊर्जा का प्रतीक मानकर गंगा की स्तुति की. पौराणिक काल से ही गंगा, ममतामयी माँ के रूप में पूजनीय है. गंगा, श्रद्धा और विश्वास के रूप में  पतित पावनी है तो जलापूर्ति के रूप में  जीवनदायनी भी. गंगा आदिकाल से ही भारत की आस्था, श्रद्धा का केंद्र होने के साथ ही दिव्य मंगलमयी कामना की पुण्यसलिला रही है. इसी आस्तिक अवधारणा का भाव लिए श्रद्धालु एक बार उस स्थान तक अवश्य पहुंचना चाहता है जहाँ से गंगा का उद्गम है. श्रद्धालु गंगोत्री धाम से 18 किमी की पैदल दूरी तय करके गोमुख तक पहुंचता है. गोमुख तक की यह यात्रा वही श्रद्धालु करता है, जो उच्च हिमालयी क्षेत्र के कारण आक्सीजन की कमी और पैदल यात्रा की चुनौती के लिए शारीरिक रूप से सक्षम हो ले...
हिमालय के सावनी गीत…

हिमालय के सावनी गीत…

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मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से ‘मंजू दिल से…’ नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 25वीं किस्त… म...