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बहुत-सी रंग-वालियों का देश है हिन्दुस्तान

मंजू दिल से… भाग-24 कृष्ण-कटिकम: जब आप ‘गीत गोविंद’ का नृत्य करते हैं, तो कृष्ण को अपने आस-पास महसूस कर  सकते हैं मंजू काला नृत्य एक ऐसी विधा है जो मनुष्य के जन्म के बाद ही शुरू हो जाती है, या यूँ कह लीजिए की ये इन्सान के जन्म के साथ ही अभिव्यक्तियाँ देना आरम्भ […]
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नदी द्वीप- माजुली और मलाई कोठानी

मंजू दिल से… भाग-23 मंजू काला ‘एकांत कभी-कभी सबसेअच्छा समयहोता है.’ – जान मिल्टन, इन पैराडाइज़ लास्ट मिल्टन की उपरोक्त पंक्तियों को परिभाषित करती हैं जाड़ों की बोझिल और ठिठुररती शामें. इन ठिठुररती शामों के  दौरान मै बैठे-ठाले ही यात्राएँ करने लगती हूँ. असल में कुछ यात्राएँ हम रेल मार्ग से करते हैं, because कुछ सड़क मार्ग से, कुछ हवाई मार्ग से […]
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भद्रज मंदिर मानो बांज की सरणी से चमकती मणि

भद्रज मंदिर: यात्रा वृत्तांत सुनीता भट्ट पैन्यूली जिज्ञासा से था आकुल मन वह मिट्टी, हुई कब तन्मय मैं, विश्वास मांगती थी प्रतिक्षण आधार पा गयी निश्चय मैं! बाधा-विरोध अनुकूल बने अंतर्चेतन अरूणोदय में, पर भूल विहंस मृदु फूल बने मैं विजयी प्रिय,तेरी जय में. –सुमित्रा नंदन पंत जिस चरम पर पहुंचकर आकांक्षाओं की पूर्ति तो […]
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हरिद्वार की यात्रा बिना ऋषिकेश जाए पूरी नहीं होती…

   डॉ. कायनात काजी फोटोग्राफर, ट्रैवल राइटर और ब्लॉगर, देश की पहली सोलो फिमेल ट्रैवलर   हरिद्वार की यात्रा बिना ऋषिकेश जाए पूरी नहीं होती, आप जब भी हरिद्वार जाएं एक दिन एक्स्ट्रा लेकर जाएं जिससे ऋषिकेश भी घूम आएं. ऋषिकेश हरिद्वार से 25 किमी दूर है. because तीन दिशाओं से पहाड़ियों से घिरा, जिसके […]
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शंहशाह: लक्ष्मी पूजन कर गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश करते थे!

मुगलों का जश्ने-ए-चराग मंजू दिल से… भाग-22 मंजू काला “जश्ने- ए-चराग” के संदर्भ में कुछ कहने से से पहले मैं दीपावली की व्याख्या कुछ अपने अनुसार करना चाहूंगी चाहुंगी. दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘दीप’ अर्थात ‘दिया’ व ‘आवली’ अर्थात ‘लाइन’ या ‘श्रृंखला’ के मिश्रण से हुई है. इसके उत्सव में घरों […]
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हंगरी से उत्तराखंड की विहंगम यात्रा

पीटर शागि सहायक व्याख्याता, ऐल्ते विश्वविद्यालय, बुदापैश्त, हंगरी एवं ठेठ घुमक्कड़ पहाड़ है ही अलग. मेरे हंगरी से फिर तो निश्चित ही. दुना-डेन्यूब के किनारे बसे मेरे बुदापेश्त से हम लोग कुछ ऐसी ललचाई आँखों से उनकी ओर देखते हैं, जैसे दिल्ली शहर. इतने साल पहले भारत में because जब पहला लंबा समय बिताया था, […]
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क्या है रेशम मार्ग?

मंजू दिल से… भाग-21 मंजू काला वोल्गा से लेकर गंगा तक  के प्राणी ने अपनी जरूरतों के लिए हजारों मीलों का सफर तय  किया  है! कभी उसने शिकार की खोज में यात्रा की, तो  कभी आशियाने के लिए वह भटकता रहा है!  शनै-शनै जब  उसमें थोड़ी चेतना  की सुगबुगाहट हुई तो उसने  व्यापार के लिए  […]
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क्या हैं चावल से जुड़ी मान्यताएं व रस्में…

देहरादून के बासमती चावल की दुनियाभर में रही है धाक! मंजू दिल से… भाग-20 मंजू काला आज धानेर खेते रोद्र छाया लुको चोरी खेला  रे भयी लुको चोरी खेला रे! (ठाकुर जी का रविंद्र संगीत) प्राचीन समय से ही भारतीय थाली में दाल और चावल परोसने की परंपरा रही है. चावल की दुनियाभर में तकरीबन […]
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चंदेरी साड़ियां : मी टू, अहिल्याबाई होल्कर

मंजू दिल से… भाग-19 मंजू काला किसी भी भारतीय महिला की संदूकची, या अलमारी कोई …खोजी पति… खंगालेगा (जो पत्नी के खजाने की टोह लेता हो )  तो उसे  उनमें झिलमिल करती चंदेरी साड़ियां जरूर झांकते हुए नजर आ.. जायेंगी!   मैं भी जब अपने साड़ियों के पिटारे को खोलती हूँ… (यह मेरा प्रिय शगल है! […]
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‘संझा’ देवी को सर्वाधिक प्रिय है सफेद फूल

मंजू दिल से… भाग-18 मंजू काला कवार मास का प्रारंभ …यानी शरद ऋतु का आगमन जिसमे रंग-आकृति और गंध वाले फूलों की बहुतायत देखने को मिलती है. ये फूल केवल कला की उत्कृष्टता को इंगित नहीं करते वरन उनकी समग्र सुगंधावली का भी प्रस्फुटन करते हैं. इसी प्रकृति उल्लास के साथ बालिका पर्व यानी सांझी […]