लोक पर्व-त्योहार

जौनसार-बावर : लोक आस्था, शौर्य का उत्सव है ‘पायन्ता’

जौनसार-बावर : लोक आस्था, शौर्य का उत्सव है ‘पायन्ता’

लोक पर्व-त्योहार
  जौनसार-बावर का अनूठा ‘पाइंता पर्व’: देव आराधना, शस्त्र पूजन, वीर गाथाओं और पश्चाताप की सदियों पुरानी परंपराओं का संगमइन्द्र सिंह नेगी वरिष्ठ पत्रकार उत्तराखंड के जनजातीय क्षेत्र जौनसार-बावर की लोक संस्कृति अपनी विशिष्ट परंपराओं, देवी-देवताओं के प्रति अगाध आस्था और ऐतिहासिक विरासत के लिए अलग पहचान रखती है। यहाँ विजयदशमी का पर्व देश के अधिकांश हिस्सों से बिल्कुल अलग स्वरूप में मनाया जाता है। जहाँ सामान्यतः दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के प्रतीक के रूप में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन के साथ मनाया जाता है, वहीं जौनसार-बावर में परंपरागत रूप से रावण-दहन के बजाय देव आराधना, शस्त्र पूजन, वीरों के स्मरण और सामूहिक उल्लास का पर्व ‘पाइंता’ मनाया जाता है। जौनसार-बावर के महासू महाराज और सिलगुर महाराज के देवालयों में पाइंता विशेष श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। बिस...
विजयादशमी 2026: धर्म की रक्षा, श्रीराम की विजय और रामराज्य का शाश्वत संदेश

विजयादशमी 2026: धर्म की रक्षा, श्रीराम की विजय और रामराज्य का शाश्वत संदेश

लोक पर्व-त्योहार
विजयादशमी (20 अक्टूबर, 2026)  पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा       कठिन और लंबे वनवास के बाद श्रीराम द्वारा रावण के साथ लंका में युद्ध के बाद विजय प्राप्त करने की स्मृति को सजीव करता विजयादशमी का पर्व भारत के जन-जीवन में विशेष महत्व रखता है। यह याद दिलाता है कि आसुरी वृत्तियाँ जीवन-द्रोही होती हैं और उनका प्रतिकार करने के लिए तत्पर रहना आवश्यक है। यह पर्व भारतीय संस्कृति में जीवन मूल्यों को स्थापित करने की सतत कामना और उसके लिए संघर्ष की अनिवार्यता को भी व्यंजित करता है। श्रीराम की मंगलदायी छवि पौरुष और चरित्र के उत्कर्ष के रूप में लोक मन में अंकित है। पर उत्कर्ष से वह दूर नहीं, बल्कि पास आ जाते हैं। उनकी विशिष्टता यही है कि उनका जैसा आत्मीय कोई और नहीं मिलता। लोक से श्रीराम का तादात्म्य इतना गहरा...
माँ नंदा देवी राजजात: उत्तराखंड की बेटी की कैलाश यात्रा और सदियों पुरानी परंपरा

माँ नंदा देवी राजजात: उत्तराखंड की बेटी की कैलाश यात्रा और सदियों पुरानी परंपरा

लोक पर्व-त्योहार
 डॉ. प्रवेश कुमार जा मेरी लाड़ली नंदा ते ऊँचा कैलाश। ना-ना बाबा, मैं नी जानदू ते ऊँचा कैलाश।। इस गीत की पंक्तियों के साथ माँ नंदा देवी की यात्रा शुरू हो जाती है। हमारी भारत भूमि अपनी विविधता और उसमें विद्यमान एकता के लिए विश्व में पहचानी जाती है। इस विविधता को हम एक उत्सव के रूप में मनाते हैं। इसी प्रकार हमारे पहाड़ों में हर चोटी पर एक देवता और उसे पूजने वाले भक्त हमें मिल जाते हैं। इस लेख में मैंने उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में रची-बसी माँ नंदा देवी लोकजात और राजजात पर चर्चा की है। अभी पिछले दिनों यह यात्रा (लोकजात) प्रत्येक वर्ष की भाँति प्रारंभ हुई, हालाँकि लोकजात तो प्रत्येक वर्ष होती है। लेकिन पहले तो यह सुनने में आया कि इस बार लोकजात के साथ राजजात भी होगी। फिलहाल इस पर स्थानीय लोगों में कुछ संशय बना, लेकिन फिर भी चौसिंघा खाड़ू के साथ 5 सितंबर को यह यात्रा प्रारंभ हो गई।...
बौल्याधार में गूंजा लोक संस्कृति का रंग, देव डोलियों के सानिध्य में थिरके कदम

बौल्याधार में गूंजा लोक संस्कृति का रंग, देव डोलियों के सानिध्य में थिरके कदम

उत्तरकाशी, लोक पर्व-त्योहार
  हर तीसरे वर्ष आयोजित होने वाले ऐतिहासिक मेले में उमड़ा आस्था और परंपरा का सैलाबनीरज उत्तराखंडी, उत्तरकाशीगाजणा क्षेत्र के ठांडी गांव स्थित बौल्याधार में आयोजित तीन दिवसीय ऐतिहासिक एवं पौराणिक मेला रविवार को पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और लोक संस्कृति के रंगों के बीच संपन्न हुआ। 4 से 6 सितंबर तक चले इस मेले में क्षेत्र की लोक आस्था, देव परंपरा, पशुपालन और पारंपरिक संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला। हर तीसरे वर्ष आयोजित होने वाला यह मेला गाजणा क्षेत्र के ग्रामीणों के लिए केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का महत्वपूर्ण अवसर भी माना जाता है। मेले में आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में ग्रामीण और श्रद्धालु पहुंचे तथा देवडोलियों के दर्शन कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।देवडोलियों के सानिध्य में हुए धार्मिक अनुष्ठान मेले में...
जब खेतों से लौटती है गौरा : सातूं-आठूं में अन्न, बेटी और पहाड़ की स्मृति

जब खेतों से लौटती है गौरा : सातूं-आठूं में अन्न, बेटी और पहाड़ की स्मृति

पिथौरागढ़, लोक पर्व-त्योहार
 प्रकाश चन्द्र पुनेठा सिलपाटा, पिथौरागढ़ भादो की पंचमी से अष्टमी तक चलने वाला कुमाऊं का यह लोकपर्व केवल गौरा-महेश्वर की आराधना नहीं, बल्कि अन्न, कृषि-चक्र, स्त्री-स्मृति और सामुदायिक जीवन का उत्सव भी है। पहाड़ में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीखें नहीं होते। वे मौसम के साथ आते हैं, खेतों के साथ बदलते हैं और घर-परिवार के रिश्तों में अपना अर्थ खोजते हैं। कुछ पर्व ऐसे भी हैं, जिनमें देवता और मनुष्य के बीच की दूरी बहुत कम रह जाती है। गौरा-महेश्वर का सातूं-आठूं ऐसा ही एक लोकपर्व है। कुमाऊं के सीमांत अंचल, विशेषकर पिथौरागढ़ में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पंचमी से शुरू होकर सप्तमी और अष्टमी तक चलने वाला यह पर्व अपने भीतर पहाड़ के जीवन की कई परतें समेटे हुए है। इसे शिव-पार्वती अर्थात गौरा-महेश्वर से जोड़ा जाता है, लेकिन इसके अनुष्ठानों में जितनी जगह देवताओं की है, उतनी ही खेत की मिट्टी, अन...
हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

हिलजात्रा: मुखौटों में जीवित सोर घाटी की 500 साल पुरानी लोक-स्मृति

पिथौरागढ़, लोक पर्व-त्योहार
 प्रकाश चन्द्र पुनेठा सिलपाटा, पिथौरागढ़ पिथौरागढ़ की सोर घाटी में हिलजात्रा केवल एक लोकपर्व नहीं, बल्कि पहाड़ के उस सामूहिक जीवन की स्मृति है, जिसमें खेती, पशु, जंगल, देवता और मनुष्य एक-दूसरे से अलग नहीं थे। कुमौड़ में मनाया जाने वाला यह पर्व लगभग पाँच सौ वर्षों की परंपरा को अपने भीतर समेटे हुए है। समय बदला, खेतों की मेड़ें सूनी होने लगीं, गांवों से पलायन बढ़ा और खेती का स्वरूप भी बदलता गया, लेकिन हिलजात्रा आज भी उस लोक-संसार की बची हुई आवाज की तरह हमारे सामने आती है। हिलजात्रा के केंद्र में उसके मुखौटे और पात्र हैं—लखिया भूत, वीरभद्र तथा खेती-किसानी और ग्रामीण जीवन से जुड़े अनेक रूप। ये मुखौटे केवल मनोरंजन के लिए नहीं हैं। इनके पीछे पहाड़ के लोकजीवन की गहरी स्मृतियां छिपी हैं। जब कलाकार इन्हें धारण करते हैं, तो उनके चेहरे भले ही ओझल हो जाते हैं, लेकिन उन्हीं मुखौटों के भीतर...
आजादी के 80 वर्ष: भारत की स्वतंत्रता, स्वराज और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की चुनौती

आजादी के 80 वर्ष: भारत की स्वतंत्रता, स्वराज और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति की चुनौती

लोक पर्व-त्योहार
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2026)  पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा     स्वतंत्रता निश्चय ही सभ्य मानव समाज का सर्वोत्तम आविष्कार है जो मनुष्य को अपने चुने हुए लक्ष्यों को पाने के लिए सामर्थ्यसंपन्न बनाती है। आज विकास, प्रगति और उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए स्वतंत्रता को सबसे ताकतवर हथियार माना जाता है। स्वतंत्रता समर्थ बनाती है यही सोच कर पराधीनताओं की बेड़ियों को तोड़ने के लिए विश्व में अनेक संग्राम होते आ रहे हैं। अभी भी म्यांमार जैसे कई देशों में तानाशाही के ख़िलाफ़ बेचैनी है और उसके आतंक का प्रतिरोध जारी है। वस्तुतः प्राणिमात्र उस नैसर्गिक परिस्थिति में ही जीना चाहता है जिसमें मुक्त हो कर अपनी शर्तों पर जिया जा सके। परतंत्र होने पर गोस्वामी तुलसीदास के शब्दों में सपने भी सुख नसीब नहीं होता: पराधीन सप...
चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

चांदणी धार पूजन : जहां पक्षियों से संवाद करती है आस्था

पर्यावरण, लोक पर्व-त्योहार
  तुंगनाथ घाटी : लोकज्ञान, पर्यावरण और विज्ञान का अद्भुत संगमआशिता डोभाल उत्तराखंड का पहाड़ केवल भौगोलिक संरचना भर नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मानव के सहअस्तित्व का जीवंत दर्शन है। यहां की जीवनशैली में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन—इन ‘5 ज’ का गहरा रिश्ता है। यही कारण है कि पर्वतीय समाज ने प्रकृति को संसाधन नहीं, बल्कि संबंध माना है। इस संबंध की एक अनूठी मिसाल रुद्रप्रयाग जिले की तुंगनाथ घाटी में आज भी जीवित है—चांदणी धार पूजन। विरासत में मिली पर्यावरण चेतना तुंगनाथ बाबा का शीतकालीन प्रवास स्थल मक्कूमठ केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चेतना के केंद्र के रूप में भी जाना जाता है। यह क्षेत्र वन आंदोलनों की भूमि रहा है। यहाँ की लोकमानस में गूंजने वाला नारा— “मौण द्यौला पर बौण ना” (गर्दन कटवा देंगे, पर जंगल नहीं कटने देंगे) यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति...
स्वावलंबी विकास की ओर- आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक

स्वावलंबी विकास की ओर- आत्मबोध से आत्मनिर्भरता तक

लोक पर्व-त्योहार
  दीपावली पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा  इस साल दीपावली का पर्व देश के लिए इस अर्थ में विशेष है कि वह हमें स्वयं की पहचान के लिए आमंत्रित कर रहा है। इसका तकाजा है कि हम विभिन्न प्रकार के भ्रमों के आवरण से मुक्त हो कर प्रकाश का वरण करें। राह में आते तिमिर को दूर करने के लिए प्रकाश का यह पर्व हमें स्वयं को जगा कर ज्योति का वाहक बनने के लिए प्रेरित करता है। अपनी शक्ति को पहचानना ही वह आधार है जो आज की वैश्विक अस्थिरता और उथल-पुथल वाले अनिश्चय के वातावरण में हमें सहारा दे सकेगा। आज के जटिल होते परिवेश में इसे सुखद आश्चर्य ही कहेंगे कि तमाम विघ्न-बाधाओं को पार करते हुए भारत धन-धान्य की दृष्टि से अनेक देशों की तुलना में और स्वयं अपने पिछली उपलब्धियों की तुलना में उल्लेखनीय रूप से संतोषजनक स्थिति में है।...
भविष्य का भारत: स्वायत्त और स्वावलंबी!

भविष्य का भारत: स्वायत्त और स्वावलंबी!

लोक पर्व-त्योहार
स्वतंत्रता दिवस (15 अगस्त, 2025) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र, शिक्षाविद् एवं पूर्व कुलपति पराधीन सपनेहु सुख नाहीं! अपनी अमूल्य कृति “रामचरितमानस “में गोस्वामी तुलसीदास जी की यह उक्ति प्राणि मात्र के जीवन की एक प्रमुख सच्चाई को दर्शाती है कि दूसरे के अधीन रहने वाले को सपने में भी सुख नसीब नहीं होता. पराधीन रहते हुए भारत वर्ष ने लगभग हज़ार वर्ष की लंबी अवधि तक अनेकानेक कष्ट सहे और यातनाएँ झेलीं. भारत की पहचान बदलने के लिए न सिर्फ़ नाम ही बदला गया, पहले हिन्दुस्थान फिर इंडिया, बल्कि उसके मानस, संस्थाओं और संस्कार सबको नए साँचे में ढालते रहने की कोशिश जारी रही. तरह-तरह के शोषण द्वारा विदेशी आक्रांताओं ने भारत को विपन्न बनाने की लगातार कोशिश की. अंग्रेज़ों ने उपनिवेश बना कर हद ही कर दी. उन्होंने भारत का भरपूर दोहन किया और शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी. अपने ही देश में ख़ुद को अस्वीकृत ...