January 25, 2021
Home Posts tagged उत्तराखंड (Page 3)
शिक्षा

प्रशासनिक हिन्दी शब्दावली के शब्द शिल्पी डॉ. नारायण दत्त पालीवाल

हिन्‍दी दिवस (14 सितंबर) पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी 14 सितम्बर का दिन समूचे देश में ‘हिन्‍दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है. आजादी मिलने के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिन्‍दी को राजभाषा बनाने का फैसला लिया गया था. तब से हर साल 14 सितंबर को हिन्‍दी दिवस के […]
स्मृति शेष

स्वंत्रता संघर्ष के क्रांतिकारी जननायक पं.गोविंद बल्लभ पंत 

पं. गोविंद बल्लभ पंत की जन्मजयंती (10 सितंबर) पर डॉ. मोहन चंद तिवारी भारत के स्वतंत्रता संग्राम की संघर्ष पूर्ण कहानी आज भी लोगों के दिलों में क्रांति की अलख जलाती है. ऐसे ही स्वतंत्रता संघर्ष के  क्रांतिकारी जननायकों में से पंडित गोविंद बल्लभ पंत जी की आज जन्म जयंती है. उत्तराखंड के प्रसिद्ध स्वतन्त्रता […]
संस्मरण

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48 प्रकाश उप्रेती अविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” और “सरूली” की बात. ‘थेऊ’ पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले […]
इतिहास

उत्तराखंड की सल्ट क्रांति: ‘कुमाऊँ की बारदोली’

शिक्षक दिवस (5 सितंबर) पर विशेष डॉ. मोहन चन्द तिवारी देश की आजादी की लड़ाई में उत्तराखंड के सल्ट क्रांतिकारियों की भी अग्रणी भूमिका रही थी. 5 सितंबर 1942 को महात्मा गांधी के ‘भारत छोड़ो’ राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन की प्रेरणा से जन्मे सल्ट के क्रांतिकारियों ने अपने क्षेत्र में स्वाधीनता आन्दोलन की लड़ाई लड़ते हुए […]
पर्यावरण

प्रदूषित गंगा और हम!

कमलेश चंद्र जोशी कहते हैं प्रकृति हर चीज का संतुलन बनाकर रखती है. लेकिन अधिकतर देखने में यह आया है कि जहां-जहां मनुष्य ने अपना हाथ डाला वहां-वहां असंतुलन या फिर समस्याएं पैदा हुई हैं. इन समस्याओं का सीधा संबंध मनुष्य की आस्था, श्रद्धा, स्वार्थ या तथाकथित प्रेम से रहा है. गंगा को हमने मॉं […]
संस्मरण

इनसे खेत आबाद रहे, हमसे जो बर्बाद हुए

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ […]
आधी आबादी

पर्यावरण आंदोलन और पहाड़ी महिलाएं

भावना मसीवाल पहाड़ का जीवन देखने में हमें जितना शांत और खूबसूरत लगता है, अपने भीतर वह बहुत सी हलचलों और दबावों को समेटे है. यह दबाव एक ओर प्रकृति का प्रकोप है जो भूकंप और बाढ़ के रूप में देखा जाता है तो दूसरी ओर पहाड़ पर बढ़ता मानवीय हस्तक्षेप है जो केदारनाथ, बद्रीनाथ और रूद्रप्रयाग […]
संस्मरण

‘खोपड़ा’ यही तो नाम मेरे गाँव का है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—46 प्रकाश उप्रेती आज बात ‘खोपड़ा’ की. ये मेरे ‘गाँव’ का नाम है. गाँव मेरे लिए सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि पूरा जीवन है. गाँव सुनते ही चेहरा खिल उठता है. आँखों के सामने ‘वारे-पारे’ (आमने-सामने) बाखे और हमारी ‘बीचेक कुड़ी’ (बीच वाला घर) तैरने लगती है. गाँव सुनते […]
संस्मरण

बाजार ने कौतिक की रौनक भी छीन ली

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—45 प्रकाश उप्रेती आज बात “कौतिक” की. साल भर जिसका इंतजार बच्चे, बूढ़े, बड़े सबको रहता था, वह कौतिक था. कौतिक मतलब “मेला” हुआ. कौतिक की तब इतनी हाम थी कि परदेश गए लोग भी कौतिक पर घर पहुंच जाते थे. मासाब कौतिक के दिन हाज़िरि लगाकर छोड़ देते […]
किस्से/कहानियां

बेमौसम बुराँश

कहानी प्रतिभा अधिकारी ट्रेन दिल्ली से काठगोदाम को रवाना हो गयी, मनिका ने तकिया लगा चादर ओढ़ ली,  नींद कहाँ आने वाली है उसे अभी; अपने ननिहाल जा रही है वह ‘मुक्तेश्वर’. उसे मुक्तेश्वर की संकरी सड़कें और हरे-धानी लहराते खेत और बांज के वृक्ष दिखने लगे हैं अभी से, इस बार खूब मस्ती करेगी वह… […]