देहरादून

उत्तराखंड स्थापना दिवस : 21 वर्षों में मुख्मंत्रियों के सिवा बदला क्या?

उत्तराखंड स्थापना दिवस पर विशेष

प्रकाश उप्रेती

उत्तराखंड राज्य के हिस्से में जो कुछ अभी है वह KBC यानी ‘कौन बनेगा करोडपति’  का एक प्रश्न है. यही हमारा हासिल भी है. हमारे यहाँ कौन बनेगा सीएम (KBC) सिर्फ because चुनाव के समय का प्रश्न नहीं है बल्कि स्थायी प्रश्न है. इसीलिए स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा, कृषि, पर्यटन, परिवहन, पलायन आदि की स्थिति में कोई गुणात्मक अंतर इन 21वर्षों में नहीं आया है लेकिन वहीं इन 21 वर्षों में हमने 11 मुख्यमंत्री जनता पर थोप दिए. असल में यही हमारी 21 वर्षों की बड़ी उपलब्धि है.

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एक राज्य के हिस्से में 21 वर्ष का समय क्या वाकई में वयस्क और परिपक्व होने का पर्याप्त समय है! विकास के पंचवर्षीय वादों पर वोट लुटा देने वाले नागरिक समाज के लिए 21 वर्ष के क्या मायने हैं. इन वर्षों में उन सपनों का क्या हुआ जिनके लिए संघर्ष किया गया था. इन 21 वर्षों में साल-दर-साल पोस्टर से तस्वीर, because दीवार से पट्टी ही बदली या जनता की तक़दीर भी बदली है! पृथक और पहाड़ी राज्य का वह सपना इन 21 वर्षों में पूरा हुआ या वर्ष-दर-वर्ष धूमिल होता चला गया! ये सारे प्रश्न, शंकाएँ उस राज्य को लेकर हैं जिसका आज स्थापना दिवस है. वह राज्य उत्तराखंड है.

अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर कई वर्षों तक चले आंदोलन के बाद 9 नवंबर 2000 को उत्तराखण्ड को 27वें राज्य के रूप में स्वीकृति मिली वह भी अथक संघर्ष और बलिदान के बाद. पहाड़ के लोगों की आकांक्षाओं व सपनों का यह राज्य राजनीतिक दृष्टि से बदलावकारी तो रहा लेकिन जन उम्मीदों पर बहुत खरा नहीं उतरा.

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हांफते हुए जवानी की दहलीज तक पहुंचा यह राज्य 21 वर्षों में 11 मुख्यमंत्रियों को देख चुका है. यहाँ सदन में पहुंचा हर नेता एक ही दौड़ में होता है, वह दौड़ होती है- मुख्यमंत्री because की कुर्सी की दौड़. वैसे भी देश के किसी अन्य राज्य को 21 वर्षों में11 मुख्यमंत्री देखने का सौभाग्य तो नहीं ही मिला होगा. इस मामले में उत्तराखंड और वहां की जनता स्वयं पर गर्व कर सकती है. दो- दो अस्थाई राजधानियों का बोझ भी यही राज्य उठा रहा है. स्थाई राजधानी का प्रश्न आज भी जस का तस बना हुआ है.

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कुछ समय पहले सरकार ने गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया है जबकि पृथक उत्तराखंड राज्य आंदोलन के साथ ही गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग भी उठी थी because लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि यह राज्य आज भी स्थाई राजधानी के सवाल पर उलझा हुआ है. वैसे भी जब नेताओं की दीठ दिल्ली और पीठ पहाड़ की तरफ होगी तो राजधानी पहाड़ों में कैसे हो सकती है. हर सरकार जब विपक्ष में होती है तभी राजधानी का सवाल उठाती है. यह सवाल 21 वर्षों के बाद भी सवाल ही है.

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बेरोजगारी, पलायन, शिक्षा, स्वास्थ्य because और प्राकृतिक संसाधनों को लेकर सरकारों की नीतियों पर किए गए सवाल भी 21 वर्षों में गाढ़े ही हुए हैं. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) के आंकड़ों के मुताबिक, उत्तराखंड में बेरोजगारी दर 22.3% है. पलायन का एक बड़ा कारण भी बेरोजगारी ही है.

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इन 21 वर्षों में राज्य के सैकड़ों गांवों खाली हो चुके हैं. पृथक राज्य बनने के बाद तकरीबन 32 लाख लोग पलायन कर चुके हैं. सरकारी पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के 1702 गांव भुतहा हो चुके हैं. मतलब एकदम खाली हो चुके हैं और तक़रीबन 1000 गांव ऐसे हैं जहां 100 से कम लोग बचे हैं.  पलायन आयोग की because रिपोर्ट के मुताबिक 50% लोग रोजगार के कारण, 15% शिक्षा के चलते और 8% लचर स्वास्थ्य सुविधा की वजह से पलायन करने को मजबूर हुए. शिक्षा का हाल यह है कि कई गांवों में तो 20- 20 किलोमीटर तक कोई स्कूल ही नहीं है. कहीं स्कूल है तो शिक्षक नहीं हैं. पिछले वर्षों में सरकार ने कई सारे स्कूल बंद भी किए. शिक्षा की स्थिति आज भी 21 वर्ष पुरानी जैसी ही है. चिकित्सा सुविधाओं के मामले में तो राज्य का हाल ही खस्ता है.

खनन माफियाओं ने नदियों को खत्म कर दिया है. यह सब 21वर्षों की अदला-बदली की सरकारों की देन ही है. यह 21 वर्षों की वह तस्वीर है जो स्थापना दिवस की चकाचौंध में कहीं नजर because नहीं आएगी. वहां नजर आएगी तो बस फाइलों में दर्ज विकास की इबारतें जो कभी जनता तक पहुँच ही नहीं पाई. अदम गोंडवी ने लिखा-“तुम्‍हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है” वास्तविकता भी यही है.

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एक तरफ जहाँ 30 से 40 किलोमीटर तक कोई सरकारी हॉस्पिटल नहीं है तो वहीं सुविधा के लिहाज से तहसील तक में बने सरकारी हॉस्पिटल में अल्ट्रासाउंड की मशीन और अन्य जाँच के because उपकरण तक नहीं हैं. अल्मोड़ा जिले के ही 83 गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. आज भी इलाज के लिए दिल्ली ही आना पड़ता है. प्राकृतिक संसाधनों की लूट के मामले में तो इस राज्य का कोई मुकाबला है ही नहीं. सरकारी तन्त्र और भू-माफिया के गठजोड़ ने पूरे पहाड़ को फोड़ डाला है. सड़कों की माया में लाखों पेड़ काट डाले गए हैं.

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खनन माफियाओं ने नदियों को खत्म कर दिया है. यह सब 21वर्षों की अदला-बदली की सरकारों की देन ही है. यह 21 वर्षों की वह तस्वीर है जो स्थापना दिवस की चकाचौंध में कहीं नजर because नहीं आएगी. वहां नजर आएगी तो बस फाइलों में दर्ज विकास की इबारतें जो कभी जनता तक पहुँच ही नहीं पाई. अदम गोंडवी ने लिखा-“तुम्‍हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है/ मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है” वास्तविकता भी यही है.

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21 वर्षों  में राज्य की स्थिति एक ढर्रे पर रही. सरकार अदली-बदली लेकिन जनता की हालत वैसी ही रही. पहाड़ अपने ही दुखों तले खिसकता रहा. इन वर्षों में पहाड़ का कद घटा because और नेताओं का कद बढ़ता गया. जनता के सपने धुंधले होते गए लेकिन नेताओं के सपने पूरे हुए.एक तरफ जहाँ पहाड़ के गाड, गध्यर, नौले सूखे और गाँव के गाँव उजड़े तो वहीं दूसरी तरफ बड़े-बड़े महल बने, पानी पर बांध बने और विधायक- मंत्री व मुख्यमंत्री बने. इसलिए उत्तराखंड को जब देखना व समझना हो तो उसे देहरादून और ऋषिकेश से न देखा और न समझा जा सकता है. उसकी इन 21 वर्षों की यात्रा को भी पहाड़ की उन महिलाओं की नजर से देखना होगा जो, चिपको आंदोलन में जंगल को अपना मायका बताती हैं और कुल्हाड़े के आगे आ खड़ी होती हैं.

पर्यटन की असीम संभावनाओं के बावजूद इस दिशा में सरकारों की अकर्मण्यता तारीफे-काबिल है. ऐसी स्थिति में कैसे जश्न मनाया जा सकता है. आखिर इन 21 वर्षों में सिवाय सरकारों के क्या बदला है ! फिर भी राज्य स्थापना दिवस की बधाई देते हुए दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ मुझे मौजू लगती हैं-  मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ / मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं. यही कह सकता हूँ.

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शराब के खिलाफ आंदोलन में बाजार के बाजार बंद करा देती हैं और शराब माफियाओं के सामने दरांती ताने निडर खड़ी हो जाती हैं. पृथक राज्य आंदोलन में गोठ-गुठ्यार छोड़ दिल्लीbecause तक हुंकारा भरने के लिए चल पडती हैं. उनकी आँखों से भी इसे देखना होगा. तभी उन सपनों को भी समझा जा सकता है जो अलग राज्य की मांग और संकल्पना के साथ जुड़े हुए थे लेकिन वह सपने अब धुंधले हो चुके हैं. वह आँखें आशावान तो हैं लेकिन उम्मीद हारती जा रही हैं. ऐसे में GDP, बजट, सडक आदि से पहाड़ को कैसे समझा जा सकता है.

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विकास का यह रेडीमेड मॉडल जिसमें सड़क, शहर और सीमेंट है वह कैसे पहाड़ों में फिट हो सकता है ? क्या यही पहाड़ की जरूरतें हैं ? या फिर इन 21 वर्षों में हमारे नीति because निर्माता पहाड़ की जरूरतों को समझ ही नहीं पाए. पर्यटन की असीम संभावनाओं के बावजूद इस दिशा में सरकारों की अकर्मण्यता तारीफे-काबिल है. ऐसी स्थिति में कैसे जश्न मनाया जा सकता है. आखिर इन 21 वर्षों में सिवाय सरकारों के क्या बदला है ! फिर भी राज्य स्थापना दिवस की बधाई देते हुए दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियाँ मुझे मौजू लगती हैं-  मैं बे-पनाह अँधेरों को सुबह कैसे कहूँ / मैं इन नज़ारों का अँधा तमाशबीन नहीं. यही कह सकता हूँ.

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(डॉ. प्रकाश उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर एवं हिमांतर पत्रिका के संपादक हैं और
पहाड़ के सवालों को लेकर हमेशा मुखर रहते हैं.)

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