January 28, 2021
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स्मृति शेष

महात्मा रामरत्न थपलियाल-एक गुमनाम संत और वैज्ञानिक

डॉ. अरुण कुकसाल महात्मा रामरत्न थपलियाल जी की लिखित सन् 1930 में प्रकाशित पुस्तक ‘विश्वदर्शन’ को पढ़कर दो बातें एक साथ मेरे मन-मस्तिष्क में कौंधी, कि हम कितना कम जानते हैं अपने आस-पास के परिवेश को, और अपनों को. दूसरी बात कि हमारे स्थानीय समाज में अपने घर-परिवार-इलाके-समाज के
संस्मरण

‘वड’ झगडै जड़

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—43 प्रकाश उप्रेती आज बात “वड” की. एक सामान्य सा पत्थर जब दो खेतों की सीमा निर्धारित करता है तो विशिष्ट हो जाता है. ‘सीमा’ का पत्थर हर भूगोल में खास होता है. ईजा तो पहले से कहती थीं कि- “वड झगडै जड़” (वड झगड़े का कारण). ‘वड’ उस […]
किस्से/कहानियां

पलायन का दर्द

पार्वती जोशी ओगला में बस से उतरते ही पूरन और उसके साथी पैदल ही गाँव की ओर चल दिए. सुना है अब तो गाँव तक सड़क बन गई है. मार्ग में अनेक परिचित गाँव मिले; जिन्हें काटकर सड़क बनाई गई है . वे गाँव अब बिल्कुल उजड़ चुके हैं. वे गाँव वाले सरकार से अपने […]
लोक पर्व/त्योहार

“इजा मैंले नौणि निकाई, निखाई”

घृत संक्रान्ति 16 अगस्त पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी ‘घृत संक्रान्ति’ के अवसर पर समस्त देशवासियों और खास तौर से उत्तराखण्ड वासियों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि कृषिमूलक हरित क्रान्ति से पलायन करके आधुनिक औद्योगिक क्रान्ति के लिए की गई दौड़ ने हमें इस योग्य तो बना दिया है कि हम पहाड़ों […]
संस्मरण

पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—42 प्रकाश उप्रेती आज बात “छन” की. छन मतलब गाय-भैंस का घर. छन के बिना घर नहीं और घर के बिना छन नहीं.  पहाड़ में घर बनाने के साथ ही छन बनाने की भी हसरत होती थी. एक अदत छन की इच्छा हर कोई पाले रहता है. ईजा को […]
इतिहास

‘करो या मरो’ अगस्त क्रांति का बीजमंत्र

9 अगस्त ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की 78वीं वर्षगांठ पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी आज नौ अगस्त को देश ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन की 78वीं वर्षगांठ मना रहा है.नौ अगस्त 1942 का दिन भारत की आजादी का एक ऐतिहासिक दिन है. इसी दिन गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के लिए “भारत छोड़ो आंदोलन” के […]
संस्मरण

कंकट सिर्फ लकड़ी नहीं बल्कि पहाड़ की विरासत का औज़ार है

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—41 प्रकाश उप्रेती पहाड़ जरूरत और पूर्ति के मामले में हमेशा से उदार रहे हैं. वहाँ हर चीज की निर्मिति उसकी जरूरत के हिसाब से हो जाती है. आज जरूरत के हिसाब से इसी निर्मिति पर बात करते हैं. यह -“कंकट” है. इसका शाब्दिक अर्थ हुआ काँटा, काटने वाला. […]
साहित्यिक हलचल

इजा! नि थामि तेरी कईकई, सब जगां रई तेरी नराई

(शम्भूदत्त सती का व्यक्तित्व व कृतित्व-3) डॉ. मोहन चंद तिवारी कुमाऊं के यशस्वी साहित्यकार शम्भूदत्त सती की रचनाधर्मिता से पहाड़ के स्थानीय लोग प्रायः कम ही परिचित हैं किन्तु पिछले तीन दशकों से हिंदी साहित्य के क्षेत्र में एक आंचलिक कुमाऊंनी साहित्यकार के रूप में सती जी ने अपनी एक खास पहचान बनाई है. शम्भूदत्त […]
किस्से/कहानियां

गोधूलि का दृश्य

लघुकथा अनुरूपा “अनु” गोधूलि का समय था. गाय बैल भी जंगल की ओर से लौट ही रहे थे.मैं भी घर के पास वाले खेत में नींबू के पेड़ की छांव में कलम और कागज लेकर बैठ गई.सोच रही थी कुछ लिखती हूं. क्योंकि उस पल का जो दृश्य था वह बड़ा ही लुभावना लग रहा […]
संस्मरण

अब कौन ‘नटार’ से डरता है…

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40 प्रकाश उप्रेती पहाड़ में खेती हो न हो लेकिन “नटार” हर खेत में होता था. “नटार” मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर, […]