Tag: रवांई घाटी

शिक्षक दिनेश रावत ने फिर बढ़ाया रवांई का मान, मिला “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता सम्मान”

शिक्षक दिनेश रावत ने फिर बढ़ाया रवांई का मान, मिला “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता सम्मान”

उत्तराखंड हलचल
हल्द्वानी: शिक्षा विभाग में अपनी रचनात्मकता के लिए पहचान रखने वाले शिक्षक दिनेश रावत को मिलने वाले सम्मानों की फेहरिस्त एक और सम्मान जुड़ गया है। उनको अमर उजाला और MIET की ओर से “देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता समान” से सम्मानित किया गया है। समारोह का आयोजन MIET कुमाऊं के लामाचौड़, हल्द्वानी स्थित परिसर में किया गया।समारोह के दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शैक्षिक व सह-शैक्षिक गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के आधार पर प्रदेशभर के विद्यालयों और महाविद्यालयों से चयनित अध्यापक/ प्राध्यापकों को ‘देवभूमि शिक्षा उत्कृष्टता समान’ से सम्मानित किया। सम्मानित होने वाले शिक्षकों में सीमांत उत्तरकाशी के रवांई क्षेत्र के कोटी, बनाल निवासी शिक्षक दिनेश सिंह रावत भी शामिल हैं, जो वर्तमान में हरिद्वार जनपद के बहादराबाद विकास खंड के राजकीय प्रा.वि.न.-4 में से...
जन आंदोलन: मुल्क अपने गिरफ्तार साथियों को छुड़ा लाया

जन आंदोलन: मुल्क अपने गिरफ्तार साथियों को छुड़ा लाया

उत्तरकाशी
तिलाड़ी कांड 30 मई पर विशेषध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’ तीस मई सन् 1930 को रवांई के किसानों द्वारा अपने हक हकूक के लिए टिहरी रियासत के विरुद्ध लामबद्ध होना एक अविस्मरणीय जन आन्दोलन था. ‘बोलान्दा बदरी’ जैसे भावनात्मक, अविव्यक्ति के शब्दों से अपने महाराजा को सम्बोधित करने वाली जनता का आन्दोलन के लिए उत्तेजित होना कहीं न कहीं तत्कालिक समय में टिहरी रियासत के अविवेकपूर्ण नीति का ही प्रतिफल था जिसका खामियाजा भोले-भाले ग्रामीणों को अपनी जान की कुर्बानी दे कर चुकाना पड़ा. आन्दोलन की मुख्य वजह सन् 1928 को टिहरी राज्य में हुए वनबन्दोबस्त ‘मुनारबन्दी’ थीं जिसमें जनता के हक हकूकों को नजरन्दाज ही नहीं अपितु सख्त कुठाराघात भी किया गया. चरान-चुगान, घास-पत्ती, ‘लाखड़ी-जेखड़ी’ हल-नसेड़ा सभी वन उपजें वन सीमा के अन्तर्गत आ जाने के कारण ग्रामीणों के सम्मुख पहाड़ जैसी विकराल बाधा आन पड़ी थीं. रवांई की जनता ने अपन...
बहिनों के प्रति स्नेह और सम्मान  की प्रतीक है ‘दोफारी’

बहिनों के प्रति स्नेह और सम्मान  की प्रतीक है ‘दोफारी’

लोक पर्व-त्योहार
दिनेश रावत बात संग्रांद (संक्रांति) से पहले एक रोज की है. शाम के समय माँ जी से फोन पर बात हो रही थी. उसी दौरान माँ जी ने बताया कि- ‘अम अरसू क त्यारी करनऽ लगिई.’ ( हम अरसे बनाने की तैयारी में लगे हैं.) अरसे बनाने की तैयारी? मैं कुछ समझ नहीं पाया और मां जी से पूछ बैठा- ‘अरस! अरस काले मां?(अरसे! अरसे क्यों माँ?) तो माँ ने कहा- ‘भोव संग्रांद कणी. ततराया कोख भिजऊँ अर कुठियूँ.’ (कल संक्रांति कैसी है. उसी वक्त कहाँ भीगते और कूटे जाते हैं.) ‘काम भी मुक्तू बाजअ. अरस भी लाण, साकुईया भी उलाउणी, स्वाअ भी लाण अर त फुण्ड भी पहुंचाण.’ (काम भी बहुत हो जाता है. अरसे भी बनाने हैं. साकुईया भी तलनी है. स्वाले यानी पूरी भी बनानी है और फिर वह पहुंचाने भी हैं.) माँ जी से बात करते-करते मैं सोचने को विवश हो गया कि आख़िर गांव-घर से दूर होते ही हम कितनी चीजों से दूर हो जाते हैं. हमारी जीवन शैली कितनी बदल जाती है. ...
सियूड़िया मेला :  जहां  देव पश्वा अपने मुंह में डालते हैं लोहे व चांदी के सुये

सियूड़िया मेला :  जहां  देव पश्वा अपने मुंह में डालते हैं लोहे व चांदी के सुये

उत्तरकाशी
देव पशवा का मुंह में लोहे वचांदी की छड़ डालना रहता है मेले का मुख्य आकर्षण. रामा गांव में लगता है 12 because गांव का कैलापीर, नरसिंह एवं सियूड़ियादेवता का मेला. हिमाचल के डोडरा का है सियूड़ियादेवता, रामा सिरांई क्षेत्र का सबसे पुराना गांव है रामा.  नीरज उत्तराखंडी, पुरोला रामा सिरांई पट्टी के 12 गांव  का सियूड़िया देवता, केलापीर एवं नरसिंह देवताओं के मेले में बुधवार को रामा गांव में क्षेत्र की भारी भीड उमडी,हर वर्ष 22 गते भाद्रपद को 7 सितंबर सियूड़िया देवता के पशवा का मुहं because में लोहे व चांदी की छड सियूडा डालना लोगों के आस्था, आकर्षक का केंद्र है जिस रोचक नजारे देखने को कमल सिरांई व मोरी त्यूणी, पर्वत क्षेत्र व नौंगाव समेत सरबडियाड़ व दूर दराज गांव से सैकडों की भीड उमड़ती है.ज्योतिषमेले के दिन केलापीर व नरसिंह देव पशवा because की मौजदूगी में सियूड़िया महाराज ...
खुशखबरी: रवांई के लाल चंद्रभूषण बिजल्वाण का श्रेष्ठ शिक्षक के लिए चयन

खुशखबरी: रवांई के लाल चंद्रभूषण बिजल्वाण का श्रेष्ठ शिक्षक के लिए चयन

उत्तरकाशी
शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी करेंगे सम्मानितनीरज उत्तराखंडी, पुरोला उत्तरकाशीराजकीय आदर्श उच्च प्राथमिक विद्यालय पुजेली खलाड़ी में प्रधानाध्यापक व गणित-विज्ञान के शिक्षक चंद्रभूषण बिजल्वाण का चयन श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान के लिए हुआ है. बिजल्वाण को because यह सम्मान शिक्षक दिवस,5 सितंबर को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी देहरादून में देकर सम्मानित करेंगें.ज्योतिष चंद्रभूषण बिजल्वाण को यह सम्मान गांव के गरीब छात्रों के पठन पाठन को लेकर अभिनव प्रयोगों से गाँव के होशियार प्रतिभावान दर्जनों छात्र -छात्राओं के प्रति समर्पित होकर स्कूल सहित because अपने घर में भी अतिरिक्त पढ़ाई की अलख जगाने का प्रयास है.ज्योतिष गौरतलब है कि चंद्रभूषण बिजल्वाण because आज ही नहीं पूर्व में भी  उच्च प्राथमिक  विद्यालय सुनाली व विभिन्न विद्यलयों में तैनात थे तब भी अपने आसपास के आधा दर्जन ...
रवांल्टी के मील का पत्थर हैं महाबीर रवांल्टा

रवांल्टी के मील का पत्थर हैं महाबीर रवांल्टा

उत्तरकाशी
नीरज उत्तराखंडी, उत्तरकाशीलब्ध प्रतिष्ठित साहित्यकार महाबीर रवांल्टा को उत्तराखंड शासन द्वारा उत्तराखंड because भाषा संस्थान में बतौर सदस्य नामित किए जाने पर लोक भाषा व भाषा प्रेमियों के दिन बहुरेंगे साहित्य साधकों में इस बात को लेकर जहाँ नई उम्मीद जगी है, वहीं उनके चयन को लेकर सम्पूर्ण क्षेत्र में खुशियों की लहर दौड़ पड़ी है.बढ़ेगी बताते चलें प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में उत्तराखंड भाषा संस्थान (ULI) सभा का गठन किया गया. जिसे प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैंण में स्थापित किया जायेगा. संस्थान के because अध्यक्ष मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत तथा कार्यकारी अध्यक्ष प्रदेश के भाषा मंत्री यतीश्वरानंद होंगे. संस्थान के सदस्यों में हिंदी, उर्दू, पंजाबी एवं लोक भाषा के 12 विख्यात भाषाविद व साहित्यकारों को नामित किया गया है.बढ़ेगी शासन द्वारा भाषा संस्थान हेतु लोकभाषा के अंतर्गत जि...
तिलाड़ी कांड: जब यमुना किनारे निहत्थों पर बरसाई गईं गोलियां

तिलाड़ी कांड: जब यमुना किनारे निहत्थों पर बरसाई गईं गोलियां

इतिहास
तिलाड़ी कांड 30 मई पर विशेषसुनीता भट्ट पैन्यूलीसीमांत जनपद उत्तरकाशी के रवांई घाटी के बड़कोट नगरपालिका के अन्तर्गत यमुना नदी के तट पर बसा हुआ एक स्थान है तिलाड़ी, जो अपने नैसर्गिक सौंदर्य और सघन वन because संपदा के लिए प्रसिद्ध है किंतु दु:ख कि बात है कि तिलाड़ी अपनी दूसरी वजह से हिन्दुस्तान के प्रमुख समाचार पत्रों विशेषकर गढ़वाल और कुमाऊं के साप्ताहिक पत्रों में सुर्खियों में आया जिसके 30 मई 1930 के रक्त रंजित इतिहास से हम उत्तराखंड के अधिकांश बाशिंदे शायद आज भी अनभिज्ञ हैं.आजादीउत्तराखंड के तिलाड़ी कांड के उस काले धब्बेनुमा इतिहास की मेरे सामान्य ज्ञान में अभिवृद्धि नहीं हो पाती यदि मैंने बृज भूषण गैरोला की “रियासती षड्यंत्रों का इतिहास” और स्व. विद्यासागर नौटियाल का “यमुना के बागी बेटे” न पढ़ा होता सोचा तिलाड़ी because कांड का इतिहास उससे जुड़े लोगों की शहादत, उनके अपन...
उत्तराखंड के लोक और देव परंपरा को समझने के लिए एक ज़रूरी क़िताब

उत्तराखंड के लोक और देव परंपरा को समझने के लिए एक ज़रूरी क़िताब

पुस्तक-समीक्षा
पुस्तक समीक्षाचरण सिंह केदारखंडीकोटी बनाल (बड़कोट उत्तरकाशी) में 7 जून 1981 को जन्मे दिनेश रावत पेशे से शिक्षक और प्रवृति से यायावर और प्रकृति की पाठशाला के अध्येता हैं जिन्हें because अपनी सांस्कृतिक विरासत से बेहद लगाव है. अंक शास्त्र “रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं” नवम्बर 2020 में प्रकाशित लोक संस्कृति पर उनकी दूसरी किताब है इससे पहले रावत जी “रवांई क्षेत्र के लोकदेवता और लोकोत्सव” पुस्तक लिख चुके हैं जो because उनकी दूसरी किताब की प्रेरणा बनी है. समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून और संस्कृति विभाग उत्तराखंड के आर्थिक अनुदान से प्रकाशित 294 पृष्ठ की इस किताब में 5 अध्याय हैं और कवर पेज (महासू देवता) सोबन दास जी का बनाया हुआ है... अंक शास्त्र उत्तराखंड समूचे भारत के साथ साथ हिमालयी राज्यों में भी अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता के लिए जाना जाता है. भावना के उदात्त स्फुरणों में...
उत्तराखंड के इतिहास में बड़ी खोज, 1000 साल पुरानी मूर्ति, भगवान शिव के अवतार लकुलीश और पाशुपत धर्म    

उत्तराखंड के इतिहास में बड़ी खोज, 1000 साल पुरानी मूर्ति, भगवान शिव के अवतार लकुलीश और पाशुपत धर्म    

इतिहास, उत्तरकाशी
प्रदीप रावत (रवांल्टा) इतिहास को समझना और जानना बहुत कठिन है. परत दर परत, जितनी भी नई परतों को कुरेदते जाएंगे, हर परत के पीछे एक नई परत निकल आती है. इतिहास का प्रयोग विशेष रूप से दो अर्थों में किया जाता है. एक है प्राचीन या विगत काल की घटनाएं और दूसरा उन घटनाओं के विषय में धारणा. इतिहास शब्द का because तात्पर्य है कि "यह निश्चय था". ग्रीस के लोग इतिहास के लिए हिस्तरी शब्द का प्रयोग करते थे. हिस्तरी का शाब्दिक अर्थ बुनना होता है.ऐतिहासिक धरोहर इतिहास की कुछ ऐसी ही बुनावट उत्तराखंड के उत्तरकाशी (Uttarkashi) जिले की यमुना घाटी (Yamuna Valley) में बिखरी पड़ी है. इस बनुवाट के बिखराव पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया. पुरातात्विक महत्व की इस ऐतिहासिक धरोहर को आज तक संजोन का प्रयास भी नहीं किया गया. पहली बार इतिहासकार डॉ. विजय बहुगुणा because ने यमुना घाटी के देवल गांव में बिखरी इतिहास की कुछ ऐ...
विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालअरसे/अरसा पहाड़ में समूण या कलेउ becauseके रूप मे दिया जाने वाला एक पकवान है, जो उत्तराखण्ड में सिर्फ गढ़वाल मण्डल में प्रमुखता से बनता है बल्कि हमसे लगे कुमाऊं, जौनसार—बावर, बंगाण, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत कहीं भी अरसा नही बनता है. इसके इतिहास की बात करें तो बहुत ही रूचिपूर्ण इतिहास रहा है अरसे का. बताते हैं कि यह दक्षिण भारत से आया हुआ पकवान है. इतिहासकारो के अनुसार आदिगुरू शंकराचार्य ने जब बद्रीनाथ और केदारनाथ में कर्नाटक के पुजारियों को नियुक्त किया था, तो नवीं सदी में वहां से आए हुए ये ब्राहमण अपने साथ अरसा so यहां लेकर आए और साथ ही बनाने की परम्परा भी शुरू कर गये. कालांतर में ये परम्परा गढ़वाल के आमजन में भी शुरू हो गई. अरसा तमिलनाड, केरल, आंध्र प्रदेश, उडीसा, बिहार और बंगाल में भी बनाया जाता है, वहां इसको अलग-अलग जगह अलग-अलग नामों से जाना जाता है.अटल आंध्र प्रदे...