November 1, 2020
समाज/संस्कृति

विलुप्ति के कगार पर पारंपरिक व्‍यंजन अरसे की मिठास

  • आशिता डोभाल

अरसे/अरसा पहाड़ में समूण या कलेउ becauseके रूप मे दिया जाने वाला एक पकवान है, जो उत्तराखण्ड में सिर्फ गढ़वाल मण्डल में प्रमुखता से बनता है बल्कि हमसे लगे कुमाऊं, जौनसार—बावर, बंगाण, हिमाचल प्रदेश, नेपाल, तिब्बत कहीं भी अरसा नही बनता है. इसके इतिहास की बात करें तो बहुत ही रूचिपूर्ण इतिहास रहा है अरसे का. बताते हैं कि यह दक्षिण भारत से आया हुआ पकवान है. इतिहासकारो के अनुसार आदिगुरू शंकराचार्य ने जब बद्रीनाथ और केदारनाथ में कर्नाटक के पुजारियों को नियुक्त किया था, तो नवीं सदी में वहां से आए हुए ये ब्राहमण अपने साथ अरसा so यहां लेकर आए और साथ ही बनाने की परम्परा भी शुरू कर गये. कालांतर में ये परम्परा गढ़वाल के आमजन में भी शुरू हो गई. अरसा तमिलनाड, केरल, आंध्र प्रदेश, उडीसा, बिहार और बंगाल में भी बनाया जाता है, वहां इसको अलग-अलग जगह अलग-अलग नामों से जाना जाता है.

अटल

आंध्र प्रदेश में “अरसालू” कर्नाटक, महाराष्ट्र, उडी़सा, but बंगाल और बिहार में “अनारसा” नाम से और गढ़वाल में “अरसा” नाम से जाना जाता है. स्वाद मे थोड़ा फर्क जरूर है उसका कारण यह है कि हमारे यहां गन्ने का गुड़ इस्तेमाल होता है, जबकि दक्षिण भारत में खजूर का गुड़ और बंगाल, बिहार व और उड़ीसा में चीनी से बनाया जाता है.

इसको बनाने के लिए चावल को because8 से 10 घण्टे तक भिगो कर रखना पड़ता है, उसके बाद ओखली मे कूटकर चावल का आटा बनाकर व गुड़ की चाशनी की एक निश्चित मात्रा का मिश्रण तैयार किया जाता है और फिर गरम तेल मे तलकर अरसा तैयार किया जाता है. इस अरसे का शादी ब्याह में बड़ा महत्व होता है. शादी के बाद लड़की के घर से पहली बार अरसे का कलेउ देने की परम्परा हमारे गढ़वाल में सदियों पुरानी है.

अटल

यदि रवांई घाटी बात करूं तो हर साल माघ soके महीने में हर बेटी के मायके से अरसे का कलेउ (पूरे गांव भर मे बांटने के लिए) देना हमारी परम्परा में रहा है जो आज भी बरकरार है. मुझे आज भी याद है कि बचपन में हम उस अरसे के लिए भाई-बहन आपस मे लड़ते झगड़ते भी थे और सिर्फ माघ महीने ही नही चैत्र माह में पूरे महीने भर घर की दहलीज पर फूल डाले जाते हैं और उसका समापन बैशाखी के दिन होता है, butतो उस दिन भी अरसे बनाए जाते हैं. जो बच्चे दहलीज पर फूल डालते है उनको बदले मे पैसे नहीं, अरसे दिए जाते हैं.

घर की बेटियों को भी उनकी ससूराल में अरसे देने का रिवाज है यानी सालभर में माघ और चैत्र माह में अरसे देने की परम्परा सिर्फ रवांई घाटी में है. अरसा एक ऐसा पकवान है जिसे महीने भर तक बिना किसी रेफ्रीजरेटर के रखा जा सकता है. यदि भूख को शान्त करना हो तो उस समय ये मददगार साबित होता है.

पकवान

आज हालात ये हैं कि त्यौहारो को मनाने और soपकवानो के बनाने के तरीके बदल गये हैं. माघ माह के कलेउ में अब बाजार में बने लड्डू दिये जाते है फूलदेई में फूल डालने वाले बच्चों को अरसे की जगह पैसे दिए जाते हैं, क्योंकि कुछ सालों से अरसे बनाने व चूड़ा कूटने की becauseपरम्परा खत्म होती दिख रही है, ये दोनों काम थोड़ा कष्टदायक होते हैं. चावल को ओखली में कूटना और गुड़ की चाशनी को बनाने के लिए जानकार और अनुभवी लोगों का साथ में होना बहुत जरूरी होता है क्योंकि चाशनी के सही बनने से इसका स्वाद लाजबाव होता है.

हम

आज हम चारधामों मे देखते है becauseकि प्रसाद के रूप में वही दिया जाता है जो अमूमन देशभर के धार्मिक स्थलों मे दिया जाता है, जबकि हमारे पास चूड़ा और अरसा जैसा पकवान हैं, तो क्यों न हम एक नई शुरुआत करें, जिससे सबकी जीभ तक अरसे का स्वाद भी पंहुच जाए और हमारी लोक परम्परा भी जीवित बची रहे।

(लेखिका सामाजिक कार्यकर्ता हैं.)

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  1. Avatar

    बहुत सुंदर और सार्थक जानकारी, आशिता डोभाल जी को बहुत शुभकामनाएं

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