जन आंदोलन: मुल्क अपने गिरफ्तार साथियों को छुड़ा लाया

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तिलाड़ी कांड 30 मई पर विशेष

ध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’

तीस मई सन् 1930 को रवांई के किसानों द्वारा अपने हक हकूक के लिए टिहरी रियासत के विरुद्ध लामबद्ध होना एक अविस्मरणीय जन आन्दोलन था. ‘बोलान्दा बदरी’ जैसे भावनात्मक, अविव्यक्ति के शब्दों से अपने महाराजा को सम्बोधित करने वाली जनता का आन्दोलन के लिए उत्तेजित होना कहीं न कहीं तत्कालिक समय में टिहरी रियासत के अविवेकपूर्ण नीति का ही प्रतिफल था जिसका खामियाजा भोले-भाले ग्रामीणों को अपनी जान की कुर्बानी दे कर चुकाना पड़ा.

आन्दोलन की मुख्य वजह सन् 1928 को टिहरी राज्य में हुए वनबन्दोबस्त ‘मुनारबन्दी’ थीं जिसमें जनता के हक हकूकों को नजरन्दाज ही नहीं अपितु सख्त कुठाराघात भी किया गया. चरान-चुगान, घास-पत्ती, ‘लाखड़ी-जेखड़ी’ हल-नसेड़ा सभी वन उपजें वन सीमा के अन्तर्गत आ जाने के कारण ग्रामीणों के सम्मुख पहाड़ जैसी विकराल बाधा आन पड़ी थीं. रवांई की जनता ने अपनी न्यायोचित मांगों को मनवाने के लिए टिहरी राजदरवार का रास्ता पकड़ा किन्तु असफलता ही हाथ लगी.

स्व. राजेन्द्र सिहं राना ‘नयन’ जी कहते थे कि ‘‘नौकरशाहों के रवांई भ्रमण के समय जनता को न सिर्फ उनके तीखे शब्द-वाणों का मुकाबला करना पड़ा अपितु मुल्क में आवाज खोलने वाले स्याणें पंचों को झूठे मुकदमों में फंसा कर, झूठी अफवाहें फैलाकर राजदरबार के कान भरने का काम किया.’’

 ‘यमुना के बागी बेटे’ पुस्तक के लेखक विद्यासागर नौटियाल ने लिखा हैं कि ‘‘एक दिन जब रवांई के रुद्रसिंह और जमन सिंह अपने मुकदमे के सिलसिले में राजगढ़ी गये हुए थे तो तत्कालीन एस0 डी0 एम0 सुरेन्द्रदत्त नौटियाल और डी0 एफ0 ओ0 पद्मदत्त रतूड़ी ने उन दोनों को राजतर में रामप्रसाद कौशिक की दुकान में आकर हकहकूक के विषय में कौंसिल के फैसले बाबत चलने को कहा. रास्ते में उन्हें जमन सिंह भी मिला तो तीनों राजतर पहुंचे. वहां पहुंचकर उन्हें बताया गया कि तुम्हें सुलह-वार्ता हेतु टिहरी आने को कहा गया है. तीनों  प्रसन्न थे शायद महाराजा ने उनकी न्यायोचित मांगों पर विचार किया होगा. राम प्रसाद कौशिक दुकानदार भी उनके साथ चलने को राजी हो गये. डंडालगाँव की सीमा के ऊपर जब वे राड़ी डांडे के घनघोर जंगल से गुजर रहे थे तभी डिप्टी साहब के संकेत पर पटवारी, सुपरवाइजर आदि ने चारों लोगों के हाथों में हथकड़ी डाल दी. वे हक्के-बक्के रह गये. अब उनकी समझ में बात आ गयी थी कि उन्हें सुलह वार्ता हेतु नहीं बल्कि सरकारी मुलजिम बनाकर टिहरी जेल की तरफ घसीटा जा रहा हैं.’’ राड़ीडांडे की सीमा के पार तक वे उन्हें छोड़ आये और स्वयं निश्चिंत होकर दोनों हाकिम राजगढ़ी के लिए लौट आये.’’

राड़ी से वापस लौट रहे दोनों हाकिमानों ने जब इन ग्रामीणों को राड़ी की ओर तेज कदमों से आते देखा तो वे उन्हें धमकाते हुए कहने लगे, ‘‘खबरदार कोई भी आगे नहीं बढ़ेगा वरना…’’ डिप्टी ने अपनी बन्दूक आगे-आगे चल रहे किशनदत्त की ओर तान दी तो उन्होंने बन्दूक की नाल पकड़ कर उसका मुहं जमीन की ओर कर दिया. डिप्टी के पीछे खड़े पदमदत्त ने अपनी पिस्तोल निकाल कर दनादन गोलियाँ दागनी शुरू कर दी. नंगाणगाँव का झुन सिंह और अजीत सिंह मौके पर ही मारे गये.

आते-जाते मुसाफिरों ने जब अपने नेताओं को बन्दी बनाकर ले जाते हुए देखा तो वे जितनी जल्दी हो सके जन-जन तक यह सूचना पहुंचाने लगे. नंगाणगाँव का हीरा सिंह उस रोज चाँदाडोखरी की जनसभा में गया हुआ था. उसके बेटे जयपाल सिंह ने जब यह खबर सुनी तो वह भी दो-चारों को इकट्ठा कर चल पड़ा. थान गाँव का किशनदत्त भी खबर सुनते ही चलता बना. राड़ी से वापस लौट रहे दोनों हाकिमानों ने जब इन ग्रामीणों को राड़ी की ओर तेज कदमों से आते देखा तो वे उन्हें धमकाते हुए कहने लगे, ‘‘खबरदार कोई भी आगे नहीं बढ़ेगा वरना….’’ डिप्टी ने अपनी बन्दूक आगे-आगे चल रहे किशनदत्त की ओर तान दी तो उन्होंने बन्दूक की नाल पकड़ कर उसका मुहं जमीन की ओर कर दिया. डिप्टी के पीछे खड़े पदमदत्त ने अपनी पिस्तोल निकाल कर दनादन गोलियाँ दागनी शुरू कर दी. नंगाणगाँव का झुन सिंह और अजीत सिंह मौके पर ही मारे गये. एक गोली पालर के जीत सिंह को तथा एक नारायण दत्त के लगीं तो वे घायल हो कर गिर पड़े. पदमदत्त की पिस्तोल से निकली पाँचवीं गोली आनन-फानन में डिप्टी की जांग में जा लगी तो वह भी घायल हो कर गिर पड़ा. भयभीत डी0 एफ0 ओ0 घायल डिप्टी को छोड़ अपनी जान बचाकर जंगली मार्ग से भाग निकला.’’

मुल्क (जनता) अपने गिरफ्तार साथियों को छुड़ा कर लायी और राड़ी से मृत, घायल (डिप्टी सहित)  लोगों को डंडों पर बाँधकर वापस राजतर ले आये. राड़ी डांडे के निकट ‘नालूपाणी’ नामक स्थान पर घटी इस घटना को पदमदत्त ने नरेन्द्रनगर पहुंच कर अपने ढ़ंग से प्रस्तुत प्रस्तुत किया. महाराजा साहब इन दिनों योरोप की यात्रा पर थे. रियासत की जिम्मेदारी देख रहे तत्कालीन बजीर चक्रधर जुयाल आग बबूला हो गया और रवाल्टों को उचित दण्ड देने के लिए सेना प्रमुख कमांडेंट नत्थी सिंह के नेतृत्व में रियासत की सेना के साथ 29 मई को रवांई राजगढ़ी आ गये. हीरा सिंह सहित रवांई के प्रमुख स्याणे पंच नालूपानी की घटना और जनता पर किये जाने वाले अत्याचारों के विड्ढय में अंगे्रज कमिष्नर को मिलने षिमला गये हुए थे.

30 मई सन् 1930 को रवांई की करीब पैतालीस पट्टियों की जनता यमुना के किनारे तिलाड़ी नामक स्थान पर राड़ी में घटी दु:खद घटना व आगे की रणनीति तय करने के लिए एकत्र हुई थी. तिलाड़ी में शांति प्रिय बैठक चल रही थी. रियासत की सेना को बैठक की भनक मिलते ही मैदान को चारों ओर से घेर लिया और निहत्थे सभासदों पर अंधाधुन्ध गोलियां चला दीं. गोली कांड में कई लोग घटनास्थल पर ही शहीद हो गए तथा कुछ लोग सभासदों में भगदड़ में कुचले गये. कईयों ने यमुना नदी को पार करना चाहा किन्तु वे उसके तेज बहाव में बह गए. इस नृशंस जनसंहार से पूरी रवांई घाटी सन्न रह गयी थीं. सेना ने घर-घर तलाशी अभियान चलाकर डंडक में सम्मिलित करीब तीन सौ लोगों को गिरफ्दार कर टिहरी जेल में डाल दिया. विभिन्न धाराओं के अनुसार इन पर मुकदमे चलाये गये.

हर वर्ष 30 मई के दिन तिलाड़ी शहीदों की स्मृति में तिलाड़ी शहीद दिवस मनाया जाता है. इस अवसर पर रवांई घाटी के लोग तिलाड़ी में आकर माटी के वीर सपूतों को श्रद्धा सुमन अर्पित कर उन्हें नमन करते हैं.         

(लेखक शिक्षाविद् एवं साहित्यकार हैं)

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