कॉर्बेट नेशनल पार्क के 90 साल: भारत के पहले नेशनल पार्क की अनसुनी कहानी और गौरवशाली इतिहास

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Narendra Singh Former Forest Officer

नरेन्द्र सिंह
पूर्व वनाधिकारी

हैली नेशनल पार्क भारत का ही पहला नेशनल पार्क नहीं है, बल्कि यह भारतीय उपमहाद्वीप का भी पहला नेशनल पार्क है, जिसकी स्थापना 8 अगस्त 1936 को हुई थी। अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क और अफ्रीका के क्रूगर नेशनल पार्क के बाद यह दुनिया का तीसरा नेशनल पार्क था। जब लोग नेशनल पार्क का कॉन्सेप्ट और उद्देश्य भी नहीं समझते थे, तब भारत में हैली नेशनल पार्क की स्थापना की गई थी। यूनाइटेड प्रोविंस जो वर्तमान उत्तरप्रदेश है, के तत्कालीन गवर्नर मालकॉम हेली के नाम पर इसका नामकरण किया गया था, क्योंकि उन्होंने इसकी स्थापना में विशिष्ट रुचि दिखाई थी। दरअसल यह पार्क और भी पहले अस्तित्व में आ गया होता, अगर उस समय पर्सी विंढम कुमाऊँ के कमिश्नर न होते! वे 1911 में मिर्जापुर से यहाँ आये थे, जहाँ वे कलेक्टर हुआ करते थे। उनके नाम से वहाँ विंढमगंज, और विंढम फॉल भी हैं। वे अविवाहित थे और शिकार के बहुत शौकीन थे। एक  इसके लिए वे शुक्रवार को जँगल चले जाते थे और सोमवार को लौटा करते थे। एक वर्ष में उनके 6 महीने जँगल में ही बीतते थे। उनके बारे में जिम कॉर्बेट ने एक बार कहा था, ‘He knows more about tigers than anyone in India.’ वे वायसराय के निकट सम्बन्धी भी थे, इसलिए किसी से डरते भी नहीं थे। उनके इस शौक के कारण इस नेशनल पार्क की स्थापना में देरी हुई, अन्यथा यह बहुत पहले ही नेशनल पार्क बन गया होता। आज हमारे लिए यह गर्व का विषय है कि देश का पहला नेशनल पार्क हमारे प्रदेश उत्तराखंड में स्थित है।

1947 में आज़ादी के बाद इसका नाम रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया। 1956 में, पार्क का नाम  महान प्रकृतिवादी, प्रख्यात संरक्षणवादी और अनेकों मानवभक्षी शेरों के खात्मा करने वाले जिम कॉर्बेट के नाम पर कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया, जिन्होंने इसकी सीमा निर्धारित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। यद्यपि इसके प्रथम प्रशासनिक अधिकारी एफ डब्ल्यू चैंपियन थे, क्योंकि इसमें उनकी लैंसडाउन डिवीजन का अधिकांश भाग सम्मिलित किया गया था। अब यह पार्क नैनीताल, पौड़ी और अल्मोड़ा जिलों में विस्तारित है। इसका अमानगढ़ रेंज के भाग, उत्तरप्रदेश में भी चला गया है। यद्यपि मेरा मानना है कि वन्यजीव प्रबंधन की दृष्टि से इसे एक ही यूनिट के अंतर्गत रहना उचित रहता।

सभी फोटो wikipedia.org से साभार

यूँ तो कॉर्बेट पार्क मेरा सबसे पसंदीदा स्थान है, न केवल इसलिए कि मैंने इसमें वन सेवा की, बल्कि इसलिए कि इसकी भौगोलिक स्थिति और प्राकृतिक वन इतने सघन और मनोहारी हैं कि पूरा जीवन वन्यजीवों के मध्य बिताया जा सकता है। इसका नैसर्गिक सौंदर्य स्वर्ग से कम नहीं है। मेरा ऐसा मानना है कि भगवान न करे कि कभी टाइगर इस धरती से विलुप्त हो,परन्तु यदि कभी इस खूबसूरत प्रजाति पर संकट आया तो कॉर्बेट पार्क की जमीन में वह ताकत है कि वह इसे सदैव बचा कर रख सकती है, और टाइगर के संरक्षण में एक विशिष्ट कालजयी भूमिका निभाने में यहाँ की भूमि और जँगल इसमें बहुत सक्षम हैं।

यहाँ मुझे एक बात याद आ रही है जो आपके साथ साझा करना चाहता हूँ। भारत के पूर्व वायसराय लिनलिथगो की पुत्री जो काफी वृद्ध हो चुकीं थीं, एक दिन कॉर्बेट पार्क की सैर पर आईं। उन्हें ढिकाला क्षेत्र में घुमाने का दायित्व मुझे दिया गया। वो बचपन में अपने परिवार के साथ यहाँ वन्यजीवों का शिकार करने आती थीं और अब लगभग 50 वर्ष बाद यहाँ आईं थी। वार्षिक टाइगर शूट के समय वे यहाँ टेन्ट में रहते थे क्योंकि तब तक ढिकाला में रेस्ट हाउस नहीं बना था, और वे बोक्साड़ वन विश्राम भवन में रहते थे, जो कालागढ़ बाँध बनने के बाद अब रामगंगा जलाशय में जलमग्न हो गया है। जिप्सी से घूमते-घूमते जब हम लीदख़लिया के आगे ऊँचे टीले पर जलाशय के पास पहुँचे तो उन्होंने मुझसे जिप्सी से नीचे उतरने की इजाजत माँगी। मैं भी उनके साथ नीचे उतर गया तो जब मैंने उनकी ओर देखा तो वे रामगंगा के उस पार एकटक देखे जा रहीं थीं। मुझे लगा कि शायद वे अपने बचपन को याद कर रहीं हैं। उनके मौन को तोड़ते हुए मैंने उनसे पूछा’ ‘Madam, what difference do you find since then?’ उन्होंने कहा, ‘It’s the same! Exactly the same!’ तब मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘Of course! It would be same as you can’t change topography!’ तब उस भद्र महिला ने तपाक से उत्तर दिया, ‘No, you can change the topography. Just start the mining, do tree cutting, everything would change!’ मैंने उनकी आँखों में एक गहरा सन्तोष और सुकून देखा। तब उन्होंने मेरे दोनों हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, ‘Thank you so much! You have kept it as it is…’ यह हम सबके लिए सबसे बडी शाबाशी और कॉम्पलिमेंट था! इस पर मेरा मन और मस्तक गर्व से उन्नत हो गया!

आज के दिन, मेरा उन महान वनकर्मियों को सलाम, जो आजकल कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व में कार्यरत है, और उन्हें भी जो 1936 से लेकर आज तक इसमें संरक्षण कार्य करने हेतु सौभाग्यशाली रहें है,  जिनके अथक परिश्रम और निष्ठा से टाइगर अभी ज़िन्दा है!

आज का दिन मेरे जीवन का एक स्मरणीय दिवस है, क्योंकि  8 अगस्त 1991 को मैंने कॉर्बेट पार्क को जॉइन किया था। उसदिन मुझे आश्चर्य हुआ था कि वहाँ  पार्क की स्थापना के सम्बन्ध में कोई भी कार्यक्रम आयोजित नहीं किया गया था, क्योंकि इसी दिन रामनगर के समीपवर्ती छोई गाँव मे सिख आतंकवादियों ने कुछ लोगों की नृशंस हत्या कर दी थी, और उत्तरप्रदेश के तत्कालीन डीजीपी पुलिस और अन्य वरिष्ठ अधिकारी लखनऊ से हेलीकॉप्टर से यहाँ आये थे। मैंने पार्क के विद्वान प्रकृतिविद फील्ड डायरेक्टर पितृतुल्य श्री आनन्द सिंह नेगी से मुलाक़ात करके अपने जीवन की एक यादगार पारी प्रारम्भ की थी।

आज कॉर्बेट पार्क को स्थापित हुए 90 वर्ष हो गयें है। इस दिन न केवल कॉर्बेट पार्क में बल्कि पूरे उत्तराखंड में और देश में बाघ संरक्षण के उत्सव मनाने का दिन है। उत्तराखंड में इसलिए कि इसी पार्क की जीवन-रेखा रामगंगा नदी के किनारे ढिकाला में 1 अप्रैल 1973 को प्रोजेक्ट टाइगर प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के निर्देश पर तत्कालीन केंद्रीय पर्यटन मन्त्री  डॉ कर्ण सिंह द्वारा ही लॉन्च किया गया था। और अगले 10 वर्ष पश्चात जब 2036 में आज के दिन  हम कॉर्बेट पार्क की शताब्दी मना रहें होंगे। उचित होगा कि हम इस दशक का उपयोग इसकी जैव-विविधता संरक्षण के लिए विशेष योजना बनाकर क्रियान्वित करना चाहिए।

आज के इस ऐतिहासिक दिन को विशेष पोस्टल स्टाम्प जारी करने, पार्क के पुराने वनकर्मियों को सम्मानित करने, 90 वर्षों के अनुभव और लेख एक स्मारिका में संधारित करने, AI और डिजिटल तकनीकी प्रशिक्षण, वनकर्मियों को देश विदेश के पार्कों के भ्रमण आदि आदि कार्यक्रम आयोजित करने चाहिए। और सबसे प्रमुख आज के दिन को राष्ट्रीय पार्क दिवस के रूप में घोषित करके सभी पार्क पर्यटकों, स्टेक होल्डर्स, इको टोन क्षेत्र के ग्रामीणों और वन्यजीव प्रेमियों को उपहार देकर धन्यवाद ज्ञापित करना श्रेयस्कर होगा!!

काश! कोई लौटा दे मेरे कॉर्बेट पार्क के दिन!!

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