पुस्तक समीक्षा

  • चरण सिंह केदारखंडी

कोटी बनाल (बड़कोट उत्तरकाशी) में 7 जून 1981 को जन्मे दिनेश रावत पेशे से शिक्षक और प्रवृति से यायावर और प्रकृति की पाठशाला के अध्येता हैं जिन्हें because अपनी सांस्कृतिक विरासत से बेहद लगाव है.

अंक शास्त्र

“रवांई के देवालय एवं देवगाथाएं” नवम्बर 2020 में प्रकाशित लोक संस्कृति पर उनकी दूसरी किताब है इससे पहले रावत जी “रवांई क्षेत्र के लोकदेवता और लोकोत्सव” पुस्तक लिख चुके हैं जो because उनकी दूसरी किताब की प्रेरणा बनी है. समय साक्ष्य प्रकाशन देहरादून और संस्कृति विभाग उत्तराखंड के आर्थिक अनुदान से प्रकाशित 294 पृष्ठ की इस किताब में 5 अध्याय हैं और कवर पेज (महासू देवता) सोबन दास जी का बनाया हुआ है…

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उत्तराखंड समूचे भारत के साथ साथ हिमालयी राज्यों में भी अपनी एक विशिष्ट सांस्कृतिक अस्मिता के लिए जाना जाता है. भावना के उदात्त स्फुरणों में हम गर्व से इसे देवभूमि भी because पुकारते आये हैं जहाँ देवालय, महालय और अनूठी देव परंपराएं हैं. इस अनूठी देव परंपरा ने यहाँ के लोक मानस पर गहरी छाप छोड़ी है. देव परंपराएं यहाँ की संस्कृति का मात्र हिस्सा नहीं हैं बल्कि पूरी की पूरी लोक संस्कृति इन्हीं देव परंपराओं के इर्द—गिर्द घूमती है.

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लोक जीवन, परंपरा और संस्कृति because का बोलता आईना जैसी इस किताब को साहित्यकार डॉ. प्रयाग जोशी और रवांई के गौरव महावीर रवांल्टा ने अपना आशीर्वाद दिया है.

पहला अध्याय रवांई के साथ—साथ जनपद उत्तरकाशी का भौगोलिक और सांस्कृतिक सर्वे करता है. लेखक में बेहद पठनीय और भाषायी प्रवाह के साथ हिमालय के सांस्कृतिक सोम से because पाठक को सराबोर किया है. भारतीय मनीषा के आर्य ग्रंथों के सन्दर्भों के साथ लिखे गए इस अध्याय को चाय की दो प्यालियों के साथ आसानी से पूरा किया जा सकता है.

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‘लोकजीवन और लोकदेवता’ दूसरा अध्याय है जिसमें लेखक ने लोक को इन शब्दों में परिभाषित किया है : “…सामान्य दृष्टि से लोक को एक भौगोलिक सीमान्तर्गत आने वाले मानव because समाज की भावना, आचार-विचार, रीति-नीति, मान्यता-परम्परा, आस्था-अनुरंजन का ऐसा समुच्चय या पुन्ज कहा जा सकता है जो सम्बंधित लोक विशेष की पृथक पहचान बनता है” (पृष्ठ—35).

पुस्तक का तीसरा अध्याय ‘देवालय और प्रचलित धार्मिक प्रवृतियों और उनकी आंचलिक विशेषताओं को समर्पित है.

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बेहद ऊंचाई और गहराई से लिखा गया किताब का चौथा अध्याय ‘आंचलिक देवालय और देवगाथाएं’ शीर्षक से है जिसमें नौगाँव, पुरोला और मोरी के देवालयों और देवगाथाओं पर तीन because अलग़-अलग़ खंड लिखे गए हैं. रौंतेली रवांई के इन तीन हिस्सों में प्रचलित देव मान्यताएं, पूजा परंपरा, मंदिरों का शिल्प, कला और साहित्य पर बहुत ही प्रामाणिक तरीके से लिखा गया है.

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निष्कर्ष रूप में लिखा गया पाँचवाँ अध्याय रवांई क्षेत्र में प्रचलित महाभारतकालीन परंपराओं पर प्रकाश डालता है. किताब के अध्ययन से पाठक को यह भी पता चलता है कि ‘नागराजा’ निर्विवाद रूप से इस पूरे क्षेत्र के सबसे अधिक पूजे जाने वाले लोकदेवता हैं. ख़ुद लेखक इस बात की तसदीक करते हैं : “रवांई का शायद ही कोई ऐसा because गाँव या घर हो जिसमें नागराजा की पूजा न होती हो. नागराजा के प्रतीक ‘नागराजा की लाठी’ लोहे की छड़ी और एक दूसरी छड़ी पर जड़ा लोहे का दीपक पूजा स्थलों पर सुशोभित रहते हैं. ये छड़ी ही नागराजा की प्रतीकात्मक उपस्थिति है..” (261)

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इस अध्याय में पांडव नृत्य के विभिन्न आयामों और स्वरूपों पर भी प्रकाश डाला गया है यथा गैंडी नृत्य, स्वांग नृत्य, जोगड़ा नृत्य, श्मशान साधना और सबल साधना. लोक देवता नृसिंह because के अलग़-अलग़ रूपों पर दी गई जानकारी भी सहेजने लायक है और बहुत मार्मिक ढंग से पेश की गयी है रथ देवता और दिशा दांगुड़िया की लोक कहानियों को भी…

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दिनेश रावत जी अपनी सृजन यात्रा की सुबह में हैं, अभी उनसे बहुत सारी उम्मीदें हैं. उनकी इन किताबों ने उनके मूल्याङ्कन के मानदंडों को बहुत बड़ा कर दिया है. इस because किताब को लिखकर उन्होंने अपनी मातृभूमि के कर्ज़ को चुका दिया है और समाज के उस हिस्से को ऋणी कर दिया है जिनकी पगलाई बातों में केवल दो बिस्वा ज़मीन का मसाण मिलता है…और जिनके लिए मातृभूमि ‘मात्र भूमि’ है.

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Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास

1 Comment

    बहुत बेहतरीन समीक्षा। जब कभी भी इस किताब की उपलब्धता होगी, अवश्य ही पढ़ूँगा । शुभकामनाएँ।

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