साहित्‍य-संस्कृति

नशे के खिलाफ ‘जय हो’ का हस्ताक्षर अभियान

नशे के खिलाफ ‘जय हो’ का हस्ताक्षर अभियान

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नशे के खिलाफ नगरवासियों को जागरूक कर उपजिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापनहिमांतर ब्यूरो, बड़कोटनगर पालिका परिषद सहित आसपास के क्षेत्रों में नशे का करोबार बहुत फलफूल रहा है. सामाजिक चेतना की बुलन्द आवाज 'जय हो' ग्रुप, नगर व्यापार मण्डल सहित नगर केbecause प्रबुद्वजनों ने नशे के खिलाप हस्ताक्ष अभियान चलाकर थाना प्रभारी निरीक्षक और उपजिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपते हुए नशे से जूड़े लोगों व माफियाओं के खिलाफ कानूनी कार्यवाही की मांग की. इधर 'जय हो' ग्रुप ने जिलाधिकारी because और पुलिस अधीक्षक को भी 501 लोगों के हस्ताक्षर युक्त ज्ञापन भेजकर नशे से बड़कोट को मुक्त करने की अपील की. हस्ताक्षर नगर पालिका परिषद सहित आसपास के क्षेत्रों में नशीले पदार्थों का बड़ा गोरख धंधा चल रहा है, जिसमें भारी मात्रा में बड़कोट व आसपास के क्षेत्रों में स्मैक, भांग आदि नशा because युवाओं को परोसा जा रहा है, इससे युवा पीड़ी...
आओ! आज वेलेंटाइन-डे पर प्रकृति प्रेम का इजहार करें

आओ! आज वेलेंटाइन-डे पर प्रकृति प्रेम का इजहार करें

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आज 14 फरवरी को मनाया जाने वाला वेलेंटाइन डे प्यार के इजहार का दिन है.डॉ. मोहन चंद तिवारीभारत में वैलेंटाइन-डे के मौके पर वसंत ऋतु का सुहाना मौसम चल रहा होता है. जिस प्रकार प्यार मोहब्बत की स्नेहधारा के साथ इस पावन ऋतु का स्वागत किया जाना चाहिए, so वह माहौल आज कहीं गायब है.संसद हो या सड़क चारों ओर घृणा विद्वेष की भावना से वातावरण विषाक्त बना हुआ है. कोरे विकासवाद और आर्थिक सुधारों ने खेत, किसान यहां तक कि हिमालय की गिरि कंदराओं को because भी रुला कर रख दिया है.चमोली में ग्लेशियर के टूटने से जो जल सैलाब उमड़ा है, उसने गम्भीर चेतावनी दे दी है कि आने वाले दिन प्राकृतिक प्रकोप से जूझने के भयंकर दिन होंगे. कैसे कहें हम प्रकृति के उपासक देश हैं. पावन ऋतुपर आज वेलेंटाइन डे के मौके पर हम भारतीय होने के नाते यही मंगल कामना करते हैं कि हर्ष और उल्लास से इस प्रेम दिवस का स्वागत करें, घृणा...
गावों में भाईचारे की मिसाल हैं परम्परागत घराट  

गावों में भाईचारे की मिसाल हैं परम्परागत घराट  

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालपहाड़ की चक्की, शुद्धता और आपसी भाईचारे की मिसाल कायम करने वाली ये चक्की शायद ही अब कहीं देखने को मिलती होगी, गुजरे जमाने में जीवन जीने का यह because मुख्‍य आधार हुआ करती थी. पहाड़ में मानव सभ्यता के विकास की ये तकनीक सबसे प्राचीन है. यहां की जीवन शैली में इसे आम भाषा में घराट (Gharat) या घट्ट कहा जाता है और हिंदी में पनचक्‍की यानी पानी से चलने वाली चक्की. but ये पूर्ण रूप से हमारे चारों ओर के पर्यावरण के अनुकूल होते थे, इसका निर्माण हमारे बुजुर्गों  ने अपनी सुविधा के अनुसार किया है, जिस जगह पानी की पर्याप्त मात्रा में उपलब्धता रही, वहीं इसका निर्माण किया, खासकर नदी या सदाबहार गाढ़ गदेरे में इसका निर्माण हुआ है. एक समय वह भी था जब हर गांव का अपना एक घराट होता हुआ करता था, चाहे वो किसी एक व्यक्तिगत परिवार so का रहा हो, पूरे गांव के लोग उसी घराट में अपना गेहूं, जौ, मक्...
पहाड़ पर बस में बैठने की ख्वाहिश…

पहाड़ पर बस में बैठने की ख्वाहिश…

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फकीरा सिंह चौहान ‘स्नेही’शहरों में बस के विषय में कई बार मैंने अपने पापा से सुना था, कि बस एक घर की तरह होती है. उसमें 40- 50 लोग एक साथ मिलकर बैठते हैं. उसके अंदर खिड़कियां भी होती हैं because जिससे बाहर का नजारा आसानी से देख सकते हैं. नदी के उस पार दूर पहाड़ की धार becauseपर खींची गई एक पतली-सी रेखा जिसे लोग सड़क कहते थे. सड़क पर चलने वाली मोटर मकड़ी की तरह सरकती नजर आती थी . नजर जब भी बुजुर्ग बस या मोटर की बात करते थे, मैं बड़े  उत्सुकता और ध्यान से सुनता था. मुझे नजदीक से सड़क और मोटर देखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ था. अचानक एक दिन गांव के पंच आंगन में मीटिंग का आयोजन हुआ सभी बुजुर्गों ने उस मीटिंग में भाग लिया. मैं भी चुपके से एक दीवार की ओड लेकर आंगन के पीछे ही छुप छुप कर because मीटिंग में होने वाली बातों की चर्चा को सुनने लगा. गांव वाले सड़क के विषय में बात कर रहे थे. गां...
आन-बान और शान की प्रतीक हैं टोपियां…

आन-बान और शान की प्रतीक हैं टोपियां…

साहित्‍य-संस्कृति
सुनीता भट्ट पैन्यूलीसर्द मौसम है, कभी बादल सूर्य को आगोश में ले लेते हैं कभी सूरज देवता बादलों को पछाड़कर धूप फेंकते यहां-वहां नज़र आ जाते हैं, कभी पेड़ो के झुरमुट में, कभी आसमान so में प्रचंड चमकते, कभी खेतों के पीछे, कभी पहाड़ियों में धीरे-धीरे सरकते कभी नदी का माथा  चूमते किंतु इस धूप में ताबिश नहीं है बनिस्बत इसके सर्दी की धूप में कहीं न कहीं नमी भी है. जरा-सी धूप मलने का मन हो देह में तो एक चुभन भरी हवा चेहरे को छूकर, सर्र से कानों से होकर गुज़र जाती है.माथा फिर क्या किया जाये? नमी और कोहरे भरे दिन से धूप का आंख-मिचौली करना कहां सुकून दे पाता है ठिठुरते शरीर को. झट से ओढ़ लिये जाते हैं शाल, स्कार्फ, so कैप या टोपी तब कहीं जाकर निजात मिल पाती है ठंड से. कड़कड़ाती ठंड  हो और दांत किटकिटा रहे हों ऐसे में टोपी, स्कार्फ़ मफलर पहनने का ख़्याल न आये तो सर्दी का मजा लेना बेईमानी है....
जहां न्‍याय के लिए गुहार लगाने पहुंचते हैं लोग…

जहां न्‍याय के लिए गुहार लगाने पहुंचते हैं लोग…

साहित्‍य-संस्कृति
कुमाऊंनी से कुछ अलग है न्याय देवता गोरिल की गढ़वाली जागर कथा न्यायदेवता गोरिल पर एक शोधपूर्ण लेखडॉ. मोहन चंद तिवारीकुमाऊं और गढ़वाल के विभिन्न क्षेत्रों में 'ग्वेल देवता', ‘गोलज्यू’ ,‘गोरिल' आदि विभिन्न नामों से आराध्य न्याय देवता की लोकगाथा के विविध संस्करण प्रचलित हैं और उनमें इतनी भिन्नता है कि कभी कभी उनमें परस्पर तारतम्य बिठाना भी बहुत कठिन कार्य हो जाता है. because लोकगाथाओं की सामान्य प्रवृत्ति रही है कि विभिन्न क्षेत्रीय मान्यताओं और जनश्रुतियों के आधार पर इनका निरंतर कथाविकास होता रहता है. जागर लगाने वाले क्षेत्रीय जगरियों के द्वारा भी कथा में अपनी तरफ से कुछ नया जोड़ देने के कारण न्याय देवता ग्वेल की कथा के साथ समय समय पर कई अवांतर कथाएं भी जुड़ती गई हैं. मूल कथा को क्षेत्रीय भेद और स्थानीय मान्यताओं के कारण भी कई तरह के मोड़ दे दिए गए हैं. इसलिए यह पता लगाना कठिन है कि न्य...
नोएडा में जोरों पर है श्रीराम मंदिर समर्पण निधि अभियान, घर-घर संपर्क कर रहे हैं स्वयं सेवक

नोएडा में जोरों पर है श्रीराम मंदिर समर्पण निधि अभियान, घर-घर संपर्क कर रहे हैं स्वयं सेवक

साहित्‍य-संस्कृति
हिमांतर ब्यूरो, नोएडा  अयोध्या में भगवान श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण के लिए शुक्रवार से ही देशभर में श्रीराम मंदिर समर्पण निधि अभियान की शुरुआत हो चुकी है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) और उससे जुड़े संगठनों के कार्यकर्ता घर-घर संपर्क अभियान के जरिए राम मंदिर के निर्माण के लिए सहयोग राशि जुटा रहे हैं। नोएडा में भी इस अभियान के तहत हर सोसायटी, सेक्टर और मोहल्लों में जाकर कार्यकर्ता राम मंदिर निर्माण के लिए धन संचय और संपर्क अभियान कर रहे हैं। प्रभात फेरियों के जरिए हर हिंदू को अयोध्या में बनने वाले भव्य राम मंदिर और उसके निर्माण के लिए चलाई जा रही श्रीराम मंदिर समर्पण निधि अभियान के बारे में जानकारी दी जा रही है और भजन-कीर्तन के जरिए राम काज के लिए लोगों के भीतर समर्पण का भाव भरा जा रहा है। संघ के कार्यकर्ता और आम हिंदू नागरिक जोश, जुनून और समर्पण भाव से घर-घर जाकर संपर्क अभियान कर रहे ...
क्या है जन्म-जन्मान्तर और सात जन्मों के रिश्ते की सच्चाई?

क्या है जन्म-जन्मान्तर और सात जन्मों के रिश्ते की सच्चाई?

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भुवन चन्द्र पन्तजब स्त्री व पुरूष वैवाहिक सूत्र में बंधते हैं तो सनातन संस्कृति में इसे जन्म-जन्मान्तर का बन्धन अथवा सात जन्मों का बन्धन कहा जाता है. अगर कोई ये कहे कि हां, यह बात शत-प्रतिशत सही है तो संभव है कि उसे दकियानूसी ठहरा दिया जाय. because वर्तमान दौर वैज्ञानिक सोच का है, जब तक हम कारण व परिणाम पर तसल्ली नहीं कर लेते, उसे यों ही स्वीकार नहीं करते. वस्तुतः होना भी यहीं चाहिये, किसी भी विचार अथवा परम्परा को बिना तथ्यों व तर्कों के स्वीकार कर लेना कोई बुद्धिमानी भी नहीं है. लेकिन ये भी सच है कि सनातन संस्कृति की सभी अवधारणाऐं शोधपूर्ण एवं विज्ञानपरक एवं तार्किक हैं. ये बात अलग है कि हमने उनकी गहराइयों में न जाकर और मर्म को जाने बिना अपनी परम्परा का हिस्सा बना लिया.so यही कारण है कि आज के युवा आनुवंशिकी के जनक ग्रेकर जॉन मेंडल के सिद्धान्तों पर तो विश्वास करते हैं, जिन्होंने उन्नी...
नव वर्ष 2021 हरिद्वार कुम्भ का भी लोकमंगलकारी वर्ष है

नव वर्ष 2021 हरिद्वार कुम्भ का भी लोकमंगलकारी वर्ष है

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डॉ. मोहन चंद तिवारीप्रति वर्ष 31 दिसंबर को काल की एक वर्त्तमान पर्याय रात्रि 12 बजे अपने अंत की ओर अग्रसर होती है तो दूसरी पर्याय नए वर्ष के रूप में पदार्पण भी करती है.काल के इसी संक्रमण की वेला को अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार नववर्ष का आगमन माना जाता है. इस बार नव वर्ष की संक्रान्ति में आगामी जनवरी के महीने से अप्रैल के महीने तक हरिद्वार कुंभ का भी शुभ संयोग उपस्थित हो रहा है. हालांकि कोरोना संकट के कारण कुम्भ के शाही स्नानों की शुरुआत 11 मार्च से होगी किन्तु कुम्भ स्नान का प्रारम्भ जनवरी महीने के मकर संक्रांति से ही हो जाता है. इसलिए इस नववर्ष 2021 का 'कुम्भ वर्ष' के रूप में भी विशेष महत्त्व है.कुम्भ स्नानदेश में नववर्ष  मनाने की विविधता के बावजूद एक समानता यह है कि भारत के लोग सूर्य की संक्रांति और चन्द्रमा के नक्षत्र विज्ञान की शुभ पर्याय को ध्यान में रखते हुए सौरवर्ष और चान्...
नदी कभी वापस नहीं लौटती…

नदी कभी वापस नहीं लौटती…

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पुरातन वर्ष एक दस्तावेज़ भी है हमारे अनुभव हमारी स्मृतियों का जिसमें अनगिनत अनगढा, अनसुलझा, so कुछ तुर्श, कुछ सड़ा-गला, कुछ थोड़ा बहुत उपयोगी भी है यह हमें तय करना है कि नवीनता की ड्योढी पर हमें क्या-क्या साथ लेकर पांव रखना है.सुनीता भट्ट पैन्यूलीसमय धारा प्रवाह बहती because अविरल नदी है जिसकी नियति बहना है, जो किसी के लिए नहीं ठहरती, हां विभिन्न कालखंडों में विभाजित विविध घाटों के पड़ावों से टकराकर अपने होने का आभास कराती हुई जा पहुंचती है उस भवसागर में  जिसका प्रारब्ध उस अदृश्य शक्ति ने या विधि के विधान ने सुनिश्चित किया है. जहां न अंत है, न आरंभ है, न अफसोस की गुंजाइश है, न हर्ष का पारावार, न किंतु-परंतु, न सवाल-जवाब, न उल्लसिता की कोई परिभाषा. because सब कुछ छुटता चला जाता है. साथ बहकर चली आती हैं उस नदी के साथ तो वह हैं स्मृति खंड जिसके दांये-बांये से होकर समय रूपी नदी त...