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पहाड़ी क्षेत्रों में आर्थिक रूप से अधिक फायदेमंद है बड़ी इलायची का उत्पादन
डॉ. राजेंद्र कुकसालबड़ी इलायची या लार्ज कार्डेमम को मसाले की रानी कहा जाता है. इसका उपयोग भोजन का स्वाद बढाने के लिए किया जाता है साथ ही इसमें औषधीयय गुण भी होते है. बड़ी इलायची से बनने वाली दवाईयों का उपयोग पेट दर्द, वात, कफ, पित्त, अपच, अजीर्ण, रक्त और मूत्र आदि रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है. इसकी खेती सिक्किम, पश्चिमी बंगाल, दार्जलिंग और भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में अधिक की जाती है. बड़ी इलायची भारत के उत्तर– पूर्वी भाग में प्राकृतिक रूप में पाई जाती है. इसके आलावा नेपाल, भूटान और चीन जैसे देश में भी इसकी खेती बड़े पैमाने पर की जाती है.समुद्र तट से 600 - 1500 मीटर तक की ऊंचाई वाले नम व छायादार स्थान जहां पर सिंचाई की सुविधा हो, बड़ी इलायची खेती की अपार संभावनाएं है. किन्तु समय पर उन्नत किस्मों की पौधों का न मिलना, तकनीकी जानकारी का अभाव, फसल (फलों) को सुखाने हेतु आधुनिक...

टैगोर का शिक्षादर्शन- ‘असत्य से संघर्ष और सत्य से सहयोग’
रवीन्द्र नाथ टैगोर की पुण्यतिथि (7 अगस्त,1941) पर विशेषडॉ. अरुण कुकसाल‘किसी समय कहीं एक चिड़िया रहती थी. वह अज्ञानी थी. वह गाती बहुत अच्छा थी, लेकिन शास्त्रों का पाठ नहीं कर पाती थी. वह फुदकती बहुत सुन्दर थी, लेकिन उसे तमीज नहीं थी.
राजा ने सोचा ‘इसके भविष्य के लिए अज्ञानी रहना अच्छा नहीं है’....उसने हुक्म दिया चिड़िया को गंभीर शिक्षा दी जाए.
पंडित बुलाए गए और वे इस निर्णय पर पंहुचे कि चिड़िया की शिक्षा के लिए सबसे जरूरी हैः एक पिंजरा. और फिर पिंजरे में रखकर चिड़िया ज्ञान पाने लगी. लोगों ने कहा ‘चिड़िया के तो भाग्य जगे!’....
‘महाराज, चिड़िया की शिक्षा पूरी हो गई’.
राजा ने पूछा, ‘वह फुदकती है?
भतीजे-भानजों ने कहा, ‘नहीं !’
‘उड़ती है?’
‘एकदम नहीं!’
‘चिड़िया लाओ,’ राजा ने आदेश दिया.
चिड़िया लाई गई. उसकी सुरक्षा में कोतवाल, सिपाही और घुड़सवार साथ चल रहे थे. राजा ने चिड़िया को उंगली से ...

संकट में सीमांत
सुमन जोशीबरसात का मौसम है. खिड़कियों के शीशों पर पड़ी बूंदों को देखते हुए अदरक-इलायची वाली चाय की चुस्कियों के बीच अपनी पसंदीदा किताब पढ़ने के दिन.
और उसी के साथ म्यूजिक स्टोर से,
"रिम-झिम गिरे सावन,
सुलग-सुलग जाए मन,
भीगे आज इस मौसम में,
लगी कैसी ये अगन".
गीत सुनते-सुनते कहीं पहाड़ों व बचपन की यादों में खो जाने के दिन.
तेल की कढ़ाई में प्याज़ और आलू का बेसन में लिपटकर गोते खाने के दिन.हम इस बरसात में जहाँ जाने का मन बनाते हैं. जिस जगह की छवि हम मन में उकेरते हैं असल में वहां के लोग पल-पल डरों के अंधेरों में जीते हैं. जो लोग इस मंजर का आँखों देखा हाल देख रहे है और त्रादसी से जूझ रहे हैं उनके लिए बरसात एक डरावने सपने की तरह हैं.और इसी बीच शहर में बैठे अपने 12×14 फ़ीट के कमरे में बैठे फेसबुक,इंस्टाग्राम पर बरसात की चुनिंदा तस्वीरों पर लाइक करते हुए हम सोचते हैं कि काश हम वहा...

राजनीति में अदला बदली
भाग—2डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र राजनीति में परिवर्तन आंतरिक अंतर्विरोध के कारण भी होता है. यह अंतर्विरोध पार्टी विशेष कम होकर व्यक्तिगत रूप में ज्यादा दिखता है, जब एक प्रभावशाली नेता अपनी ही पार्टी से संबंध विच्छेद कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है. उस वक्त नेता के समर्थक जितने भी सांसद/विधायक होते हैं, वह भी विरोधी हो जाते हैं. ऐसे में राजनीति की परिवर्तनशील प्रक्रिया चरित्रहीन हो जाता है. जिससे स्थिति अस्थिर हो जाती है और यह अस्थिरता राजनीति के उन सवालों को खड़ा करता है, जिसे देखने की कोशिश कभी संवैधानिक रूप में हुई ही नहीं. इसके कई उदाहरण अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक उतार-चढ़ाव में मिल जाता है. इसलिए जिस राजनीति में आत्ममंथन की जरूरत है, कारणों की समीक्षा की जरूरत है, वहां सिर्फ राजनीतिक आलोचनाओं के अलावा कुछ नहीं है.आरोप-प्रत्यारोप के बीच राजनीतिक नैतिकता खत्म होती नजर ...

अब कौन ‘नटार’ से डरता है…
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—40प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में खेती हो न हो लेकिन "नटार" हर खेत में होता था. "नटार" मतलब खेत से चिड़ियों को भगाने के लिए बनाया जाने वाला ढाँचा सा. तब खेतों में जानवरों से ज्यादा चिड़ियाँ because आती थीं. एक -दो नहीं बल्कि पूरा दल ही आता था. झुंगर, मंडुवा, तिल, गेहूं, जौ, सरसों और धान सबको सफाचट कर जाते थे. कई बार तो उनके दल को देखकर ईजा हा...हा ऊपर से बोल देती थीं लेकिन तब चिड़ियाँ निडर हुआ करती थीं. दूर भागने की जगह वो निर्भीक होकर दाने चुगती रहती थीं.
ज्योतिष
खेत में बीज बोने के बाद ईजा की दो प्रमुख चिंताएं होती थीं: एक 'बाड़' करना और दूसरा "नटार" लगाना. बाड़, पशुओं के लिए और नटार, चिड़ियों के लिए. बाड़ के लिए ईजा '"रम्भास" (एक पेड़) और अन्य लकड़ियां लेकर आती थीं. सम्बल से उन्हें 'घेंटने' के बाद लम्बी लकड़ियों को सीधा और छोटी लकड़ियों को आड़ा- because तिरछा ल...

महिलायें, पीरियड्स और क्वारंटीन
डॉ. दीपशिखा जोशीवैसे तो लगभग हमारे देश के हर हिस्से में महिलाओं को माहवारी के दिनों में अछूत माना जाता है, मगर पहाड़ी इलाक़ों में ख़ासकर बात करूँगी उत्तराखण्ड के बहुत जगहों पर इस प्रथा का बहुत सख़्ती से पालन होता है.
बहुत से लोग जो अब शहरों में रहते हैं या जिनका कभी पहाड़ों से वास्ता ना रहा हो शायद विश्वास ना करें कि अभी भी या कभी इतना कठिन जीवन जीती हैं या जीती थी महिलायें!
क्वारंटीन, आइसोलेशन शब्द हम में से बहुत से लोगों ने अब इस कोरोना काल में सुने होगें, मगर वो पहाड़ी महिला आज भी माहवारी के उन कठिन दिनों में रहती है पूरे 4 से 7 दिन बिलकुल अलग-थलग, उसे कोई छू नहीं सकता, अगर कोई छू लें तो गौ-मूत्र से उसकी शुद्धि की जाती है. उस महिला को इन दिनों केवल रसोई या पूजा-घर ही नहीं घर के बाक़ी हिस्सों में जाने की भी मनाही होती है. उसे मिलता है एक अलग स्थान, घर का कोई कोना, अधिकांशतया गाय को...




