संस्मरण

चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जब नाटक में देवता के रूप में अवतरित हुए

चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जब नाटक में देवता के रूप में अवतरित हुए

संस्मरण
पेशावर विद्रोह दिवस पर यात्रा-संस्मरण डॉ. अरुण कुकसाल ...कैन्यूर बैंड से 20 किमी. चलकर हम पीठसैण पहुंचे हैं. पीठसैण (समुद्रतल से 2250 मीटर ऊंचाई) एक ऊंची धार पर एकदम पसरा है, ग्वाले की तरह. जैसे कोई ग्वाला ऊंचे टीले पर अधलेटा आराम फरमाते हुए नीचे घाटी में चरते अपने जानवरों पर भी नजर रख रहा हो. ‘पहाड़ी भाषा में ‘सैण’ का मतलब ‘मैदान’ होता है और ‘सैण’ में 'ई' की मात्रा लगा दो तो पहाड़ी में ‘सैणी’ ‘महिला’ को कहते हैं’. अब तक बिल्कुल चुप रहने वाले अजय ने अपनी चुप्पी इस ज्ञानी बात को कहकर तोड़ी है. सपकपाया अजय अपनी सफाई में कहता है कि 'पीठसैण नाम पर उसे यह याद आया'. अजय की इस बात पर केवल मुस्कराया ही जा सकता है. पीठसैण की वर्तमान पहचान उत्तराखण्ड के जननायक स्वर्गीय वीर चंन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’ जी से है. (ज्ञातव्य है कि चन्द्रसिंह ‘गढ़वाली’, सेना में 2/18 रायल गढ़वाल में हवलदार थे और 23 अप्रैल, 1930...
डॉ. अशोक कुमार गुसाईं : सीमांत में भी सराही गई जिनकी सक्रियता और संजीदगी

डॉ. अशोक कुमार गुसाईं : सीमांत में भी सराही गई जिनकी सक्रियता और संजीदगी

संस्मरण
दिनेश रावत डॉ. अशोक कुमार गुसाईं जी! शिक्षा विभाग के एक ऐसे अधिकारी रहे जिनकी प्रशासनिक एवं अकादमिक समझ जितनी गहरी है, भाव-स्वभाव, कार्य व व्यवहार उतना ही सहज-सरल. कार्य एवं दायित्वों के प्रति सजग-समर्पित तथा शिक्षक अभिभावक व जन सामान्य के लिए सदैव सुलभ. ना समय की पाबंदी, ना पद का कोई मद. आप ना केवल स्वयं बेहतर करने के लिए पर्यत्नशील रहते थे बल्कि शिक्षकों को भी निरंतर प्रेरित—प्रोत्साहित करते रहते थे. आपकी पारखी नज़रें बहुत आसानी से काम करने और ना करने वालों को पहचान लेती थीं. फिर चाहे वह अतिदुर्गम में हों या अतिसुगम में. काम न करने वालों के खिलाफ आवश्यक कार्यवाही तथा काम करने वालों को यथोचित मान-सम्मान-स​हयोग प्रदान करना आपकी विशिष्टता रही है. काम करने वाले शिक्षक-शिक्षिकाएं आपकी जुबां पर होते थे और अवसर मिलने पर उनके प्रयासों की प्रशंसा भी करते थे. आपके इन सद्प्रयासों से न केवल सबंध...
टिहरी का आदि विद्रोही (स्पार्टाकस) की याद

टिहरी का आदि विद्रोही (स्पार्टाकस) की याद

संस्मरण
अरुण कुकसाल बात 1973 की है. पिताजी का काशीपुर से टिहरी ट्रांसफर हुआ. मैंने 10वीं में प्रताप इण्टर कालेज, टिहरी में एडमीशन ले लिया था. पुराना बस अड्डा से बाजार की ओर ढलान से जाते हुए पुल के पार चकाचक सफेद मकान और उसके ऊपर लगे लाल झण्डे पर निगाह अक्सर रुक जाती थी. कालेज जाते हुए एक दिन जिज्ञासावश साथ चल रहे दोस्त अतर सिंह पुण्डीर से पूछा ‘ये घर किसका है' तो उसने सनसनी भरी जानकारी दी. टुकड़े-टुकड़े में कई दिनों तक मित्रों से मिलने वाली सूचना के मुताबिक ‘वो मकान वकील विद्यासागर नौटियाल का है. वे पक्के कम्यूनिस्ट हैं. रूस एवं चीन सहित कई अन्य कम्यूनिस्ट देशों में उनका आना-जाना लगा रहता है. लेखक भी हैं और अच्छी कहानियां लिखते हैं. एक दोस्त ने राज की बात बड़े धीरे से मित्रमण्डली को बताई कि वे जासूस भी हैं. ‘बस फिर क्या था. उन पर अधिक से अधिक जानकारी जुटाना हमारे, प्रमुख कार्यो में शामिल हो ...
एक झोला हाथ में, चार चेले साथ में

एक झोला हाथ में, चार चेले साथ में

संस्मरण
प्रकाश उप्रेती  सभागार खचाखच नहीं भरा था. स्टेज पर 4 कुर्सियां और नाम की पट्टी थी. एक आयोजकनुमा जवान अंदर-बाहर और स्टेज के ऊपर नीचे चक्कर काट रहा था. गिनती तो नहीं की लेकिन सभागार में अभी सात-आठ लोग ही थे. उनमें से भी 2 लोग बैठ हुए थे बाकी सभागार की भव्यता और स्टेज की सजावट को हसरत भरी निग़ाहों से निहार रहे थे. तभी 24-25 साल का एक नौजवान गेट को पूरी ताकत से धक्का देते हुए सभागार के भीतर घुसा. उस नौजवान के ललाट पर पसीने की कुछ बूंदे थी, बाल अजय देवगन की भांति माथे से चिपके थे, पीले रंग की कमीज जिसे नाभि तक पहनी हुई पेंट के भीतर अतिरिक्त परिश्रम से खोंचा गया था, पेट तीन चौथाई निकला हुआ, कंधे पर हिमाचल में हुए सेमिनार का झोला, पाँव में चोंच वाले जूते, चेहरे पर अति गंभीरता थी. इस मुद्रा को मैंने ही नहीं बल्कि वहाँ उपस्थित उन 7-8 लोगों ने भी नोटिस किया. भीतर घुसते ही वह दिव्य नौजवान स्टेज की...
मेरे हिस्से का आपातकाल

मेरे हिस्से का आपातकाल

संस्मरण
चारु तिवारी अंधेरी काली रातें. तारों से भरा आसमान. कड़कड़ाती ठंड़. चांद भी जैसे सुबह होने का इंतजार कर रहा हो. अभी ‘ब्यांण तार’ आने में देर थी. घाटी में बसे इस छोटे से कस्बे के चारों ओर गांव ही गांव. कहीं कोई आहट नहीं. चिड़ियों ने भी अपना ‘घोल’ नहीं छोड़ा है. रात खुलने के अभी कोई संकेत नहीं. दूर शियारों की ‘टुक्याव ’ (बोलने की आवाज) अभी आयी नहीं. बगल के गांव रावलसेरा के मुर्गे तो और देर में बांग देते हैं. बाहर खेतों में दूर तक बिछी ‘तुषार’ (रात को गिरी ओस का सख्त होना) की सफेद चादर. जहां पानी रुका हैं वहां ‘खांकर’ (पानी का जमना) जम गई है. सोचता था पिताजी इतनी जल्दी उठ क्यों जाते हैं? स्कूल जाने का समय भी दस बजे का है. इतनी जल्दी पिताजी जाते कहां हैं? ईजा से एक-दो बार पूछा तो वह भी टाल गई. बहुत बाद में पता चला कि देश में आपातकाल लगा है. सरकारी कर्मचारियों से सख्ती है. नौकरी बचानी है तो इंदिरा...
उत्तराखंड: मठ-मंदिरों के प्रति मैं श्रद्धा से नतमस्तक हो गई

उत्तराखंड: मठ-मंदिरों के प्रति मैं श्रद्धा से नतमस्तक हो गई

संस्मरण
जाख देवता (गुप्तकाशी) जाखधार देवशाल सुनीता भट्ट पैन्यूली यात्राओं का एक नैतिक व सकारात्मक कर्म यह भी होना चाहिए कि जहां-जहां हम जाते हैं, रहगुज़र जिस पर भी हमारी दृष्टि पड़ती है उसके बारे में कौतुहल, जिज्ञासा  इतनी विकराल होनी चाहिए कि हम उस वैशिष्ट्य और वैविध्य को दूसरों के संज्ञान में भी ला सकें. यदि हम पौराणिक और धार्मिक स्थलों की यात्रा पर हैं तो यात्रायें निश्चित ही अपनी  परंपराओं और अपने सांस्कृतिक गौरव को बल देने के उद्देश्य से भी प्रेरित होनी चाहिए. अभी हाल ही में गुप्तकाशी जाना हुआ. गुप्तकाशी अपने आप में ही एक पौराणिक और सांस्कृतिक वैभव की नगरी है. केदारघाटी के जाख देवता जिन्हें यहां के स्थानीय निवासी यक्ष के रूप में पूजते हैं,अपने रहस्यमयी और चमत्कारिक अवतरण के लिए देश-विदेश में भी प्रख्यात हैं. कहा जाता है कि जाख देवता अपने पशवा पर अवतरित होकर जलते अंगारों पर नृत्य करता...
हिमालय की एक परंपरा का जाना है पर्यावरणविद विश्वेश्वर दत्त सकलानी का अवसान

हिमालय की एक परंपरा का जाना है पर्यावरणविद विश्वेश्वर दत्त सकलानी का अवसान

संस्मरण, स्मृति-शेष
'वृक्ष मानव' विश्वेश्वर दत्त सकलानी जी की जयंती (2 जून, 1922 ) पर सादर नमन चारु तिवारी प्रकृति को आत्मसात करने वाले वयोवृद्ध पर्यावरणविद विश्वेश्वर दत्त सकलानी का अवसान हिमालय की एक परंपरा का जाना है. उन्हें कई सदर्भों, कई अर्थों, कई सरोकारों के साथ जानने की जरूरत है. पिछले दिनों जब उनकी मृत्यु हुई तो सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा के समाचार माध्यमों ने उन्हें प्रमुखता के साथ प्रकाशित-प्रसारित किया. इससे पहले शायद ही उनके बारे में इतनी जानकारी लेने की कोशिश किसी ने की हो. सरकार के नुमांइदे भी अपनी तरह से उनके अंतिम संस्कार में शामिल हुये. मुख्यमंत्री से लेकर राज्यपाल तक ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया. जैसे भी हो यह एक तरह से ‘वृक्ष मानव’ की एक परंपरा को जानने का उपक्रम है जिसे कई बार, कई कारणों से भुलाया जाता है. 96 वर्ष की उम्र में (18 जनवरी, 2019) उन्होंने अपने गांव सकलाना पट्टी ...
अपना-अपना नया साल…

अपना-अपना नया साल…

संस्मरण
सुनीता भट्ट पैन्यूली कल नये साल का पहला दिन है। हे ईश्वर ! विश्व के समस्त प्राणियों ,मेरे घर-परिवार में, नये साल में जीवन के शुभ गान और स्फूरित राग हों,इसी अन्तर्मन से बहती हुई प्रार्थना में हिलोरें मारती हुई मैं अपनी दैनंदिन क्रिया के अहम हिस्से का निर्वाह करने, अपने ओसारे में आ गयी, जैसे ही तुलसी के चौबारे में दिया जलाया,तभी दिवार की उस तरफ से आवाज़ आई। कैसी हो बेटी? मैं सुबह से देख रहा था तुम्हें, तुम आज दिखाई नहीं दी। मैंने दीये की पीत वर्ण और बिछुड़ते हुए सूरज की रक्ताभ मिश्रित नारंगी लौ में ताऊजी को देखा। ताऊजी प्रणाम, मैं ठीक हूं आप कैसे हैं ? हां!आज थोड़ी सी व्यस्त थी मैं। कल नया साल का पहला दिन है ना? सोचा आज ही गाजर का हलुआ बनाकर रख लूं कल के लिए..वही सब गाजर को घिसकर उसे दूध में उबाल रही थी। अच्छा! नये साल के स्वागत की तैयारी चल रही है.. मैंने भी तो मनाना था बेटी न...
चोखी ढाणी देखने के बाद आमेर किले (आंबेर) की सैर

चोखी ढाणी देखने के बाद आमेर किले (आंबेर) की सैर

संस्मरण
सुनीता भट्ट पैन्यूली सुबह के साढ़े दस बजे हैं हम घर से निकल गये हैं. मुश्क़िल यह है कि मुझे हर हाल में आमेर का किला देखना है और समय हमारे पास कम है और पतिदेव ने समय सीमा बता दी है कि दो बजे तक किसी भी सूरत में देहरादून के लिए निकलना है मुझे भली-भांति ज्ञात है सीमित समय में इतना विराट और भव्य दुर्ग नहीं देखा जा सकता है.सरसरी नज़र से पहले भी आमेर देख चुकी हूं किंतु इस बार मैं आमेर किले के because बारे में थोड़ा बहुत पढ़कर आयी हूं ताकि भारत की इस विशालकाय यूनेस्को की धरोहर को इतिहास की उसी ड्योढ़ी पर बैठकर उस समृद्ध,अनुशासित,वैभव और कीर्ति के काल को केंद्रित दृष्टि से जीवंत महसूस कर सकूं और थोड़ा बहुत आमेर के बारे में लिख पाऊं. ज्योतिष अपनी धरोहरों के माध्यम से ही इतिहास अपने वैभव, because अपनी कीर्ति अपनी संस्कृति को समय की तरंगों पर बसा सकता है. मेरा अपना अनुभव है कि जिस जगह  भ्रमण क...
देहरादून से “द्वारा” गांव वाया मालदेवता…

देहरादून से “द्वारा” गांव वाया मालदेवता…

संस्मरण
लघु यात्रा संस्मरण सुनीता भट्ट पैन्यूली Treasure of thoughts are with us. They only have to be discovered.... मेरे अन्दर  पेड़ नदी,पहाड़, झरने,जंगली फूलों से सराबोर प्रकृति के विभिन्न आयामों की सुंदर व अथाह  प्रदर्शनी सजी हुई है किंतु फिर भी मेरा मन नहीं भरता है और मैं शरणोन्मुख because हो जाती हूं  नदियों, पहाड़ों और सघन जंगलों से बात करने की तृषा-तोष हेतु. ज्योतिष स्मृतियों और अनूभूतियों के चिंतन का so कारवां  चलता रहता है मेरी यात्राओं में मेरे साथ-साथ जिससे सृजन के वेग को मेरी कलम की हौसला-अफ़जाई द्वारा एक बल मिलता है. मेरे यात्रा अनुभव,मेरे संस्मरण और मेरे मोबाइल के कैमरे की जुगलबंदी कुछ इस तरह हो जाती है कि, या सीधा-साफ कहूं मेरे अनुभव और मेरे मोबाइल के बीच अच्छी बनने लगी है because जिससे मेरी लघु- या चिर यात्राओं  के गंतव्य की भौगोलिक-स्थिती वहां का खान-पान,वहां की वनस्पति...