राजनीति में अदला बदली

भाग—2

  • डॉ. रुद्रेश नारायण मिश्र

 राजनीति में परिवर्तन आंतरिक अंतर्विरोध के कारण भी होता है. यह अंतर्विरोध पार्टी विशेष कम होकर व्यक्तिगत रूप में ज्यादा दिखता है, जब एक प्रभावशाली नेता अपनी ही पार्टी से संबंध विच्छेद कर दूसरी पार्टी में शामिल हो जाता है. उस वक्त नेता के समर्थक जितने भी सांसद/विधायक होते हैं, वह भी विरोधी हो जाते हैं. ऐसे में राजनीति की परिवर्तनशील प्रक्रिया चरित्रहीन हो जाता है. जिससे स्थिति अस्थिर हो जाती है और यह अस्थिरता राजनीति के उन सवालों को खड़ा करता है, जिसे देखने की कोशिश कभी संवैधानिक रूप में हुई ही नहीं. इसके कई उदाहरण अलग-अलग राज्यों के राजनीतिक उतार-चढ़ाव में मिल जाता है. इसलिए जिस राजनीति में आत्ममंथन की जरूरत है, कारणों की समीक्षा की जरूरत है, वहां सिर्फ राजनीतिक आलोचनाओं के अलावा कुछ नहीं है.

आरोप-प्रत्यारोप के बीच राजनीतिक नैतिकता खत्म होती नजर आती है. यहीं से दलबदल की राजनीति, राजनीतिक गलियारों में सामान्य सी बात हो गई है. यह पार्टी विशेष होते हुए व्यक्ति विशेष जाता है और इसका राजनीतिक उदाहरण 2019 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव है. जिसके बाद जोड़-तोड़ की राजनीति से कई समीकरण देखने को मिलें. 

तब मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, मणिपुर सहित अन्य राज्यों में सत्ता समीकरण महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं, जब राष्ट्रीय पार्टी के विधायक दल या क्षेत्रीय पार्टी किसी अन्य राष्ट्रीय पार्टी से अपना गठबंधन कर राजनीति के नीति को बदल कर रख दें. इस तरह की घटना बीजेपी और कांग्रेस पार्टी के संदर्भ में परखा जा सकता है, जहां विधायकों के साथ लगातार अनदेखी और सौतेले रवैये की बात सामने उभर कर आता है. इस अनदेखी का एक उदाहरण अरुणाचल प्रदेश की राजनीतिक उथल-पुथल और दल-बदल की राजनीति भी है. जहां कांगेस के बागी विधायकों का कांग्रेस के नबाम तुकी के नेतृत्त्व पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करना है. उसके बाद राष्ट्रपति शासन और बाद में नेतृत्त्व के बदलाव के साथ सबकुछ सामान्य हो जाना. राजनीतिक समीकरण की स्थिति को स्पष्ट ही नहीं करता बल्कि राजनीतिक अपरिपक्वता को भी दर्शाता है. परिणामतः 2016 में कई राजनीतिक नेता कांग्रेस से बीजेपी में शामिल हो जाते हैं. जिसमें अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का नाम महत्त्वपूर्ण है. यह राजनीति का सिलसिला थमता हुआ नहीं दिखता है. राज्य-दर-राज्य राजनीति में बदलाव राजनीति की जरूरत है या सिर्फ समीकरण का विवाद, यह तो समय और स्थिति पर ही निर्भर करता है.

यह स्थिति बिहार के राजनीति में लगातार देखा जा सकता है, जहां जनता दल यूनाइटेड पहले भाजपा के साथ सरकार बनाती है, फिर राजद और कांग्रेस के साथ मिलकर. इसका कारण पुराने गठबंधन को बिहार के सत्ता से दूर रखना था, पर जदयू ने राजद से अपने मतभेदों के कारण वापस भाजपा के साथ अपने राजनीतिक रास्ता को तैयार करता है. राजनीति के उठापटक में राजनीतिक रास्ता हमेशा आसान नहीं होता है. इसी संदर्भ में उत्तराखंड की राजनीतिक घटना को समझा जा सकता है. जब 2016 में कांग्रेस के कई नेता बीजेपी में शामिल हो गए और सरकार अल्पमत में आ गई. यहीं से राजनीति पर दाग लगने शुरू होते हैं. आरोप-प्रत्यारोप के बीच राजनीतिक नैतिकता खत्म होती नजर आती है. यहीं से दलबदल की राजनीति, राजनीतिक गलियारों में सामान्य सी बात हो गई है. यह पार्टी विशेष होते हुए व्यक्ति विशेष जाता है और इसका राजनीतिक उदाहरण 2019 का महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव है. जिसके बाद जोड़-तोड़ की राजनीति से कई समीकरण देखने को मिलें. एक तरफ खरीद-फरोख्त का डर, तो दूसरी तरफ उलटफेर की राजनीति और अन्तोगत्त्वा शिवसेना का भाजपा से अलग होकर एनसीपी और कांग्रेस के साथ सरकार बनाना. सत्ता, सरकार और पार्टी पर कई सवाल खड़ा करता है. राजनीतिक घमासान के बीच और अस्थिरता और आधारहीन उठापटक को दिखाता है.

बीजेपी पर खरीद-फ़रोख्त और कांग्रेसी विधायकों को बंधक बनाने का आरोप लगता है. परंतु जब कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सियासी गलियारे को छोड़ बीजेपी में शामिल होता है. तब मामला अंदरुनी राजनीति का हो जाता हो जाता है. और कई अटकलें सिंधिया और उनकी राजनीति से जोड़कर लगाई जाती है.

यह उठापटक मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार बनने के महज डेढ़ साल के अंदर दिखने लगता है. बीजेपी पर खरीद-फ़रोख्त और कांग्रेसी विधायकों को बंधक बनाने का आरोप लगता है. परंतु जब कांग्रेस का एक बड़ा चेहरा ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के सियासी गलियारे को छोड़ बीजेपी में शामिल होता है. तब मामला अंदरुनी राजनीति का हो जाता हो जाता है. और कई अटकलें सिंधिया और उनकी राजनीति से जोड़कर लगाई जाती है. जिनमें सिंधिया को राज्यसभा की सीट से दूर रखना भी माना जाता है. ऐसे में कांग्रेस की सरकार को अल्पमत से होकर गुजरना पड़ता है और बीजेपी मार्च, 2020 में सत्ता में आ जाती है.

सत्ता के गलियारे राजनीतिक नीतियों को कई बार दरकिनार कर देता है. वह भूल जाता है कि यह राजनीति है. समूह या व्यक्ति के नीति नहीं. यह प्रजातांत्रिक देश की नीति है. जिसमें शामिल यहां की जनता है.

राजस्थान में जिस तरह से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के मनमुटाव और आपसी कोल्ड-वार की खबर आई. उसके लिए जिम्मेदार किसे माना जाए? इसी राजनीतिक कोल्ड वार में सचिन पायलट अपने खेमें के साथ कांग्रेस से दूर चले जाते हैं. और मुख्यमंत्री गहलोत का उनपर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आता है. ऐसे में राजनीति की बागडोर एक सी नहीं रहती है. मामला हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट में पहुँचता है. विपक्ष का रवैया आलोचनात्मक हो जाता है.

मध्यप्रदेश की ही तरह मणिपुर के राजनीति अदला-बदली की घटना देखना चाहिए. जहां बीजेपी की सरकार से कुछ विधायक अलग हो जाते हैं और कांग्रेस में शामिल हो जाते हैं. इसी तरह कांग्रेस के कुछ विधायक बीजेपी में शामिल हो जाते हैं. यह सारे घटनाक्रम केंद्रीकृत होकर काम करता है. जो विधायकों की तोड़फोड़, उनका समर्थन पाना और सत्ता में बने रहना है. और यह सत्ता खतरे में खड़ी तब हो जाती है, जब गठबंधन में आए अन्य विधायकों के राजनीतिक विचार सुने नहीं जातें. उन्हें विभिन्न कार्यक्रमों से अलग कर दिया जाता है. और कई बार तो उनके प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया जाता है. ऐसी स्थिति में राजनीतिक उलटफेर का लाभ विपक्ष की पार्टी उठाती है. और सत्ता में आने की कोशिश करती है. परंतु कई बार पार्टी के अंदर से ही जब मनमुटाव और कार्यक्रमों पर पाबंदी लगाई जाती हैं. तब हाल राजस्थान जैसा हो जाता है. यहाँ अन्य पार्टी की भूमिका सामने आती है पर तब, जब पार्टी विशेष चेहरा से उसे सियासी मुनाफा दिखता हो. राजस्थान में जिस तरह से मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के मनमुटाव और आपसी कोल्ड-वार की खबर आई. उसके लिए जिम्मेदार किसे माना जाए? इसी राजनीतिक कोल्ड वार में सचिन पायलट अपने खेमें के साथ कांग्रेस से दूर चले जाते हैं. और मुख्यमंत्री गहलोत का उनपर आपत्तिजनक टिप्पणियां सामने आता है. ऐसे में राजनीति की बागडोर एक सी नहीं रहती है. मामला हाईकोर्ट से होता हुआ सुप्रीम कोर्ट में पहुँचता है. विपक्ष का रवैया आलोचनात्मक हो जाता है. विपक्ष पर राजनीतिक ट्रेडिंग या बर्गिनिंग का आरोप लगाया जाता है. इन सब मामलों में सत्ताधारी पार्टी खुद को बचने की कोशिश करता है. विपक्ष पर साजिश करने का आरोप लगाता है. जिससे राजनीतिक गलियारों में भूचाल ही नहीं आता, बल्कि आरोप-प्रत्यारोप की श्रृंखला चलने लगता है और ऐतिहासिक संदर्भ धरे-के-धरे रह जाते हैं. इसलिए राजनीतिक अदला-बदली सामाजिक कारणों के लिए ठीक है परन्तु व्यक्ति विशेष के लिए नहीं. क्योंकि व्यक्ति विशेष सत्ता निरंकुश होकर स्वयं के बारे में सोचना शुरु कर देता है, तब राजनीति विवश हो जाता है. अव्यवस्थाओं में अवसर तलाशने लगता है और सामाजिक मूल्यों को भूल जाता है. जिसकी स्वीकार्यता पार्टी और व्यक्तिगत स्तर पर तो होती है, पर जन समुदाय मूक दर्शक के अलावा कुछ नहीं बचते. उनके प्रश्न आज के राजनीतिक संस्कृति में दम तोड़ देते हैं. तो क्या राजनीति उलटफेर और उठापटक के बीच लोकतांत्रिक राजनीति के नैतिकता को देखने की जरूरत नहीं है? जरूरत है, पतनशील राजनीति से उभरने की. सत्ता पर काबिज होने के बजाय उसे लोकतांत्रिक तरीके से चलाने की ताकि राजनीति के अदला-बदली में लोकतंत्र कमजोर ना दिखे.

(लेखक एम. . हिंदी, एम.., एम. फिल., पीएच. डी. जनसंचार. राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में कई शोधपत्र प्रस्तुति एवं प्रकाशन. समकालीन मीडिया के नए संदर्भों के लेखक एवं जानकार हैं)
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