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‘विकट से विशिष्ट’ जीवन-यात्रा

‘विकट से विशिष्ट’ जीवन-यात्रा

स्मृति-शेष
पूर्णानन्द नौटियाल (सन् 1915 - 2001)डॉ. अरुण कुकसालबचपन में मिले अभावों की एक खूबी है कि वे बच्चे को जीवन की हकीकत से मुलाकात कराने में संकोच या देरी नहीं करते. घनघोर आर्थिक अभावों में बीता बचपन जिंदगी-भर हर समय जीवनीय जिम्मेदारी का अहसास दिलाता रहता है. उस व्यक्ति को पारिवारिक-सामाजिक उत्तरदायित्वों के निर्वहन करते हुए ही अपने व्यक्तिगत विकास की गुंजाइश का लाभ उठाना होता है. जीवनीय 'अभावों के प्रभावों' में उस व्यक्ति के साथ अन्य मनुष्यों का व्यवहार सामान्यतया तटस्थता के भावों को लिए रहता है. यह सामाजिक तटस्थता अक्सर निष्ठुरता के रूप में मुखरित होती है. लेकिन वह व्यक्ति अपने प्रति इस सामाजिक संवेदनहीनता को सहजता से ही ग्रहण करता है.एक शताब्दी पूर्व हमारे समाज में जन्मे पूर्णानंद नौटियाल जी को मेरी तरह आप भी नहीं जानते होंगे. यह स्वाभाविक भी है. क्योंकि हमारे परिवार-समाज में...
उच्चतर शिक्षा में देश को नयी उड़ान देने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020

उच्चतर शिक्षा में देश को नयी उड़ान देने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020

शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-6आनंद सौरभ“उच्चतम शिक्षा वो है जो हमें सिर्फ जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सद्भाव में लाती है.” -गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंजूरी दे दी है. देश में शिक्षा के क्षेत्र में यह इस सदी की सबसे बड़ी नीतिगत पहल है.  पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 34 साल पहले 1986 में आयी थी, जिसमें कुछ संशोधन 1992 में लाये गए. इन तीन दशकों में देश की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव आया है, और यह निरंतर ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), मशीन लर्निंग, बिग डाटा, ऑटोमेशन आदि तकनिकी विकास ने औद्योगिक क्रांति के चौथे चरण की नींव रख दी है.  इसके फलस्वरूप ज्ञान का क्षेत्र भी बहुत तेजी से बदल रहा है. आज उच्चतर शिक्षा...
बुदापैश्त में गुरुदेव स्मृति

बुदापैश्त में गुरुदेव स्मृति

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-9डॉ. विजया सतीगुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर को because मई माह के आरम्भ से अगस्त तक कई रूपों में याद किया गया. बुदापैश्त से मेरे मन की भी यह एक मधुर स्मृति !ज्योतिष बुदापैश्त में मार्च महीने के because अंतिम सप्ताह में सामान्यत: ऐसा मौसम नहीं होता था. किन्तु उस दिन अप्रत्याशित because रूप से सुखद हल्की ठंडक लिए धीरे-धीरे बहती ठंडी हवा और चमकती धूप ने शहर के पूरे वातावरण को खुशनुमा बना दिया था.ज्योतिष इस प्रिय माहौल में संपन्न एक सार्थक आयोजन की स्मृतियाँ अब भी उतनी ही जीवंत बनी हुई हैं. भारतीय दूतावास, यहाँ के प्रसिद्ध एत्वोश लोरांद विश्वविद्यालय और दिल्ली स्थित because भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद के संयुक्त प्रयासों से एक ऐसी अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी विश्वविद्यालय के प्रांगण में हुई जो बंगाल और भारत से बाहर  गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रति एक सामयिक स...
लंबे समय से हावी औपनिवेशिक स्वरूप से दिलाएगी मुक्ति : नई शिक्षा नीति-2020

लंबे समय से हावी औपनिवेशिक स्वरूप से दिलाएगी मुक्ति : नई शिक्षा नीति-2020

शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-5डॉ गीता भट्ट मातृभाषा से शिक्षा देने के महत्व को महात्मा गांधी ने इस प्रकार व्यक्त किया है “मां के दूध के साथ जो संस्कार और मीठे शब्द मिलते हैं, उनके और पाठशाला के बीच जो मेल होना चाहिये, वह विदेशी भाषा के माध्यम से शिक्षा देने से टूट जाता है. इस संबंध को तोड़ने वालों का उद्देश्य पवित्र ही क्यों न हो, फिर भी वे जनता के दुश्मन हैं.” आज अगर गांधी होते, तो राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की समग्रता और राष्टीय चेतना से संचित रूपरेखा देख अत्यंत संतुष्ट होते. 34 वर्षों के उपरांत एक नीति जो रचनांतर होने के साथ-साथ शैक्षणिक मापदंडों में एक नयी सोच को लायी है और आने वाले समय में शिक्षा पर लंबे समय से हावी औपनिवेशिक स्वरूप को मूलतः भारतीय करने में मील का पत्थर साबित होगी. शिक्षा नीति पर विमर्श और प्रतिपुष्टि की प्रक्रिया लंबे समय से चल रही थी. शिक्षा मंत्री रमेश...
करछी में अंगार

करछी में अंगार

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—16रेखा उप्रेतीकुछ अजीब-सा शीर्षक है न… नहीं, यह कोई मुहावरा नहीं, एक दृश्य है जो कभी-कभी स्मृतियों की संदूकची से बाहर झाँकता है… पीतल की करछी में कोयले का अंगार ले जाती रघु की ईजा… जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाती… अपने घर की ओर जाती ढलान पर उतर रही है, बहुत सम्हल कर… कि करछी से अंगार गिरे भी नहीं और बुझे भी नहीं. चूल्हा कैसे जलेगा वरना… तीस-चालीस साल पहले जो पहाड़ में रह चुके हैं या बचपन पहाड़ों में बिताया है, उनके लिए यह दृश्य अपरिचित नहीं होगा. चूल्हे में आग बचाकर रखना या ज़रुरत पड़ने पर दूसरे घरों से आग जलाने के लिए जलता कोयला ले जाना, उस वक़्त की ज़रुरत भी थी और सीमित संसाधनों के बीच एक ऐसी जीवन-शैली का उदाहरण भी, जहाँ मामूली से मामूली वस्तु भी ‘यूज़ एंड थ्रो’ की ‘कैटेगरी’ में नहीं थी. मुझे याद है सुबह का भोजन बन जाने के बाद अधजली लकड़ियों को बुझा कर अलग रख दिया ज...
पहाड़ और परोठी…

पहाड़ और परोठी…

साहित्‍य-संस्कृति
आशिता डोभालपहाड़ों की संस्कृति में बर्तनों का एक अलग स्थान रहा है और ये सिर्फ हमारी संस्कृति ही नहीं हमारी धार्मिक आस्था का केंद्र भी रहे है, जिसमें हमारी सम्पन्नता के गहरे राज छुपे होते हैं. धार्मिक आस्था इसलिए कहा कि हमारे घरों में मैंने बचपन से देखा कि दूध से भरे बर्तन या दही, मठ्ठा का बर्तन हो उसकी पूजा की जाती थी और खासकर घर में जब नागराजा देवता (कृष्ण भगवान) की पूजा होती है, तो घर में निर्मित धूप (केदारपाती, घी,मक्खन) का धूपाणा इन बर्तनों के पास विशेषकर ले जाकर पूजा की जाती थी, जिससे हमें कभी भी दूध दही की कमी न हो और न हुई.हमारे घर में 6, 4, 2 सेर की एक, एक परोठी हुआ करती थी और मठ्ठा बनाने के लिए एक बड़ा—सा जिसे स्थानीय बोली में परेडू कहा जाता है, होता था और मठ्ठा मथने की एक निश्चित जगह होती थी, उस जगह पर मथनी, रस्सी और दीवार पर मकान बनाते समय ही दो छेद बनाए जाते हैं, जिस...
“लॉर्ड  मैकाले की कैद से मुक्ति दिलाती नई शिक्षा नीति” 

“लॉर्ड  मैकाले की कैद से मुक्ति दिलाती नई शिक्षा नीति” 

शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-4डॉ योगेन्द्र नाथ शर्मा “अरुण”लगभग 34 वर्षों के लम्बे इंतजार के बाद यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और कर्मठ केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ रमेश पोखरियाल “निशंक” के प्रयासों के परिणाम स्वरूप भारत को नई शिक्षा नीति के रूप में वस्तुतः 'लॉर्ड मैकाले की मानसिक कैद' से मुक्ति मिली है. माननीया श्रीमती इंदिरा गाँधी की निर्मम हत्या के बाद जब उनके सुपुत्र श्री राजीव गाँधी प्रधानमंत्री बने, तो उनके दिमाग में शिक्षा का कोई रूप अगर था, तो वह था “दून स्कूल, देहरादून” की अंग्रेजी से लदी-फदी 'कान्वेंट' की शिक्षा का और उन्होंने इसी लिए भारत को एक बार फिर से विदेशी अवधारणा के अनुसार चलाने का स्वप्न संजोया. उस समय राजीव गाँधी के सलाहकार थे सैम पित्रोदा, जो स्वयं विदेशी रंग में पूरी तरह रंगे हुए थे. इसका परिणाम यह हुआ कि भारत के “शिक्षा मंत्रालय” का नाम ...
पाथा: पहाड़ी मानक पात्र

पाथा: पहाड़ी मानक पात्र

साहित्‍य-संस्कृति
विजय कुमार डोभालपहाड़ में गांववासी अपने उत्पादन (अनाज, दालें, सब्जी या दूध -घी) आदि से यह अनुमान लगाते थे कि उनके पास अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए यह काफी होगा कि कुछ कमी हो सकती है. ‘मापन’ की कोई व्यवस्था न होने से वे किसी से उधार न तो ले सकते थे और न दे सकते थे. धीरे-धीरे सभ्यता के विकास के साथ ‘मापन -पात्रों’ की खोज भी हुई जिससे आदान-प्रदान सरल हो गया. प्रसिद्ध पहाड़ी कहावत- ‘नाता बढ़ा कि पाथा’ से भी पाथे की मापन क्षमता का पता चलता है. हमारे गांव में नाप-तौल के लिए बाट-तराजू का प्रयोग बहुत सीमित होता है क्योंकि बाट-तराजू कुछ ही परिवारों के पास होता है जबकि प्रत्येक परिवार के पास पूर्वजों की धरोहर के रूप में कई मापन-पात्र सुरक्षित तथा कार्यकारी अवस्था में हैं.हमारे जिस पात्र में जितना अनाज या द्रव पदार्थ समाता है उसे उसकी धारिता कहते हैं. यह मापन-पात्र मुट्ठी, अदुड़ी, माणी (सेर), ...
पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

पहाड़ों में ‘छन’ की अपनी दुनिया

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—42प्रकाश उप्रेतीआज बात "छन" की. छन मतलब गाय-भैंस का घर. छन के बिना घर नहीं और घर के बिना छन नहीं.  पहाड़ में घर बनाने के साथ ही छन बनाने की भी हसरत होती थी. एक अदत छन की इच्छा हर कोई पाले रहता है. ईजा को घर से ज्यादा छन ही अच्छा लगता है. उन्हें बैठना भी हो तो छन के पास जाकर बैठती हैं. छन की पूरी संरचना ही विशिष्ट थी. ईजा के लिए छन एक दुनिया थी जिसमें गाय-भैंस से लेकर 'किल' (गाय-भैंस बांधने वाला), 'ज्योड़' (रस्सी), 'अड़ी' (दरवाजे और बाउंड्री पर लगाने वाली लकड़ी) 'मोअ' (गोबर), 'कुटो'(कुदाल), 'दाथुल' (दरांती),  'डाल' (डलिया), 'फॉट' (घास लाने वाला),  'लठ' (लाठी), 'सिकोड़' (पतली छड़ी) और 'घा' (घास) आदि थे. इन्हीं में ईजा खुश रहती थीं. हम कम ही छनपन जाते थे लेकिन ईजा कभी-कुछ, कभी-कुछ के लिए चक्कर लगाती ही रहती थीं. हमें 'किल घेंटने' के लिए जरूर कहती थीं- "...
भारतीय शिक्षा में नवोन्मेष का आवाहन

भारतीय शिक्षा में नवोन्मेष का आवाहन

शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-3प्रो. गिरीश्वर मिश्रभारत विकास और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हो रहा एक जनसंख्या-बहुल देश है. इसकी जनसंख्या में युवा वर्ग का अनुपात अधिक है और आने वाले समय में यह और भी बढ़ेगा जिसके लाभ मिल सकते हैं, बशर्ते शिक्षा के कार्यक्रम में जरूरी सुधार किया जाए. यह आवश्यक होगा कि कुशलता के साथ सर्जनात्मक योग्यता को भी यथोचित स्थान मिले. शिक्षा सामाजिक परिवर्तन का माध्यम होती है और उसी से समाज की चेतना और मानसिकता का निर्माण होता है. कहना न होगा कि भारत के पास ज्ञान और शिक्षा की एक समृद्ध और व्यापक परम्परा रही है, किन्तु अंग्रेजी उपनिवेश के दौर में एक भिन्न दृष्टिकोण को लागू करने के लिए और साम्राज्यवादी प्रवृत्ति के अनुरूप यहां की अपनी ज्ञान-परम्परा और शिक्षा-पद्धति को प्रश्नांकित करते हुए लार्ड मैकाले द्वारा निर्दिष्ट व्यवस्था के अनुरूप शिक्षा थोपी गई. इसने द...