October 30, 2020
शिक्षा

उच्चतर शिक्षा में देश को नयी उड़ान देने वाली राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भाग-6

  • आनंद सौरभ

“उच्चतम शिक्षा वो है जो हमें सिर्फ जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सद्भाव में लाती है.” -गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंजूरी दे दी है. देश में शिक्षा के क्षेत्र में यह इस सदी की सबसे बड़ी नीतिगत पहल है.  पिछली राष्ट्रीय शिक्षा नीति 34 साल पहले 1986 में आयी थी, जिसमें कुछ संशोधन 1992 में लाये गए. इन तीन दशकों में देश की अर्थव्यवस्था में आमूलचूल बदलाव आया है, और यह निरंतर ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), मशीन लर्निंग, बिग डाटा, ऑटोमेशन आदि तकनिकी विकास ने औद्योगिक क्रांति के चौथे चरण की नींव रख दी है.  इसके फलस्वरूप ज्ञान का क्षेत्र भी बहुत तेजी से बदल रहा है. आज उच्चतर शिक्षा का ज़ोर पारम्परिक विषयों से इतर ज्ञान के इन नए क्षेत्रों पर होना चाहिए, जिससे देश अपनी युवा शक्ति का लाभ उठाते हुए कुशल कामगारों की फौज तैयार कर सके, जो अंततः देश को विश्वपटल पर एक महाशक्ति एवं विश्वगुरु के तौर पर स्थापित कर सकें. नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति इसी संकल्पना को यथार्थ रूप देने का रास्ता बताती है. इसके साथ ही भारत ने सतत विकास एजेंडा 2030 के तहत लक्ष्य 4 को पूरा करने के लिए भी प्रतिबद्ध है जिसके तहत सभी के लिए समावेशी और सामान गुणवत्तायुक्त शिक्षा सुनिश्चित करने और जीवन-पर्यन्त शिक्षा के अवसरों को बढ़ावा दिए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. ऐसी स्थिति में एक ऐसी शिक्षा नीति आवश्यक हो गयी थी, जिसके आधार पर वर्तमान की शिक्षा व्यवस्था में पीढ़ीगत बदलाव लाया जा सके ताकि वह बदलते परिदृश्य से उपजी ज़रूरतों को पूरा करने का काम कर सके. इस आलेख में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के उच्चतर शिक्षा से जुड़े विभिन्न आयामों की चर्चा की गयी है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को दी मंजूरी.

उच्चतर शिक्षा: मौजूदा परिदृश्य एवं समस्याएं
भारत में उच्चतर शिक्षा व्यवस्था अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा व्यवस्था है. आकंड़े बताते हैं कि आज़ादी के बाद से पिछले 73 वर्षों में देश में उच्च शिक्षा में विद्यार्थियों की संख्या में करीब 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, वहीं इसे मुहैया कराने के लिए विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और शिक्षकों की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. 1986 में दूसरी राष्ट्रीय शिक्षा नीति के वक़्त देश में 150 विश्वविद्यालय तथा 500 महाविद्यालय थे. आज उच्चतर शिक्षा व्यवस्था में 3.74 करोड़ छात्र, 993 विश्वविद्यालय,  39,931 महाविद्यालय एवं 10,725 स्वचालित संस्थाएं शामिल हैं.

हालांकि तथ्य यह भी है कि इसके बावजूद युवाओं की एक बड़ी आबादी आज भी उच्चतर शिक्षा से दूर है, और विद्यालय से निकलने के बाद 9 छात्रों में से 1 ही महाविद्यालय पहुँच पाते हैं. मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा उच्चतर शिक्षा को लेकर पिछले साल जारी की गयी अखिल भारतीय सर्वेक्षण रिपोर्ट 2018-19 के अनुसार, भारत में उच्चतर शिक्षा में सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 18-23 आयु वर्ग में महज़ 26.3% है. यानी देश में 18-23 आयु वर्ग के युवाओं की जनसंख्या का केवल 26.3 प्रतिशत हिस्सा ही महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में दाखिला लिए हैं. हालांकि इसी आयु वर्ग में महिलाओं का नामांकन अनुपात पुरुषों से ज़्यादा है, लेकिन जीईआर को अगर सम्पूर्णता से देखें तो हम पाएंगे कि भारत में यह संख्या विकसित देशों की तुलना में बेहद कम है.अगर समूची जनसँख्या की बात करें तो यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत जीईआर रैंकिंग में 28.06 अंक के साथ 96वें स्थान पर है.

हाल ही में विभिन्न एजेंसियों द्वारा दुनिया भर के विश्वविद्यालयों की जारी रैंकिंग में शीर्ष 100 विश्वविद्यालयों में कोई भी भारतीय विश्वविद्यालय जगह न बना सका. इसकी वजह में  गुणवत्तापूर्ण, शैक्षणिक व्यवस्था का अभाव, शैक्षणिक योग्यता का रोज़गार में न बदल पाना, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के शैक्षणिक पुरस्कारों और सम्मानों का अभाव, शोध एवं अनुसंधान की कमज़ोर स्थिति आदि प्रमुख हैं. एक तरफ देश का सकल घरेलू उत्पाद जहाँ बढ़ता जा रहा है, इस साल के आर्थिक सर्वे के मुताबिक़ शिक्षा पर जीडीपी का महज 3 प्रतिशत हिस्सा मात्र ही खर्च हो रहा है.  हाल ही में आयी एक रिपोर्ट के मुताबिक़  छात्र सकल सार्वजानिक व्यय के मामले में देश का स्थान वैश्विक सूची में 62वां है.

गुणवत्तापूर्ण उच्चतर शिक्षा  आज़ादी के सत्तर साल बाद भी कोसों  दूर है.  राष्ट्रीय मूल्यांकन व प्रत्यायन परिषद् (नैक) की रिपोर्ट के अनुसार इस देश के 90 फीसदी कॉलेजों एवं 70 फीसदी विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक स्तर बेहद कमजोर है. शिक्षकों की कमी और छात्र-शिक्षक का असंतुलित अनुपात इस समस्या को और विकराल बनाता है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे अहम संस्थान इस कमी का सामना कर रहे हैं, जहाँ 15-20 प्रतिशत तक शिक्षक के पद खाली हैं. परिणामस्वरूप उच्चतर शिक्षा पाने के बावजूद रोजगारपरकता एक बड़ी चुनौती बनकर उभरती है. नैसकॉम और मैकिन्से के अध्ययन के मुताबिक मानविकी में 10 में एक और अभियंत्रण में डिग्री प्राप्त 4 में से एक भारतीय छात्र ही नौकरी पाने के योग्य हैं. और यह स्थिति तब है जब 1968 की प्रथम राष्ट्रीय शिक्षा नीति और 1986 में आयी दूसरी शिक्षा नीति में उच्चतर शिक्षा की गुणात्मकता को प्रभावी बनाने पर विशेष बल दिया गया.  1986 में रोज़गारोन्मुखी नयी शिक्षा नीति भी लायी गयी. इसके बावजूद ये विसंगतियां बनी रहीं. भाषा की समस्या भी एक बड़ी समस्या है. अध्ययन अगर मातृभाषा में हो तो सीखना सरल हो जाता है.  लेकिन बहुत काम उच्चतर शिक्षा संस्थान ऐसे हैं जिनमें अध्ययन – अध्यापन का कार्य मातृभाषा में होता है. उच्चतर शिक्षा में मौजूदा विसंगतियों में खंडित शैक्षिक पारिस्थितकीय तंत्र, संज्ञानात्मक कौशल विकास पर ज़ोर का कम होना,  विषयों और उनके अध्ययन का कठोर एवं संकीर्ण विभाजन, और संस्थागत स्वायत्तता आदि प्रमुख हैं, जो लम्बे समय से विद्यमान हैं.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति सभी व्यावसायिक शिक्षाओं को उच्च शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग बनाने का दृष्टिकोण रखती है. साथ ही, इसके मुताबिक़ स्वचालित तकनीकी विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालयों, कानूनी और कृषि विश्वविद्यालयों आदि को उद्देश्य बहु-विषयक संस्थान बनना होगा.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भविष्योन्मुख उच्चतर शिक्षा
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 उपर्युक्त समस्याओं एवं विसंगतियों का गम्भीरावलोकन करती है. यह ईमानदारपूर्वक अंतर्दर्शन दिखाता है कि इस बार सरकार की मंशा उच्चतर शिक्षा में दशकों से लंबित संरचनात्मक सुधारों को क्रियान्वयन करने की दिखाई दे रही है. यह समझना होगा कि  राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 उच्चतर शिक्षा के विभिन्न आयामों के लिए क्या दृष्टिकोण और समाधान प्रस्तुत करती है.

सकल नामांकन अनुपात (जीईआर)
जब तक उच्चतर शिक्षा का फलक व्यापक नहीं होगा, और ज़्यादा से ज़्यादा युवा इससे नहीं जुड़ेंगे, तब तक भारत को उसकी जनसांखियकीय लाभांश ( डेमोग्राफिक डिविडेंड) का लाभ नहीं मिल सकेगा. इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) को मौजूदा 26.3 प्रतिशत से बढाकर 2035 तक 50 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य तय करती है.  जीईआर को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए खुली और दूरस्थ शिक्षा को और विस्तार देने की बात कही गयी है.  राष्ट्री शिक्षा नीति कहती है कि ऑनलाइन पाठ्यक्रम को उच्चतम गुणवत्तापूर्ण बनाने के कदम उठाये जाएंगे ताकि ये कक्षा कार्यक्रमों के समतुल्य हों.

समग्र बहुविषयक शिक्षा व्यवस्था
मौजूदा व्यवस्था में जहाँ छात्रों को उनके द्वारा चुने गए विषयों में बाँध कर रख दिया जाता है, यह ज्ञानोपार्जन की बेहद संकीर्ण संकल्पना है, जहाँ पाठ्यक्रम कठोर होता है . स्कूली शिक्षा प्राप्त करने के बाद छात्र अक्सर माता – पिता, मित्रों और सम्बन्धियों के दवाब में ऐसे विषयों को चुनने को मज़बूर हो जाते हैं, जिनमें उनकी अभिरुचि नहीं होती. इसलिए उच्चतर शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी उनके लिए यह शिक्षा महज किताबी बनकर रह जाती है. इस वजह से शिक्षा की उत्पादकता भी प्रभावित होती है. इसके उलट नयी शिक्षा नीति इस दृष्टिकोण को बदलने का उद्यम करती है, और  समग्र बहुविषयक शिक्षा व्यवस्था पर ज़ोर देती है. यह उन उपायों को सुझाती है जिससे उच्चतर शिक्षा में नामांकित छात्रों के लिए उनके महाविद्यालय, विश्वविद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थानों का अनुभव लाभदायक और व्यापक बन सके, और यह उनकी प्रकृति एवं प्रवृत्ति के अनुरूप उनके बेहतर कैरियर का मार्ग प्रशस्त कर सके. नयी नीति में पाठ्यक्रमों को लचीला बनाने की बात कही गयी है. साथ ही, विषयों के रचनात्मक संयोजन पर बल दिया गया है. व्यावसायिक शिक्षा या अभियांत्रिकी शिक्षा की तरह चार वर्षों के समग्र स्नातक शिक्षा की व्यवस्था की जायेगी, जिसमें कई स्तरों पर एंट्री एवं एक्ज़िट बिंदुओं का विकल्प मुहैया कराया जाएगा. अगर किसी छात्र को स्नातक का पहला वर्ष पूरा करने के बाद कोर्स छोड़ना है तो उसे एक वर्षीय सर्टिफिकेट प्रदान किया जाएगा. मौजूदा व्यवस्था में ऐसी परिस्थिति में छात्रों का एक वर्ष निष्फल जाता है.  इसी प्रकार 2 वर्षों के बाद एडवांस डिप्लोमा, 3 वर्षों के बाद स्नातक की डिग्री और चौथा वर्ष सफलतापूवर्क पूरा करने के बाद शोध के साथ स्नातक की डिग्री प्रदान की जायेगी. बहुविषयक शिक्षा को प्रोत्साहित करने के लिए वैश्विक मानकों के अनुरूप आईआईटी, आईआईएम की तरह बहुविषयक शिक्षा एवं अनुसंधान विश्वविद्यालय (एमईआरयू) स्थापित किये जाएंगे. उच्चतर शिक्षा संस्थानों को उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, अनुसंधान एवं सामुदायिक भागीदारी उपलब्ध कराने के जरिये बड़े, साधन संपन्न, गतिशील बहु विषयक संस्थानों में रूपांतरित कर दिया जाएगा. यह उच्चतर शिक्षण संस्थानों को 2040 तक ऐसे बहु विषयक शिक्षा क्लस्टरों एवं हबों में तब्दील करने की परिकल्पना कराती है, साथ ही, 2030 तक प्रत्येक ज़िला या उसके आस-पास एक बहुविषयक उच्च शिक्षा संस्थान को सुनिश्चित किया जाएगा. जिससे उच्चतर शिक्षा का  विखंडन समाप्त हो सके, और ऐसे प्रत्येक संस्थान कम से कम तीन हज़ार छात्रों के सम्पूर्ण और चहुमुँखी विकास पर ध्यान केंद्रित कर सकें.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट की परिकल्पना की गयी है. वित्तीय बैंकों की माफिक यह बैंक उच्चतर शिक्षा के छात्रों को अपने यहाँ खाता खोलने की अनुमति देगा, जिसमें उनके एकेडमिक क्रेडिट उनकी पढ़ाई के समानुपात में जमा होंगे. अगर किसी छात्र को अपना विषय बदलना है, या अपना उच्चतर शिक्षा संस्थान बदलना है तो ये एकेडमिक क्रेडिट नए विषय, या नामांकन और नौकरी पाने तक काम आएंगे. यहाँ यह बात रेखांकित करने योग्य है कि एकेडमिक क्रेडिट की यह प्रणाली विकसित देशों में भी वर्षों से सफलतापूर्वक लागू है.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति सभी व्यावसायिक शिक्षाओं को उच्च शिक्षा प्रणाली का अभिन्न अंग बनाने का दृष्टिकोण रखती है. साथ ही, इसके मुताबिक़ स्वचालित तकनीकी विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालयों, कानूनी और कृषि विश्वविद्यालयों आदि को उद्देश्य बहु-विषयक संस्थान बनना होगा.

अकादमिक  बैंक आफ क्रेडिट
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में एकेडमिक बैंक आफ क्रेडिट की परिकल्पना की गयी है. वित्तीय बैंकों की माफिक यह बैंक उच्चतर शिक्षा के छात्रों को अपने यहाँ खाता खोलने की अनुमति देगा, जिसमें उनके एकेडमिक क्रेडिट उनकी पढ़ाई के समानुपात में जमा होंगे. अगर किसी छात्र को अपना विषय बदलना है, या अपना उच्चतर शिक्षा संस्थान बदलना है तो ये एकेडमिक क्रेडिट नए विषय, या नामांकन और नौकरी पाने तक काम आएंगे. यहाँ यह बात रेखांकित करने योग्य है कि एकेडमिक क्रेडिट की यह प्रणाली विकसित देशों में भी वर्षों से सफलतापूर्वक लागू है. यूरोप के ज़्यादातर देशों में क्रेडिट व्यवस्था लागू है, वहीँ अमेरिका में सेमेस्टर क्रेडिट आवर्स स्कीम का पालन किया जाता है. ऑस्ट्रेलिया में भी यह व्यवस्था स्नातक और परा-स्नातक कोर्सों पर लागू है.

राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ)
नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक अहम पहलू राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना है. यह फाउंडेशन देश में अनुसंधान और नवाचार को बढ़ावा देने का कार्य करेगी. एनआरएफ विभिन्न मंत्रालयों द्वारा एक-दूसरे से स्वतंत्र किए जा रहे अनुसंधान अनुदान को आत्मसात करते हुए यह सुनिश्चित करेगा कि देश में समग्र अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के लिए और बुनियादी विज्ञान की दिशा में प्रासंगिक पहचान वाले क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके. वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने अपने बजटीय भाषण में घोषणा की थी कि सभी मंत्रालयों के पास उपलब्ध धन को राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन में एकीकृत किया जाएगा.

भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई)
उच्च शिक्षा में अनुदान, गवर्नेंस आदि मुद्दों पर सुधार के लिए राष्ट्रीय ज्ञान आयोग, यशपाल आयोग और हाल ही में नई शिक्षा नीति के विकास पर गठित कमिटी ने  कई अहम उपाय सुझाए थे जिनमें एक नियामक संस्था के गठन का सुझाव दिया गया था जो उच्च शिक्षण संस्थानों की शैक्षणिक और संस्थागत स्वायत्तता में दखलंदाजी किए बिना अपना रेगुलेटरी कामकाज करेगी. नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसी परिकल्पना को मूर्त रूप देते हुए एकल नियामक संस्था भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एचईसीआई) के गठन की बात कही गयी है. हालांकि विधि एवं चिकित्सा को इस आयोग के दायरे से बाहर रखा गया है. यह संस्था 61 वर्ष पुराने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की जगह लेगी. इस पहल का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को बढ़ावा देना है. आयोग उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्तता को बढ़ावा देने के उपाय सुझाएगा और उच्च शिक्षा में शैक्षणिक मानदंडों की बहाली सुनिश्चित करेगा. वह पाठ्यक्रमों का शिक्षण परिणाम, शिक्षण और अनुसंधान के मानदंड, संस्थानों के वार्षिक प्रदर्शन के लिए मूल्यांकन प्रक्रिया, संस्थानों का एक्रेडेशन, और संस्थानों को बंद करने आदि के लिए भी नियम बनाने का कार्य करेगा. इस आयोग के तहत चार स्वतंत्र परिषद् होंगे :  विनियमन के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा नियामकीय परिषद (एनएचईआरसी), मानक निर्धारण के लिए सामान्य शिक्षा परिषद (जीईसी), वित पोषण के लिए उच्चतर शिक्षा अनुदान परिषद (एचईजीसी) और प्रत्यायन के लिए राष्ट्रीय प्रत्यायन परिषद (एनएसी) .

संस्थागत स्वायत्ता
राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती है कि संस्थागत स्वायत्ता सुनिश्चित करने के लिए  यह व्यवस्था की जायेगी कि महाविद्यालयों की सम्बद्धता 15 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से समाप्त हो जाए, और उनको क्रमिक स्वायत्ता देने के लिए एक राज्यवार तंत्र की स्थापना की जायेगी. इन कदमों से प्रत्येक महाविद्यालय या तो एक स्वायत्तशासी डिग्री प्रदान करने वाले महाविद्यालय में विकसित हो जाएंगे या किसी विश्वविद्यालय के संघटक महाविद्यालय बन जाएंगे.

वंचित वर्गों के छात्रों के लिए वित्तीय सहायता
उच्च  शिक्षा को समाज के हर वर्ग तक पहुंचाने एवं उसे समग्र बनाने की दिशा में राष्ट्रीय शिक्षा नीति अनुसूचित जाति/ जनजाती, अन्य पिछड़ा वर्ग और अन्य श्रेणियों के छत्रों की योग्यता को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय छात्रवृत्ति पोर्टल के विस्तार की बात कराती है.  इसके अलावा निजी उच्च शिक्षण संस्थानों को ज़रूरतमंद छात्रों के लिए मुफ्त शिक्षा और छात्रवृत्तियों के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा.

 राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 के अनुसार शिक्षा, मूल्यांकन, योजनाओं के निर्माण और प्रशासनिक क्षेत्र में तकनीकी के प्रयोग पर विचारों के स्वतंत्र आदान-प्रदान हेतु एक स्वायत्त निकाय ‘राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी मंच’  की स्थापना की जायेगी. तकनीक के बेहतर इस्तेमाल से कक्षा प्रक्रियाओं में सुधार लाया जाएगा, वंचित समूहों तक शैक्षिक पहुँच को बढ़ाने, शिक्षकों के कौशल को उन्नत करने एवं शैक्षिक योजना एवं प्रबंधन को कारगार बनाने के उपाय किये जाएंगे. शिक्षा मंत्रालय ई-लर्निंग की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए डिजिटल ढाँचे को मज़बूत करने के लिए भी कदम उठाएगा.

बहुभाषावाद को प्रोत्साहन एवं भारतीय अनुवाद एवं व्याख्या संस्थान
भारतीय भाषाओं के संरक्षण एवं विकास के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 पाली, फारसी और प्राकृत भाषाओं के लिए भारतीय अनुवाद एवं व्याख्या संस्थान की स्थापना की अनुशंसा करती है. नयी नीति बहुभाषावाद को भी प्रोत्साहित करती है, साथ ही उच्च शिक्षण संस्थानों में संस्कृत और सभी भाषा विभागों को मजबूत करने और ज्यादा से ज्यादा उच्च शिक्षण संस्थानों के कार्यक्रमों में, शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृभाषा या स्थानीय भाषा का उपयोग करने की सिफारिश करती है.

उच्च शिक्षा का अंतर्राष्ट्रीयकरण
उच्चतर शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाने के साथ ही इसके अंतर्राष्ट्रीयकरण पर भी ज़ोर दिया जाएगा. ताकि दूसरे देश के छात्र यहाँ आकर शिक्षा ग्रहण कर सकें. इसके अलावा देश में परिसरों को खोलने के लिए शीर्ष विश्व रैंकिंग रखने वाले विश्वविद्यालयों के प्रवेश करने की अनुमति प्रदान की जाएगी. इसके लिए एक वैधानिक फ्रेमवर्क तैयार किया जाएगा.

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 का सफल क्रियान्वयन
किसी भी नीति की सफलता उसके सफल क्रियान्वयन में है.  राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 की परिकल्पनाओं और अनुशंसाओं के सफल क्रियान्वयन में ही इस नीति की सफलता निहित है.  अतः यह सवाल उठना वाज़िब है कि क्या इन सारी नीतियों का अक्षरशः क्रियान्वयन किया जा सकेगा ? इस सवाल का जवाब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में आयोजित उच्च शिक्षा सम्मेलन में अपने उदघाटन भाषण में दिया.  उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि सरकार शिक्षा में इन संरचनात्मक सुधारों के लिए कृत-संकल्पित है, और पूरी राजनितिक इच्छाशक्ति के साथ इसे लागू करने के लिए जुटेगी. उन्होंने यह भी कहा कि इस नीति का सफल क्रियान्वयन  महायज्ञ की तरह है, और सुधारों को त्वरित गति से लागू करने के लिए हर संभव प्रयत्न किये जाएंगे.

निष्कर्ष
राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को मंजूरी देश के शैक्षिक इतिहास में एक ऐतिहासिक और परिवर्तनकारी कदम है. इस नीति के सफल क्रियान्वयन से देश के शैक्षिक व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव होंगें जिससे देश महाशक्ति और विश्वगुरु बनने की राह पर तेजी से अग्रसर होगा. उच्च शिक्षा में मौजूद दशकों की विसंगतियों का निराकरण भी इस शिक्षा नीति के माध्यम से होगा. साथ ही व्यावसायिक और कौशल विकास पर ज़ोर देने से देश में बेरोज़गारी की समस्या का भी निराकरण होगा. यह नीति मौजूदा समय की जरूरतों के मुताबिक़ है, और यह प्रत्येक छात्र की अद्वितीय क्षमताओं को सामने का उद्यम करती है. प्रधानमंत्री के शब्दों में यह नीति दस्तावेज   21वीं सदी के युवाओं की सोच, जरूरतों, उम्मीदों और आकांक्षाओं के साथ साथ 130 करोड़ से ज्यादा भारतीयों की आकांक्षाओं का प्रतिबिंब भी है. आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि आने वाला समय राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को व्यवहारिक रूप में बदलता देख पायेगा जिससे ‘नए भारत’ की संकल्पना यथार्थ रूप ले पाएगी.

(लेखक भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी और जामिया मिलिया इस्लामिया, नयी दिल्ली में पीएचडी शोधार्थी हैं.)

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