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यूसर्क : बाँस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जागरुकता कार्यक्रम

यूसर्क : बाँस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए जागरुकता कार्यक्रम

देहरादून
 विश्व बाँस दिवस का आयोजनहिमांतर ब्यूरो, देहरादूनउत्तराखण्ड विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान केन्द्र (यूसर्क) (Uttarakhand Center for Science Education and Research (USERC)) के सभागर में विश्व बाँस दिवस (world bamboo day) का आयोजन गत 18 सितम्बर 2021 को किया गया. कार्यक्रम का उद्देश्य बाँस की प्रजाति के because बहुउपयोगी महत्व को देखते हुये बाँस के उद्योग को बढ़ावा देने, काश्तकारों के सामाजिक एवं आर्थिक उन्नयन हेतु व इसके संरक्षण के लिये जागरूकता को बढ़ाना था. कार्यक्रम में यूसर्क की वैज्ञानिक डा. मन्जू सुन्दरियाल द्वारा बाँस के उपयोग, आजीविका का संसाधन परम्परागत व्यवसाय की समस्यायें एवं बाँस के संसाधन के संरक्षण पर विस्तृत प्रस्तुतिकरण दिया गया.ज्योतिष कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुये यूसर्क की निदेशक प्रो. (डा.) अनीता रावत द्वारा बाँस को एक महत्वपूर्ण प्रजाति बताते हुये इसके संरक्...
अखरोट के पेड़ का बलिदान

अखरोट के पेड़ का बलिदान

संस्मरण
फकीरा सिंह चौहान स्नेही सड़क के किनारे बस को रोकते हुए ड्राइवर ने कहा, गांव आ गया है, सभी लोग उतर जाए. मैं बस की सीट पर गहरी नींद में  सोया हुआ था. ड्राइवर मुझे जगाते हुए बोला, "बाबू जी, "आपको कौन से because गांव जाना है. "आप का भाड़ा यहीं तक का है. "मैं हकबका कर उठा, तथा बस का दरवाजा खोल कर  सड़क के किनारे उतर गया. ज्योतिष हल्की-फुल्की बूंदाबांदी हो रही थी. भादो का महिना था. चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी. पहाड़ों के बीचों-बीच श्वेत कुरेडी {कोहरे} के गोले उमड़ रहे थे. हर छोटे-छोटे नाले सफेद दूध की सैकड़ों धाराओ की तरह झरनों के रूप में प्रवाहित हो रहे थे. कभी घनघोर बादलों की गड़गड़ाहट कभी बिजली की चमक से मौसम बेईमान सा नजर आ रहा था. चुंकी गांव थोड़ा  सड़क के ऊपर था.  मेरे पास छाता भी नहीं था.  घनघोर वर्षा तथा तेज हवा चलने की संभावना बढ़ रही थी. मेरे दिमाग में आया कि सड़क से लगे हुए खेत...
गंजी हो आई खोपड़ी में चार बालों सा हौसला

गंजी हो आई खोपड़ी में चार बालों सा हौसला

देहरादून
नीलम पांडेय नील जीवन में मित्रों का आना हमारे सर के बालों की तरह है. बाल जब नये - नये आते हैं, खूब चमकदार,घने होते हैं. देखने वाले भी सोचते हैं क्या चमक-दमक है? कुछ लोग because तो इस चमक-दमक से जल उठते हैं. चमकते मित्र व्यक्ति की सामाजिक एवम् वर्चुअल जिंदगी की कहानी में अचानक प्रशंसाओं की वृद्वि करने लगते हैं. लेकिन यह क्या?  धीरे-धीरे उनकी लाख देखभाल के बावजूद या शायद हमारी ही अनदेखी के कारण वे रुखे और बेजान होकर गिरने लगते हैं. कभी हम ही उनसे परेशान होकर उनको काट-छांट कर उनकी छंटनी कर देते हैं और बचे हुए को तराशने लगते हैं.ज्योतिषकुछ मित्र घुंघराले बालों की तरह समझने में बहुत जटिल होते हैं. लेकिन वे एक बार समझ में आ जाएं तो उन्हें अपने मन मुताबिक ढाला जा सकता है. कुछ मित्र बिल्कुल सीधे because सपाट होते हैं, वे अपनी बात पर खरे रहते हैं उनके साथ यह है कि अगर हम उन्हें समझ भी जाएं...
जलवायु संकट और कोविड ने मिलाया हाथ, 140 मिलियन लोग झेल रहे एक साथ

जलवायु संकट और कोविड ने मिलाया हाथ, 140 मिलियन लोग झेल रहे एक साथ

पर्यावरण
निशांत  चरम मौसम की घटनाओं और महामारी ने न सिर्फ एक साथ लाखों लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है, बल्कि जलवायु और कोविड संकट के संयोजन ने रिलीफ़ because (राहत-सहायता प्रतिक्रिया) प्रयासों में बाधा डालने के साथ-साथ 'अभूतपूर्व' मानवीय ज़रूरतें पैदा की हैं। यह कहना है इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ रेड क्रॉस एंड रेड क्रिसेंट सोसाइटीज़ (IFRC) की एक रिपोर्ट का. ज्योतिष इस रिपोर्ट के अनुसार, 140 मिलियन लोग - रूस की लगभग पूरी आबादी के बराबर - महामारी के दौरान बाढ़, सूखा, तूफान और जंगल की आग से प्रभावित हुए हैं. because 65 से अधिक या पांच साल से कम उम्र के 660 मिलियन लोग हीटवेव (गर्मी की लहर) की चपेट में आ गए, जो संयुक्त राज्य अमेरिका की आबादी का लगभग दोगुना है. ज्योतिष कोविड की चपेट में आने के बाद से सबसे घातक घटना (जिसके लिए डाटा उपलब्ध है) पश्चिमी यूरोप में 2020 की हीटवेव थी, जिसमें बेल्जियम, फ्रां...
डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण ‘क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ’ का लोकार्पण

डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण ‘क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ’ का लोकार्पण

साहित्यिक-हलचल
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीदिल्ली विश्वविद्यालय के इंद्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉक्टर रेखा उप्रेती के यात्रा संस्मरण 'क्षितिज पर ठिठकी सॉंझ' का रविवार को वसुंधरा में लोकार्पण हुआ. किताब में रेखा उप्रेती ने अपने यूरोप-यात्रा के संस्मरणों को शामिल किया है. 20 दिनों की इस यात्रा के दौरान लेखिका ने जो 15 संस्मरण लिखे थे, because वो किताब में शामिल हैं. यह किताब 120 पन्नों की है, जिसे परिकल्पना प्रकाशन ने छापा है. लोकार्पण और परिचर्चा कार्यक्रम में अभिनेता और रंगकर्मी भूपेश जोशी ने रेखा उप्रेती के संस्मरणों का पाठ किया. साहित्यकार कुसुम जोशी ने किताब में शामिल यात्रा-संस्मरणों के बारे में कहा कि ये संस्मरण इतने रोचक हैं, कि पाठक भी लेखक के साथ यात्रा के पलों को जीने लगता है.  यूरोप में भी लेखिका अपना पहाड़ खोज रही होती हैं. अपने गांव और बचपन को याद कर रही होती हैं. ...
ढाई दिन के झोंपड़े की तरह ढाई दिन का प्यार!

ढाई दिन के झोंपड़े की तरह ढाई दिन का प्यार!

संस्मरण
घट यानी पनचक्की (घराट)डॉ. हरेन्द्र सिंह असवाल पिछली सदी की बात है. उनके लिए जिन्होंने ये देखा नहीं, लेकिन हमारे लिए तो जैसे कल की बात है कि हम रविवार को पीठ में तीस पैंतीस किलो गेहूं, जौ  लादकर घट जा रहे हैं. दूर से ही देख रहा हूँ जैसे घट का पानी टूटा हुआ है और मैं दौड़ रहा हूँ. जैसे ही घट पर पहुँचा तब तक किसी ने पानी लगा दिया और मैं पिछड़कर दूसरे या तीसरे नंबर पर पहुँच गया हूँ. थोड़ा निराश, थोड़ा नज़र इधर-उधर देखकर और फिर सोच रहा हूँ   कि दूसरा घट ख़ाली होगा ? यह सिलसिला हर दूसरे  हफ़्ते में चला ही रहता. घट का पानी टूटना और लगना उसके चलने और न चलने से जुड़ा है. ये घट भी दो तरह के होते थे, एक तो सदा बहार होते  दूसरे बरसाती. बरसाती घट तीन महीने ही चल पाते थे. ऐसे हमारे गांव में कालोगाड पर तीन घट थे एक ग्वाड़  में  नाखून के  काला ताऊ जी का था, दूसरा  गहड़ गाँव के गुसाईं जी का और तीसरा ...
पशुधन की कुशलता और समृद्धि का लोकपर्व

पशुधन की कुशलता और समृद्धि का लोकपर्व

लोक पर्व-त्योहार
प्रकाश उप्रेती आज खतडू है. ठंड आरम्भ होने की सूचना देने वाला यह त्योहार गोठ-गुठयार से लेकर खेत- खलिहानों तक की सुख-समृद्धि का द्योतक है. ईजा भी कहती थीं- "खतडूक बाद च्यला जाड़ होने गोय" because (खतडू के ठंड होती गई). मैं, आज भी इसके इसी संदर्भ से वाकिफ हूँ कि खतडू ऋतु परिवर्तन और कृषि से जुड़े साधनों को कृतज्ञता अर्पित करने वाला त्योहार है.ज्योतिष यह पशुधन की कुशलता और समृद्धि पर आधारित लोकपर्व है. वैसे यह हर वर्ष आश्विन माह के प्रथम दिन यानि संक्रांति को मनाया जाता है. इस दिन सामूहिक तौर पर एक जगह सूखी लकड़ियां,because घास और झाड़ियों को इकट्ठा करके उसे पुतले के आकार का बनाया जाता है और अंधेरा होते ही सारे गाँव वाले 'छिलुक' (एक तरह से लकड़ी की मशाल) और ककड़ी लेकर आते हैं फिर उस पुतले पर आग लगाई जाती है, ककड़ी के टुकड़े उसमें डाले जाते हैं. फिर उस राख़ को घर में रखा जाता है.ज्योतिष ...
चंदेरी साड़ियां : मी टू, अहिल्याबाई होल्कर

चंदेरी साड़ियां : मी टू, अहिल्याबाई होल्कर

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-19मंजू कालाकिसी भी भारतीय महिला की संदूकची, या अलमारी कोई ...खोजी पति... खंगालेगा (जो पत्नी के खजाने की टोह लेता हो )  तो उसे  उनमें झिलमिल करती चंदेरी साड़ियां जरूर झांकते हुए नजर आ.. जायेंगी!   मैं भी जब अपने साड़ियों के पिटारे को खोलती हूँ... (यह मेरा प्रिय शगल है! फुरसत पाते ही मैं अपना साड़ियों का  पिटारा जरूर खोलती हूँ!)  तो यही चंदेरी साड़ियां...  मंद स्मित  बिखेरते हुए मुझे मेरे विवाह के वक्त की याद दिला देती हैं मसलन. माँ और  पिताजी का मेरे विवाह की तैयारियों में संलग्न रहना, पडो़सन आंटियों का मेरी साड़ियों में फाल लगाने आना!   मेरा चोरी- चोरी  पतिदेव के चित्र को निहारना,  माँ और दादी की नजर  से छुपकर.. विवाह के लिए बनाए गए आभूषणों की आजमाईश..सखियों के साथ मिलकर करना... और हाँ माँ के साथ रिक्शा में बैठकर दर्जी के यहाँ जाना भी इसी में शामिल है! मेरी माँ...
उत्तरकाशी: गर्तांगली का आधुनिक शिल्पी – राजपाल बिष्ट

उत्तरकाशी: गर्तांगली का आधुनिक शिल्पी – राजपाल बिष्ट

उत्तरकाशी
पुष्कर सिंह रावत इन दिनों उत्तरकाशी की गर्तांगली चर्चा में है. करीब डेढ़ सौ साल पुराना यह रास्ता किसने बनाया इस पर अभी शोध की जरूरत है. लेकिन हेरीटेज महत्व के इस पुल को नया रूप देने वाले because राजपाल बिष्ट को उत्तरकाशी के लोग बखूबी जानते हैं. पुल बनाने में महारत रखने वाले इस युवा ठेकेदार ने एक जोखिमभरी राह को आसान बना दिया. दरअसल इस काम के लिए वन विभाग और लोनिवि को काफी माथापच्ची करनी पड़ी. इसके खतरे को देखते हुए और कोई तैयार नहीं हुआ तो राजपाल बिष्ट आगे आए. उनसे बहुत पुरानी मित्रता होने के कारण मुझे उनकी कार्यशैली मालूम है. नफा नुकसान से ज्याआदा उनका because ध्यान काम के महत्व पर रहता है. उनसे लगातार संपर्क के कारण गर्तांगली के जीर्णोद्धार की हर खबर मुझे मिलती रही. संयोगवश देहरादून में हम दोनों पड़ोसी हैं. लिहाजा पुल के लिए देवदार की लकड़ी का इंतजाम करते वक्त मैं उनके साथ ही मौजूद था. ...
कच्चे रास्ते पक्के सबक – दीपा तिवारी

कच्चे रास्ते पक्के सबक – दीपा तिवारी

पुस्तक-समीक्षा
कैलास मानसरोवर यात्रा पर एक उपयोगी यात्रा-पुस्तकडॉ. अरुण कुकसालकैलास पर्वत (ऊंचाई समुद्रतल से 22,028 फीट) और मानसरोवर (ऊंचाई समुद्रतल से 14,950 फीट) हिन्दू, बोनपा, बौद्ध और जैनियों की आस्था के सर्वोच्च तीर्थस्थल हैं. हिन्दुओं के लिए यह शिव का विराट रूप है. तिब्बत के बोनपा यहां स्वास्तिक में विराजमान अपने देवों दैमचौक और दोरजे फांगमो के दर्शन करते हैं. because बौद्ध बुद्ध की तपस्थली और जैन प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव की निर्वाण भूमि यहां मानते हैं. जीवनदायनी नदियां करनाली, सतलज, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु नदियों का उद्गम क्षेत्र यही है.ज्योतिष एक आम हिन्दू, तिब्बती, जैन और बौद्ध व्यक्ति के लिए कैलास - मानसरोवर जाना मन की संपूर्ण मनोकामनाओं का तर जाना है. हिमालय प्रेमी और घुमक्कड़ों के लिए because कैलास - मानसरोवर की यात्रा जीवन की अमूल्य निधि को हासिल करना है. वर्षों से मेरा भी ख़्वाब है क...