कैलास मानसरोवर यात्रा पर एक उपयोगी यात्रा-पुस्तक

  • डॉ. अरुण कुकसाल

कैलास पर्वत (ऊंचाई समुद्रतल से 22,028 फीट) और मानसरोवर (ऊंचाई समुद्रतल से 14,950 फीट) हिन्दू, बोनपा, बौद्ध और जैनियों की आस्था के सर्वोच्च तीर्थस्थल हैं. हिन्दुओं के लिए यह शिव का विराट रूप है. तिब्बत के बोनपा यहां स्वास्तिक में विराजमान अपने देवों दैमचौक और दोरजे फांगमो के दर्शन करते हैं. because बौद्ध बुद्ध की तपस्थली और जैन प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव की निर्वाण भूमि यहां मानते हैं. जीवनदायनी नदियां करनाली, सतलज, ब्रह्मपुत्र और सिन्धु नदियों का उद्गम क्षेत्र यही है.

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एक आम हिन्दू, तिब्बती, जैन और बौद्ध व्यक्ति के लिए कैलास – मानसरोवर जाना मन की संपूर्ण मनोकामनाओं का तर जाना है. हिमालय प्रेमी और घुमक्कड़ों के लिए because कैलास – मानसरोवर की यात्रा जीवन की अमूल्य निधि को हासिल करना है. वर्षों से मेरा भी ख़्वाब है कि कैलास – मानसरोवर जाऊं पर ख़्वाब और हकीकत का अभी मिलन होना बाकी है. होता भी है कि नहीं? ये आने वाले वक्त के गर्भ में छुपा है.

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शिक्षक, प्रशिक्षक और घुमक्कड़ दीपा तिवारी खुशकिस्मत हैं कि उन्होने मानसरोवर जाने के अपने बचपन के सपने को साकार किया है. तभी तो मानसरोवर पहुंच कर उनकी अपार because प्रसन्नता इस प्रकार अभिव्यक्त हुई कि ‘‘मैं दहाड़े मार-मार कर रोये जा रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे मुझे मेरे सारे अवसादों से मुक्ति मिल गई हो (पृष्ठ-117).’’ अब जीते-जी इससे बड़ी जीवनीय खुशी और क्या हो सकती है?

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अतः पहली आत्मीय बधाई तो दीपा तिवारी जी को अपने बचपन के सपने को सहेज कर जीवंत रखने के लिए है. (हम बचपन में हम जीते ही कहां है? और फिर भविष्य की चिंता में वर्तमान because को भी अनदेखा करना हमारी नियति है.) अपनी इसी जीवनीय जीवंतता के आत्म-बल पर दीपा  कैलास – मानसरोवर की यात्रा को कर पायी हैं. उनको दूसरी बधाई इस यात्रा को सफलता पूर्वक पूरी करने की है. पर इन दोनों बधाइयों से बड़ी बधाई इस बात की है कि उन्होने अपनी इस यात्रा को अपनी निजी अमानत की सीमा में न रखकर हम सबको शब्द-यात्री बना कर ‘कच्चे रास्ते पक्के सबक’ खूबसूरत किताब के माध्यम से बखूबी सैर करा दी है.

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निःसंदेह, इस किताब के माध्यम से पाठकों को कैलास – मानसरोवर यात्रा की प्रमाणिक जानकारी और अनावश्यक because मिथकों – भ्रमों को धूमिल करने में मदद मिली है और भावी पाठकों को मिलेगी.

कैलास – मानसरोवर यात्रा पर because वहां पहुंचे यात्रियों द्वारा बहुत लिखा गया है. पर अधिकांश किताबें इस यात्रा के महिमा मंडन की मुग्धता और प्रचलित मिथकों के खोल में सिमटी दिखाई दी हैं.

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इससे इतर, यात्री दीपा तिवारी ने कैलास – मानसरोवर यात्रा की पुरातन मान्यताओं के प्रति तटस्थ भाव रखते हुए यह ऐलान किया कि ‘‘मेरे लिए यह यात्रा न किसी मुक्ति की because कामना के लिए, न ही किसी कट्टरवादी धार्मिक तीर्थ यात्री की तरह, ईश्वर को तलाशने की थी. मैं तो कुदरत के अनमोल खजाने को इस यात्रा द्वारा अपनी आंखों में और अपनी रूह में रचा-बसा लेना चाहती थी (पृष्ठ-148).’’

दीपा तिवारी की इसी साफगोई because और साहस ने किताब पर भ्रमपूर्ण मिथकों, मान्यताओं और अन्धविश्वासों की छाया नहीं पड़ने दी है. इससे यह किताब अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णनों से परे हटकर वास्तविक अनुभवों और रोमांच के कलेवर में है. ऐसा करके उन्होने एक सच्चे घुमक्कड़ का परिचय दिया है.

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बिना लाग-लपेट के दीपा जी लिखती हैं कि ‘‘कैलास शोरगुल, आडंबर या पाखंड का विषय नहीं है. यह हमारे फिज़िकल टेम्परामेंट को डिस्क्राइब करता है. हमारे चलने की खूबी because और ट्रैंकिंग के हुनर को दिखाता है. लोग तीर्थ यात्राओं के नाम पर पागलों की तरह हो जाते हैं. … धर्मान्ध व्यक्ति किसी भी पर्वत या स्थान में जाकर, वहां की शांति को भंग कर देता है, पर वह वहां की कठिनाईयों को अनुभव ही नहीं कर पाता क्योंकि वह अपनी मादकता में रहता है (पृष्ठ-155).’’

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यह किताब कैलास – मानसरोवर यात्रा के साथ – साथ मानवीय आचरण के मनोवैज्ञानिक और व्यवहारिक पक्षों को भी उजागर और विश्लेषित करती है. दीपा मानती हैं कि हम because भारतीयों में हिप्पोक्रेसी, टाइमपास और मनोविनोद का सबसे चहेता साधन है. तभी तो इस यात्रा के दौरान यात्रियों के आपसी झगड़े, गलत हरकतें, ईष्या और द्वेष की भावना ‘बम-बम भोले’ के जयकारे एवं ‘ऊॅं नमः शिवाय’ के जाप के साथ ही चलते हैं. आखिर में इस यात्रा दल के एक व्यवस्थापक को कहना पड़ा कि ‘‘अगर आपके व्यवहार में यात्रा से कोई बदलाव नहीं आया तो इतनी बड़ी यात्रा का क्या फायदा (पृष्ठ-147).’’ यात्रा व्यवस्थापक का यह संदेश और चेतावनी दुनिया के सभी यात्रियों और घुमक्कड़ों को सबक के बतौर आत्मसात करनी चाहिए.

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एक आम यात्री की मनःस्थिति और जिज्ञासा को रोचकता से यह किताब सामने लायी है. यात्रा के लिए मानसिक और शारीरिक तैयारियों की छोटी-छोटी बातें और यात्रा में शामिल होने न होने के because संशय के दौरान यात्री दिलों की धड़कनों का गज़ब का कौतुहल इसमें है. शिक्षिका दीपा तिवारी ने सम्पूर्ण यात्रा के दौरान इस सीमान्त इलाके की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पलायन, पर्यावरण पर चिन्ता और चिन्तन को रेखांकित किया है. दीपा ने स्थानीय भाषा, शब्दों, रीति-रिवाज, पहनावा, लोगों का व्यवहार, प्रचलित लोककथायें, किवदन्तियां, विकास की स्थिति से हमें रू-ब-रू कराया है. दैनिक डायरी लिखने की आदत ने उनको यात्रा के दौरान यह काम करने में मदद की है.

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दीपा जागरूक यात्री के बतौर यात्रा के तौर-तरीकों, मान्यताओं, विश्वासों, अन्धविश्वासों और लोगों के व्यवहार पर प्रश्नचिन्ह लगाने से नहीं चूकती हैं. वह यात्रा को आसान करने के लिए अचानक मिली सुविधा याने ट्रक की सवारी करने का मौका नहीं छोड़ती, तिब्बती लोगों की पर्यावरण के प्रति सजगता से वह प्रभावित है. घोड़े वाले because रास्ते में यत्र-तत्र बिखरे कूडा-करकट को उठा कर अगले डेस्टबिन में डालने की षिक्षा को अपने लिए वह सहर्ष ग्रहण करती है. हम भारतीयों के मुकाबले विदेशियों की मानसरोवर पर गहन और प्रामणिक जानकारी से वो दंग होती है. वह मानती है कि हम अपने परिवेश को बहुत कम जानते हैं, लेकिन उसका गुणगान करने से नहीं अघाते हैं. वास्तव में, जीवनीय यर्थाथ से हमें दूर रहने की आदत है. तिब्बत पहुंचकर दीपा का कहना था कि हम चीन की कितनी ही बुराई कर लें लेकिन विकास के मुकाबले में वह हमसे कहीं आगे है.

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लिपुलेख में घोड़े में चढ़ते हुए अचानक डर कर चिल्लाने के कारण आंतों में आई ऐंठन ने सारे रास्ते उन्हें तकलीफ में रखा परन्तु अदम्य साहस के साथ उस पर काबू रख कर because वे कैलास – मानसरोवर तक सकुशल पहुंच पायी थी.

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दीपा तिवारी जी ने कैलास – मानसरोवर यात्रा में जाकर हिम्मत पेश की और उससे ज्यादा एक रोचक यात्रा-पुस्तक लिख कर सार्थक घुमक्कड़ी का परिचय दिया है. इस यात्रा में because उन्हीं के शब्दों में ‘पग-पग पर मौत ने उनका इन्टरव्यू लिया था’. लिपुलेख में घोड़े में चढ़ते हुए अचानक डर कर चिल्लाने के कारण आंतों में आई ऐंठन ने सारे रास्ते उन्हें तकलीफ में रखा परन्तु अदम्य साहस के साथ उस पर काबू रख कर वे कैलास – मानसरोवर तक सकुशल पहुंच पायी थी.

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वे लिखती है कि ‘‘मैं एक because कदम चलती, फिर चलते-चलते बेहोशी आने लगती. छाती में तेज दर्द होने लगता…….मन ने यहां तक सोच लिया था कि शायद मैं अब जिंदा नहीं रह पाऊंगी. फिर से अपनी अन्दरूनी सोच को जगाते हुए मैं थोड़ा ताकत महसूस करती (पृष्ठ-123).

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समय-साक्ष्य, देहरादून से प्रकाशित दीपा तिवारी की यात्रा-पुस्तक ‘कच्चे रास्ते पक्के सबक’ घुमक्कड़ी लेखन में पुरुष वर्चस्व के सम्मुख मातृशक्ति के सशक्त रूप में उपस्थिति हुई है. कैलास because और मानसरोवर के साथ-साथ इस किताब में अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, गुंजी, कालापानी, नाबीढांग, लिपुलेख, तकलाकोट, मान्धाता पर्वत, राकसताल, यमद्वार, डोल्मा-ला, गौरीकुंड, जुठुलफुक, खोचरनाथ और अन्य कई खूबसूरत पड़ावों से हमारी मुलाकात यह किताब कराती हैं. इन जगहों की वन्यता, विराटता और विकटता के साथ यहां के प्राकृतिक वैभव पाठक को आश्चर्यचकित करते हैं. निःसदेह किताब रोचक है, परन्तु कहीं-कहीं शब्दों की अशुद्धियां अखरती हैं.

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बेहतरीन यात्रा-पुस्तक लिखने के लिए because दीपा तिवारी जी को पुनः बहुत-बहुत बधाई. यह पुस्तक कैलास यात्रा से अधिक अन्य सभी तरह की यात्राओं और घुमक्कड़ी के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ और गाइड पुस्तक की लोकप्रियता हासिल करेगी.

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‘कच्चे रास्ते पक्के सबक’ – दीपा तिवारी
कैलास मानसरोवर यात्रा-
19 अगस्त से 17 सितम्बर, 2018 तक
प्रकाशन वर्ष-2021, प्रकाशक- समय साक्ष्य, देहरादून
पृष्ठ- 164, मूल्य- रु. 165

(लेखक एवं प्रशिक्षक)

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