प्रकाश उप्रेती

आज खतडू है. ठंड आरम्भ होने की सूचना देने वाला यह त्योहार गोठ-गुठयार से लेकर खेत- खलिहानों तक की सुख-समृद्धि का द्योतक है. ईजा भी कहती थीं- “खतडूक बाद च्यला जाड़ होने गोय” because (खतडू के ठंड होती गई). मैं, आज भी इसके इसी संदर्भ से वाकिफ हूँ कि खतडू ऋतु परिवर्तन और कृषि से जुड़े साधनों को कृतज्ञता अर्पित करने वाला त्योहार है.

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यह पशुधन की कुशलता और समृद्धि पर आधारित लोकपर्व है. वैसे यह हर वर्ष आश्विन माह के प्रथम दिन यानि संक्रांति को मनाया जाता है. इस दिन सामूहिक तौर पर एक जगह सूखी लकड़ियां,because घास और झाड़ियों को इकट्ठा करके उसे पुतले के आकार का बनाया जाता है और अंधेरा होते ही सारे गाँव वाले ‘छिलुक’ (एक तरह से लकड़ी की मशाल) और ककड़ी लेकर आते हैं फिर उस पुतले पर आग लगाई जाती है, ककड़ी के टुकड़े उसमें डाले जाते हैं. फिर उस राख़ को घर में रखा जाता है.

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गाँव के सब बच्चे मिलकर खतडू जलाते थे. चटपटा पीसा नमक और ‘हरि काकड’ के साथ खतडू को भगाया जाता था. घर से लेकर ‘छन’ तक सभी इसमें शामिल होते थे. गाय, भैंस, because बैल सबके लिए त्योहार का मतलब होता है. ‘वारे बाखे’ वाले ‘पारे बाखे’ और पारे बाखे वाले वारे बाखे, खतडू को भेजते थे. कभी किसी के ‘चुलपन’ खतडू को भेज देते थे तो कभी ‘भकार’ होन. जब गांव पूरा हो जाए तो सब मिलकर दूसरे गाँव को खतडू को भेज देते थे. यह सब होता ज़बानी ही था. इस ज़बानी खर्च में बच्चों की रचनात्मकता महत्वपूर्ण होती थी.

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ऋतु परिवर्तन के इस because त्योहार को बाद के दिनों में गढंत इतिहास में उलझा दिया. जबकि उस गढंत के कोई पुख़्ता साक्ष्य इतिहास में भी नहीं मिलते हैं. असल में यह त्योहार पशुधन की समृद्धि ,ऋतु परिवर्तन और धरती को कृतज्ञता अर्पित करने वाला त्योहार है.

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अपन, ज़बान की रचनात्मकता में आरंभ से ही बदमाश थे.  इसलिए खतडू को सीधे ‘मल्खन, या डापन’ भेज देते थे. यह ज़बानी जंग कम से कम 2 घंटे तो चलती ही थी. because इसके बाद थोड़ा काकड आग में डालकर बाकी सब खा लिया जाता था.

ऋतु परिवर्तन के इस त्योहार को बाद के दिनों में गढंत इतिहास में उलझा दिया. जबकि उस गढंत के कोई पुख़्ता साक्ष्य इतिहास में भी नहीं मिलते हैं. असल में यह त्योहार पशुधन की समृद्धि ,ऋतु परिवर्तन और धरती को कृतज्ञता अर्पित करने वाला त्योहार है.

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