
पहाड़ में लौटती उम्मीद: आधुनिक कृषि से बदल रहा बागेश्वर का भविष्य
- हिमांतर ब्यूरो, बागेश्वर
उत्तराखंड के पहाड़ों में वर्षों से पलायन एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती रहा है। बेहतर शिक्षा, रोजगार और सुविधाओं की तलाश में गांवों से शहरों की ओर बढ़ता कदम अक्सर सूने घरों और वीरान खेतों की कहानी कहता था। लेकिन अब इसी पहाड़ में एक नई कहानी जन्म ले रही है- “रिवर्स माइग्रेशन” की कहानी, जहां लोग लौट रहे हैं… और सिर्फ लौट ही नहीं रहे, बल्कि अपने गांवों की तस्वीर बदल रहे हैं। बागेश्वर इस बदलाव की एक जीवंत मिसाल बनकर उभरा है। यहां आधुनिक कृषि, सरकारी योजनाओं और स्थानीय प्रशासन के समन्वित प्रयासों ने उम्मीद की नई किरण जगाई है।

बदलती सोच, बदलती ज़मीन
जिलाधिकारी आकांक्षा कोंड़े के नेतृत्व में जनपद में कृषि को केवल आजीविका नहीं, बल्कि उद्यम के रूप में विकसित करने की दिशा में ठोस प्रयास किए गए हैं। किसानों को 80-90% तक अनुदान पर पॉलीहाउस, आधुनिक कृषि यंत्र और तकनीकी प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा रहा है।
इन पहलों का असर साफ दिखने लगा है। सलीगांव के युवा मनोज कोरंगा ने एकीकृत कृषि मॉडल अपनाकर तीन पॉलीहाउस, मत्स्य पालन तालाब और खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित की। आज वे न केवल सालाना लाखों की आय अर्जित कर रहे हैं, बल्कि स्थानीय लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं।

जैविक खेती से ब्रांड तक
गरुड़ ब्लॉक के चंद्रशेखर पांडे ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़ते हुए जैविक और औषधीय खेती का रास्ता चुना। तुलसी, लेमनग्रास, अश्वगंधा और रोजमेरी जैसी फसलों को उगाकर उन्होंने “हिम नेचुरल” जैसे स्थानीय ब्रांड के जरिए बाजार तक अपनी पहुंच बनाई। उनकी सफलता यह साबित करती है कि पहाड़ की मिट्टी में सिर्फ फसल नहीं, बल्कि संभावनाएं भी उगती हैं।
तकनीक से बढ़ी पैदावार
दान सिंह जैसे किसानों ने ‘आत्मा योजना’ और ‘आरकेवीवाई’ के तहत प्रशिक्षण लेकर वर्मी कम्पोस्ट, लाइन बुवाई और आधुनिक उपकरणों का उपयोग शुरू किया। परिणामस्वरूप उत्पादन में 30-40% की वृद्धि और लागत में कमी आई। यह बदलाव दर्शाता है कि सही तकनीक और मार्गदर्शन से सीमित संसाधनों में भी बड़ा बदलाव संभव है।
महिलाएं बनीं बदलाव की धुरी
पहाड़ की महिलाओं ने इस परिवर्तन को नई दिशा दी है। मन्यूड़ा गांव की हंसी शाह ने वैज्ञानिक खेती अपनाकर मोटे अनाज और सब्जियों का उत्पादन शुरू किया। आज वे न केवल खुद आत्मनिर्भर हैं, बल्कि 40 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें भी स्वरोजगार से जोड़ रही हैं।

कीवी और जड़ी-बूटियों की नई क्रांति
जनपद में कीवी उत्पादन तेजी से उभर रहा है। कुछ वर्षों पहले तक सीमित क्षेत्र में होने वाली यह खेती अब बड़े स्तर पर फैल चुकी है, जिससे किसानों की आय में कई गुना वृद्धि हुई है। इसके साथ ही ‘कुटकी’ जैसी औषधीय फसल की खेती ने भी महिलाओं के लिए आय का नया स्रोत तैयार किया है। सैकड़ों महिलाएं इस खेती से जुड़कर न केवल आर्थिक रूप से सशक्त हुई हैं, बल्कि उन्होंने गांवों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा किए हैं।
उम्मीद की नई कहानी
बागेश्वर आज उस बदलाव का प्रतीक बन गया है, जहां पलायन की जगह अब वापसी की कहानी लिखी जा रही है। आधुनिक तकनीक, सरकारी योजनाओं और स्थानीय प्रयासों का यह संगम पहाड़ के भविष्य को नई दिशा दे रहा है। यह केवल एक जिले की कहानी नहीं, बल्कि पूरे उत्तराखंड के लिए एक प्रेरणा है—कि अगर सही दिशा और प्रयास मिल जाएं, तो पहाड़ की कठिनाइयों में भी संभावनाओं के नए रास्ते खोजे जा सकते हैं।
