Blog

बाल साहित्य का स्पेस ‘मोबाइल’ की ‘स्क्रीन’ ने भर दिया

बाल साहित्य का स्पेस ‘मोबाइल’ की ‘स्क्रीन’ ने भर दिया

साहित्‍य-संस्कृति
बाल दिवस पर विशेषप्रकाश उप्रेती पिछले कुछ समय से हमारी दुनिया बहुत तेजी से बदली है. इस बदलाव में एक पीढ़ी जहाँ बहुत पीछे रह गई तो वहीं दूसरी पीढ़ी बहुत आगे निकल गई है. इस बदलाव में जिसने because अहम भूमिका निभाई वह मोबाइल की स्क्रीन और एक क्लिक पर सबकुछ खोज लेना का भरोसा देने वाला इंटरनेट है. आज  बाल पत्रिकाओं के मुकाबले बच्चे मोबाइल की स्क्रीन पर यूट्यूब के जरिए कहानियाँ देख रहे हैं. उनका पूरा बौद्धिक स्पेस मोबाइल और इंटरनेट तक सिमट गया है.ज्योतिष हिंदी साहित्य के केंद्र में बाल साहित्य कभी नहीं रहा . हमेशा से बाल साहित्य को अगंभीर साहित्यिक कर्म के रूप में देखा गया . आज भी बाल साहित्य के अस्तित्व पर अलग से कम ही बात होती है. इसलिए कभी बचकाना साहित्य कह कर तो कभी साहित्यिक गंभीरता (जो कम ही दिखती है) के नाम पर बाल साहित्य को केंद्र because से बाहर ही रखा गया.  इसके बावजूद हिंदी मे...
डीडीहाट महोत्सव: सिराकोट मंदिर तक बनेगा रोपवे!

डीडीहाट महोत्सव: सिराकोट मंदिर तक बनेगा रोपवे!

पिथौरागढ़
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने क्षेत्र के विकास के लिए विभिन्न योजनाओं घोषणा कीहिमांतर ब्यूरो, पिथौरागढ़मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिथौरागढ़ के डीडीहाट में आयोजित पांच दिवसीय डीडीहाट महोत्सव के समापन अवसर पर कुमाऊंनी भाषा में संबोधित करते हुए क्षेत्र के विकास हेतु विभिन्न घोषणाएं कि जिसमें, डीडीहाट नगर से सिराकोट मंदिर तक रोपवे का निर्माण करने, जीजीआइसी डीडीहाट का नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय देव सिंह because डसीला के नाम किए जाने, डीडीहाट खेल मैदान के विस्तारीकरण करने की कार्यवाही हेतु जिलाधिकारी को प्रस्ताव तैयार करते हुए शासन को प्रेषित करने की घोषणा, घसाड़ विद्यालय का उच्चीकरण किए जाने, डीडीहाट नगर के आंतरिक मार्गों के निर्माण व सौंदर्यीकरण किए जाने की स्वीकृति की घोषणा, डीडीहाट महोत्सव को प्रत्येक वर्ष राजकीय मेले के रूप में मनाए जाने की घोषणा की गई. मुख्यमंत्...
उत्तराखंड का परंपरागत रेशा शिल्प

उत्तराखंड का परंपरागत रेशा शिल्प

साहित्‍य-संस्कृति
चन्द्रशेखर तिवारी प्राचीन समय में समस्त उत्तराखण्ड में परम्परागत तौर पर विभिन्न पादप प्रजातियों के because तनों से प्राप्त रेशे से मोटे कपड़े अथवा खेती-बाड़ी व पशुपालन में उपयोग की जाने वाली सामग्रियों का निर्माण किया जाता था. पहाड़ में आज से आठ-दस दशक पूर्व भी स्थानीय संसाधनों से कपड़ा बुनने का कार्य होता था. ट्रेल (1928) के अनुसार उस काल में पहाड़ के कुछ काश्तकार लोग कुछ जगहों पर कपास की भी खेती किया करते थे.ज्योतिष कुमाऊं में कपास की बौनी किस्म से कपड़ा बुना जाता था. कपड़ा बुनने के इस काम को तब शिल्पकारों की उपजाति कोली किया करती थी. हाथ से बुने इस कपड़े को 'घर बुण’ के नाम से जाना जाता था. टिहरी रियासत में कपड़ा बुनने वाले बुनकरों को because पुम्मी कहा जाता था. भारत की जनगणना 1931, भाग-1, रिपोर्ट 1933 में इसका जिक्र आया है. उस समय यहां कुमाऊं के कुथलिया बोरा व दानपुर के बुनकर तथा गढ़वाल के ...
अशोक चक्र विजेता शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा

अशोक चक्र विजेता शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा

पिथौरागढ़
प्रकाश चन्द्र पुनेठा उत्तराखण्ड राज्य के जिला मुख्यालय पिथौरागढ़ से लगभग 79 किलोमीटर दूर पश्चिम में गंगोलीहाट तहसील में लगभग 29 किलामीटर दूर रावलखेत गाँव है. रावलखेत गाँव हमारे देश के शाँन्तिकाल के सर्वाच्च वीरता पुरुस्कार अशोक चक्र विजेता, 10वीं बटालियन पैराशूट रेजिमेंट के स्वर्गीय हवलदार बहादुर because सिंह बोहरा का गाँव है. वर्तमान में जिला पिथौरागढ़ में शहीद हवलदार बहादुर सिंह बोहरा एकमात्र अशोक चक्र विजेता है. जब भी हम किसी गाँव में जाते है तो देखते है कि अक्सर गाँव में कई मकान एक दूसरे से सटकर बने हुए हैं, मकानों के आँगन आपस में मिले हुए है, गाँव का मुख्य मार्ग, मकानों के छोटे-छोटे मार्गों से जुड़ा होता है. जिस कारण गाँव में रहने वाले लोग एक दूसरे के संपर्क में रहते हैं.ज्योतिष इसके विपरीत शहर से दूर पहाड़ों के मध्य घनघोर बीहड़ जंगल के मध्य स्थित रावलखेत गाँव, विस्तृत क्षेत्र में बि...
भाषा और अनुवाद का विराट व कौतूहल वर्धक संसार…! 

भाषा और अनुवाद का विराट व कौतूहल वर्धक संसार…! 

पुस्तक-समीक्षा
बहुविविध आयाम और उदेश्य हैं यह देवेशपथ सारिया जी के रचनात्मक संसार से परिचित होकर  मुझे ज्ञात हुआसुनीता भट्ट पैन्यूली कविताएं महज़ कल्पनाओं,मिथक और आस-पास के वातावरण से शरीर ही नहीं धारण करतीं अपितु कविताओं का उद्देश्य किसी संसार की व्यापकता में उसके सामाजिक रूप, संस्कृति, उसके प्राकृतिक सौंदर्य,मानव स्वभाव  और वहां के भौगोलिक वातावरण से पाठकों को परिचित कराना भी है. चाहे वह साहित्यिक क्षेत्र हो, समकालीन व because साम्राज्यवादी व्यवस्था हो कवि की मनोदशा या उसके सामाजिक जीवन का संघर्ष हो या उसकी अपने देश के प्रति प्रेम की प्रगाढ भावना हो अथवा उसका वैयक्तिक संघर्ष हो, जिसकी उदेश्य पूर्ति के लिए किसी भी भाषाओं में लिखी गयी कविताओं की विश्वव्यापी संप्रेषणीयता के लिए उनका अनुवाद एक विशिष्ट कारक है जो कविताओं की मूल जड़ों और उसके आच्छन्न उदेश्यों को हर प्रांत व दुनिया के जनमानस तक पहुंचाने ...
पिथौरागढ़ शरदोत्सव: मुख्यमंत्री धामी ने किया विकास प्रदर्शनी का शुभारम्भ

पिथौरागढ़ शरदोत्सव: मुख्यमंत्री धामी ने किया विकास प्रदर्शनी का शुभारम्भ

पिथौरागढ़
पिथौरागढ़ में 344 करोड़ की विकास योजनाओं का शिलान्यास एवं लोकार्पणहिमांतर ब्यूरो, पिथौरागढ़मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अपने तीन दिवसीय भ्रमण पर पिथौरागढ़ पहुंचे. उन्होंने जिला मुख्यालय के देव सिंह मैदान में आयोजित शरदोत्सव एवं विकास प्रदर्शनी का शुभारंभ करते हुए, जनपद के विकास के लिए कुल 34384.65 (तीन सौ तैतालिस करोड़ चौरासी लाख, पैंसठ हजार) की 126 योजनाओं तथा कार्यों का लोकार्पण एवं शिलान्यास किया. मुख्यमंत्री द्वारा विधानसभा पिथौरागढ़ के अंतर्गत 91.23 लाख रु. की लागत से निर्माणाधीन केएनयूराआइका पिथौरागढ़ के विद्यालय का पुननिर्माण एवं खेल मैदान का सुदृढ़ीकरण, 179.38 लाख रु. की लागत से एसडीएसराइका पिथौरागढ़ में मिटिंग हाल, प्रयोगशाला एवं हाईटेक शौचालय का निर्माण, 40.50 लाख की लागत से निर्माणाधीन राइका कुम्डार में लाइब्रेरी कक्ष एवं कम्प्यूटर कक्ष का निर्माण, 64.29 लाख की लागत से निर्म...
छठ: भारतराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा लोकपर्व

छठ: भारतराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा लोकपर्व

लोक पर्व-त्योहार
छठ पूजा पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीचार दिनों तक आयोजित होने वाले छठ पूजा के पर्व की 8 नवंबर को शुरुआत हो चुकी है,जिसका समापन 11 नवंबर को प्रातःकालीन सूर्य अर्घ्य के साथ होगा. सूर्य देवता और षष्ठी देवी को समर्पित यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों द्वारा मनाया जाता है.चार दिवसीय इस पर्व के चार अनुष्ठानपरक because आयाम हैं- नहाय-खाय, खरना, छठ पूजा और सूर्य देव को अ‌र्घ्य देना. इस त्यौहार के माध्यम से लोग सूर्य देवता, देवी उषा (सुबह की पहली किरण) और प्रत्युषा (शाम की आखिरी किरण) के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि मान्यता है कि ब्रह्मांड में सूर्य ऊर्जा का पहला स्रोत है जिसे प्रकृति रूपा षष्ठी देवी धारण करती हैं तथा उसी के कारण पृथ्वी पर जीवन भरण संभव हो पाता है. बिहार का पर्व छठ चार दिनों तक मनाया जाने वाला लोकपर्व ...
उत्तराखंड स्थापना दिवस : 21 वर्षों में मुख्मंत्रियों के सिवा बदला क्या?

उत्तराखंड स्थापना दिवस : 21 वर्षों में मुख्मंत्रियों के सिवा बदला क्या?

देहरादून
उत्तराखंड स्थापना दिवस पर विशेषप्रकाश उप्रेती उत्तराखंड राज्य के हिस्से में जो कुछ अभी है वह KBC यानी ‘कौन बनेगा करोडपति’  का एक प्रश्न है. यही हमारा हासिल भी है. हमारे यहाँ कौन बनेगा सीएम (KBC) सिर्फ because चुनाव के समय का प्रश्न नहीं है बल्कि स्थायी प्रश्न है. इसीलिए स्वास्थ्य, रोजगार, शिक्षा, कृषि, पर्यटन, परिवहन, पलायन आदि की स्थिति में कोई गुणात्मक अंतर इन 21वर्षों में नहीं आया है लेकिन वहीं इन 21 वर्षों में हमने 11 मुख्यमंत्री जनता पर थोप दिए. असल में यही हमारी 21 वर्षों की बड़ी उपलब्धि है.ज्योतिष एक राज्य के हिस्से में 21 वर्ष का समय क्या वाकई में वयस्क और परिपक्व होने का पर्याप्त समय है! विकास के पंचवर्षीय वादों पर वोट लुटा देने वाले नागरिक समाज के लिए 21 वर्ष के क्या मायने हैं. इन वर्षों में उन सपनों का क्या हुआ जिनके लिए संघर्ष किया गया था. इन 21 वर्षों में साल-दर-साल प...
गढ़वाल हितैषणी सभा आम चुनाव सम्पन्न, पैनल न.—1 विजयी घोषित

गढ़वाल हितैषणी सभा आम चुनाव सम्पन्न, पैनल न.—1 विजयी घोषित

देश—विदेश
अध्यक्ष पद पर अजय सिंह बिष्ट एवं महासचिव पद पर द्वारिका प्रसाद भट्ट विजयीहिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीदिल्ली—एनसीआर में उत्तराखंड गढ़वाल की सबसे बड़ी सामाजिक संस्था 'गढ़वाल हितैषणी सभा (गढ़वाल भवन)' के आम चुनाव वर्ष 201—23 के लिए 7 नवम्बर, 2021 को पंचकुयां रोड स्थित गढ़वाल भवन में सम्पन्न हुए, इसमें मुख्यत: दो पैनलों ने भाग लिया. पैनल न. — 1 के अध्यक्ष के उम्मीदवार अजय सिंह बिष्ट एवं महासचिव के उम्मीदवार द्वारिका प्रसाद भट्ट और पैनल नं.—2 के अध्यक्ष के उम्मीदवार शैलेंन्द्र नेगी एवं महासचिव के उम्मीदवार पवन कुमार मैठाणी के बीच चुनाव हुआ. इसमें अध्यक्ष के अलावा 9 पदाधिकारी एवं 15 कार्यकारिणी सदस्यों ने चुनाव में हिस्सा लिया. गढ़वाल हितैषणी सभा के दोनों पक्षों के सभी उम्मीदवार इसके लिए कई दिनों से तैयारियों में जुटे हुए थे. दोनों पैनलों ने अपने—अपने लोगों से संपर्क अभियान के तहत चुनाव ...
शंहशाह: लक्ष्मी पूजन कर गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश करते थे!

शंहशाह: लक्ष्मी पूजन कर गंगा-जमुनी तहजीब की अनूठी मिसाल पेश करते थे!

ट्रैवलॉग
मुगलों का जश्ने-ए-चराग मंजू दिल से… भाग-22मंजू काला“जश्ने- ए-चराग” के संदर्भ में कुछ कहने से से पहले मैं दीपावली की व्याख्या कुछ अपने अनुसार करना चाहूंगी चाहुंगी. दीपावली शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों ‘दीप’ अर्थात ‘दिया’ व ‘आवली’ अर्थात ‘लाइन’ या ‘श्रृंखला’ के मिश्रण से हुई है. इसके उत्सव में घरों के द्वारों व मंदिरों पर लक्ष प्रकाश की श्रंखलाओं को because प्रज्वलित किया जाता है. गृहस्थ चाहे वह सुदूर हिमालय का हो या फिर समुद्र तट पर मछलियाँ पकड़ने वाला हो, सौदा सुलफ का इंतमजात करते हैं तो गृहवधुएं घरों की विथिकाओं और दालानों को अपने धर्म व परंम्परा के अनुसार सुंदर आलेपनों व आम्रवल्लिकाओं से सुसज्जित किया करती हैं. पहाडी़ घरों के ओबरे जहाँ उड़द की दाल के भूडो़ं से महक उठते हैं तो वहीं राजस्थानी रसोड़े में मूंगडे़ का हलवा, सांगरे की सब्जी व प्याज की कचौड़ी परोसने की तैया...