लोक पर्व-त्योहार

छठ: भारतराष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा लोकपर्व

छठ पूजा पर विशेष

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

चार दिनों तक आयोजित होने वाले छठ पूजा के पर्व की 8 नवंबर को शुरुआत हो चुकी है,जिसका समापन 11 नवंबर को प्रातःकालीन सूर्य अर्घ्य के साथ होगा. सूर्य देवता और षष्ठी देवी को समर्पित यह पर्व मुख्य रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोगों द्वारा मनाया जाता है.चार दिवसीय इस पर्व के चार अनुष्ठानपरक because आयाम हैं- नहाय-खाय, खरना, छठ पूजा और सूर्य देव को अ‌र्घ्य देना. इस त्यौहार के माध्यम से लोग सूर्य देवता, देवी उषा (सुबह की पहली किरण) और प्रत्युषा (शाम की आखिरी किरण) के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि मान्यता है कि ब्रह्मांड में सूर्य ऊर्जा का पहला स्रोत है जिसे प्रकृति रूपा षष्ठी देवी धारण करती हैं तथा उसी के कारण पृथ्वी पर जीवन भरण संभव हो पाता है. बिहार का पर्व छठ चार दिनों तक मनाया जाने वाला लोकपर्व है.

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कार्तिकमास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से लेकर सप्तमी तिथि तक इस पर्व के व्रत और अनुष्ठान बड़े नियम और निष्ठा से किए जाते हैं . बिहार में इस पर्व को ‘डाला छठ’ भी कहते हैं. because चतुर्थी तिथि को व्रतीजन स्नान करके सात्त्विक भोजन करते हैं जिसे ‘नहाय खाय’ कहा जाता है. पंचमी तिथि को पूरे दिन व्रत रखकर संध्याकाल में प्रसाद ग्रहण किया जाता है जिसे ‘खरना’ और ‘लोहण्डा’ कहते हैं. षष्ठी तिथि को दोपहर से ही नदियों और तालाबों के किनारे व्रती जनों की भीड़ जुटने लगती है. महिलाएं सूर्य देव और छठ माई के गीत गाती हुई अपने घरों से निकलती हैं.

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सभी फोटो pixabay.com से साभार

सूर्य देव के अर्ध्य का सूप और डलिया ढोने का काम पुरुष वर्ग करता है. बांस से निर्मित सूप और डलिया में सूर्य देव को चढ़ाने का जो प्रसाद होता है उसमें सभी प्रकार के ऋतु फल, because कन्द मूल, मिष्टान्न और अनेक प्रकार के पकवान होते हैं. प्रसाद सामग्री में गुड़ और आटे से बना हुआ ‘ठेकुआ’ और ‘लडुआ’ का होना जरूरी है. ठेकुआ पर लकड़ी के सांचे से सूर्यदेव के रथ का चक्र भी अंकित होना चाहिए. जैसे ही सूर्य भगवान अस्त होने लगते हैं, व्रतीजन जल में खड़े होकर दोनों हाथों से सूर्य भगवान को अर्ध्य अर्पित करते हैं. महिलाएं लोकगीत गाते हुए कहती हैं-

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ढलवा डलिया because में ठेकुआ,
मिठैया, कन्दमूल.
सिर पर because सिन्दुरवा
हो सखि because कातिक महिनवां..

छठ पर्व के समय गाए गए एक लोकगीत के अनुसार अन्न, धन्न और सोना आदि समस्त वैभव की पूर्ति सूर्य भगवान से हो because जाती है किन्तु पुत्र की प्राप्ति के लिए भगवती षष्ठी का व्रत किया जा रहा है-

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अन-धन so सोनवा लागी,पूजी देवलघरवा हे.
पुत्र लागी, करीं हम but छठी के बरतिया हे..

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सप्तमी की तिथि को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त से ही सूर्य भगवान के उदय होने की बेसब्री से प्रतीक्षा की जाने लगती है. इस दिन महिलाएं सूर्योदय से पहले ही नदी या तालाब के पानी में उतर जाती हैं because और छठ मइया से विनती की जाती है कि सूर्य भगवान जल्दी दर्शन दें तथा अन्न-धन, घर-परिवार  सब प्रकार की खुशहाली प्रदान करें. इन्हीं मांगलिक गीतों से उदित होते हुए सूर्य को अर्ध्य प्रदान किया जाता है-

कौने अवगुणवां सूरुज
नाहीं उगले हे छठि मइया.
जिंदगिया बना दे अन्न धन
सेवकन के घर भरवा दे..

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सूर्य को अर्ध्य देने के बाद प्रसाद ग्रहण because किया जाता है और इसी दिन व्रत का समापन होता है .इस साल 11 नवंबर को इस महापर्व का समापन किया जाएगा.

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सूर्योपासना से जुड़ा छठ पर्व आज बिहार के क्षेत्रीय पर्व के रूप में ही जाना जाता है पर इस पर्व से जुड़ी पौराणिक मान्यताओं और लोकगाथाओं पर गौर किया जाए तो पता चलता है कि because भारत के आदिकालीन सूर्यवंशी भरत राजाओं का यह मुख्य पर्व था तथा उसके बाद मगध (बिहार) और आनर्त (गुजरात) के राजनैतिक इतिहास के साथ भी छठ पर्व की ऐतिहासिक कड़ियां जुड़ती गईं.

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छठ पर्व बिहार का सर्वाधिक लोकप्रिय पर्व कैसे बन गया, इस सम्बन्ध में एक पौराणिक मान्यता प्रचलित है कि मगध सम्राट जरासन्ध के किसी पूर्वज के कुष्ठ रोग को दूर करने के लिए शाकलद्वीपीय because मग ब्राह्मणों ने सूर्योपासना की थी. तभी से मगध क्षेत्र बिहार में छठ के अवसर पर सूर्योपासना का प्रचलन प्रारम्भ हुआ. छठ पर्व के साथ आनर्त प्रदेश वर्तमान गुजरात के सूर्यवंशी राजा शर्याति और भार्गव ऋषि च्यवन का भी ऐतिहासिक कथानक जुड़ा है.

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पौराणिक अनुश्रुति के अनुसार एक बार राजा शर्याति जंगल में शिकार खेल रहे थे तो उनकी पुत्री सुकन्या ने गलतफहमी में दीमक की बांबी में डूबे तपस्यारत च्यवन ऋषि की चमकती because हुई दोनों आंखों को फोड़ डाला था. च्यवन ऋषि के शाप से शर्याति के सैनिकों पर घोर उपसर्ग होने लगा. तब प्रायश्चित के रूप में शर्याति ने ऋषि की सेवा शुश्रुषा हेतु अपनी कन्या को सौंप दिया. सुकन्या ने किसी नागकन्या के परामर्श पर कार्तिक मास की षष्ठी तिथि को सूर्य देव की उपासना की तो च्यवन ऋषि के आखों की ज्योति वापस आ गई.

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‘ब्रह्मवैवर्तपुराण’ में छठ पर्व को स्वायम्भुव मनु के पुत्र प्रियव्रत के इतिहास से जोड़ते हुए बताया गया है कि जब राजा प्रियव्रत की कोई सन्तान नहीं हुई तो उन्होंने महर्षि कश्यप के कहने पर because पुत्रेष्टि यज्ञ किया जिसके फलस्वरूप उनकी महारानी ने पुत्र को जन्म तो दिया किन्तु वह शिशु मृत उत्पन्न हुआ. बाद में षष्ठी देवी की कृपा से वह शिशु जीवित हो गया. तभी से प्रकृति का छठा अंश मानी जाने वाली षष्ठी देवी बालकों की रक्षिका और सन्तान देने वाली देवी के रूप में पूजी जाने लगी –

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षष्ठांशा प्रकृतेर्या च सा च षष्ठी प्रकीर्तिता.‘

पुराणों के अनुसार षष्ठी शिशुओं के संरक्षण एवं संवर्धन से सम्बन्धित देवी है तथा इसकी विशेष पूजा षष्ठी तिथि को होती है. छठ पर्व के साथ स्कन्द पूजा की भी परम्परा जुड़ी है. because भगवान शिव के तेज से उत्पन्न बालक स्कन्द की छह कृतिकाओं ने अपना स्तनपान कराकर रक्षा की थी. इसी कारण स्कन्द के छह मुख हैं और उन्हें कार्तिकेय नाम से भी पुकारा जाने लगा. कार्तिक मास से सम्बन्ध होने के कारण षष्ठी देवी को स्कन्द की पत्नी ‘देवसेना’ के नाम से भी पूजा जाने लगा-

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मातृकासु च विख्याता
देवसेनाऽभिधा च सा.’

शास्त्रों में छठ पूजा से सम्बन्धित तांत्रिक विधि का भी वर्णन मिलता है. घड़े पर,वट वृक्ष के मूल में अथवा दीवार पर षष्ठी देवी की आकृति उकेर कर ‘षष्ठांशा प्रकृतेर्या’ इस मंत्र से because ध्यान करने पर मनुष्य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं. छठ पर्व के अवसर पर निस्सन्तान व्यक्ति यदि “ऊँ ह्रीं षष्ठी देव्यै स्वाहा” इस अष्टाक्षर मंत्र से षष्ठी देवी का एक लाख बार जाप करता है और बाद में सामवेदोक्त सूर्य स्तोत्र का पाठ करता है तो उसे पुत्र प्राप्ति होती है.

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आज छठ पर्व बिहार और उत्तर प्रदेश से जुड़ा आंचलिक पर्व तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्व दिल्ली, मुम्बई, कलकत्ता, चेन्नई जैसे महानगरों में भी बड़े उत्साह और श्रद्धाभाव से because मनाया जाने वाला एक राष्ट्रीय पर्व का रूप धारण कर चुका है . छठ पर्व के दिन देश के कोने कोने में स्थित तालाबों, सरोवरों और नदियों के घाटों में जिस तरह से सूर्य की पूजा के लिए जनसैलाब उमड़कर आता है,उससे लगता है मानो समग्र भारतराष्ट्र पंक्तिबद्ध रूप से एकाकार होकर देश की सुख-समृद्धि और खुशहाली के लिए विश्व अर्थव्यवस्था के नियामक सूर्य देव को और प्रकृति की अधिष्ठात्री षष्ठी देवी को अपनी आस्था, भक्ति और कृतज्ञता ज्ञापन का अर्ध्य चढ़ा रहा हो .

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हमें अपने देश के उन आंचलिक पर्वों और त्योहारों का विशेष रूप से आभारी होना चाहिए जिनके कारण भारतीय सभ्यता और संस्कृति की ऐतिहासिक पहचान आज भी संरक्षित है. उत्तराखण्ड का उत्तरायण पर्व हो या केरल का ओणम पर्व कर्नाटक की रथसप्तमी हो या फिर बिहार का छठ पर्व इस तथ्य को सूचित करते हैं कि because भारत मूलतः सूर्य संस्कृति के उपासकों का देश है तथा बारह महीनों के तीज-त्योहार भी यहां सूर्य के संवत्सर चक्र के अनुसार मनाए जाते हैं. ‘पर्व’ का अर्थ है गांठ या जोड़. भारत का प्रत्येक पर्व एक ऐसी सांस्कृतिक धरोहर है जिसके साथ प्राचीन कालखण्डों का इतिहास और पूजा परम्पराओं की वैज्ञानिक कड़ियां भी जुड़ी हुई हैं.

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जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वामिग के इस दौर में छठ पर्व केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं रह जाता है, बल्कि भूमिगत जलस्तर को सुधारने हेतु परम्परागत जल-स्रोतों जैसे तालाब, सरोवर, because नदियों आदि जल संस्थानों के संरक्षण और संवर्धन का भी पर्यावरण वैज्ञानिक अभियान सिद्ध हो सकता है, ताकि जल संचयन और ‘वाटरहारवेस्टिंग’ जैसे परम्परागत जलविज्ञान को पुनर्जीवित किया जा सके.

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भारत के ऋतुविज्ञान के अनुसार कार्तिक मास में छठ पूजा के बाद देव प्रबोधिनी एकादशी से पुरुष और प्रकृति के मिलन की ऋतु आती है. इसी ऋतु में सूर्य देव ‘हस्तिशुण्डविधि’ से तालाब, सरोवर आदि प्राकृतिक जलाशयों से वाष्पीकरण करते हैं तथा अन्तरिक्ष में मेघों का गर्भधारण होता है. यही मेघ चान्द्रमास के बारह पक्षों यानी छह because महीनों के बाद चातुर्मास में मानसूनों की वर्षा द्वारा धरती को धन-धान्य से समृद्ध करते हैं. यही कारण है कि छठ पूजा के अवसर पर गन्ने के बारह पेड़ उसके नीचे मिट्टी का एक घड़ा और छह दिए जलाकर रखे जाते हैं ताकि यथाकाल छह महीने का वृष्टिगर्भ सफल हो सके तथा नियत समय पर मानसूनों की वर्षा हो सके.

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इस अवसर पर मिट्टी के हाथी because भी बनाए जाते हैं, जो प्रतीक है हाथी के सूंड के आकार के जल स्तम्भों का जिनसे मानसून बनने की प्रक्रिया सक्रिय रहती है. इस प्रकार छठ पर्व की पृष्ठभूमि में मानसून विज्ञान का इतिहास भी संरक्षित है.

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दरअसल, छठ पर्व ‘भारतराष्ट्र’ की अस्मिता का पर्व है. छठ के अवसर पर अस्त होते और उगते सूर्य को अर्ध्य देने का यही निहितार्थ है कि समस्त प्रजाजनों का भरण पोषण करने वाला असली राजा तो सूर्य है. वैदिक साहित्य में प्रजावर्ग का भरण पोषण करने के कारण सूर्य को ‘भरत’ कहा गया है. वैदिक राष्ट्रवादी चिंतकों के because अनुसार सूर्य एक ‘राष्ट्र’ भी है ‘राष्ट्रपति’ भी. सूर्य की ‘भरत’ संज्ञा होने के कारण सूर्यवंशी आर्य ‘भरतगण’ कहलाने लगे. बाद में इन्हीं सूर्योपासक भरतवंशियों से शासित यह देश भी ‘भारतवर्ष’ कहलाया. भारतवासियों के लिए समस्त कामनाओं की पूर्ति तो भगवान् सूर्य से हो जाती है, किन्तु पुत्रेषणा की पूर्ति मातृस्वरूपा प्रकृति देवी से ही होती है. इसलिए परब्रह्म स्वरूप सूर्य और उनकी शक्तिस्वरूपा षष्ठी देवी की पूर्जा अर्चना की परम्परा हजारों वर्षों से प्रचलित है.

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भारतराष्ट्र की अस्मिता, खुशहाली और सांस्कृतिक पहचान से सरोकार रखने वाले लोगों को बिहारवासियों का विशेष आभारी होना चाहिए कि उन्होंने सूर्य पूजा के माध्यम से छठपर्व की पृष्ठभूमि में वैदिक आर्यों के धरोहर स्वरूप सूर्यसंस्कृति की लोकपरंपरा को आज भी जीवित रखा है. भारत के लगभग अस्सी प्रतिशत गांव आज भी कृषि because एवं पेयजल के लिए भूमिगत जल पर ही निर्भर हैं परंतु जलापूर्ति के स्रोत दिन प्रतिदिन घटते जा रहे हैं. ऐसे संकटकालीन परिस्थितियों में भारत के सूर्य उपासकों का देशवासियों को यही संदेश है कि छठ पर्व को महज एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में ही नहीं बल्कि इसे जलसंस्थानों के संरक्षण और संवर्धन के राष्ट्रीय अभियान के रूप में भी मनाया जाना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न प्राकृतिक प्रकोप शांत हों, नियत समय पर मानसूनों की वर्षा हो और यह देश कृषिसम्पदा से खुशहाल हो सके.

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समस्त देशवासियों को छठ पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं.

(लेखक because दिल्ली विश्वविद्यालय के  रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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