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उत्तराखंड में फिर खिलेगा कमल, BJP के विकास कार्यों पर जनता को पूरा भरोसा: धन सिंह रावत  

उत्तराखंड में फिर खिलेगा कमल, BJP के विकास कार्यों पर जनता को पूरा भरोसा: धन सिंह रावत  

उत्तराखंड हलचल
धन सिंह रावत श्रीनगर विधानसभा के वर्तमान विधायक हैं। उन्होंने कम उम्र में ही समाज सेवा का  कार्य शुरू कर दिया था। साल 1989 में धन सिंह रावत ने आरएसएस ज्वॉइन किया। बाल विवाह, छुआछूत और शराब के खिलाफ अभियान छेड़ा। वह राम जन्मभूमि मूवमेंट के दौरान भी सक्रिय रहे और जेल भी जाना पड़ा। उच्च शिक्षा मंत्री, स्वास्थ्य मंत्री और सहकारिता जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय में मंत्री के रूप में सेवा दे चुके धन सिंह रावत का कहना है कि इस चुनाव में भी जनता का प्यार उन्हें प्राप्त होगा और सूबे में फिर से भाजपा की सरकार बनेगी। इसकी वजह यह है कि बीजेपी के शासन के दौरान सूबे में जितने कार्य हुए हैं, उतने कभी अन्य सरकारों के कार्यकाल में नहीं हुए।अंतिम गांव और व्यक्ति तक विकास पहुंचाना है हमारा लक्ष्य धन सिंह रावत ने कहा कि राज्य की जनता ने जिस तरह से पिछले चुनावों में अपना भारी समर्थन भारतीय जनता पार्टी को दिया ...
नेताजी ने ही दिया था गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान

नेताजी ने ही दिया था गांधीजी को ‘राष्ट्रपिता’ का सम्मान

स्मृति-शेष
नेताजी की1 26वीं जन्मजयंती पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रणी क्रांतिवीर नेता सुभाष चन्द्र बोस की 126वीं जन्म जयंती है. समूचा देश नेता जी की इस जयंती को 'अगाध श्रद्धाभाव से मना रहा है. 'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र बोस का नाम भारतीय स्वतंत्रता because आंदोलन के इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखे जाने योग्य है. उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान,भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़ने के लिये 21अक्टूबर,1943 को 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया.इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था. इस संगठन का राष्ट्रीय गीत था-हरताली “क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा” जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे. उनके द्वारा दिया गया 'जय हिन्द' का नारा आज भी भारत का राष्ट्...
उत्कट देशानुरागी और दुर्धर्ष स्वतंत्रता-सेनानी!

उत्कट देशानुरागी और दुर्धर्ष स्वतंत्रता-सेनानी!

स्मृति-शेष
पराक्रम दिवस (23 जनवरी) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  आज देश-सेवा के नाम पर राजनीति में दम-ख़म आजमाने वाले हर तरह की सौदेबाजी करने पर उतारू हैं. उन्हें सत्ता चाहिए क्योंकि सत्ता से इस लोक में सब सधता दिखता है. अनेक जन सेवक हमाए बीच हैं जो जीवन में कभी बड़े कष्ट और संघर्ष के बीच जिए और एक साधारण जन की तरह कष्ट सहा पर सत्ता का स्वाद पाते ही काया-पलट होता गया और अब वे करोड़ों और शायद घोषित-अघोषित अरबों रूपयों के स्वामी बन बैठे हैं . लोकैषणा कब वितैषणा में परिवर्तित हो गई पता ही नहीं चला. उसके बाद समाज और जन की भावना सिमटती गई और परिवार ही सीमा बनता गया. शर्म हया छोड़ बेटा-बेटी, नाती-पोते, भाई-भतीजे, बंधु-बांधव, और जाति-बिरादर तक पहुँच कर उनका देश और समाज का दायरा सिमटता गया. इस भारत-भूमि में उत्तरोत्तर बड़े प्रयोजन के लिए छोटे प्रयोजन या हित का त्याग करने की व्यवस्था थी. कुल के लिए निजी सुख, ...
गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार रहेगी ‘देवभूमि उत्तराखंड’ की धूम

गणतंत्र दिवस की परेड में इस बार रहेगी ‘देवभूमि उत्तराखंड’ की धूम

देश—विदेश
हिमांतर ब्यूरो, नई दिल्लीरक्षा मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय रंगशाला शिविर, नई दिल्ली में गणतंत्र दिवस परेड में शामिल होने की तैयारियों के अवसर पर विभिन्न प्रदेशों एवं मंत्रालयों की झांकी के माध्यम से कलाकारों अपने-अपने राज्यों की सांस्कृतिक झलक पेश की. उत्तराखण्ड राज्य के कलाकारों द्वारा उत्तराखण्ड की पांरपरिक वेशभूषा में राष्ट्रीय रंगशाला में आकर्षक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया, जिसे उपस्थित लोगों द्वारा बहुत पसंद किया गया, साथ ही इन 12 राज्यों के कलाकारों द्वारा भी अपने-अपने प्रदेश की झांकी के साथ पांरपरिक वेशभूषा में प्रस्तुति दी गई। गणतंत्र दिवस समोराह में इस वर्ष 12 राज्यों की झांकी सम्मिलित की गई है।उल्लेखनीय है कि गणतंत्र दिवस परेड के लिए उत्तराखंड की झांकी में सूचना विभाग के संयुक्त निदेशक एवं नोडल अधिकारी के.एस.चौहान के नेतृत्व में उत्तराखंड राज्य से 16 कलाकार गणतंत...
कुमाऊं में आज भी संरक्षित है ‘उत्तरैंणी’ से ‘भारतराष्ट्र’ की पहचान

कुमाऊं में आज भी संरक्षित है ‘उत्तरैंणी’ से ‘भारतराष्ट्र’ की पहचान

लोक पर्व-त्योहार
उत्तरायणी पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीकुमाऊं उत्तराखण्ड में मकर संक्रान्ति का because पर्व 'उत्तरैंणी', ‘उत्तरायणी या ‘घुघुती त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। उत्तराखंड हिमालय का क्षेत्र अनादिकाल से धर्म इतिहास और संस्कृति का मूलस्रोत रहता आया है। ज्योतिष भारत मूलतः सूर्योपासकों का देश होने के because कारण यहां मकर संक्रान्ति या उत्तरायणी का पर्व विशेष उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है। मकर संक्रान्ति के माध्यम से भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति की झलक विविध रूपों में दिखाई देती है। ऐसी मान्यता है कि मकर संक्रान्ति के दिन भगवान् भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। चूँकि शनिदेव मकर राशि के स्वामी हैं‚अतः इस दिन को मकर संक्रान्ति के नाम से जाना जाता है। ज्योतिष महाभारतकाल में भीष्म पितामह ने because अपनी देह त्यागने के लिये उत्तरायण पक्ष में पड़ने वाले मकर संक्रान्...
बहुत-सी रंग-वालियों का देश है हिन्दुस्तान

बहुत-सी रंग-वालियों का देश है हिन्दुस्तान

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-24 कृष्ण-कटिकम: जब आप ‘गीत गोविंद’ का नृत्य करते हैं, तो कृष्ण को अपने आस-पास महसूस कर  सकते हैंमंजू कालानृत्य एक ऐसी विधा है जो मनुष्य के जन्म के बाद ही शुरू हो जाती है, या यूँ कह लीजिए की ये इन्सान के जन्म के साथ ही अभिव्यक्तियाँ देना आरम्भ कर देती है.  जब कोई बच्चा धरती पर जन्म लेता है तभी वह रोकर हाथ-पैर मारकर अपनी भावाव्यक्ति करता है. उसे भूख लगती है तो वह रुदन करता है, because और माँ समझ जाती है कि बच्चा भूखा है. इन्ही आंगिक-क्रियाओं से इस रसमय कला-नृत्य की उत्त्पत्ति हुई है. यह कला देवी-देवताओं, दैत्य-दानवों, मनुष्यों एवम पशु-पक्षियों तक को प्रिय है. हमारे हिन्दुस्तान में तो यह विधा ईश्वर प्राप्ति का साधन मानी गई है, यह बात हिन्दुस्तान का हर गृहस्थ जनता है कि जब समन्दर मंथन के पश्चात  दानवों को अमरत्व प्राप्त  होने का खतरा उत्त्पन हुआ, तब भगवान विष्णु...
हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी

हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी

साहित्‍य-संस्कृति
विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र  वाक् या वाणी की शक्ति किसी से भी छिपी नहीं है. ऋग्वेद के दसवें मंडल के वाक सूक्त में वाक् को राष्ट्र को धारण करने और समस्त सम्पदा देने वाले देव तत्व के रूप में चित्रित करते हुए बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा गया है : अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्. यह वाक की जीवन और सृष्टि में भूमिका को रेखांकित करने वाला प्राचीनतम भारतीय संकेत है. हम सब यह देखते हैं कि दैनंदिन जीवन के क्रम में हमारे अनुभव वाचिक कोड बन कर एक ओर स्मृति के हवाले होते रहते हैं तो दूसरी ओर स्मृतियाँ नए-नए सृजन के लिए खाद-पानी देती रहती हैं . अनुभव, भाषा, स्मृति और सृजन की यह अनोखी सह-यात्रा अनवरत चलती रहती है और उसके साथ ही हमारी दुनिया भी बदलती रहती है. यह हिंदी भाषा का सौभाग्य रहा है क़ि कई सदियों से वह कोटि-कोटि भारतवासियों की अभिव्यक्ति, संचार और सृजन के लिए एक प्रमुख...
 ‘जीवन जिससे पूर्ण सार्थक हो, वो मंजिल अभी दूर है’

 ‘जीवन जिससे पूर्ण सार्थक हो, वो मंजिल अभी दूर है’

पौड़ी गढ़वाल
प्रेरक व्यक्तित्व – डॉ. चरणसिंह 'केदारखंडी'डॉ. अरुण कुकसालमैं अचकचा गया हूं कि कहां पर बैठूं? कमरे के चारों ओर तो एक दिव्य और भव्य स्वरूप पहले ही से विराजमान है. मुझे सुखद आश्चर्य हुआ कि कमरे में करीने से because रखी पुस्तकें मेरे स्वागत में एक साथ मुस्करा दी हैं. मेरे हाथ श्रीअरविंद और श्रीमां के चित्रों की ओर स्वतः ही अभिवादन के लिए जुड़ गये हैं. मैं तुरंत सामने की किताब को सहला कर अपने को सहज करता हूं. हिन्दी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेजी की डिक्शनरियों की एक लम्बी कतार सामने के रैक पर सजी हैं. कमरे में दिख रही सभी किताबें धर्म के दायरे से बाहर निकलकर आध्यात्म का आवरण लिए हुये हैं.ज्योतिष पल भर पहले मैं असमजस में रहा कि पहले किताबों से बातें करूं या केदारखंडी जी से. पर पल में ही संशय मिटा कि इन किताबों का अंश केदारखण्डी जी में किसी न किसी रूप में है, तो फिर उन्हीं से बातें प...
अमृत पर्व कुम्भ: सनातन संस्कृति, परम्परा और ज्ञानामृत चेतना से पुनः संवाद….

अमृत पर्व कुम्भ: सनातन संस्कृति, परम्परा और ज्ञानामृत चेतना से पुनः संवाद….

पुस्तक-समीक्षा
डॉ. मोहन चंद तिवारीनववर्ष 2022 के अवसर पर, जब देश अपनी आजादी के 75वें अमृत महोत्सव की वर्षगांठ भी मना रहा है, यह बताते हुए अपार हर्ष हो रहा है कि इस नए वर्ष में मेरी because चिर प्रतीक्षित पुस्तक "अमृत पर्व कुम्भ: इतिहास और परम्परा" देश के लब्धप्रतिष्ठ प्रकाशन, ईस्टर्न बुक लिंकर्स, दिल्ली के माध्यम से सुधीजन पाठकों के करकमलों में शीघ्रातिशीघ्र पहुंचने वाली है. ज्योतिष हमारे देश के बुद्धिजीवियों और सन्त महात्माओं ने आदिकाल से चली आ रही  कुम्भ परम्परा को महज एक धार्मिक मेले की नजरिए से ही देखा है, जिसका आयोजन चार तीर्थ स्थानों पर तीन सालों के अंतराल पर किया जाता है. किन्तु इस कुम्भ अवधारणा के पीछे नदियों के संरक्षण, प्रकृति संरक्षण,  नदीमातृक संस्कृति और पर्यावरण चिंतन because और अखंड राष्ट्रीय एकता का जो विचार हजारों वर्षों से इस भारत देश को राष्ट्रीय अस्मिता के भाव से जोड़ रहा था उसे ...
नए साल का जन एजेंडा क्या कहता है

नए साल का जन एजेंडा क्या कहता है

साहित्‍य-संस्कृति
प्रो. गिरीश्वर मिश्र  नया ‘रमणीय’ अर्थात मनोरम कहा जाता है. नवीनता अस्तित्व में बदलाव को इंगित करती है और हर किसी के लिए आकर्षक होती है. अज्ञात और अदृष्ट को लेकर हर कोई ज्यादा ही उत्सुक और कदाचित भयभीत भी रहता है. यह आकर्षण तब अतिरिक्त महत्व अर्जित कर लेता है जब कोविड जैसी लम्बी खिंची महामारी के बीच सामान्य अनुभव में एकरसता और ठहराव आ चुका हो. पर काल-चक्र तो रुकता नही  और सारा वस्तु-जगत बदलाव की प्रक्रिया में रहता है. गतिशील दुनिया में द्रष्टा की दृष्टि और और सृष्टि  दोनों ही परिवर्तनशील हैं और परिवर्तन में  संभावनाओं  की गुंजाइश बनी रहती है. इसलिए नए का स्वागत किया जाता है. नए वर्ष की आहट सुनाई पड़ रही है. इस घड़ी में सबका स्वागत है. इस अवसर पर देश की स्थिति पर गौर करते हुए वे अधूरे काम भी याद आ रहे हैं जो देश और समाज के लिए अनिवार्य एजेंडा प्रस्तुत करते हैं. कोविड-19 महामारी के  के  घाव ...