Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
भारतीय काल गणना में ‘अधिमास’ की अवधारणा

भारतीय काल गणना में ‘अधिमास’ की अवधारणा

अध्यात्म
डॉ. मोहन चंद तिवारीइस वर्ष 18 सितंबर से 'अधिमास' प्रारंभ becauseहो चुका है,जो 16 अक्टूबर को समाप्त होगा.और 17 अक्टूबर से नवरात्र प्रारम्भ होंगे. यह 'अधिमास','अधिक मास', 'मलमास' और 'पुरुषोत्तम मास' आदि नामों से भी जाना जाता है. 'अधिमास' के कारण इस बार दो आश्विन मास पड़े हैं. साथ ही चतुर्मास भी पांच महीनों का हो गया है और नवरात्रि जो श्राद्ध पक्ष की समाप्ति के साथ ही शुरू हो जाती थी वह भी एक महीने पीछे खिसक गई है.घासी विदित हो कि भारतीय पंचांग के becauseअनुसार वर्त्तमान विक्रम संवत 2077 में मान्य 60 संवत्सरों में 47वां 'प्रमादी' नामक संवत्सर चल रहा है. 'संवत्सर' उसे कहते हैं जिसमें मास आदि भली भांति निवास करते रहें. इसका दूसरा अर्थ है बारह महीने का काल विशेष. इस नए संवत की खास विशेषता यह है कि इस बार दो आश्विन मास होने के कारण वर्ष बारह नहीं बल्कि तेरह महीनों का होगा और श्राद्ध और न...
घासी, रवीश कुमार, और लिट्टी-चौखा

घासी, रवीश कुमार, और लिट्टी-चौखा

साहित्यिक-हलचल
ललित फुलाराएक बार मैं घासी के साथ रिक्शे पर बैठकर जा रहा था. हम दोनों एक मुद्दे को लपकते और दूसरे को छोड़ते हुए बातचीत में मग्न थे. तभी पता नहीं उसे क्या हुआ? नाक की तरफ आती हुई becauseअपनी भेंगी आंख से मेरी ओर देखते हुए बोला 'गुरुजी कॉलेज भी खत्म होने वाला है.. जेब पाई-पाई को मोहताज है.. खर्च बढ़ता जा रहा है.. घर वालों की रेल बनी हुई है.. नौकरी की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं दिख रही. भविष्य का क्या होगा पता नहीं!'घासीचेले के भविष्य की जरा-सी भी चिंता नहीं है आपको. जब देखों चर्चाओं का रस लेते रहते हो.' उसके मुंह से यह बात सुनकर मुझे बेहद शर्मिंदगी हुई. रिक्शे में एक butऔर व्यक्ति बैठे थे. जब हम तीनों एक साथ उतरे उन्होंने घासी से कुछ कहना चाहा पर उसने उनको अनदेखा कर दिया. मेरे हाथ से बटुआ लिया.. तीस रुपये निकालकर रिक्शे वाले को थमाए और आगे बढ़ गया.घासी उसकी बात एकदम सही थी....
वो “सल्डी सुंगनाथ” और देवीदत्त मासीवाल का फ़ोटो स्टूडियो

वो “सल्डी सुंगनाथ” और देवीदत्त मासीवाल का फ़ोटो स्टूडियो

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—52प्रकाश उप्रेतीतब कैमरे का फ्लैश चमकना भी चमत्कार लगता था. कैमरा देख लेना ही चाक्षुष तृप्ति का चरम था. देखने के लिए हम सभी बच्चों की भीड़ इकट्ठा हो जाया करती थी और कैमरे को लेकर हम becauseअपना गूढ़ ज्ञान आपस में साझा करते थे. हम सबकी बातों में यह बात कॉमन होती कि- "हां यार कैमरा गोर कदयूं" (कैमरा गोरा कर देता है). इसके बाद जिसमें फेंकने का जितना सामर्थ्य होता वह उतनी बातें बनाता था. जबकि कैमरा हम सब ने दूर से ही देखा होता था.कैमरा गाँव में तब फ़ोटो खिंचाने के कुछ ही मौके होते थे. so उनमें से एक गाँव की 'दीदियों' (बहनों) द्वारा शादी के लिए फोटो खिंचवाने का होता था. एकदम चटक रंग के सूट में फ़ोटो खिंचवाया जाता था जिसमें अक्सर पीछे का बैकग्राउंड हरा, नीला और आसमानी होता था. फ़ोटो एकदम सावधान की मुद्रा में खिंचवाया जाता था. उसमें कोई भाव या पोज़ नहीं...
ऑक्सफोर्ड, हिन्दी और इमरै बंघा

ऑक्सफोर्ड, हिन्दी और इमरै बंघा

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-13डॉ. विजया सतीबुदापैश्त में हिन्दी पढ़ने वाले विद्यार्थियों का because अध्ययन ब्रजभाषा काव्य पढ़े बिना पूरा नहीं होता और इस भाषा के विशेषज्ञ के रूप में वहां निमंत्रित होते हैं डॉ इमरै बंघा.बुदापैश्त डॉ बंघा बुदापैश्त में इंडोलोजी के छात्र रहे but और विश्वभारती, शान्तिनिकेतन में शोधार्थी. वर्तमान में वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के ओरिएंटल इन्सटीट्यूट में एसोसिएट प्रोफ़ेसर हैं, जहां वे हिन्दी, उर्दू और बँगला पाठ पढ़ाते हैं.बुदापैश्तभारतीय साहित्य पर कई पुस्तकों और आलेखों के रचयिता डॉ बंघा का लेखन अंग्रेजी, हिंदी और हंगेरियन में प्रकाशित है. उनका मुख्य काम ब्रजभाषा पर है – ‘सनेह को मारग - so आनंदघन का जीवन वृत्त’ – उनकी इस पुस्तक का प्रकाशन भारत में हुआ.बुदापैश्त हिन्दी की मध्यकालीन कविता, because विशेष रूप से तुलसीदास में अभिरुचि रखने वाले डॉ इमरै बं...
स्कूली शिक्षा की वैकल्पिक राहें

स्कूली शिक्षा की वैकल्पिक राहें

शिक्षा
गांधी जी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए अंग्रेजों को उत्तरदायी ठहराया था...प्रो. गिरीश्वर मिश्रस्कूली शिक्षा सभ्य बनाने के लिए एक अनिवार्य व्यवस्था बन चुकी है. शिक्षा का अधिकार संविधान का अंश बन चुका है. भारत में स्कूलों पर प्रवेश के लिए बड़ा दबाव है और अभी करोड़ों बच्चे because स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और जो स्कूल जा रहे हैं उनमें से काफी बड़ी संख्या में बीच में ही स्कूल की पढाई छोड़ दे रहे हैं. यानी शिक्षा के सार्वभौमीकरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है. दूसरी तरफ स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता को ले कर भी सवाल खड़े होते रहे हैं. सभी बच्चों को उनकी रुचि, क्षमता और स्थानीय सांस्कृतिक प्रासंगिकता आदि को दर किनार रख सभी को एक ही ढाँचे में एक ही तरह के सांचे में ढाल कर शिक्षा की व्यवस्था की जाती है.स्कूली शिक्षागांधी जी ने शिक्षा के सुन्दर वृक्ष के समूल विनाश के लिए ...
“वराहमिहिर के अनुसार भूमिगत शिलाओं से जलान्वेषण”

“वराहमिहिर के अनुसार भूमिगत शिलाओं से जलान्वेषण”

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-18डॉ. मोहन चंद तिवारीआधुनिक भूविज्ञान के अनुसार भूमि के उदर में ऐसी बड़ी बड़ी चट्टानें होती हैं जहां सुस्वादु जल के सरोवर बने होते हैं. केंद्रीय भूजल बोर्ड के आंकड़ों के अनुसार भारतीय प्रायद्वीप का लगभग because 70 प्रतिशत हिस्सा जिन ‘कड़ी चट्टानों’ (Aquifers) से बना है उन चट्टानों के नीचे पानी का विशाल भंडार मौजूद है जिसमें से सालाना 4.23 क.हे.मी. पानी काम में लाया जा सकता है जबकि आज केवल 1 क.हे.मी. ही काम आ रहा है. वराहमिहिर की बृहत्संहिता में इन्हीं भूमिगत जल के खजानों को खोजने के अनेक उपाय बताए गए हैं..बांबी (12मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी’, so हरिद्वार द्वारा ‘आई आई टी’ रुडकी में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों और जलविज्ञान के अनुसंधानकर्ता विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य ‘प्राचीन भारत में जलविज्ञान‚ जलसंरक्षण और जलप्रबंधन’ से स...
उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी एवं राज संत हरिदत्त काण्डपाल

उत्तराखंड के स्वतंत्रता सेनानी एवं राज संत हरिदत्त काण्डपाल

स्मृति-शेष
पुण्यतिथि (24 सितम्बर) पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारीआज 24 सितम्बर उत्तराखंड के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और राज संत श्री हरिदत्त काण्डपाल जी की पुण्यतिथि है. स्व. हरि दत्त कांडपाल ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पूरे पाली पछाऊं क्षेत्र में आजादी के becauseआंदोलन की अलख जलाई.आंदोलन के दौरान उन्होंने अंग्रेज हुक्मरानों की नाक में दम कर दिया था,जिसकी वजह से उन्हें कई बार कठोर कारावास हुई.आजादी के बाद स्व. हरिदत्त कांडपाल 1957 से 1974 तक लगातार द्वाराहाट क्षेत्र के विधायक रहे. यूपी शासनकाल में वह वनमंत्री भी थे.जागरी गौरतलब है कि अंग्रेजी हुकुमत के दौरान गांधी जी के आह्वान पर उत्तराखंड में स्वराज प्राप्ति के लिए स्वतंत्रता सेनानियों के जन आंदोलन के रूप में सल्ट क्रांति और सन 1942 में समूचे देश में 'भारत छोड़ो' आंदोलन का जो बिगुल बजा,उसमें पाली पछाऊं व द्वाराहाट- soरानीखेत क्षेत...