मुनिया चौरा की कपमार्क ओखली उत्तराखंड के आद्य इतिहास का साक्ष्य

  • डॉ. मोहन चंद तिवारी

एक वर्ष पूर्व दिनांक 11अक्टूबर, 2019 को जालली-मासी मोटरमार्ग पर स्थित सुरेग्वेल से एक कि.मी.दूर मुनियाचौरा गांव में मेरे द्वारा खोजी गई कपमार्क ओखली मेरी because नवरात्र शोधयात्रा की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है. महापाषाण काल की यह  कपमार्क मेगलिथिक ओखली उत्तराखंड के पाली पछाऊं क्षेत्र के सांस्कृतिक इतिहास को उजागर करने वाली एक महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक अवशेष भी है.

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इस ओखली के मिलने का घटनाक्रम भी बहुत रोचक है. राष्ट्रीय इतिहास लेखन की चिंताओं को लेकर नवरात्र यात्रा because के दौरान मैंने जब दिनांक 11 अक्टूबर, 2019 को कपमार्क ओखलियों का सर्वेक्षण करने के लिए ‘मुनिया की धार’ जाने का मन बनाया और वहां सुरेग्वेल जाकर मैंने अनेक स्थानीय लोगों से ओखलियों के रास्ते के बारे में पूछा तो उन्हें कोई ओखली की जानकारी नहीं थी. मैं फिर भी अपनी पुरानी स्मृतियों के सहारे अकेला ओखलियों के पास तक पहुंच तो गया. मगर निराशा ही हाथ लगी क्योंकि because यह स्थान अब बीहड़ जंगल में तब्दील हो चुका था. वैसे भी एक पांव चोटिल होने की वजह से उस खड़ी चढ़ाई में विद्यमान मुनिया धार की पुरातन ओखलियों तक पहुंचना मेरे लिए असम्भव ही था.

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हालांकि सन् 1990 के दौरान उत्तराखंड के प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद डॉ. यशोधर मठपाल ने जोयूं की ग्यारह और बाईस ओखलियों के साथ साथ मुनियाधार की इन ओखलियों की खोज कर ली थी. because उसके बाद लगभग बीस वर्ष पूर्व स्वयं मैंने भी इस मुनिया धार की ओखलियों का पुरातात्त्विक सर्वेक्षण किया था, किन्तु उस समय के चित्र मेरे पास अब संरक्षित नहीं रहे. इसलिए मैं इन ओखलियों के ताजा चित्र लेना चाहता था, किन्तु मार्ग जटिल होने के कारण मुझे निराशा ही हाथ लगी और मैं इन दुर्गम खड़ी पहाड़ी में विद्यमान उन पुरानी ओखलियों तक नहीं पहुंच सका.

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पर मेरी इसी शोधयात्रा के दौरान दैवयोग से मुनिया चौरा के मार्ग के किनारे में पड़ी हुई अचानक एक नई मेगलिथिक ओखली के दर्शन हुए तो मैं आश्चर्य चकित हो गया. वहीं मुनिया चौरा गांव के निवासी श्रीबचीराम छिमवाल जी ने मुझे इस ओखली के बारे में जानकारी देते हुए बताया कि यह ओखली पारम्परिक रूप से पांडवों द्वारा because बनाई गई ओखली मानी जाती है,जो ऊपर मुनिया की ढाई (पहाड़ के शिखर) से नीचे की ओर लाई गई है. इस ओखली को यहां किस प्रयोजन से लाया गया होगा,उसकी जानकारी यहां के स्थानीय लोगों को नहीं है. छिमवाल जी ने बताया कि वे बुजुर्गों के मुख से सुनते आए हैं कि उनके पूर्वज रामनगर के निकट बसे ढिकुली ग्राम से आकर यहां मुनिया चौरा ग्राम में बसे हैं. किन्तु यह ओखली उससे भी बहुत पुरानी है,जिसका प्राचीन इतिहास आज तक किसी को नहीं मालूम.

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कपमार्क मेगलिथिक अवशेषों के शोधकर्त्ता विद्वानों के लिए यह नवोद्घाटित ओखली का पुरातात्त्विक अवशेष उत्तराखंड के आद्य  इतिहास की कड़ियों को जोड़ने वाला एक because महत्त्वपूर्ण साक्ष्य सिद्ध हो सकता है. परन्तु झाड़ियों के बीच गुमनामी की हालातों में पड़ी यह ओखली अब तक इतिहास और पुरातत्त्व के विद्वानों के लिए अज्ञात ही बनी हुई थी.

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मैंने झाड़-झंकर में पड़ी उस पुरातात्त्विक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण ओखली को साफ करके उसका भली भांति निरीक्षण किया. सलेटी रंग के ठोस आयताकार पाषाण खंड में अत्यंत कलात्मक because शैली में उकेरी गई यह कपमार्क ओखली आकार और बनावट की दृष्टि से डेढ़ फिट लंबी, सवा फिट चौड़ी और एक फिट गहरी मेगलिथिक श्रेणी की महाश्मकालीन ओखली के अंतर्गत आती है, जिसकी प्राचीनता का कालखंड तीन-चार हजार सहस्राब्दी ईस्वी पूर्व तक निर्धारित किया जा सकता है.

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कपमार्क मेगलिथिक अवशेषों के because शोधकर्त्ता विद्वानों के लिए यह नवोद्घाटित ओखली का पुरातात्त्विक अवशेष उत्तराखंड के आद्य  इतिहास की कड़ियों को जोड़ने वाला एक महत्त्वपूर्ण साक्ष्य सिद्ध हो सकता है. परन्तु झाड़ियों के बीच गुमनामी की हालातों में पड़ी यह ओखली अब तक इतिहास और पुरातत्त्व के विद्वानों के लिए अज्ञात ही बनी हुई थी.यहां तक कि मुनिया चौरा ग्राम के निवासी भी उस ओखली के रहस्य को नहीं जानते थे.

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मुनिया चौरा से लगभग एक-डेढ़ कि.मी.की दूरी पर स्थित जोयूं ग्राम की ऐसी ही ग्यारह और बाइस ओखलियां भी इसी शैली में तराशी गई बहुत पुरानी महाश्मकालीन ओखलियां हैं. उत्तराखंड के प्रसिद्ध पुरातत्त्वविद व इतिहासकार डॉ.यशोधर मठपाल ने 1996 में प्रकाशित because ‘द रॉक आर्ट ऑफ कुमाऊं हिमालय’ नामक अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त अपनी शोध पुस्तक में जोयूं की इन ग्यारह और बाइस ओखलियों के अलावा सुरेग्वेल स्थित मुनिया की ढाई में स्थित ओखलियों के भी पुरातात्त्विक महत्त्व को सर्वप्रथम उजागर किया था. किंतु वर्त्तमान में मुनिया चौरा की यह नई अन्वेषित ओखली ढाई के नीचे ग्राम के बीच में अवस्थित ओखली है जो अब तक डॉ.यशोधर मठपाल,के संज्ञान में भी नहीं आ सकी थी.

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संयोगवश मेरे द्वारा किए गए इस स्थान के पुरातात्त्विक सर्वेक्षण के दौरान अकस्मात इस ओखली के मिलने से यह प्रमाणित हो जाता है कि आद्य इतिहास काल में मुनिया चौरा की इन because ओखलियों का प्रयोग धार्मिक प्रयोजनों के अतिरिक्त वैदिक कालीन कृषि सभ्यता के किसानों द्वारा अनाज कूटने, तेल निकालने,यज्ञ के अवसर पर चावलों को कूटकर पुरोडाश बनाने आदि धार्मिक प्रयोजनों के लिए भी किया जाता रहा होगा.

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उत्तराखंड स्थित जालली घाटी के इतिहास के सन्दर्भ में मेगलिथिक कप-मार्क्स ओखलियों के जो अवशेष अब तक पुरातत्त्वविदों को पश्चिमी रामगंगा घाटी में स्थित नौला गाँव के देवीमंदिर परिसर और अल्मोड़ा के नौगांव,जोयूं तथा मुनिया की ढाई आदि विभिन्न स्थानों में मिले हैं,यह मुनिया चौरा गांव की नवोद्घाटित कपमार्क ओखली भी because उसी मेगलिथिक कल्चर से जुड़ी पुरातात्त्विक श्रेणी के अंतर्गत आती है.

वैदिक कालीन आर्यों के इतिहास की दृष्टि से अब साहित्यिक और पुरातात्त्विक दोनों प्रकार के साक्ष्यों से पूरी तरह यह सच सामने आ चुका है कि वैदिक आर्यों का आदि निवास because स्थान उत्तराखंड की यही देवभूमि हिमालय थी.इसी उत्तराखंड हिमालय की गिरि कंदराओं में वैदिक ऋषि मुनियों ने वैदिक मंत्रों का साक्षात्कार किया था और पर्यावरण की शांति हेतु तरह तरह के यज्ञानुष्ठान भी इन ओखलियों के माध्यम से किए जाते थे.

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ऋग्वेद, अथर्ववेद तथा ब्राह्मण ग्रन्थों में स्पष्ट रूप से ऊखल मूसल से सम्बंधित अनेक मंत्र मिलते हैं और उत्तराखंड के अनेक स्थानों में मिलने वाली ये कपमार्क ओखलियां उन्हीं का because पुरातात्त्विक प्रमाण हैं. किंतु विडम्बना यह है कि हमारे देश के इतिहासकार चाहे वे उपनिवेशवादी हों या फिर राष्ट्रवादी, ब्रिटिश साम्राज्यवादी इतिहासकारों व्हीलर, वेबर आदि द्वारा आर्यों को विदेशी मूल का सिद्ध करने की भ्रांत मान्यताओं का सप्रमाण खंडन करने की दिशा में सदा उदासीन ही रहे हैं.

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राष्ट्रवादी इतिहासकारों और राज्य सरकारों द्वारा आज तक भारत के राष्ट्रीय इतिहास लेखन की दिशा में ऐसा कोई ठोस कार्य नहीं किया गया कि वे जन सामान्य को भारतीय because आर्यों के इतिहास की सही सही तथ्यात्मक जानकारी दे सकें. जैसा कि आज भी इतिहास के ग्रन्थों में छात्रों को पढ़ाया जाता है,उस सन्दर्भ में जिज्ञासा उठना भी स्वाभाविक है कि यदि आर्य विदेशीमूल के नहीं थे तो कौन थे?

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राष्ट्रवादी इतिहासकारों और राज्य सरकारों द्वारा आज तक भारत के राष्ट्रीय इतिहास लेखन की दिशा में ऐसा कोई ठोस कार्य नहीं किया गया कि वे जन सामान्य को भारतीय because आर्यों के इतिहास की सही सही तथ्यात्मक जानकारी दे सकें. जैसा कि आज भी इतिहास के ग्रन्थों में छात्रों को पढ़ाया जाता है,उस सन्दर्भ में जिज्ञासा उठना भी स्वाभाविक है कि यदि आर्य विदेशीमूल के नहीं थे तो कौन थे? उनका आदि निवास किस because प्रदेश में था? और उनका अस्तित्व काल के समयसीमा की न्यूनतम तिथि क्या रही होगी? आज इतिहास के छात्र अपने देश के इतिहासकारों और पुरातत्त्ववेत्ताओं से इन जटिल सवालों का सप्रमाण उत्तर चाहते हैं.

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मैं राष्ट्रीय महत्त्व के इन सवालों के उत्तर तलाशने के लिए पिछले दो तीन दशकों से अपनी मातृभूमि के दुर्गम स्थलों की धूल फांकता आया हूं. यहां लाठी के सहारे अकेला पदयात्रा because करते हुए गुमनामी और उपेक्षा का दंश झेल रहे उन पुराने पत्थरों, टूटे और खंडित मूर्तियों, देवालयों के जीर्ण शीर्ण अवशेषों की खोज खबर करने हेतु प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्र पर उनके हाल चाल जानता और लिखता आया हूं.हालांकि मेरी because कर्मभूमि दिल्ली है,जहां मैं अध्यापन और शोधकार्य करता हूं,किन्तु पिछले पचास वर्षों से नियमित रूप से आश्विन नवरात्र पर अपने गांव आकर दस पंद्रह दिन इस क्षेत्र के आसपास पुरातात्त्विक, ऐतिहासिक और पौराणिक इतिहास से धार्मिक और सांस्कृतिक अवशेषों के बारे में जानकारी जुटाना जन्मभूमि के प्रति अपना राष्ट्रीय दायित्व भी मानता हूँ.

हम यदि अपनी जन्मभूमि को मातृभूमि मानते हैं तो इसके लिए हमें अपनी मातृभूमि के धूलिकणों को माथे से लगाकर यह अनुभूति भी करनी होगी कि इस माटी में आज कितनी because सुगन्ध बची है? हमें इस ओर भी जागरूक होना होगा कि जहां हमारे पूर्वज रहते थे और जिस देवभूमि को उन्होंने वेदमन्त्रों के उच्चारण और यज्ञानुष्ठान से पवित्र किया था,उस मातृभूमि के कितने भाग को हम आज जान पाए हैं?और कितने because स्थानों को अब तक हमने वहां प्लास्टिक का कचरा बिखेर कर प्रदूषित कर दिया है? उत्तराखंड बनने के बाद इसके इतिहास लिखने और उसके पुरातात्त्विक अवशेषों को सहेजने की चिंता के प्रति सरकार और जनमानस उदासीन ही रहा है.

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ज्ञात हो कि पिछली दो-तीन शताब्दियों के दौरान पाश्चात्य विद्वानों के द्वारा उत्तराखंड में कपमार्क ओखलियों का इतिहास संरक्षित करने की परंपरा शुरू की गई थी.उसके बाद डॉ.यशोधर because मठपाल,डॉ.एम.पी.जोशी, डॉ.यशवंत कठौच आदि अनेक उत्तराखंड के विद्वानों ने भी पुरातन इतिहास से जुड़े ओखलियों के खोजबीन की इस परम्परा को आगे बढ़ाया, जिसके परिणामस्वरूप उत्तराखंड ही नहीं समूचे because भारत के प्राचीन आद्य इतिहास से जुड़े नए पुरातात्त्विक साक्ष्य उजागर होने लगे. माना जाता है कि है कि कपमार्क ओखलियों के रूप में विद्यमान ये महा पाषाणकालीन अवशेष उत्तराखंड में आद्य इतिहास काल और वैदिक काल के ‘मेगलिथिक कल्चर’ की पुष्टि करते हैं और वैदिक काल की पांच छह हजार वर्ष से भी प्राचीन कृषिकालीन सभ्यता के साथ इन ओखलियों का सम्बंध स्थापित होता है.

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वर्त्तमान नवोद्घाटित मुनिया चौरा की इस बृहदाकार नवीन ओखली से यह  स्पष्ट हो जाता है कि इन ओखलियों का प्रयोग वहां के ग्रामीण जनों द्वारा अनाज आदि कूटने because पीसने के अलावा यज्ञानुष्ठान, पितृपूजा आदि धार्मिक अनुष्ठानों की दृष्टि से भी इन ओखलियों का प्रयोग किया जाता रहा होगा क्योंकि वैदिक साहित्य में ऐसे अनेक सूक्त हैं जिनमें उलूखल और मूसल की देवता भाव से पूजा करने का उल्लेख मिलता है.

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प्रायः कपमार्क ओखलियों के अवशेष पुरातत्त्वविदों को बीहड़ जंगलों में मिले हैं या शक्ति और शिव के मंदिरों के आस-पास इनकी अवस्थिति देखी गई है. किंतु जालली घाटी के because निकट बसे जोयूं ग्राम और मुनिया चौरा से मिली ओखलियां खासकर उन स्थानों में प्राप्त होती हैं जहां धान के सेरे (खेत) विद्यमान थे और उनके निकट वहां खेतिहर किसानों की आवासीय बस्तियां भी थीं. इससे यह अनुमान लगाना भी सहज है कि उन पुरातन स्थानों में बसे मातृदेवी के उपासक धान उत्पादक वैदिक आर्यों की धार्मिक गतिविधियों से इन ओखलियों का घनिष्ठ सम्बंध रहा होगा.जालली घाटी, सुरेग्वेल, दाणुथान आदि स्थानों से मिलने वाले बहुत संख्या के शवागारों के मिलने से भी यह ज्ञात होता है कि यहां खेती करने वाले आर्य किसानों की आवासीय बस्तियां थीं,जो ओखलियों की पूजा किया करती थी.

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प्रायः यह देखने में भी आया है कि because इन ओखलियों का महा पाषाणकालीन शवागारों के साथ भी विशेष सम्बन्ध रहा है. द्वाराहाट स्थित चन्द्रेश्वर की कपमार्क ओखलियां हों या पश्चिमी रामगंगा घाटी के नौला गांव से मिलने वाली ओखलियां,सबके सब महा पाषाणकालीन शवागारों के साथ भी घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध रहे हैं.

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वर्त्तमान नवोद्घाटित मुनिया चौरा की इस बृहदाकार नवीन ओखली से यह  स्पष्ट हो जाता है कि इन ओखलियों because का प्रयोग वहां के ग्रामीण जनों द्वारा अनाज आदि कूटने पीसने के अलावा यज्ञानुष्ठान, पितृपूजा आदि धार्मिक अनुष्ठानों की दृष्टि से भी इन ओखलियों का प्रयोग किया जाता रहा होगा क्योंकि वैदिक साहित्य में ऐसे अनेक सूक्त हैं जिनमें उलूखल और मूसल की देवता भाव से पूजा करने का उल्लेख मिलता है. इस पर मैंने एक स्वतंत्र शोधपत्र भी लिखा है.

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पुरातन काल में जालली घाटी और सुरेग्वेल का यह सम्पूर्ण क्षेत्र धान उत्पादक वैदिक आर्य किसानों का आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्त्व की दृष्टि से अत्यंत समृद्ध क्षेत्र रहा था और आज जहां पर सूरेग्वेल का मन्दिर विद्यमान है वहां पुरातन काल से लेकर कत्यूरी राजाओं के राज्य काल पर्यन्त अनेक धार्मिक मंदिरों और यात्री धर्मशाला के रूप because में मन्याओं का निर्माण भी किया गया था. यद्यपि ये ‘मन्या’ नाम की यात्री धर्मशालाएं आज नष्ट हो गई हैं किंतु द्वाराहाट का मन्या या मनदेव मंदिर समूह इनके ऐतिहासिक अस्तित्व की पुष्टि करता है. वर्त्तमान में ‘मनिया चौरा’ नाम भी, जहां से यह because ओखली मिली है,यह बताता है कि कत्यूरी राजाओं के काल में इस स्थान पर अनेक मन्याओं का निर्माण किया गया था इसीलिए इस स्थान को ‘मनिया चौरा’ नाम से जाना जाता है. यह स्थान पाली पछाऊं क्षेत्र की  राजनैतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र स्थान रहा था.

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किन्तु विडम्बना यह भी है कि पुरातत्त्ववेत्ता समूचे उत्तराखंड में कुछ खास स्थानों पर मिलने वाली ओखलियों या पुरातात्त्विक अवशेषों के बारे में ही चर्चा करते हैं. किंतु पाली पछाऊं के जालली, द्वाराहाट, चौखुटिया,मासी,भिकियासेंण आदि दुर्गम स्थानों में लावारिश पड़ी अनेक कपमार्क ओखलियों,खेतों और मंदिरों के आसपास पाए जाने वाले because शवागारों का हमारे पुरातत्त्वविदों ने कभी संज्ञान ही नहीं लिया और न ही इन प्रागैतिहासिक आद्य ऐतिहासिक और पौराणिक धरोहरों की व्याख्या करने में राज्य प्रशासन ने कभी रुचि प्रकट की.आज राष्ट्रीय धरातल पर इन कपमार्क ओखलियों के साक्ष्यों के आधार पर उत्तराखंड के विभिन्न कालखण्डों के इतिहास को एकसूत्र में संयोजित करने की आवश्यकता है.

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मैं बहुत उत्साहित था कि ‘दैनिक जागरण’, because ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक भास्कर’ के उत्तराखंड संस्करणों में मुनिया चौरा की इस नवोद्घाटित ओखली का समाचार चित्र सहित सुर्खियों में प्रकाशित हुआ था. उत्तराखंड के ईटीवी ने भी मेरी इस ओखली की खोज का प्रसारण किया. उत्तराखंड राज्य का पुरातत्त्व विभाग भले ही इस देवभूमि के प्राचीन धरोहरों के प्रति उदासीन रहा हो किन्तु हमारे उत्तराखंड के क्षेत्रीय मीडिया जगत् के संवाददाता आज भी क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों के प्रति अति गम्भीर और जागरूक रहे हैं.

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अन्त में इस लेख के माध्यम से मैं because आज मुनिया चौरा की एक वर्ष पुरानी नवोद्घाटित ओखली की जानकारी उत्तराखंड संस्कृति के अध्येताओं के साथ शेयर करना चाहता हूं ताकि लोग जान सकें कि हमारे क्षेत्र की ये उपेक्षित ओखलियां और पुरातात्त्विक अवशेष न केवल हमारी हिमालयी संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं,अपितु राष्ट्रीय सन्दर्भ में उत्तराखंड की इतिहास और संस्कृति के भी महत्त्वपूर्ण साक्ष्य हैं, जिनका संरक्षण और संवर्धन हमारा राष्ट्रीय दायित्व है.

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(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, 1986 में विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्रपत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित.)

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