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हिमालय के सावनी गीत…

मंजू काला मूलतः उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से ताल्लुक रखती हैं. इनका बचपन प्रकृति के आंगन में गुजरा. पिता और पति दोनों महकमा-ए-जंगलात से जुड़े होने के कारण, पेड़—पौधों, पशु—पक्षियों में आपकी गहन रूची है. आप हिंदी एवं अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लेखन करती हैं. आप ओडिसी की नृतयांगना होने के साथ रेडियो-टेलीविजन की वार्ताकार भी हैं. लोकगंगा पत्रिका की संयुक्त संपादक होने के साथ—साथ आप फूड ब्लागर, बर्ड लोरर, टी-टेलर, बच्चों की स्टोरी टेलर, ट्रेकर भी हैं.  नेचर फोटोग्राफी में आपकी खासी दिलचस्‍पी और उस दायित्व को बखूबी निभा रही हैं. आपका लेखन मुख्‍यत: भारत की संस्कृति, कला, खान-पान, लोकगाथाओं, रिति-रिवाजों पर केंद्रित है. इनकी लेखक की विभिन्न विधाओं को हम हिमांतर के माध्यम से मंजू दिल से… नामक एक पूरी सीरिज अपने पाठकों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं. पेश है मंजू दिल से… की 24वीं किस्त…


मंजू दिल से… भाग-24

  • मंजू काला

रिंगालो को बाड़ो,
डाँडयूँ माँ कुयेडु़ लौंखी
सुबा होईगे  माडू़
अर!
छाँछु छौली रौडी
फूलों दग्डयौं जाणु छौ
कुयेड़ी दगडी औलु…

अर्थात- फूलों के साथ जा रहा हूँ
बादलों के साथ लौट आऊंगा…!!

सावन भादों में जिस प्रकार  हमारे देश में अन्यत्र झूले पड़ते हैं और हिंडोले के गीत गाए जाते हैं उस प्रकार की परम्परा मेरे प्यारे हिमालय में नहीं है किन्तु धानी चूनर वाली प्रकृति में एक नई प्राण चेतना की हरितिमा भर जाने का उल्लास और अपने अभाव का विषाद वहां के लोकगीतों मे भी मुखर हुआ मिलता है. वर्षा ऋतु में जब हिमाच्छादित वन-पर्वतों पर बर्फ पिघलने लगती है, तो उनमें अपूर्व उल्लास और हरित सौंदर्य का संभार दिखाई देने लगता है. पर्वतों की अधित्यकाओं और निचली उपत्यकाओं मे फैले खेतों की उस हरियाली को देखकर आदिम मानव का हृदय गीत और नृत्य के स्वरों में कभी उछल पड़ा होगा. छुड़े गीतों में वर्षा ऋतु के बाद बुग्यालों में फूले असंख्य फूलों के बीच जीवन बिताने वाले चरवाहे के भाग्य की सराहना की गई है, जिसकी दृष्टि धरती पर नहीं पड़ती और जो फूलों का ही बिछौना बिछाता है और फूलों का ही ओढना ओढता है.

यूँ तो गढ़वाली गीतों में वर्षा से निखरी प्राकृतिक सुषमा का अधिक उल्लेख नहीं मिलता और अभाव पूर्ण जीवन में ऐसी दृष्टि की आशा करना उचित भी नहीं होगा. गढ़वाली गीतों में जिस प्रकार बसन्त स्त्रियों के लिए मायके की स्मृति लेकर आता है, उसी प्रकार बरखा ऋतु वियोग को उदीप्त करती है. प्रकृति मे सावन अवशय आता है, किंतु जब मानव अपने जीवन में सावन की हरियाली नहीं पाता तब उसके मन की पीड़ाएं ही बादलों के माध्यम से उभर आती हैं. आजीविका के लिए पतियों के दीर्घ कालिन प्रवास के कारण गढ़वाली नारी के लिए जैसे-भादों की हरियाली का अर्थ ही बदल जाता है. उसके लिए तो बादल उसके हृदय पर उमड़ते हैं, बिजली उसके हृदय पर कड़कती है.

कहती है-

“मेरी जिकुड़ी मा ब्वे कुयेडी़ सी लौंखी,
बिजुली सी चौंकी”

फिर सावन-भादों का हरा-भरा सौंदर्य, मोरों का उल्लास..चरवाहों का उन्माद… बंसी स्वर, कोयल की कूक…, चरती भैंसों की टन-टन करती घंटियाँ और नदी नालों का उछलता पानी जैसे सब कुछ एक ही पीड़ा के रंग में रंग जाता है और उदास होकर गाने लगती है-

“डांडू कुरेडु़ लौंखी स्वामी जी,
ह्वै गे अंध्याघोर;
सौण को मैना ऐग्यो पति जी, धौली भरेगी जोर
धरती हरी हव्गे पति जी, हवैग्यों आदा!

भै-बैणों की खुद कम पति जी, खूद तुम्हारी जादा
मेरु दिल गोट्यूँ च पति जी, छौं तुम्हारी रामी,
डांड्यूँ देखी  रौई आँदी पति जी, मैन आँख्यौं माँ थामी”

अर्थात- हे स्वामी, पर्वतों पर बादल घुमड़ आये हैं, अंधकार छा गया!
सावन का मास आ गया है, धवली नदी पानी से पुरजोर भर गई है।
धरती हरी-भरी हो गई है, पर मैं तो आधी रह हूँ
मुझे भाई-बहन कम याद आते हैं, पर तुम्हारी याद ज्यादा आती है।
तुम्हारे लिए मैने मन को रोक रखा है, मै तुम्हारी रामी हूँ।

पर्वत-शिखरों को देखकर मुझे रोना आता है पर मैं उसे थामे रखती हूं…! और फिर बादल को बिसुरते हुए कोसती है-

“रूम-झूम बरखा मैना लग्युं च सोण कु!
नाना-नाना भूलों की खूद लगीं च
उनी मेरा स्वामी परदेश गैन
उनी कालु..कुयेडी़ बौडिक आई!”

कि…

रिम-झिम बरखा लगी है, सावन का महीना आया!
मुझे अपने छोटे-छोटे भाईयों की याद आती है
एक और मेरे स्वामी परदेश गए हैं
दूसरी ओर ये  काले बादल यहाँ चले आए!
और.. देखए…न..!!

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“छाँछु छौली रौडी
फूलों दगडी जाणुं छौं
कुयेडी़ दगड़ औलु बौड़ी”

इस प्रकार सावन-भादौं के इन गीतों  मे उस प्रिय के प्रति तीव्र पीड़ा, उलाहना, तथा सहानुभूति की भावना मिलती है. जिसने कभी बसन्त के खिलते फूलों के सामने बादल के साथ लौटने का वादा किया था, वो तो भूल गया, शायद पुरुष की प्रकृति ही भूलने की हो, वह विरहिणी तो उस बांसुरी वाले चरवाहे के इंतजार में बुग्याल में ही बैठी रही और खुद भी फुल बन गई या प्रिय के विरह में उसके हृदय की उमड़ती-घूमड़ती पीड़ा ही जैसे बादल बन गई हो!

मैनो आयो सोंण कु
डाँडयूँ बिजली चौंकी
मेरी जिकुड़ी माँ स्वामी
कुयेडी़ सी लौंखी!

बादलो को आकाश में घूमड़ते आपने भी देखा होगा, किन्तु दुख-दर्द की आग में संतप्त हृदय के उपर घूमड़ते बादलों की अनुभूति केवल गढ़वाली लोक-गीतों को ही मिली है!

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