साहित्‍य-संस्कृति

गांधी जी की दत्तक पुत्री-‘मीरा बहन’

गांधी जी की दत्तक पुत्री-‘मीरा बहन’

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एक साधिका और सेविका की जीवन-यात्राडॉ. अरुण कुकसाल‘गांधीवाद जैसी कोई वस्तु नहीं है और मैं नहीं because चाहता कि मेरे पीछे मैं कोई सम्प्रदाय छोड़ कर जाऊं. मैंने अपने ही ढंग से सनातन सत्यों को हमारे दैनिक जीवन और समस्याओं पर लागू करने का केवल प्रयत्न किया है....मैंने जो मत बनाये हैं और जिन परिणामों पर मैं पहुंचा हूं, वे किसी भी तरह अन्तिम नहीं हैं. यदि इनसे अच्छे मुझे मिल जांय, तो मैं इन्हें कल ही बदल सकता हूं. मेरे पास दुनिया को सिखाने के लिए कोई नई चीज नहीं है. सत्य और अहिंसा अनन्त काल से चले आ रहे हैं. ज्योतिष ...मैं अहिंसा का उतना बड़ा पुजारी नहीं हूं, जितना कि सत्य का हूं; और मैं सत्य को प्रथम स्थान देता हूं तथा अहिंसा को दूसरा. मैं सत्य के खातिर अहिंसा को छोड़ सकता हूं....मेरे मत के विरुद्ध धर्मशास्त्रों के प्रमाण दिये गए हैं; परन्तु मेरा यह विश्वास पहले से अधिक दृढ़ हुआ है कि स...
बीज शब्द: अभिव्यक्तियाँ, चेतना, मौलिकता, बरकत, विचारधारा

बीज शब्द: अभिव्यक्तियाँ, चेतना, मौलिकता, बरकत, विचारधारा

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गांधी का सामाजिक चिन्तन (शोध आलेख)नीलम पांडेय नील, देहरादून, उत्तराखंड  “गांधी, खादी और आजादी गोरों की बरबादी थी, अहिंसा, अदृश्य, अमूक, हक हकूक की लाठी थी” एक महान नेतृत्व के लिऐ सदैव उच्च आदर्शों की आवश्यकता होती है, इसके बिना एक अच्छे समाज की कल्पना कभी नही की जा सकती है. समाज को सही पथ पर ले जाने के लिऐ एक सही नेतृत्व का होना अत्यंत आवश्यक है. जहाँ आदर्श नही हैं, वहाँ लक्ष्य भी नही हैं. गांधी जी ने इन्ही आर्दशों तथा अनुशासनों को अपनाकर, समाज में अपनी सहज, सजीव अभिव्यक्तियाँ दी और समाज के हर एक वर्ग ने उन अपनत्व भरी अभिव्यक्तियों में कहीं ना कहीं स्वयं को महसूस किया तथा उस समय, देशकाल परिस्थियों में उसकी महती आवश्कता को देखते हुऐ असंख्य लोग उनके विचारों के साथ जुड़ते चले गये थे. गांधी जी जानते थे, कि समाज में, सामाजिक चेतना का बीज मंत्र एक साथ, एकमेव चिंतन कर चलने में ही है, जिसमें...
राष्ट्रपिता का भारत–बिम्ब और नैतिकता का व्यावहारिक आग्रह

राष्ट्रपिता का भारत–बिम्ब और नैतिकता का व्यावहारिक आग्रह

साहित्‍य-संस्कृति
गांधी जयंती (2 अक्टूबर) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  इतिहास पर नजर दौडाएं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह देश अतीत में सदियों तक मजहबी साम्राज्यवाद के चपेट में रहने के बाद अंग्रेजी साम्राज्यवाद, जो मुख्यत: because आर्थिक शोषण में विश्वास करता था, के अधीन रहा. राजनैतिक रूप से स्वतंत्र होने के बाद एक तरह के औपनिवेशिक चिंतन से ग्रस्त  अब वैश्वीकरण के युग में पहुँच रहा है. इस दौर में सामाजिक-सांस्कृतिक चिंतन के क्षेत्र में महात्मा गांधी का ‘हिन्द स्वराज’ सर्वाधिक सृजनात्मक उपलब्धि के रूप में उपस्थित हुआ. यह स्वयं में एक आश्चर्यकारी घटना है क्योंकि इस बीच पश्चिम से परिचय के बाद उसे अपनाते हुए हमारे मानसिक संस्कार तद्रूप होते गए. वह भाषा, व्यवहार, पहरावा तथा शिक्षा आदि सबमें परिलक्षित होता है. स्मरणीय है अमेरिकी चिंतन ने यूरोप से अलग दृष्टि स्वीकार की और रूस ने भी स्वायत्त चिंतन की दृष्टि वि...
हिंदी में हत्यारे पहचान लिए जाते हैं!

हिंदी में हत्यारे पहचान लिए जाते हैं!

साहित्‍य-संस्कृति
(हिंदी दिवस पर विशेष)  चंद्रेश्वरसारे विरोधों एवं अंतर्विरोधों के बावज़ूद हमारी हिंदी खिल रही है, खिलखिला रही है. हिन्दी को दबाने,पीछे करने या  किनारे लगाने के अबतक के सारे षडयंत्र विफल  होते रहे हैं. हिन्दी के नाम पर चाहे जो भी राजनीति होती रही हो; पर उसे कोई धूल नहीं चटा पाया है तो  इसी कारण से कि वह वास्तव में इस देश की मिट्टी की सुगंध  से पैदा हुयी भाषा है. इसमें कोटि-कोटि मेहनतकश कंठों की समवेत आवाज़ एवं पुकार शामिल है. यह समय के सुर-ताल को पहचानने वाली भाषा है. यह ज़्यादा लचीली एवं समावेशी प्रकृति की भाषा है. इस  भाषा एवं भारतीयता के बीच एक साम्य है कि दोनों में सहज स्वीकार्यता का भाव देखने को मिलता रहा है. जिस तरह भारतीयता के ताने-बाने का युगों-युगों से निर्माण होता रहा है,समन्वय के विविध रंगीन धागों से, ठीक उसी तरह हिन्दी भी बनी है कई बोलियों एवं भाषाओं के शब्दों को आत्मस...
ज्ञान की कब्रगाहों में हिंदी का प्रेत

ज्ञान की कब्रगाहों में हिंदी का प्रेत

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेषप्रकाश उप्रेती हर वर्ष की तरह आज फिर से हिंदी पर गर्व और विलाप का दिन आ ही गया है. हिंदी के मूर्धन्य विद्वानों को इस दिन कई जगह ‘जीमना’ होता है. मेरे एक शिक्षक कहा करते थे कि “14 सितंबर because को हिंदी का श्राद्ध होता है और हम जैसे हिंदी के पंडितों का यही दिन होता जब हम सुबह से लेकर शाम तक बुक रहते हैं”.  कहते तो सही थे. इन 68 वर्षों में हिंदी प्रेत ही बन चुकी है. तभी तो स्कूल इसकी पढाई कराने से डरते हैं और अभिभावक इस भाषा को पढ़ाने में संकोच करते हैं. सरकार ने इसके लिए खंडहर बना ही रखा है. अब और कैसे कोई भाषा प्रेत होगी. हिंदी पर सेमिनार, संगोष्ठी, अखबारों के लंबे-लंबे संपादकीय और गंभीर मुद्रा में चिंतन व चिंता का आखिर यही एक दिन है. ज्योतिष...आज के हिंदी विभाग because लेखकों के नहीं, लिपिकों के उत्पादन केंद्र बन गए हैं" और गमों-रंजिश में ढहते हिं...
भाषाई  स्वराज्य है  लोकतंत्र  की अपेक्षा 

भाषाई  स्वराज्य है  लोकतंत्र  की अपेक्षा 

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेषप्रो. गिरीश्वर मिश्र  कहते हैं कि जब अंग्रेज भारत में पहुंचे थे तो यहाँ के समाज में शिक्षा और साक्षरता की स्थिति देख  दंग  रह गए थे. इंग्लैण्ड की तुलना में यहाँ के विद्यालयों और शिक्षा की व्यवस्था अच्छी थी. because यह बात कहीं और से नहीं उन्हीं के द्वारा किए सर्वेक्षणों से प्रकट होती है. जब वे शासक बने तो यह उन्हें गंवारा न हुआ और आधिपत्य के लिए उन्होंने भारत की शिक्षा और ज्ञान को अप्रासंगिक और व्यर्थ बनाने का भयानक षडयंत्र रचा. because वे  अपने प्रयास में कामयाब  रहे और भारतीय शिक्षा का सुन्दर सघन बिरवा को निर्ममता से उखाड़  फेंका. उन्होंने संस्कृति और ज्ञान के देशज प्रवेश द्वार पर कुण्डी लगा दी और एक नई पगडंडी पर चलने को बाध्य कर दिया जिसके तहत हम ‘ ए फार एपिल एपिल माने सेव’ याद करते हुए नए ज्ञान को पाने  के लिए  तत्पर हो गए. ज्योतिष जब अंग्रेज  देश ...
हिंदी प्रशासनिक शब्दावली के निर्माण में संस्कृत का योगदान

हिंदी प्रशासनिक शब्दावली के निर्माण में संस्कृत का योगदान

साहित्‍य-संस्कृति
हिंदी दिवस (14 सितम्बर) पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी 14 सितम्बर का दिन पूरे देश में ‘हिन्‍दी दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.आजादी मिलने के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिन्‍दी को राजभाषा बनाने का फैसला लिया गया था. because 14 सितंबर के दिन का एक खास महत्त्व इसलिए भी है कि इस दिन राजभाषा हिंदी के लब्धप्रतिष्ठ विद्वान् और हिंदी के उन्नायक व्यौहार राजेन्द्र सिंह का भी जन्म दिन आता है.इनका जन्म 14 सितम्बर 1900, को हुआ था और 14 सितम्बर 1949 को उनकी 50वीं वर्षगांठ पर भारत सरकार ने संविधान सभा में हिन्‍दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया था. तब से 14 सितंबर को  हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा. स्वतंत्रता प्राप्ति दरअसल, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करवाना बहुत कठिन कार्य रहा था. समूचे देश में अंग्रेजी का इतना वर्चस्व छाया हुआ था, कि हिंदी...
हमारी आत्मा का उत्सर्ग है हिंदी भाषा!

हमारी आत्मा का उत्सर्ग है हिंदी भाषा!

साहित्‍य-संस्कृति
14 सितंबर यानी हिंदी राजभाषा दिवस पर विशेषजिस देश को अपनी भाषा और साहित्य के गौरव का अनुभव नहीं है, वह उन्नत नहीं हो सकता...  —डॉ. राजेन्द्र प्रसादसुनीता भट्ट पैन्यूली हिंदी भाषा विश्व की एक प्राचीन ,समृद्ध because तथा महान भाषा होने के साथ ही हमारी राज्य भाषा भी है भारत की स्वतंत्रता के बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने एक मत से यह निर्णय लिया कि हिंदी की खड़ी बोली ही भारत की राजभाषा होगी.इस महत्त्वपूर्ण निर्णय के बाद ही हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु राष्ट्र भाषा प्रचार समिति,वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस के रुप में मनाया जाता है.ज्योतिष दरअसल भाषा  की संस्कृति कोई because बद्धमूल विषय नहीं, कालांतर यह गतिमान होती रहनी चाहिए हमारी व्यवहारिकता हमारी बोली हमारे रहन-सहन में. संस्कृति तो यही कहती है जो हमने ग्रहण किया ह...
सांस्कृतिक, धार्मिक और पहाड़ी धरोहर की प्रतीक ‘पहाड़ी गागर’

सांस्कृतिक, धार्मिक और पहाड़ी धरोहर की प्रतीक ‘पहाड़ी गागर’

साहित्‍य-संस्कृति
5 ‘ज’ पर निर्भर है पहाड़ी जीवन- शैलीआशिता डोभाल मानव सभ्यता में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन का महत्वपूर्ण स्थान रहता है यानी कि हमारी जीवन-शैली 5 तरह के ‘ज’ पर निर्भर रहती है और ये सब कहीं न कहीं हमारी आस्था because और धार्मिक आयोजनों के प्रतीक और आकर्षण के केंद्र बिंदु भी होते है और सदियों से ये अपना स्थान यथावत बनाए हुए है।संस्कृति आज आपको पहाड़ की एक ऐसी धरोहर की खूबसूरती से रू-ब-रू करवाने की कोशिश करती हूं जो अपने आप में खूबसूरत तो है, हमारी समृद्ध संस्कृति और संपन्न विरासत को भी because अपने में समाए हुए है. ये महज एक बर्तन नहीं बल्कि हमारी धरोहर है, जिसे हमारे बुजुर्गों ने हमे सौंपा है. ये अपने में कहावतों को भी समाए हुए हैं, ऐसी ही एक धरोहर है जिसका पहाड़ की रसोई में महत्वपूर्ण स्थान है उसका नाम है ‘गागर’.संस्कृति गागर में सागर जैसी कहावत को सुनने से प्रतीत होता है कि...
मेरी रसोई : पौष्टिकता से भरपूर हैं पहाड़ी व्‍यंजन

मेरी रसोई : पौष्टिकता से भरपूर हैं पहाड़ी व्‍यंजन

साहित्‍य-संस्कृति
सुनीता भट्ट पैन्यूली किसी भी समाज का दर्पण उसके अवशेषात्मक प्रमाण अथार्त उसकी लोक-संस्कृति, लोकगीत, लोक नृत्य और उसका खान-पान हैं. उस समाज की संस्कृति, परंपराओं और सभ्यताओं की बात करना तब तक अधूरा ज़िक्र है जब तक हम उस विशेष सामाजिक  परिवेश के खान-पान  अथवा ज़ायके का ज़िक्र न करें. खान-पान दरअसल महज़ उदरस्थ करना ही नहीं उसके प्रच्छन्न हमारे पूर्वजों का मनोविज्ञान उनके जीवन की दास्तां भी हैं. खाद्य पदार्थ और उससे बने व्यंजनों की उत्पत्तियों का इतिहास इतना आसान नहीं रहा होगा निश्चित ही इसका कारण संभवतः प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों  में भोजन जुटाने की ज़द्दोज़हद, ज़िंदा रहने की प्रत्याशा रही होगी. खान-पान और भोज्य पदार्थ परिचायक भी हैं उस विशिष्ट समाज के भौगोलिक वातावरण उसकी विषमता और उससे सामंजस्यता की जहां शहरों से सुदूर बसाहत,आर्थिक कमज़ोरी और पौष्टिक अन्न की अनुपलब्धता शायद कारण रहा ह...