
हिंदी का विश्व और विश्व की हिंदी
विश्व हिन्दी दिवस (10 जनवरी) पर विशेष प्रो. गिरीश्वर मिश्र
वाक् या वाणी की शक्ति किसी से भी छिपी नहीं है. ऋग्वेद के दसवें मंडल के वाक सूक्त में वाक् को राष्ट्र को धारण करने और समस्त सम्पदा देने वाले देव तत्व के रूप में चित्रित करते हुए बड़े ही सुन्दर ढंग से कहा गया है : अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाम्. यह वाक की जीवन और सृष्टि में भूमिका को रेखांकित करने वाला प्राचीनतम भारतीय संकेत है. हम सब यह देखते हैं कि दैनंदिन जीवन के क्रम में हमारे अनुभव वाचिक कोड बन कर एक ओर स्मृति के हवाले होते रहते हैं तो दूसरी ओर स्मृतियाँ नए-नए सृजन के लिए खाद-पानी देती रहती हैं . अनुभव, भाषा, स्मृति और सृजन की यह अनोखी सह-यात्रा अनवरत चलती रहती है और उसके साथ ही हमारी दुनिया भी बदलती रहती है. यह हिंदी भाषा का सौभाग्य रहा है क़ि कई सदियों से वह कोटि-कोटि भारतवासियों की अभिव्यक्ति, संचार और सृजन के लिए एक प्रमुख...









