
- नीरज उत्तराखंडी, पुरोला (उत्तरकाशी)
रवांई घाटी की सुबहें कभी सिर्फ सूरज की रोशनी से नहीं, बल्कि सरसों और खुबानी (चुलु) के ताजे तेल की खुशबू से भी जगती थीं। आंगन में रखी लकड़ी की कुनाई, आसपास जुटी महिलाएं, और हंसी-ठिठोली के बीच चलती तेल पिराई- यह दृश्य यहां के जीवन का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। आज वही खुशबू धुंधली पड़ चुकी है। बाजार के रिफाइंड तेल ने न सिर्फ रसोई का स्वाद बदला है, बल्कि एक पूरी परंपरा को धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर ला खड़ा किया है।
जब परंपरा थी सामूहिक उत्सव
मोरी क्षेत्र के पंचगाई, अठोर, बढ़ासु, फतेपर्वत और आराकोट जैसे गांवों में सर्दियों की शुरुआत तेल पिराई के मौसम का संकेत होती थी। यह केवल एक काम नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव जैसा अनुभव था।
गांव की महिलाएं सप्ताहभर तक एक-दूसरे के घरों में जुटतीं, गीत गातीं और काम के साथ रिश्तों को भी मजबूत करतीं। कुनाई के इर्द-गिर्द बनता यह माहौल, दरअसल, गांव की सामाजिक एकता की धुरी था।
मेहनत, कौशल और प्रकृति का संगम
कुनाई से तेल निकालने की प्रक्रिया जितनी पारंपरिक है, उतनी ही कठिन भी। खेतों से लाए गए सरसों और चुलु के बीज पहले धूप में सुखाए जाते, फिर पैरों से मड़ाई और ओखली में कूटकर तैयार किए जाते।
इसके बाद लकड़ी से बनी विशेष ‘कुनाई’ में इन बीजों को डालकर धीरे-धीरे तेल निकाला जाता- एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें धैर्य, अनुभव और मेहनत का अनूठा मेल होता है।
इस विधि से निकला तेल सिर्फ खाद्य पदार्थ नहीं था; वह स्वाद, सुगंध और पोषण का प्राकृतिक स्रोत था। यही तेल गांव के त्योहारों, मेलों और जागरों में भोजन की आत्मा माना जाता था।
यादों में सिमटती विरासत
जखोल गांव की शंकरी देवी की आंखों में चमक और आवाज में हल्की उदासी साफ झलकती है।
वह कहती हैं,
“हमने अपनी दादी और सास से यह काम सीखा था। सर्दियों में सालभर के लिए तेल बनाते थे। तब यह सिर्फ जरूरत नहीं, पूरे गांव को जोड़ने वाली परंपरा थी।”
आज वही परंपरा बुजुर्गों की यादों तक सिमटती जा रही है।
आधुनिकता के बीच खोती पहचान
समय के साथ गांवों में भी जीवनशैली बदली है। बाजार में आसानी से उपलब्ध रिफाइंड तेल ने कुनाई की जगह ले ली है।
घर-घर से गायब होती कुनाई केवल एक उपकरण का गायब होना नहीं है, बल्कि उस जीवनशैली का अंत है, जो आत्मनिर्भरता और प्रकृति के साथ संतुलन पर आधारित थी।
स्थानीय लोग मानते हैं कि इस बदलाव ने न सिर्फ पारंपरिक स्वाद को खत्म किया, बल्कि स्वास्थ्य पर भी असर डाला है। रासायनिक प्रक्रिया से तैयार तेलों की तुलना में कुनाई का तेल अधिक शुद्ध और पोषक माना जाता था।
अब संरक्षण की जरूरत क्यों?
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां “कुनाई तेल पिराई” को सिर्फ कहानियों में ही जान पाएंगी।
इस परंपरा को बचाने के लिए कुछ जरूरी पहलें सामने आ रही हैं—
- गांव स्तर पर प्रशिक्षण शिविर आयोजित करना
- स्थानीय उत्पादों को बाजार से जोड़ना
- सरकारी योजनाओं के माध्यम से प्रोत्साहन देना
- स्कूलों और मेलों के जरिए जागरूकता फैलाना
सिर्फ परंपरा नहीं, एक सांस्कृतिक पहचान
कुनाई से तेल पिराई केवल एक तकनीक नहीं है। यह रवांई क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान है—जहां श्रम, सहयोग और प्रकृति के प्रति सम्मान एक साथ दिखाई देते हैं।
आज जब आधुनिकता तेजी से हर परंपरा को पीछे छोड़ रही है, तब जरूरी है कि ऐसी विरासतों को सहेजने की पहल की जाए।
क्योंकि अगर यह परंपरा खो गई, तो सिर्फ एक स्वाद नहीं, बल्कि पहाड़ की जीवनशैली का एक अहम अध्याय भी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
