September 23, 2020
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जल विज्ञान

प्राचीन भारत में मेघविज्ञान और बादलों के प्रकार

भारत की जल संस्कृति-14 डॉ. मोहन चंद तिवारी (7 फरवरी, 2013 को रामजस कालेज, ‘संस्कृत परिषद्’ द्वारा आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘प्राचीन भारत में जलवायु विज्ञान’ के अंतर्गत मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य “प्राचीन भारत में मेघविज्ञान” का संशोधित लेख) भारत प्राचीन भारतीय मेघविज्ञान का इतिहास भी अन्य
इतिहास

बिखरी हुई कांग्रेस को जब महामना ने पुनर्जीवित किया

पितृपक्ष में पुण्यात्मा महामना मदन मोहन मालवीय जी का पुण्यस्मरण! डॉ. मोहन चंद तिवारी आजादी से पहले कांग्रेस पार्टी में एक ऐसा भी दौर आया था, जब अंग्रेजों की कूटनीतिक चाल के कारण कांग्रेस के नेता बुरी तरह से बिखरकर तीन-चार खेमों में बँट चुके थे.अंग्रेज हुक्मरान ‘फूट डालो राज करो’ की रणनीति के तहत […]
किस्से/कहानियां

अक्ल की महिमा

कहानी फकीरा सिंह चौहान ‘स्नेही’ एक बार एक बालक ने अपनी मां से पूछा “मां”  तुम क्यों रो रही हो? मां ने बड़े करूण भाव से कहा, “बेटा तू अभी नादान है. तू मेरे हृदय की पीड़ा को अभी महसूस नहीं कर सकता है. “बालक ने अनायास ही पूछा, “आखिर क्यों मां?” मां ने स्नेह […]
योग/साधना

बदलाव को लेकर हम परेशान व चिंतित क्यों…

परिवर्तन प्रकृति का शाश्वत नियम है… डॉ. दीपा चौहान राणा बदलाव प्रकृति का शाश्वत नियम है, यह एक ऐसा विषय जिसके कई बदलाव, बदलना, बदल जाना आदि शब्दों को लेकर कई लोग शिकायत करते हैं, शिकायत  ही नहीं बल्कि चिंतित व परेशान भी रहते हैं. रिश्तों में भी खास शिकायत होती है कि वो बदल […]
पर्यावरण

संकट में है आज हिमालय पर्यावरण

‘हिमालय दिवस’ (9 सितम्बर) पर विशेष डॉ. मोहन चंद तिवारी आज हिमालय दिवस है.पिछले कुछ वर्षों से देश भर में, खासकर उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश में 9 सितम्बर को ‘हिमालय दिवस’ मनाया जा रहा है. हिमालय दिवस की शुरुआत 9 सितंबर,2010 को हिमालय पर्यावरण को समर्पित जाने माने पर्यावरणविदों सर्वश्री सुन्दर लाल बहुगुणा, सुरेश भाई, […]
संस्मरण

 जहां विश्वास है, वहां प्यार है!

बुदापैश्त डायरी-12 डॉ. विजया सती विदेश में हम अपनी भाषा भी पढ़ाते हैं और अपने देश से भी परिचित कराते हैं – क्योंकि आखिरकार तो देश की पूरी तस्वीर देनी है हमें ! जैसे हमारा अध्यापन अपने देश के परिचय से जुड़ा रहता है, उसी तरह दूसरे देश का पूर्ण परिचय भी हमारा लक्ष्य होता […]
संस्मरण

‘सरूली’ जो अब नहीं रही

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—48 प्रकाश उप्रेती अविष्कार, आवश्यकता की उपज है. इस उपज का इस्तेमाल मनुष्य पर निर्भर करता है. पहाड़ के लोगों की निर्भरता उनके संसाधनों पर है. आज अविष्कार और आवश्यकता की उपज “थेऊ” और “सरूली” की बात. ‘थेऊ’ पहाड़ के जीवन का अनिवार्य हिस्सा है. खासकर गाय-भैंस पालने वाले […]
समाज/संस्कृति

पुत्र अपने कुल को ही तारता है, पुत्रियां दो-दो कुलों को तारतीं हैं

डॉ. मोहन चंद तिवारी   पितृपक्ष के अवसर पर प्राय: यह जिज्ञासा प्रकट की जाती है कि श्राद्ध का अधिकार किस किस को है? क्या पुत्र के अतिरिक्त पुत्री या पत्नी को भी श्राद्ध करने का अधिकार है या नहीं? कुछ पितृसत्तात्मक परंपरागत समाजों में स्थानीय मान्यताओं के कारण केवल पुत्र को या पुरुष को ही […]
इतिहास

‘गो-बैक मेलकम हैली’ ‘भारत माता की जय’

6 सितम्बर, 1932 पौड़ी क्रान्ति के नायक-  जयानन्द ‘भारतीय’ डॉ. अरुण कुकसाल हाथ में तिरंगा उठा, नारे भी गूंज उठे,  भाग चला, लाट निज साथियों की रेल में, जनता-पुलिस मध्य, शेर यहां घेर लिया, वीर जयानन्द, चला पौड़ी वाली जेल में. – शान्तिप्रकाश ‘प्रेम’ ‘मैं वीर जयानन्द ‘भारतीय’ का शुक्रिया अदा करता हूं कि उसने […]
उत्तराखंड

अनाज भंडारण की अनूठी परम्परा है कोठार

आशिता डोभाल कोठार यानी वह गोदाम जिसमें अनाज रखा जाता है, अन्न का भंडारण का वह साधन जिसमें धान, गेंहू, कोदू, झंगोरा, चौलाई या दालें सालों तक रखी जा सकती है. कोठार में रखे हुए इन धनधान्य के खराब होने की संभावना न के बराबर होती है. कोठार को पहाड़ी कोल्ड स्टोर के नाम से […]