Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
सामाजिक दायित्वशीलता निभाने में अग्रणी व्यक्तित्व

सामाजिक दायित्वशीलता निभाने में अग्रणी व्यक्तित्व

समसामयिक
डॉ. अरुण कुकसाल‘‘होम्योपैथिक चिकित्सा रोगी की रोग से लड़ने की शरीर में मौजूद क्षमता को बढ़ाकर रोगी को रोग से मुक्त कराने में साहयता प्रदान करती है. विशेषकर एलर्जिक रोगों के संपूर्ण एवं सुरक्षित उपचार के लिए होम्योपैथी को ऐलोपैथी याने आधुनिक चिकित्सा पद्धति से बेहतर माना जाता है. वर्तमान मानवीय जीवन शैली का एक नकारात्मक पक्ष यह भी है कि उसमें एलर्जिक रोगों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है.होम्योपैथी चिकित्सा पद्धति के जनक जर्मन चिकित्सक और प्राकृतिक वैज्ञानिक सैमुअल हैनीमन थे. आज से लगभग 200 वर्ष पूर्व ‘समान लक्षणों द्वारा समान लक्षणों का उपचार’ के सिद्धांत को अपनाते हुए सैमुअल हैनीमन ने यह प्रमाणित किया कि व्यक्तियों की आन्तरिेक प्राकृतिक प्रक्रिया के स्वभाव एवं प्रकृति में बहुत अंतर होता है. अतः उनकी इस विशिष्टता को रोग निदान के समय सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए.होम्योपैथी ...
प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

प्रकृति की गोद में बसा हरकीदून, बुग्याल और कई किस्म के फूलों की महक जीत लेती है दिल

उत्तराखंड हलचल
शशि मोहन रावत ‘रवांल्‍टा’मानव प्रकृति प्रेमी है. प्रकृति से ही उसे आनंद की अनुभूति होती है. मानव का प्रकृति से प्रेम भी स्वाभाविक ही है, क्योंकि प्रकृति उसकी सभी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति करती है. इसी प्रकृति ने पर्वतराज हिमालय की गोद में अनेक पर्यटन स्थलों का निर्माण किया है. इन्हीं पर्यटन स्थलों में "हरकीदून" एक अत्यंत रमणीय स्थली है. हरकीदून सीमान्त जनपद उत्तरकाशी का एक पर्यटन स्थल है. जहां प्रतिवर्ष देश-विदेशों से प्रकृति प्रेमी प्रकृति का अनुपम सौंदर्य निहारने के लिए पहुंचते रहते हैं. यह गोविन्दबल्लभ पंत वन्य जीव विहार एवं राष्ट्रीय पार्क के लिए भी प्रसिद्ध है. भोजपत्र, बुरांस व देवदार के सघन वृक्षों के अलावा यहां अमूल्य जीवनदायिनी जड़ी-बूटियां, बुग्याल एवं प्राकृतिक फल-फूल देखे जा सकते हैं.यहां वृक्षों में सर्वाधकि भोजपत्र (बेटुला युटिलिस) तथा खर्सू (क्वेरकस) के वृक्ष प...
‘गीला या सूखा’ का खेल

‘गीला या सूखा’ का खेल

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—22प्रकाश उप्रेतीआज बात उस खेल की जिसकी लत बचपन में लगी और मोह अब तक है. हम इसे- "बैट- बॉल" खेलना कहते थे और दूसरे गाँव में 'क्रिकेट' नहीं 'मैच खेलने' जाते थे. पांव से लेकर सर तक जितने 'घो' (घाव) हैं उनमें से कइयों की वजह तो यह खेल है. ईजा के हाथों से सबसे ज्यादा मार भी इसी खेल के कारण खाई है. एक पूरी रात अमरूद के पेड़ में इसी खेल के कारण गुजारनी पड़ी है. यह, नशा जैसा था यार.. बचपन में 'मुंगर' (अनाज कूटने वाला) हमारा बैट और मोजे में कपड़े भरकर सिली हुई बॉल होती थी. 'खो' (आंगन) हमारा मैदान और 'कंटर' हमारा स्टम्प होता था. ईजा जब घास-पानी लेने गई हुई होती थीं तो हम दोनों भाई शुरू हो जाते थे. 'खो' से बाहर जाना आउट होता था और नियम था कि जो मारेगा वही लाएगा.'खो' में बहन को 'अड्डु' (लंगड़ी टांग) भी खेलना होता था. वह भी ईजा के इधर-उधर जाने का इंतजार क...
खाँकर खाने चलें…!!

खाँकर खाने चलें…!!

संस्मरण
‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—11रेखा उप्रेतीशुरू जाड़ों के दिन थे वे. बर्फ अभी दूर-दूर पहाड़ियों में भी गिरी नहीं थी, पर हवा में बहती सिहरन हमें छू कर बता गयी थी कि खाँकर जम गया होगा… इस्कूल की आधी छुट्टी में पाँचवीं कक्षा में पढ़ने वाले सीनियर्स ने प्रस्ताव रखा “हिटो, खाँकर खाने चलते हैं…” तो आठ-दस बच्चों की टोली चल पड़ी खाँकर की तलाश में… इस्कूल हमारा पहाड़ के सबसे ऊँचे शिखर पर था और खाँकर मिलता था एकदम नीचे तलहटी पर बहते गधेरे में… वह भी देवदार के घने झुरमुट की उस छाँव के तले, जहाँ सूरज की किरणों का प्रवेश जाड़ों में तो निषिद्ध ही होता… अपनी पहाड़ी से कूदते-फाँदते नीचे उतर आए हम….उसके लिए हमें बनी-बनाई पगडंडियों की भी ज़रुरत नहीं थी. सीढ़ीदार खेतों से ‘फाव मारकर’ हम धड़धड़ाते हुए उतर आते थे. गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी पहले ही छोड़ दी, कोई देख ले तो खाँकर का ख़्वाब धरा रह जाए…… तलहटी पहुँचक...
एक क्रांति का नाम – नईमा खान उप्रेती

एक क्रांति का नाम – नईमा खान उप्रेती

संस्मरण
पुण्यतिथि पर विशेषमीना पाण्डेयनईमा खान उप्रेती एक क्रांति का नाम था. एक तरफ उत्तराखंड के लोक गीतों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए उन्होंने मोहन उप्रेती जी के साथ मिलकर एक बड़ी भूमिका निभाई. दूसरी ओर रंगमंच और लोक कलाओं में महिला भागीदारी के प्रति तत्कालीन समाज की जड़ मान्यताओं को पीछे छोड़ पहले पहल एक जीता-जागता उदाहरण बनी.नईमा खान उप्रेती का जन्म 25 मई, 1938 को अल्मोड़ा के एक कटटर मुस्लिम परिवार में हुआ. उनका परिवार अल्मोड़ा के बड़े रईस परिवारों में एक था. उनके पिता शब्बीर मुहम्मद खान ने उस समय की तमाम सामजिक रूढ़ियों को दरकिनार कर एक क्रिस्चियन महिला से विवाह किया. पिता के प्रगतिशील विचारों का प्रभाव नईमा पर पड़ा. उन्हें बचपन से ही गाने का शौक था. परिवार में भी संगीत के प्रति अनुराग रहा.मध्यम कद काठी, धुला रंग, छोटी पोनी में समेटे अर्द्ध खिचड़ी बाल और ...
भारतीय परंपरा जल में ‘नारायण’ का वास मानती है

भारतीय परंपरा जल में ‘नारायण’ का वास मानती है

साहित्‍य-संस्कृति
भारत की जल संस्कृति-4डॉ. मोहन चन्द तिवारी(प्रस्तुत लेख 12 मार्च, 2014 को ‘उत्तराखंड संस्कृत अकादमी, हरिद्वार द्वारा ‘आईआईटी’ रुडकी में आयोजित विज्ञान से जुड़े छात्रों,शिक्षकों और जलविज्ञान के  विद्वानों के समक्ष मेरे द्वारा दिए गए वक्तव्य- "प्राचीन भारत में जल विज्ञान, जल संरक्षण और जल प्रबंधन" का सारगर्भित संशोधित  रूप है.पिछले वर्ष 11-12 अगस्त 2019 को 'नौला फाउंडेशन' द्वारा उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी द्वाराहाट और असगोली ग्राम में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला 'मन की बात जल की बात' के जल विषयक महत्त्वपूर्ण निष्कर्षों को भी इस लेख में समाहित किया गया है.) जल संकट सम्बन्धी वर्त्तमान समस्याओं को लेकर पिछले वर्ष 11-12 अगस्त, 2019 में उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी द्वाराहाट में 'नौला फाउंडेशन' की ओर से 'मन की बात जल की बात' शीर्षक से आयोजित एक राष्ट्रीय स्तर की कार्यशाला का ...
गर्मियों की छुट्टी और रोपणी की बखत 

गर्मियों की छुट्टी और रोपणी की बखत 

संस्मरण
ममता गैरोलाजून की भीषण गर्मी में पहाड़ स्वर्ग की सी अनुभूति है. खेतों की लहलहाती हवा, धारा (पानी का स्रोत) से बहता ठंडा पानी, लोगों में आपसी मेलजोल और साथ ही सांस्कृतिक रीति-रिवाज पहाड़ों की जीवन शैली का अद्भुत दर्शन कराती है और इस अनुभूति को हम सिर्फ तब ही नहीं महसूस करते जब हम अपने गांव में होते हैं बल्कि तब भी महसूस करते हैं जब हम शहरों में कहीं दो कमरों घर में हो या फिर आलिशान फ्लैट में रह रहे हों, एक बार बस बात शुरू हो जाने पर ही उन यादों में डूब जाते हैं. फिर आज भी मन है कि गांव जाने को आतुर सा होने लगता है.एक वक़्त हुआ करता था जब गर्मी की छुट्टियों में कहीं जाने का मतलब सिर्फ दादी और नानी के घर जाना होता था. और वहां जाना किसी फॉरेन ट्रिप से कम नहीं होता था न जाने कितनी ही मौज- मस्ती और कितने ही एडवेंचर किये हैं हमने वहां, अक्सर दिन में खाना- खाने के बाद कपड़े  लेकर गाड़-गधेरा...
लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

लोक संस्कृति में रंग भरने वाला पहाड़ का चितेरा  

उत्तराखंड हलचल
ललित फुलाराभास्कर भौर्याल बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. उम्र सिर्फ 22 साल है. पर दृष्टिकोण और विचार इतना परिपक्व कि आप उनकी चित्रकारी में समाहित लोक संस्कृति और आंचलिक परिवेश को भावविभोर होकर निहारते रह जाएंगे. उनके चटक रंग बरबस ही अपनी दुनिया में खोई हुई आपकी एकाग्रता, को अपनी तरफ खींच लेंगे. वो जो अंकित कर रहे हैं, अपनी जड़ों की तरफ ले जाने की खुशी से आपको भर देगा. भास्कर के तैलीय चित्र हृदय की गहराई में जितने उतरते हैं, उनकी कुमाऊंनी में प्रकृति के सौंदर्यबोध वाली कविताएं उजाड़ मन में पहाड़ प्रेम को उतना ही ज्यादा भर देती हैं.भास्कर अब तक 200 से ज्यादा चित्र बना चुके हैं, जिनमें ग्रामीण परिवेश की बारीकियां, पहाड़ की संस्कृति में अहम भूमिका निभाने वाले वाद्य यंत्र, उत्तराखंड की संस्कृति के प्रतीक लोकनृ­त्य झोड़ा और चांचरी, एवं कुमाऊंनी, गढ़वाली और जौनसारी वेशभूषा.... आदि के विविध...
लोक की आवाज – हीरा सिंह राणा

लोक की आवाज – हीरा सिंह राणा

संस्मरण
मीना पाण्डेयआज से कुछ 18-20 साल पहले हीरा सिंह राणा जी से अल्मोड़ा में 'मोहन उप्रेती शोध समिति' के  कार्यक्रम के दौरान पहली बार मिलना हुआ. ‌तब उनकी छवि मेरे किशोर मस्तिष्क में 'रंगीली बिंदी' के लोकप्रिय गायक के रूप में रही. उसके बाद दिल्ली आकर कई कार्यक्रमों में लगातार मिलना हुआ. मध्यम कद-काठी पर मटमैला कुर्ता और गहरे रंग के चेहरे को आधा ढ़ापती अर्द्ध-चंद्राकार दाड़ी. चेहरे-मोहरे और वेश भूषा में भी वे लोक के प्रतीक रहे. उनकी कविताओं और गीतों में पहाड़ के परिवेश व  संस्कृति के प्रति गहरा लगाव स्पष्ट दिखाई देता है. राणा जी की रचनाओं का वितान बहुत वृहद रहा. वहां श्रृंगार है, जन आंदोलनों को उत्साह से भर देने के गीत हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग है और अपनी संस्कृति के प्रति अकाट्य प्रेम भी.ये दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि हीरा सिंह राणा जी की लोकगायक के रूप में लोकप्रियता के प्रकाश मे...
बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

बॅम्बूसा पॉलिमार्फा : एक बहुउपयोगी बांस

उत्तराखंड हलचल
जे. पी. मैठाणीबांस के संसार में बांस की कुल प्रजातियों को वानस्पतिक वर्गीकरण के आधार पर दो प्रमुख भागों में बांटा गया है. प्रथम बॅम्बूसा प्रजातियां जैसे- बॅम्बूसा पॉलिमार्फा, बॅम्बूसा वल्गेरिस, बॅम्बूसा बैम्बूस, बॅम्बूसा टुल्डा, बॅम्बूसा बालकोआ, बॅम्बूसा मल्टिप्लैक्स आदि. डैन्ड्राकैलेमस की प्रजातियों में डैन्ड्राकैलेमस एस्पर, डैन्ड्राकैलेमस हैमल्टोनाई, डैन्ड्राकैलेमस हेटरोस्टैचिया, डैन्ड्राकैलेमस लॉन्गिंपैथस, डैन्ड्राकैलेमस सिक्किमेन्सिस आदि. यह एक बहुत ही रोचक बात है कि बांस की प्रजातियों का उद्भव पृथ्वी पर लगभग 30 मिलियन वर्ष पहले हुआ. डायनासोर के विलुप्ति के बाद ही पृथ्वी पर बांस प्रजातियां उत्पन्न हुई हैं. आज हम आपको मूलतः म्यांमार, थाइलैण्ड, बांग्लादेश में पाए जाने वाले एक विशिष्ट बांस बॅम्बूसा पॉलिमार्फा के बारे में जानकारी दे रहे हैं. यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आजकल...