November 25, 2020

कहानी

  • एम. जोशी हिमानी

तप्त कुण्ड के गर्म जल में स्नान करके मोहन की सारी थकान चली गयी थी और वह अब अपने को काफी स्वस्थ महसूस करने लगा था.

तप्त कुण्ड के नीचे अलकनन्दा अत्यंत शांत एवं मंथर गति से अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रही थी. पहाड़ों में बहने वाली नदियां वैसे तो किसी अल्हण किशोरी सी चहकती, फुदकती, बलखाती अपनी मंजिल की तरफ दौड़ लगाती हैं परन्तु बद्रीनाथ धाम में बहने वाली अलकनन्दा का यह रूप मनुष्य को अपने प्राणवान होने का अहसास कराना चाहती थी शायद.

अलकनन्दा को मालूम था उसके शोर-शराबे तथा उच्छृंखलता से भगवान नारायण की तपस्या में खलल पड़ सकता है. बद्रीनाथ में आकर मनुष्य भले ही अपना संयम भूल जाये परन्तु अलकनन्दा अनादिकाल से अपनी मर्यादा तथा संयम को नहीं भूली थी.

अलकनन्दा नदी

जोशीमठ से बद्रीनाथ की 40 किलोमीटर की यात्रा ने मोहन को बीमार कर दिया था. वह सोचता है उसे रात्रि विश्राम जोशीमठ में करना चाहिए था. हरिद्वार से जोशीमठ तक 300 किलोमीटर की लम्बी यात्रा एक ही दिन में तय करना काफी थकाऊ था. फिर उन्हें जोशीमठ से बद्रीनाथ तक के वन साइड ट्रैफिक के कारण जोशीमठ में रोड पर ही एक घंटा खड़े रहना पड़ा था. हरिद्वार से जोशीमठ की यात्रा के मुकाबले जोशीमठ से बद्रीनाथ तक पहुँचना ज्यादा कठिन लगा था मोहन को. कच्चे पहाड़ आये दिन खिसककर सीमांत सड़क संगठन के जवानों की मेहनत पर एक क्षण में पानी फेर देते थे. संगठन के वर्दीधारी कर्मचारी बुल्डोजर, फावड़ा आदि उपकरणों से लैश हर समय सड़क पर मुस्तैद रहते थे.

मोहन उनको मन ही मन सलाम करता है इतना कठिन मौसम भी इन्हें अपनी ड्यूटी के प्रति कभी लापरवाही नहीं करने देता.

बद्रीनाथ से आने वाली सारी गाड़ियां जब जोशीमठ पहुँच गयी थी तभी जोशीमठ से बद्रीनाथ के लिए लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े वाहनों को जाने की परमीशन दी गयी थी, जिसको वहाँ पर गेट खुलना कहा जाता था. पचासों वाहनों के एक साथ कच्ची सड़कों में दौड़ने के कारण घाटियां धूल के गुबार से भर गयी थीं. गाड़ी के अन्दर मोहन का दम घुटने लगा था. रात नौ बजे जैसे ही उन्होंने बद्रीनाथ में होटल के कमरे में प्रवेश किया था, कुछ देर बाद ही उसकी सांस लगभग जाम सी हो गयी थी. उसे लग रहा था अब उसका बचना नामुमकिन है.

दुर्गा कातर दृष्टि से उसे देख रही थी. उसने चिल्ला-चिल्लाकर होटल वालों को बुला लिया था और खुद मोहन के हाथों और पैरों के तलुवों को रगड़-रगड़ कर वह उसकी सांस लौटाने की कोशिश कर रही थी.

सरकारी डिस्पेंसरी का चिकित्सक आधे घंटे में ठण्ड से कांपता हुआ होटल पहुँच गया था. आते ही उसने मोहन को एक इन्जेक्शन दिया था और छोटे आक्सीजन सिलेन्डर से वह मोहन को आक्सीजन देने लगा था.

मोहन को बहुत जल्दी आराम मिल गया था. डाक्टर लगातार रो रही दुर्गा को सांत्वना दे रहा था-‘‘आप परेशान न हों, इनको सोने दें, यह सुबह तक ठीक हो जायेंगे. गनीमत है इनको हार्ट की कोई दिक्कत नहीं हुई वरना बाहर से आने वाले कई यात्रियों को यहाँ पहुँचते ही हार्ट अटैक पड़ जाता है.

दूसरे दिन पूरे दिन उसने होटल में आराम किया था. होटल की खिड़की से वह बद्रीनाथ धाम की अद्भुत छटा को निहारता रहा था. होटल के ठीक सामने अलकनन्दा के दूसरी तरफ बद्रीनाथ मंदिर भव्य श्रृंगार के साथ सदियों से खड़ा था. मंदिर को रोज टनों गेंदे के पीले फूलों की लम्बी-लम्बी लड़ियों से सजाया जाता था. भोर में ब्रह्मवेला से लाउडस्पीकर पर आने वाली विष्णु सहस्रनाम की गूंज ने वातावरण को अलौकिक एवं दिव्य बना दिया था.

मोहन ने तुलसी की माला, चने की दाल, गरी, मिश्री तथा सूखे मेवे से बना प्रसाद का थाल खरीदकर दुर्गा को थमा दिया था तथा खुद धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगा था. इतनी लम्बी तथा कठिन यात्रा के बाद मंदिर में पहुँचकर उसे बहुत निराशा हुई थी. नारायण की तपस्यारत मूरत को देखने के लिए उन्हें चंद सेकेण्ड मिल पाये थे.

वातावरण एवं संग का बहुत बड़ा हाथ होता है इन्सान को अन्दर और बाहर से बदलने में. ठंडियों में अमूमन अपने घर पर लोग सात बजे तक रजाइयाँ नहीं छोड़ पाते हैं. चार-पांच बजे विस्तर छोड़ने वालों को तपस्वी की संज्ञा दी जा सकती है. वह खुद भी चाहते हुए भी जीवन में कभी भोर के सौन्दर्य का आनन्द नहीं उठा पाया था परन्तु बद्रीनाथ धाम की सात्विक ऊर्जा ऐसी थी कि अस्वस्थ होने के बावजूद वह चार बजे विस्तर में बैठकर ‘‘गोबिन्द गोपाल हरे मुरारे,  हे नाथ नारायण वासुदे” का जाप करने लगा था. दुर्गा भी अपने विस्तर में मंत्र जाप कर रही थी तथा बद्रीनाथ धाम में अनन्तकाल से तपस्या में लीन जिन नर-नारायण भगवान का उसने अभी दर्शन नहीं किया था, उनको अपने धाम में अपने सुहाग की रक्षा करने के लिए धन्यवाद दे रही थी.

मोहन ने तुलसी की माला, चने की दाल, गरी, मिश्री तथा सूखे मेवे से बना प्रसाद का थाल खरीदकर दुर्गा को थमा दिया था तथा खुद धीरे-धीरे मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगा था. इतनी लम्बी तथा कठिन यात्रा के बाद मंदिर में पहुँचकर उसे बहुत निराशा हुई थी. नारायण की तपस्यारत मूरत को देखने के लिए उन्हें चंद सेकेण्ड मिल पाये थे. वालंटियर, सिक्योरिटी मैन, पुजारी सब मुस्तैद थे भक्तों की लम्बी-लम्बी कतार को शीघ्र से शीघ्र आगे बढ़ाने के लिए. मूरत के सामने बैठकर इतमिनान से दर्शनों का लाभ प्राप्त करने के लिए या तो भक्त को मोटी रकम खर्च करनी पड़ती थी अथवा उसका वी.आई.पी. होना आवश्यक था, मोहन दोनों में से किसी वर्ग से नहीं था.

मंदिर में दर्शनों के बाद मोहन धीरे धीरे कदमों से चलते हुए ब्रहमकपाली घाट पर पहुंचता है. बचपन से उसने अपने बुजुर्गो से सुना था कि ब्रह्मकपाली में आकर श्राद्व करने वाले महाभागी की आगे पीछे की सात पीढ़ियां मुक्त हो जाती हैं. उसके स्वयं के मुक्त होन की तो कौन कहे.

दुर्गा घर से श्राद्ध तथा पिण्डदान की सारी सामग्री इकट्ठा कर लाई थी जौ, का आटा, काले तिल, साबूत जौ, गाय का घी, बोतल में गया का दूध, आंवला पत्र, चावल, रुई की बत्तियाँ, वस्त्र आदि. एक-एक चीज उसने पण्डा जी के आगे खोल कर रख दी थी.

मोहन धर्मिक मानयताओं में अटूट विश्वास रखने वाला व्यक्ति था. उसने सुन रखा था ब्रहम कपाली में आकर जो जीते जी स्वयं का पिण्डदान तथा तर्पण करता है उसके सारे पाप नष्ट हो जाते है . तथा उसे कभी नरक का मुँह नहीं देखना पड़ता है.

ब्रह्म कपाली में श्राद्ध कराने वालों की भी अच्छी खासी तादाद मौजूद थी . वह सोचता है हमारा देश है ही ऐसा अदभुत. यहाँ चाहे आप मंदिर, मस्जिद तीर्थ स्थल, मेला, हाट, बजार, सिनेमाहाल, अस्पताल, स्कूल, कलेज, बैंक, श्मशान घाट कहीं भी जायें लोगों की रेलम-पेल हर जगह मिलेगी.

दुर्गा घर से श्राद्ध तथा पिण्डदान की सारी सामग्री इकट्ठा कर लाई थी जौ, का आटा, काले तिल, साबूत जौ, गाय का घी, बोतल में गया का दूध, आंवला पत्र, चावल, रुई की बत्तियाँ, वस्त्र आदि. एक-एक चीज उसने पण्डा जी के आगे खोल कर रख दी थी.

पण्डा जी से श्राद्ध की दक्षिणा तय करने के बाद उन्होंने कर्मकाण्ड की प्रक्रिया आंरभ कर दी थी. कर्मकाण्ड का विस्तार एवं पूर्ण विधि विधान यजमान द्वारा दी जाने वाली दक्षिणा के आधार पर तय होती थी.

मोहन ने अपने सिर के बाल हरिद्वार में ही घुटा लिये थे. पण्डा जी ने मोहन का नाम और गोत्र पूछने के बाद श्राद्ध कर्म शुरू कर दिया था. मोहन बोले थे-‘‘पण्डित जी हमारे पितरों के श्राद्ध, पिण्ड दान के बाद आप हम दोनों का भी पिण्डदान और तर्पण कराइये ….

मैं हूँ मोहन चन्द्र पाण्डे यह मेरी पत्नी दुर्गा देवी पाण्डे भारद्वाज गोत्र. मेरे पिता का नाम लक्ष्मी दत्त पाण्डे, मां का नाम कुन्ती देवी पाण्डे, दादा का नाम-चूड़ामणि पाण्डे, दादी का नाम-तारा देवी पाण्डे, परदादा का नाम-मनोहर पाण्डे. इसके ऊपर की पीढ़ी का नाम उसे नहीं मालूम था.

सारे विधि विधान कर तथा पिण्डों को अलकनन्दा में प्रवाहित करने से पूर्व मोहन पण्डा जी के पास जाकर धीमे से फुसफुसाता है-‘‘पण्डित जी क्या मैं किसी ऐसे व्यक्ति का भी यहां पर पिण्डदान कर सकता हूँ जिसका मैं गोत्र नहीं जानता. मैं यहां पर अपना पिण्डदान करने के साथ अपने पापों से भी मुक्ति पाना चाहता हूँ…’’

पण्डित जी ने भारद्वाज गोत्र के समस्त अंतरिक्ष पित्रलोक वासियों का उच्चारण कर उनका तर्पण कर दिया था. दुर्गा भी अपने माता-पिता, दादा-दादी जितने पुरखों का वह नाम जानती थी सबका उच्चारण करवा रही थी.

सारे विधि विधान कर तथा पिण्डों को अलकनन्दा में प्रवाहित करने से पूर्व मोहन पण्डा जी के पास जाकर धीमे से फुसफुसाता है-‘‘पण्डित जी क्या मैं किसी ऐसे व्यक्ति का भी यहां पर पिण्डदान कर सकता हूँ जिसका मैं गोत्र नहीं जानता. मैं यहां पर अपना पिण्डदान करने के साथ अपने पापों से भी मुक्ति पाना चाहता हूँ…’’

दुर्गा का काम खत्म हो गया था वह थकी भी थी वह थोड़ी दूर एक किनारे टेक लगाकर सुस्ताने लगती है.

मोहन के लिए यह अच्छा मौका है उस शारदा का पिण्डदान करके उसे प्रेतयोनि से मुक्ति दिलाने का जिसकी आत्महत्या के पीछे मोहन बहुत बड़ा कारण था शायद. यह कारण मोहन के अलावा अन्य किसी को पता भी नहीं था. आत्महत्या करने वाला कभी मुक्त हो भी नहीं सकता. एक बोझ के साथ मोहन वर्षों से जी रहा था.

मोहन ब्रह्मकपाली घाट पर बैठा नर-नारायण पर्वत की दूध सी धवल बर्फ से ढकी चोटियों को निहारते हुए अतीत में पहुँच जाता है.

 

जिला विद्यालय निरीक्षक जैसी कमाऊ पोस्ट में रहते हुए भी उसने बड़ी ईमानदारी से अपनी नौकरी की थी. अगर इंसान अपने उसूलों पर अडिग रहना चाहे तो कोई भी प्रलोभन धमकी उसको डगमगा नहीं सकती है. मोहन के पास हर तरह की चारित्रिक विशेषतायें तथा पवित्रतायें थीं. कभी-कभी उसे खुद पर गुमान भी होता था. सैकड़ों कमसिन छात्राओं, नवयोवना शिक्षिकाओं से उसका सामना होता था परन्तु कभी भी किसी के प्रति उसकी दृष्टि तक नहीं बदली थी. जबकि उसे मालुम था उसके पूर्व के अधिकारी, सहकर्मी इन मामलों में बहुत कच्चे थे. वे कुछ हासिल न भी कर पायें तो नेत्रों से रसपान करके ही वे तृप्त हो जाते थे.

मोहन जैसा जिला विद्यालय निरीक्षक उनके लिए एक पौरुषहीन व्यक्ति जैसा था. मोहन को अपनी इस छवि से कोई परेशानी नहीं थी. अपनी साफ-सुथरी छवि को बनाये रखने के लिए उसने बहुत संघर्ष किया था. ‘‘इश्क और मुश्क छिपाये नहीं छिपता’’ की कहावत को उसने झूठा साबित कर दिया था.

शारदा को उसने एक स्कूल के निरीक्षण के दौरान ही तो देखा था. झक सफेद सलवार कुर्ता पहने वह पूरी तल्लीनता से क्लास ले रही थी. जिला विद्यालय निरीक्षक के औचक निरीक्षण की उसे खबर नहीं थी, बच्चों को पढ़ाने में इतनी तल्लीन थी कि खिड़की से बहुत देर से चुपचाप कोई उसकी टीचिंग का निरीक्षण कर रहा है उसे अहसास भी नहीं था.

दस-पांच मिनट में निरीक्षण खत्म करने वाला मोहन उस शिक्षिका की तल्लीनता में कब से तल्लीन है इसका उसको अहसास बहुत देर बाद हुआ था जब पीरियड खत्म होने का घंटा बजा था. तब उसे याद आया था कि उसके पीछे स्कूल के प्रिंसिपल के साथ कई टीचर उसके पलटने का इंतजार कर रहे हैं.

मोहन अपने मन मस्तिष्क से हफ्तों उस धवल छवि को हटा नहीं पाया था. उस स्कूल में दोबारा निरीक्षण में जाने का मतलब था अपने ऊपर लोगों का ध्यान केन्द्रित करवाना.

पूरा शैक्षणिक सत्र ऐसे ही बीत गया था. मोहन भी उस धवल छवि को लगभग भूल सा गया था.

स्थानान्तरण सत्र शुरू होते ही जिस तरह उसके कार्यालय में प्रार्थना पत्रों का अम्बार लग जाता था तथा टीचर्स की आवाजाही बढ़ जाती थी वही माहौल मई आते ही फिर शुरू हो गया था. स्थानान्तरण सीजन में उसे बहुत दबाव में काम करना पड़ता था हर किसी की सिफारिश मानना संभव न हो पाने के कारण उसे बहुतों की नाराजगी झेलनी पड़ती थी.

ऐसे ही दबाव भरी एक दोपहरी में वह फाइलें निपटा रहा था. खिड़की से बाहर नजर पड़ते ही उसके दिल की धड़कन तेज हो गई थीं, बाहर बरामदे में उससे मिलने को वही धवल मूरत खड़ी थी. उस दिन चपरासी को उसने किसी को भी अंदर न भेजने के सख्त निर्देश दे रखे थे. चपरासी उस धवला को शायद उसके आफिस में न होने का बहाना बनाकर टरकाने की कोशिश में लगा था.

मोहन थोड़ी देर असमंजस में रहने के बाद घंटी बजाता है और यह दिखाने का प्रयास करता है कि उसको बाहर किसी के होने की कोई जानकारी नहीं है.

 ‘‘शंकर गर्मी बहुत है नीबू की शिकंजी ले आओ बाहर से….

 ‘‘सर बाहर बहुत देर से एक शिक्षिका आपसे मिलने को खड़ी है अगर आप कहें तो ……

मोहन सर हिलाकर इजाजत देकर फाइलों में खोने का अभिनय करने लगता है.

 ‘‘मे आई कम इन सर…….

मंदिर में बजने वाली घंटियों सी सुरीली आवाज सुनकर वह दरवाजे की तरफ देखता है, धवल छवि को कुर्सी की तरफ इशारा कर बैठने को कहता है.

धवला थैंक्स कह कुर्सी पर बैठती है तथा अपना प्रार्थना पत्र उनकी तरफ बढ़ाती है.

 ‘‘प्रार्थना पत्र पढ़ने के बाद मोहन को पता चलता है कि उसका नाम शारदा है, श्रीमती शारदा कुमारी. श्रीमती भी कुमारी भी, मोहन को गहरा झटका लगता है. शारदा बरेली जिले के दूरस्थ इलाके में स्थित इण्टर कालेज में कई वर्षों से तैनात थी. अब वह शहरी क्षेत्र में किसी कालेज में अपनी तैनाती चाहती थी जहां पर रहकर वह नौकरी के साथ अपने बूढ़े सास-ससुर की सेवा कर पायेगी. उसके पति की मृत्यु के बाद उसके अलावा उनका और कोई सहारा न था. अभी आवागमन में उसके कई घंटे व्यय हो रहे थे.

शारदा ने अपना स्थानान्तरण करवाने के लिए कोई सोर्स सिफारिश का सहारा नहीं लिया था. वह स्वयं सीधे सादे शब्दों में सीधे-सादे ढंग से अपनी परेशानी रख रही थी उसने तुरन्त शारदा के प्रार्थना पत्र पर उसकी मनचाही जगह पर पोस्टिंग के आदेश कर दिये थे.

मोहन शारदा से इस पहली ही आफिसियल मुलाकात में गहरी पीड़ा से भर गया था.

शारदा ने अपना स्थानान्तरण करवाने के लिए कोई सोर्स सिफारिश का सहारा नहीं लिया था. वह स्वयं सीधे सादे शब्दों में सीधे-सादे ढंग से अपनी परेशानी रख रही थी उसने तुरन्त शारदा के प्रार्थना पत्र पर उसकी मनचाही जगह पर पोस्टिंग के आदेश कर दिये थे.

शारदा को शायद विश्वास नहीं हो रहा था कि पहली बार में ही उसकी प्रार्थना सुन ली जायेगी. उसके चेहरे पर आभार के गहरे भाव प्रकट हुए थे. वह धन्यवाद के शिष्टाचारपूर्ण वाक्यों को बोलकर चली गई थी.

शारदा की एक गहरी छाप मोहन के दिलो दिमाग में छप गई थी. अमूमन शिक्षिकाओं को उसने अत्यधिक बोलने वाली अथवा आदेशपूर्ण ढंग से बात करने वाले रूप में देखा था. शारदा जैसी मृदृभाषी, गंभीर, सादगीपूर्ण एवं गरिमापूर्ण व्यक्तित्व वाली शिक्षिका ने मोहन जैसे धीर पुरूष को बेचैन सा कर दिया था. उसके जीवन की त्रासदी को उसके एक सरकारी प्रार्थना पत्र ने उजागर कर दिया था जिसको उजागर किये बिना शायद उसका प्रार्थना पत्र बेदम नजर आता और उसपर कोई कार्यवाही भी न होती.

इस भीड़ भरी दुनियां में चंद लोगों से रिश्ते बनने या बिगड़ने का खेल भी शयद ऊपर वाला ही खेलता है.

मोहन के घर पर होने पर मां मोहन के साथ नजदीक दूर के सारे रिश्तेदारों, जान-पहचान वालों के यहां जाने का कार्यक्रम बना लेती थी, मोहन चाहते हुए भी मां को इंकार न कर पाता. मोहन 35 वर्ष का हो गया था वह समझता था इतने होनहार काबिल, उच्च अधिकारी बेटे का इतनी बड़ी उम्र तक कुवांरे होने से मां बहुत बेचैन है. मां की मनोदशा को वह जानता था कि मां इसलिए भी हर जगह उसे साथ रखती है कि शायद कहीं पर कोई लड़की उसे पसंद आ जाय और वह शादी के लिए हां कर दे.

उस दिन भी गर्मी की शाम को 6 बजे के बाद उसे मां के साथ तीन घरों में मिलने, हालचाल लेने जाना पड़ा था. घर लौटते समय एक गली के मोड़ पर मां ने अचानक गाड़ी रूकवा दी थी- ‘‘ मोहन सामने वाला घर हमारे गांव के शिल्पकार का है. बेचारे बूढ़ा-बूढ़ी अकेले रहते हैं. जवान बेटा दो साल पहले शादी के महीना भर के अंदर ही चल बसा था अब वे जवान विधवा बहू के सहारे अपना जीवन काट रहे हैं. बहू भी किसी दूसरी जगह टीचर है जहां से घर पहुंचते-पहुंचते उसे रात हो जाती है…….

 ‘‘मां आप जाओ मैं सड़क पर आपका इंतजार करता हूँ. ‘‘ मोहन उबासी भर कर बोला था.

 ‘‘हां-हां बेटा ऐसा ही करो. वैसे भी कौन हमें इनके यहां बैठना है, अपनी तरफ के हैं इसलिए खड़े-खड़े हालचाल ले लूंगी. मोहन जानता है मां औपचारिकतायें निभाने में बहुत कुशल हैं.

वह सड़क किनारे गाड़ी लगाकर टहलने लगता है. बरेली की शाम और रातें बहुत गर्म नहीं होतीं. नैनीताल की पहाड़ियों में बहने वाली शीतल हवायें बहते-बहते बरेली तक अपनी शीतलता पहुंचा ही देती हैं.

मां सदा की तरह बातों में इतना खो गई थी कि उसे याद भी नहीं था कि उसके साथ कोई और भी है जो सड़क पर उसका इंतजार कर रहा है.

वह उकताकर उस अजनबी घर का गेट खड़काने लगता है जिसके भीतर एक घंटा पहले मां ने प्रवेश किया था. वह अचंभित था मां को गेट तक छोड़ने कोई नौजवान महिला आई थी वह महिला कोई और नहीं शारदा थी. मध्यम रोशनी में मोहन को पहचानकर तथा मां द्वारा बेटे के रूप में उसका परिचय पाकर शारदा भी अनमनी सी हो गई थी.

मां घर पहुंचने तक उस परिवार की करूण गाथा शारदा के त्याग आदि की बातें करती रही थी. मां खुश थी कि अब शारदा घर के नजदीक रहेगी तथा अपने सास-ससुर की सेवा और अच्छे से कर पायेगी.

मोहन चुपचाप सुनता रहा था उसने मां को भनक भी नहीं लगने दी कि शारदा से वह पहले मिल चुका है तथा उसी के कारण शारदा अब बरेली शहर में नौकर कर पायेगी.

एक अनजानी ताकत मोहन को शारदा की तरफ खींच रही थी. समाज में लीक से हटकर कुछ अलग करने की उसके दिल के एक कोने में हल्की सी ख्वाहिश भी थी.

मोहन के पिता को आये हार्ट अटैक ने शारदा को अपनी बूढ़ी सास के साथ मोहन के घर तक पहुंचा दिया था. शारदा को इस तरह अपने घर पर पाकर मोहन को एक अजीब सा सुकून मिला था. शारदा की आंखें भी कुछ बोल रही थीं, जिनको समझने का मोहन के पास उस समय मौका नहीं था.

शारदा और उसकी सास के प्रति मां द्वारा अपनाये गये व्यवहार से वह अंदर-अंदर खिन्न हो गया था. मां ने बड़ी चतुराई के साथ उन दोनों को बैठक के दरवाजे के पास रखी गई प्लास्टिक की कुर्सियों पर बिठा दिया था. घर पर आने वाले उन लोगों जिनकी जात-पात का मां को पता नहीं होता था, उनके लिए मां सदा अलग बर्तन रखती थी, उन्हीं में उसने शारदा और उसकी सास को चाय-पानी पिलाया था. शारदा की सास उन बर्तनों में भी चाय पीने में बहुत संकोच कर रही थी. चाय पीने के बाद उसने इशारा कर शारदा से वह बर्तन भी धुलवाये थे.

उन दोनों के जाने के बाद मोहन मां से उलझ गया था.

 ‘‘मां तुमने उन दोनों औरतों को क्यों इतना बेइज्जत किया? इससे तो अच्छा था उनके लिए गेट ही नहीं खोलती.. ..’’

मां ने उनकी पूरी कुण्डली खोल दी थी-‘‘ये लोग शहर में आ गये हैं तो क्या इनको अपनी रसोई में खड़ा कर दें? इनकी जगह जहां पर थी उनको वहां पर बिठाया गया.’’

मोहन खिन्न होकर गाड़ी लेकर बाहर निकल गया था. वह खुद शर्म से गड़ा जा रहा था. शारदा ने क्या धारणा बनाई होगी उसके प्रति शिक्षा के क्षेत्र का इतना बड़ा अधिकारी और कितनी भेदभाव भरी मानसिकता.

कुछ ही दूर पर उसे शारदा रिक्शा तय करते हुई मिल गई थी- ‘‘ अम्मा जी आप मेरी गाड़ी में बैठिये मैं आपको घर तक छोड़ देता हूँ.’’

वह शारदा से नजरें नहीं मिला पा रहा था.

दोनों सास-बहू संकोच के साथ उसकी गाड़ी में बैठ गई थीं.

बिना आमंत्रण के भी वह शारदा के ससुर जी का हालचाल लेने के बहाने घर के भीतर प्रवेश कर गया था. शारदा एवं उसके सास-ससुर विश्वास नहीं कर पा रहे थे कि घंटे भर तक दरवाजे पर खड़े होकर हालचाल लेने वाली मां का बेटा आराम से सोफे में बैठकर मांग कर चाय पी रहा है. आते समय जब शारदा उसे गेट तक छोड़ने आई थी तब उसने उसका टेलीफोन नम्बर ले लिया था.

इस संक्षिप्त पहली मुलाकात के बाद उन दोनों की बातों का सिलसिला चल पड़ा था. टेलीफोन पर कुछ दिनों की झिझक के बाद वे दोनों एक दूसरे को गुड मार्निंग कह कर ही बिस्तर छोड़ते तथा गुड नाइट कह कर सोने जाते थे.

ज्यों-ज्यों मोहन की उम्र बढ़ रही थी त्यों-त्यों मां की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी, मां रोज ही दो-तीन लड़कियों की फोटो उसके आगे रखकर मनुहार करती कि अब वह झट से हां कह दे. मां अपने तथा पिता के बुढ़ापे का हवाला देकर मोहन को पिघलाने की कोशिश करती थी.

जल्द ही दोनों की हसरतों को पंख लग गये थे, शारदा घंटों अपने जीवन की पीड़ायें मोहन को बताती और बताकर हल्कापन महसूस करती थी, महीनों टेलीफोन पर बातें करने के बावजूद दोनों ने कभी अपनी मर्यादाओं को नहीं लांघा था न किसी ने दूसरे से कोई अपेक्षा की थी न आमने-सामने मिलने की ख्वाहिश जाहिर की थी. बड़ा रूहानी सा आकर्षण था दोनों के बीच.

ज्यों-ज्यों मोहन की उम्र बढ़ रही थी त्यों-त्यों मां की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी, मां रोज ही दो-तीन लड़कियों की फोटो उसके आगे रखकर मनुहार करती कि अब वह झट से हां कह दे. मां अपने तथा पिता के बुढ़ापे का हवाला देकर मोहन को पिघलाने की कोशिश करती थी.

मोहन ने अब तक अपने दिल की इच्छा शारदा को भी नहीं बताई थी और न मां को अपनी ख्वाहिश बताने की उसकी हिम्मत थी. वह जानता था मां को यदि शक भी हो गया तो घर पर भूचाल आ जायेगा.

मां, मां थी, वह चुप रहने वालों में नहीं थी, मां ने अब ज्योतिषियों और गणना करने वालों की शरण लेना शुरू कर दी थी. मां आकर बताती ज्योतिषी कह रहा है-‘‘मोहन लेट विवाह करेगा परन्तु विवाह होगा उच्च कुल की कन्या के साथ और सफल वैवाहिक जीवन रहेगा उसका………..

वह मन ही मन सोचता मोहन बहुत जल्द ज्योतिषी के कथन को झूठा साबित करने वाला है.

एक दिन मां हांफते हुए घर आई थी, आते ही उसने मोहन की ढुंढाई शुरू कर दी थी, वह बेताब थी गणना करने वाले की बातें बताने के लिए.

वह कह रही थी-‘‘गणना में निकला है कि मोहन किसी गलत संगत में फंस गया है, वह अपने कुल को बहुत जल्द दाग लगाने वाला है…….

मां की बातें सुनकर मोहन तुरंत घर से निकल गया था. उसने उस दिन रात आठ बजे तक अपना दफ्तर खोला था. चपरासी को उसने 6 बजे छुट्टी दे दी थी और कमरा अंदर से बंद कर वह शारदा को टेलीफोन मिलाने लगा था.

 ‘‘शारदा आज मैं तुमसे बहुत सी बातें करना चाहता हूँ, आज आज मेरी जिन्दगी के फैसले की रात है जो बात मैं आज तक तुमसे नहीं कह पाया आज कहना चाहता हूँ और आज ही उसका उत्तर भी चाहता हूँ….

शारदा समझ नहीं पा रही थी कि आज अचानक मोहन क्या कहना चाहता है, उसका दिल धड़कने लगा था.

शारदा मैं तुमसे विवाह करना चाहता हूँ. मेरे मां-बाप तथा समाज इसके लिए कभी इजाजत नहीं देंगे तुम्हें बहुत हिम्मत के साथ मेरा साथ देना होगा.

मोहन की किसी बात का शारदा उत्तर नहीं दे पा रही थी. मोहन टेलीफोन में मात्र उसके सिसकने की आवाज सुन रहा था.

रात के दस बज चुके थे, वह मां को फोन कर बता देता है कि वह आज रात घर नहीं आ पायेगा उसे आफिस के काम से कहीं जाना पड़ रहा है.

 ‘‘शारदा मैं अभी तुमसे मिलना चाहता हूँ, तुम गेट खोलकर रखो मैं दस मिनट में पहुंच रहा हूँ….

शारदा के उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना उसने फोन काट दिया था.

शारदा के सास-ससुर सो चुके थे, शारदा डरी सहमी हुई गेट से सटी हुई खड़ी थी, वह कांप रही थी. मोहन गेट के भीतर प्रवेश कर बगीचे में खड़े विशाल कटहल के पेड़ के नीचे शारदा का हाथ पकड़ कर उसे लगभग खींचते हुए ले गया था.

 ‘‘शारदा मैं तुम्हारी सारी उदासियों, पीड़ाओं को दूर कर तुम्हारी मांग को खुशियों से भर देना चाहता हूँ. तुम्हें मुझ पर विश्वास करना होगा. इन जात-पांत के बंधनों तथा सामाजिक कुरीतियों को हमें तोड़ना होगा. तुम अपने अतीत को भूल जाओ, तुम्हारे सारे दुःख-दर्द, तुम्हारी सारी जिम्मेदारियां अब मेरी भी हैं….

भोर तक उस कटहल के पेड़ के नीचे शारदा मोहन की बाहों में जकड़ी रही थी, बिना एक शब्द बोले, आसुओं की धार से उसने उसकी कमीज को भिगो दिया था. यह स्थिति ऐसी थी जिसमें शब्दों का कोई महत्व नहीं रह गया था.

रात भर जगे होने के कारण दूसरे दिन दोपहर तक सोया रहा था मोहन. नींद में भी दिमाग में तनाव बना हुआ था, मां को कैसे बताया जाय अपने दिल का हाल, उसको अच्छे से मालुम था उसके निर्णय से घर की चूलें हिल जायेंगी, जिस मां ने शारदा को बैठक के दरवाजे से भीतर प्रवेश तक करने नहीं दिया था. क्या वह मां शारदा को बहू के रूप में गृह प्रवेश करायेगी?

मां बहुत चतुर एवं कुशल स्त्री थी, किसी से भी वह सीधा सवाल जवाब नहीं करती थी परन्तु वह दूसरों को झुका देने की अद्भुत कला जानती थी.

मोहन मानसिक मन्थन से जूझ रहा था तभी घर में अनेक लोगों के आने की हलचल उसे सुनाई दी.

मां आवाज दे रही थी-‘‘ कान्हा नहा-धोकर जल्दी तैयार हो जाओ, तेरे मामा-मामी, फूफा, बुआ सब आये हैं…..

मां जब उस पर बहुत लाड लड़ाती थी तो उसे कान्हा पुकारती थी.

मोहन इतने लोगों के अचानक एक साथ घर पर आ जाने से कुछ सशंकित हो गया था-कहीं ज्योतिषी की बात पर विश्वास कर मां ने काई प्लानिंग तो नहीं कर ली है?

बाहर वह चाहे कितना भी बड़ा अधिकारी हो पर घर पर तो वह ‘‘ ममाज ब्वाय’’ ही था अभी तक. मामूली पढ़ी मां के धाकड़ व्यक्तित्व के आगे उसकी पी.एच.डी. की डिग्री धरी की धरी रह जाती थी.

बैठक में जाने-अनजाने मेहमानों का जमघट लगा था, सारे लोगों ने उसे सरप्राइज देने की तैयारी कर रखी थी. दुर्गा, उसके मां-बाप रिश्तेदार पूरा खानदान सगाई की रस्म पूरी करने के लिए उसका इंतजार कर रहा था.

मोहन की आंखों के आगे अंधेरा हो गया था. मां खुशी से नाच रही थी, इतने इंतजार के बाद उसके घर में साक्षात दुर्गा ही बहू के रूप में आ रही थी.

मोहन ने कनखियों से दुर्गा की तरफ देखा था सौन्दर्य, कमनीयता, वैभव की प्रतिमूर्ति लग रही थी वह. वह शायद पौरूषहीन ही था या मां ने कोई सम्मोहन क्रिया उस पर करवा दी वह कठपुतली की तरह वह सब करता रहा जो मां कराती रही. एक रात पहले शारदा से की गई सारी बातें जैसे उसके मस्तिष्क से धुंधला गई थी. ज्योतिषी ने बिल्कुल सही गणना की थी दुर्गा के रूप में उसे बहुत अच्छी पत्नी मिली थी और मां को मनचाही बहू.

शारदा को वह भूल गया हो ऐसा भी नहीं था परन्तु उसका सामना करने की हिम्मत उसमें विल्कुल नहीं थी. बहुत बड़ा छल किया था उसने शारदा के साथ, जीवन में कई बार उसने स्वयं को धिक्कारा था.

बहुत दिनों बाद उसे पता चला था कि शारदा और उसके रिश्तों की खबर मां को हो गई थी. यदि वह मोहन से सीधे सवाल करती अथवा उस पर दबाव बनाती तो मोहन विद्रोही भी हो सकता था. इसलिए उसने बहुत सावधानी के साथ पूरी तैयारी की थी तथा उसमें विजयी भी हुई थी.

मोहन मां के प्रति अंदर ही अंदर नफरत से भर उठता था, ‘‘कैसी स्त्री है यह. शारदा के प्रति यह अभी भी भयभीत है. जबकि शारदा की अब वह प्रेम के साथ आंतरिक रूप से पूजा भी करने लगा था, इतना कुछ होने के बाद भी उसने कभी मोहन से संपर्क करने की कोशिश भी नहीं की थी.

मोहन को पता था मां अब भी शारदा तथा उसके सास-ससुर से मिलती रहती हैं. शारदा की छवि को दागदार बनाने तथा मोहन के दिल से उसको हटाने की वह भरसक कोशिश करती रहती थी.

मोहन मां के प्रति अंदर ही अंदर नफरत से भर उठता था, ‘‘कैसी स्त्री है यह. शारदा के प्रति यह अभी भी भयभीत है. जबकि शारदा की अब वह प्रेम के साथ आंतरिक रूप से पूजा भी करने लगा था, इतना कुछ होने के बाद भी उसने कभी मोहन से संपर्क करने की कोशिश भी नहीं की थी.

वर्षों उपरान्त मां द्वारा ही उसे शारदा के सास-ससुर के स्वर्गवास की खबर मिली थी. साथ में मां यह बताना भी नहीं भूली थी कि शारदा के बिगड़े चाल-चलन के कारण वे ज्यादा दिन नहीं जी पाये, यह सब बताकर मां शायद यह संकेत देना चाहती थी कि मां ने कितने बड़े शारदा रूपी संकट से मोहन को और अपने परिवार को बचाया है.

रिटायरमेंट के कुछ समय पहले उसे पता चला था कि शारदा ने एकाकीपन तथा अवसाद एवं असाध्य बीमारी से ऊबकर आत्महत्या कर ली थी.

पण्डा जी ने अनाम गोत्र की प्रेतयोनि में भटकती शारदा कुमारी का तर्पण मोहन के हाथों से करवा दिया था. अलकनन्दा में पिण्ड प्रवाहित करते हुए मोहन की आंखों से आंसुओं की कुछ बूंदें भी पिण्ड के साथ प्रवाहित हो रही थी.

लेखिका पूर्व संपादक/पूर्व सहायक निदेशक— सूचना एवं जन संपर्क विभागउ.प्र.लखनऊ. देश की विभिन्न नामचीन पत्र/पत्रिकाओं में समय-समय पर अनेक कहानियाँ/कवितायें प्रकाशित. कहानी संग्रह-पिनड्राप साइलेंस’  ‘ट्यूलिप के फूल’, उपन्यास-हंसा आएगी जरूर’, कविता संग्रह-कसक’ प्रकाशित)

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