Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—32प्रकाश उप्रेतीआज बात-"उमि" की. कच्चे गेहूँ की बालियों को आग में पकाने की प्रक्रिया को ही 'उमि' कहा जाता था. गेहूँ कटे और उमि न पके ऐसा हो ही नहीं सकता था. उमि पकाने के पीछे का एक भाव 'तेरा तुझको अर्पण' वाला था. साथ ही गेहूँ कटने की खुशी भी इसमें शामिल होती थी. गेहूँ काटना तब एक सामूहिक प्रक्रिया थी. गाँव वाले मिलकर एक -दूसरे के 'ग्यों' (गेहूँ) काटते थे. बाकायदा तय होता था कि "भोअ हमर ग्यों काट ड्यला, आघिन दिन त्यूमर" (कल हमारे गेहूँ काट देंगे, उसके अगले दिन तुम्हारे). सुबह से लेकर शाम तक सब खेत में ही रहते थे. वहीं सबके लिए खाना-पानी-चाय जाती थी. 'पटोक निसा' (खेत की दीवार की तरफ) बैठकर सब साथ में खाते थे. गाँव में जिसकी भी भैंस दूध देने वाली होती थी उनके वहाँ से छाँछ आ जाती थी. छाँछ पीने के बाद ईजा लोग बोलते थे- "गोअ तर है गो, त्यूमर भैंस रोज...
झोला भर बचपन

झोला भर बचपन

संस्मरण
हम याद करते हैं पहाड़ को… या हमारे भीतर बसा पहाड़ हमें पुकारता है बार-बार? नराई दोनों को लगती है न! तो मुझे भी जब तब ‘समझता’ है पहाड़ … बाटुइ लगाता है…. और फिर अनेक असम्बद्ध से दृश्य-बिम्ब उभरने लगते हैं आँखों में… उन्हीं बिम्बों में बचपन को खोजती मैं फिर-फिर पहुँच जाती हूँ अपने पहाड़… रेखा उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. हम यहां पर अपने पाठकों के लिए रेखा उप्रेती द्वारा लिखित ‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़ नाम की पूरी सीरिज प्रकाशित कर रहे हैं… आज प्रस्तुत है उनकी 15वीं किस्त ...‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—15रेखा उप्रेतीअभाव किसे कहते हैं हम नहीं जानते थे. जो था उसी को जानते और उसके होने से भरा-पूरा था अपना बचपन. भौतिक संसाधनों से शून्य, सुविधाओं की दृष्टि से महा विपन्न लेकिन प्रकृति की अनमोल नेमतों और प...
पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

साहित्‍य-संस्कृति
अशोक जोशीदेवभूमि, तपोभूमि, हिमवंत, जैसे कई  पौराणिक नामों से विख्यात हमारा उत्तराखंड जहां अपनी खूबसूरती, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं धार्मिक तीर्थ स्थलों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है,  तो वहीं यहां के लोक पर्व भी पीछे नहीं, जो इसे ऐतिहासिक दर्जा प्रदान करने में अपनी एक अहम भूमिका रखते हैं. हिमालयी, धार्मिक व सांस्कृतिक राज्य होने के साथ-साथ देवभूमि उत्तराखंड को सर्वाधिक लोकपर्वों वाले राज्य के रूप में भी देखा जाता है. विश्व भर में कोई त्यौहार जहां वर्ष में सिर्फ एक बार आते हैं तो वही हरेला जैसे कुछ लोक पर्व देवभूमि में वर्ष में तीन बार मनाए जाते हैं. हरेला लोक पर्व उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व है, जो विशेषकर राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में अधिक प्रचलित है. कुछ लोगों के द्वारा चैत्र मास के प्रथम दिन  इसे बोया जाता है, तथा नवमी के दिन काटा जाता है. तो कुछ जनों के द्वारा साव...
रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ती नई पीढ़ी

रूढ़िवादी परंपराओं को तोड़ती नई पीढ़ी

अभिनव पहल
‘प्रिया’ एक विचार हैसूर्या सिंह पंवारमेरे लिए प्रिया मेरी बेटी ही नहीं एक विचार है. एक ऐसा विचार जो हमारे समाज में लड़कियों के सम्मान, स्वाभिमान, सशक्तीकरण से जुड़ा है. शिक्षा में उन विचारों को स्थापित करने से है जिसमें सभी कामों का सम्मान हो. कोई भी काम छोटा व बड़ा नहीं हो. हमारे समाज में जो स्कूली शिक्षा हम अपने बच्चों को दे रहे हैं उसके परिणाम में हमने ऐसे कौशल व व्यवसायों को स्थापित किया है जो उसे खेती-बाड़ी और अपने पुश्तैनी काम-धंधों से दूर करते हैं. हेय दृष्टि से देखने लगते हैं. अधिकांशतः अभिभावक अपने बच्चों को डाक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर बनने के सपने ही दिखाते हैं. दफ्तर का काम श्रेष्ठ माना जाता है. खेती किसानी का काम छोटा माने जाने लगा है. इस तरह की आंकाक्षाएं किसी को भी शहर की ओर ही ले जाने का काम करती हैं.हमारे समाज में महिलाएं खेती के सभी काम करती हैं परन्तु हल नहीं चल...
पाप और पुण्य

पाप और पुण्य

संस्मरण
रवांई के एक कृषक की ईमानदारी का फलध्यान सिंह रावत ‘ध्यानी’मुझे आरम्भ से ही बुजुर्गों के पास उठना-बैठना बहुत भाता रहा है. अपने दादा जी के पास बैठकर मैं अनेकों किस्से-कहानियाँ बड़े ही चाव से सुना करता था. एक दिन घर पर हमारे निकट के करीबी रिश्‍तेदार का आना हुआ जो तब करीब बयासी (82) वर्ष के थे अब इस दुनिया में नहीं हैं. स्व. सब्बल सिंह रावत. रात्रि को भोजन के उपरांत जब मैंने उनके लिए बिस्तर लगाया तो सोने से पूर्व उन्होंने तेल मांगा और अपनी कमीज उतार कर दाहिने हाथ की बाजू में मालिश करने लगे. मेरी नज़र उनके उस हाथ पर पड़ी तो मुझे लगा सम्भवतः इन्हें कभी इस हाथ में बहुत गहरी चोट लगी होगी. मुझ से रहा नहीं गया और मैं ने पूछ ही लिया-‘‘नाना जी आपके इस हाथ में क्या कभी कोई चोट लगी थी?’’ मेरी जिज्ञासा और उत्सुकता को भांपते हुए उन्होंने मुझे अपने पास बैठने को कहा. उसी रजाई का एक छोर निकाल कर मैं ...
‘गंगा’

‘गंगा’

किस्से-कहानियां
कहानीसीता राम शर्मा ‘चेतन’रात्रि के आठ बज रहे थे. हमारी कार हिमालय की चोटियों पर रेंगती हुई आगे बढ़ रही थी. नौजवान ड्राइवर मुझ पर झुंझलाया हुआ था - “मैनें आपसे कहा था भाई साहब, यहीं रूक जाओं, आपने मेरी एक ना सुनी, अब इस घाटी में दूर-दूर तक कोई होटल-धर्मशाला है भी या नहीं क्या मालूम, शरीर थक चुका है.” ड्राइवर की बात सुन मित्र झुंझला उठा था “ये किसी की बात मानता ही नहीं. इसका क्या है अकेला है. यहां मेरा पूरा परिवार है. बीवी है, बच्चे है, कहीं कोई हादसा हुआ तो पूरा वंश खत्म हो जाएगा, कोई नाम लेने वाला भी नहीं होगा. देखों तो, बाप रे बाप, यहां से थोड़ी सी गलती से भी अगर गाड़ी का पहिया एक इंच इधर-उधर हो जाए तो हजारों फीट नीचे खाई में जा गिरेगे.”“आप लोगों को ऐसा लगता था तो रूक जाना था वहीं, मैनें तो बस इतना सोचा था कि चालीस किलोमीटर का रास्ता शेष है, पांच बज रहे हैं आठ बजे तक हम आराम...
हरेला : पहाड़ की लोक संस्कृति और हरित क्रांति का पर्व

हरेला : पहाड़ की लोक संस्कृति और हरित क्रांति का पर्व

साहित्‍य-संस्कृति
डॉ. मोहन चंद तिवारीइस बार हरेला संक्रांति का पर्व उत्तराखंड में 16 जुलाई को मनाया जाएगा.अपनी अपनी रीति के अनुसार नौ या दस दिन पहले बोया हुआ हरेला इस श्रावण मास की संक्रान्ति को काटा जाता है.सबसे पहले हरेला घर के मन्दिरों और गृह द्वारों में चढ़ाया जाता है और फिर  माताएं, दादियां और बड़ी बजुर्ग महिलाएं हरेले की पीली पत्तियों को बच्चों,युवाओं, पुत्र, पुत्रियों के शरीर पर स्पर्श कराते हुए आशीर्वाद देती हैं- “जी रये,जागि रये,तिष्टिये,पनपिये, दुब जस हरी जड़ हो, ब्यर जस फइये. हिमाल में ह्यूं छन तक, गंग ज्यू में पांणि छन तक, यो दिन और यो मास भेटनैं रये. अगासाक चार उकाव, धरती चार चकाव है जये, स्याव कस बुद्धि हो, स्यू जस पराण हो.”परम्परा के अनुसार हरेला उगाने के लिए पांच अथवा सात अनाज गेहूं, जौ,मक्का, सरसों, गौहत, कौंड़ी, धान और भट्ट आदि के बीज घर के भीतर छोटी टोकरियों अथवा लकड़ी के ...
पहाड़ों में अंधकार को उजाले से रोशन करने वाला एकमात्र साधन-लम्पू

पहाड़ों में अंधकार को उजाले से रोशन करने वाला एकमात्र साधन-लम्पू

संस्मरण
आशिता डोभालबात सदियों पुरानी हो या वर्तमान की हो पहाड़ों में जब भी बिजली जाती है तब हमारे पास एक ही साधन होता है लम्पू जो कई सालों से हमारे घर के अंधकार को दूर करने में हमारा उजाले का साथी होता था भले ही वर्तमान में पहाड़ों में कई गांव सुविधाओं से सुसज्जित हो गए है पर कई गांव आज भी सुविधाओं से वंचित है जहां आज भी रोशनी का एकमात्र साधन लम्पू ही है.साठ-सत्तर के दशक में समूचे पहाड़ में बिजली से तो क्या ही जगमगाई होगी पर लोगों ने अपने लिए जीवन जीने के संसाधनों को जुटाने के भरकस प्रयास किए होंगे. जीवन के अंधकार और शिक्षा के अंधकार को मिटाने के लिए पहाड़ में लोगों की अपनी अलग तरकीब रही है, पुराने समय में लोग रात के अंधेरे को दूर करने के लिए चीड़ के पेड़ के छिलके (पेड़ की जड़ की तरफ का भाग) का उपयोग करते थे. लोगों की रोजमर्रा की जीवन शैली में लकड़ी निकलना एक विशेष काम होता था. मिट्टी ...
अम्मा का वो रेडियो

अम्मा का वो रेडियो

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—31प्रकाश उप्रेतीआज बात- “आम्क- रेडू” (दादी का रेडियो) की. तब शहरों से गाँव की तरफ रेडियो कदम रख ही रहा था. अभी कुछ गाँव और घरों तक पहुँचा ही था. परन्तु इसकी गूँज और गुण पहाड़ की फ़िज़ाओं में फैल चुके थे. इसकी रुमानियत ‘रूडी महिनेक पौन जसि’ (गर्मी के दिनों की ठंडी हवा) थी. क्या बच्चे, क्या जवान और क्या बूढ़े सब इसकी गिरफ्त में थे. ‘अम्मा’ (दादी) के लिए यह एक नई चीज थी जिसके बारे में पहले उन्होंने सिर्फ सुन भर रखा था. प्रत्यक्ष दर्शन का यह पहला अवसर था. अम्मा का ज्यादा समय घर पर ही बीतता था. ईजा घर के बाहर का काम देखती थीं तो अम्मा घर पर हमारी रखवाली करती थीं. एक बार बौज्यू (पिता जी) दिल्ली से आए तो बोलता हुआ यन्त्र ले आए. घर में सबको बताया-"इहें रेडू कनि"(इसे रेडियो कहते हैं). उस रेडू को जानने और समझने की जितनी ललक हम में थी उससे कहीं कम अम्मा में भ...
अपराधी तो मारा गया… बस सवाल बाकी रह गए

अपराधी तो मारा गया… बस सवाल बाकी रह गए

समसामयिक
ललित फुलाराएनकाउंटर में आरोपित अपराधी, तो मारा गया पर अपराधी का पोषण करने वाले, सालों से उसे शरण देने वाले, उन रसूखदार कथित अपराधियों का क्या, जो हर बार पर्दे के पीछे ही रह जाते हैं. पर्दे के पीछे वाला यह खेल कभी सामने नहीं आ पाता. यह भी सच है कि अगर गिरफ्तार/सरेंडर किया हुआ अपराधी बच जाता, तो उसके सारे आका चौराहे पर आ जाते. राजनीति, नौकरशाही और अपराध के गठजोड़ कि पटकथा घरों से लेकर नुक्कड़ तक बांची जा रही होती. टीवी और अखबार भरे पड़े होते. कई सफेद कुर्तों पर कालीख पुत जाती. पर दुर्भाग्य है कि अपराध के पोषण वाली बेल बच गई, पत्ता तोड़ दिया गया.बिना सत्ता, शक्ति व धन के कोई गुंडा नहीं पनप सकता. जो लोग अपराधी के एनकाउंटर से खुश हैं, उनके लिए कानून नहीं भावनाएं सर्वोपरी है. ये ही भावनाएं अपराधी को भी बनाती है और नेता को भी! मैं इस त्वरित न्याय का पक्षधर नहीं हूं और न ही हर बार पुलिस ...