Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
आभासी दुनिया के बेगाने परिन्दे

आभासी दुनिया के बेगाने परिन्दे

सोशल-मीडिया
भुवन चन्द्र पन्तजमीनी हकीकत से दूर आज हम एक ऐसे काल खण्ड में प्रवेश कर चुके हैं, जहां हमारे चारों तरफ सब कुछ है भी, और नहीं भी. बस यों समझ लीजिए कि आप दर्पण के आगे खड़े हैं, दर्पण में आपकी स्पष्ट छवि दिख रही है, आपको अपना आभास भी हो रहा है, लेकिन हकीकत ये है कि आप उसमें हैं नही. कुछ इसी तरह की हो चुकी है, हमारी सोशल मीडिया की आभासी दुनिया. फेसबुक जैसे प्लेटफार्म पर आपके सैंकड़ो मित्रों की लम्बी फेहरिस्त होगी, लेकिन बमुश्किल गिने-चुने ही ऐसे मित्र होंगें, जो हकीकत की दुनिया में आपकी मित्र मण्डली से ताल्लुक रखते होंगे. ऐसे बेगाने मित्रों से गुलजार दुनिया में उनका रिश्ता केवल लाइक और कमेंट्स से ज्यादा कुछ नहीं है.सोशल मीडिया की दुनिया में प्रवेश के कई रास्ते हैं- फेसबुक, व्हाट्सऐप, इन्स्टाग्राम, ट्वीटर आदि-आदि. अब तो कोरोना काल में वेबिनार, वर्क फ्रॉम होम, ऑन लाइन कक्षाएं और मन्दिरों ...
चित्रकला की आधुनिकता का सफर

चित्रकला की आधुनिकता का सफर

कला-रंगमंच
जगमोहन बंगाणीकला, हजारों वर्षों से हमारी भावनाओं और विचारों को व्यक्त करने का एक माध्यम रही है. हालांकि कलाकार कला-रूपों के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते थे,  समय के साथ-साथ कला के रूपों में काफी बदलाव आया है. कला का निरंतर विकास, मानव के विकास को दर्शाता है और यह मान लेना भी आसान है because कि कला और मनुष्य एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं. कला के रूप हमें विभिन्न कला आंदोलनों, कला- "वादों", संस्कृतियों और यहां तक कि कभी-कभी समाजों को भी जानने में मदद करते हैं. कलाकारों के निरंतर अन्वेषण ने कला के इतिहास में कई कला परंपराओं को विकसित किया और हर बार कलाकारों ने पिछली पीढ़ी की तुलना में कुछ अलग खोज की है. परंपराओंयदि हम कला के आधुनिकीकरण के बारे में सोचते हैं, तो हम पाएंगे कि यह कलाकारों के अन्वेषण का परिणाम था. आज भी लोगों के लिए आधुनिक कला से अपरिचित because बनकर टिप्पणी करन...
‘ओ इजा’ उपन्यास में कल्पित इतिहास चेतना और पहाड़ की लोक संस्कृति

‘ओ इजा’ उपन्यास में कल्पित इतिहास चेतना और पहाड़ की लोक संस्कृति

साहित्यिक-हलचल
शम्भूदत्त सती का व्यक्तित्व व कृतित्व-2डॉ. मोहन चन्द तिवारीपिछले लेख में शम्भूदत्त सती जी के 'ओ इजा' उपन्यास में नारी विमर्श से सम्बंधित चर्चा की गई थी. इस उपन्यास का एक दूसरा खास पहलू पहाड़ के लोगों की इतिहास चेतना और लोक संस्कृति से भी जुड़ा है,जिसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. पहाड़ वालों ने अपने इतिहास और धार्मिक तीर्थस्थानों के सम्बन्ध में सदियों से जो अनेक प्रकार की भ्रांतियां और अंधरूढ़ियां पालपोष रखी हैं,ज्यादातर वे या तो किंवदंतियों या जनश्रुतियों पर आधारित हैं या साम्राज्यवादी अंग्रेज इतिहासकारों की सोच के कारण पनपी हैं. पहाड़ी समाज में कस्तूरी की गंध की तरह रची बसी इन भ्रांतियों को आज कोई प्राचीन ऐतिहासिक साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर खारिज भी करना चाहे तो नहीं कर सकता, क्योंकि ये आस्था और विश्वास के रूप में अपनी गहरी पैंठ बना चुकी हैं.यहां पहाड़ के विभिन्न मंदिरों और यह...
ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

ईजा को ‘पाख’ चाहिए ‘छत’ नहीं

Uncategorized
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—39प्रकाश उप्रेतीपहाड़ के घरों की संरचना में 'पाख' की बड़ी अहम भूमिका होती थी. "पाख" मतलब छत. इसकी पूरी संरचना में धूप, बरसात और एस्थेटिक का बड़ा ध्यान रखा जाता था. because पाख सुंदर भी लगे और टिकाऊ भी हो इसके लिए रामनगर से स्पेशल पत्थर मँगा कर लगाए जाते थे. रामनगर से पत्थर मंगाना तब कोई छोटी बात नहीं होती थी. अगर गाँव भर में कोई मँगा ले तो कहते थे-"सेठ आदिम छु, पख़्म हैं रामनगर बे पथर ल्या रहो" (सेठ आदमी है, छत के लिए रामनगर से पत्थर लाया है). ज्योतिष पाख की संरचना में एक 'धुरेणी' because (छत के बीचों- बीच बनी मेंड सी) दूसरी, "दन्यार" (छत के आगे के हिस्से में लगे पत्थर, जिनसे बारिश का पानी सीधे नीचे जाता था) और तीसरी चीज होती थी "धुँवार" (रोशन दान). इनसे ही पाख का एस्थेटिक बनता था. ज्योतिषपाख में जो "धुरेणी" होती थी वह सबसे महत्वपूर्ण थी. वही...
दुना नदी के तट से

दुना नदी के तट से

संस्मरण
बुदापैश्त डायरी-8डॉ. विजया सतीजब हम बुदापैश्त में थे, ऐसे अवसर भी आए जब देश और विदेश एक हो गए! ... वह तीस जनवरी की सुबह थी,  दुना नदी के किनारे की ठंडक ने देह में सिहरन पैदा की. तट से ज़रा ही दूर, वाहनों की आवाजाही के बीच सड़क का एक कोना धीरे-धीरे सजीव हो उठा.ज्योतिष गुमसुम सी उस इमारत के सामने एक-एक because कर कई जन आ जुटे जिसकी दीवार पर लगे संग-ए-मरमर पर सुनहरे अक्षरों में अंकित था – इस मकान में 30 जनवरी 1913 को जन्म लिया– भारतीय पिता उमराव सिंह शेरगिल और हंगेरियन मां अंतोनिया की बेटी के रूप में चित्रकार अमृता शेरगिल ने!ज्योतिष चित्रकार की स्मृति को अनौपचारिकता के साथ because समर्पित इस कार्यक्रम में बूढ़े, युवा, सामान्य, विशिष्ट - सभी जन सहज भाव से बारिश की बूंदों के बीच केवल अमृता शेरगिल की स्मृति से स्पंदित खड़े थे.ज्योतिषअमृता शेरगिल बीसवीं सदी की because म...
संकट में है आज विश्वमैत्री का प्रतीक हिमालय पुष्प ‘ब्रह्मकमल’

संकट में है आज विश्वमैत्री का प्रतीक हिमालय पुष्प ‘ब्रह्मकमल’

समसामयिक
2 अगस्त विश्वमैत्री दिवस पर विशेषडॉ. मोहन चन्द तिवारीआज 2अगस्त प्रथम रविवार के दिन को अंतरराष्ट्रीय मित्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस अवसर पर मैं विश्वमैत्री का संदेश देने वाले संजीवनी तुल्य हिमालय के दुर्लभ पुष्प ‘ब्रह्मकमल’ के सम्बंध में सभी पर्यावरण प्रेमी मित्रों को बताना चाहता हूं कि खलजनों की मित्रता के समान भारतराष्ट्र की अस्मिता का प्रतीक यह उत्तराखंड का राज्यपुष्प 'ब्रह्मकमल’ आज संकट के दौर में है. ‘ब्रह्मकमल’ ऊँचाई वाले क्षेत्रों का एक दुर्लभ पुष्प है जो कि सिर्फ हिमालय,उत्तरी बर्मा और दक्षिण-पश्चिम चीन में पाया जाता है.वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से ‘ब्रह्मकमल’ एस्टेरेसी कुल का पौधा है. इसका वैज्ञानिक वानस्पतिक नाम ‘सोसेरिया ओबोवेलाटा’ Saussurea obvallata है.सामान्य तौर पर ‘ब्रह्मकमल’ हिमालय की पहाड़ी ढलानों या 3000-5000 मीटर की ऊँचाई में पाया जाता है. वर्त...
सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

सुन रहे हो प्रेमचंद! मैं विशेषज्ञ बोल रहा हूँ

साहित्यिक-हलचल
प्रकाश उप्रेतीपिछले कई दिनों से आभासी दुनिया की दीवारें प्रेमचंद के विशेषज्ञों से पटी पड़ी हैं. इधर तीन दिनों से तो तिल भर रखने की जगह भी नहीं बची है. एक से बढ़कर एक विशेषज्ञ हैं. नवजात से लेकर वयोवृद्ध विशेषज्ञों की खेप आ गई है. गौर से देखने पर मालूम हुआ कि इनमें तीन तरह के विशेषज्ञ हैं. वैसे तीनों कोटि के विशेषज्ञ नाभिनालबद्ध हैं. because अंतर बस आभा में है. तीनों की अंतरात्मा जोर देकर यही कहती है- प्रेमचंद पर भी पढ़ना पड़ेगा क्या? उन पर तो बोला जा सकता है. इस भाव के साथ ये प्रेमचंद की आत्म को बैकुण्ठ देने मैदान में उतर आते हैं. इन तीन कोटि के विशेषज्ञों के बारे में थोड़ा जान लें- ज्योतिष इनमें पहली कोटि के विशेषज्ञ वो हैं जिन्होंने सालों- साल से प्रेमचंद की कोई कहानी तक नहीं पढ़ी है. ये प्रथम कोटि के विशेषज्ञ हैं. ये पूर्वज्ञान के बल पर ही प्रेमचंद को निपटा देते हैं. because यह कोई पहला...
विश्व-साहित्य के युगनायक- प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन 

विश्व-साहित्य के युगनायक- प्रेमचन्द, गोर्की और लू शुन 

साहित्यिक-हलचल
मुंशी प्रेमचंद के जन्मदिन पर विशेषडॉ. अरुण कुकसालप्रेमचंद, गोर्की और लू शुन तीन महान साहित्यकार, कलाकार और चिंतक. जीवनभर अभावों में रहते हुए अध्ययन, मनन, चिन्तन और लेखन के जरिए बीसवीं सदी के विश्व-साहित्य के युगनायक बने. एक जैसे जीवन संघर्षों के कारण तीनों वैचारिक साम्यता, स्वभाव और व्यवहार के भी करीब थे. पढ़ने-लिखने का चस्का तीनों पर बचपन से था. प्रेमचन्द के पहले अध्यापक एक मौलवी थे जो उन्हें उर्दू-फारसी सिखाते थे. गोर्की ने अपनी नानी से सुनी कहानियों की हकीकत जानने की जिज्ञासा से पढ़ना शुरू किया. लू शुन मेघावी छा़त्र थे इस कारण पढ़ने का जनून उनमें बचपन से ही था. तीनों के पिता का निधन बचपन में ही हो गया था. निर्धनता के कारण पढ़ने के लिए कई कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा था. पर अपनी स्वाध्याय के प्रति जबरदस्त जिद्द के कारण उन्होनें हर मुसीबत का डटकर मुकाबला किया था.जनवादी लेखक हंसर...