झोला भर बचपन

हम याद करते हैं पहाड़ को… या हमारे भीतर बसा पहाड़ हमें पुकारता है बार-बार? नराई दोनों को लगती है न! तो मुझे भी जब तब ‘समझता’ है पहाड़ … बाटुइ लगाता है…. और फिर अनेक असम्बद्ध से दृश्य-बिम्ब उभरने लगते हैं आँखों में… उन्हीं बिम्बों में बचपन को खोजती मैं फिर-फिर पहुँच जाती हूँ अपने पहाड़… रेखा उप्रेती दिल्ली विश्वविद्यालय, इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में बतौर एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं. हम यहां पर अपने पाठकों के लिए रेखा उप्रेती द्वारा लिखित ‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़ नाम की पूरी सीरिज प्रकाशित कर रहे हैं… आज प्रस्तुत है उनकी 15वीं किस्त …


‘बाटुइ’ लगाता है पहाड़, भाग—15

  • रेखा उप्रेती

अभाव किसे कहते हैं हम नहीं जानते थे. जो था उसी को जानते और उसके होने से भरा-पूरा था अपना बचपन. भौतिक संसाधनों से शून्य, सुविधाओं की दृष्टि से महा विपन्न लेकिन प्रकृति की अनमोल नेमतों और पुरखों की जोड़ी थात से परिपूर्ण श्रम-साध्य पहाड़ी जीवन का एक छोटा-सा हिस्सा हमारे बचपन की झोली में पड़ा.

पत्थर लकड़ी और गारे से बना कच्चा-पक्का मकान, धुँए से भरे गोठ में मिट्टी के चूल्हे में पकती रोटियों की गंध, भड्डू में खदबदाती दाल, खुला आँगन और हरी-भरी पहाड़ियों से घिरी सुन्दर वादियाँ …

मिटटी और गोबर से लिपे चाख के कोने में किलकारी मारता जनमता बचपन … प्रति साँझ  सोहर में गाया जाता,- “ सोने के पलने में झूल रे… चाँदी के झुझने से खेल रे…” पर हकीकत यह थी कि गूदड़ी में ही पलते पहाड़ के लाल… हम तो बड़े भाग्यवान थे, घर के भीतर दाई के संरक्षण में जन्मे… सुनते थे कि फलानी आमा जब जंगल में लकड़ी बीनने गयी थी तो वहीं प्रसव पीड़ा उठी… बच्चे का जन्म हुआ, घास काटने की दराती से खुद ही नाल काटी और वासुदेव की तरह डलिया में लाल को उठाए घर पहुँची…

कुनमुनाने पर डलिया हिलाकर, ‘ता ता’ कहते हुए ताली बजाकर, ‘काबुड़ी-काबुड़ी’ कहते हुए उसे गुदगुदाकर बहलाया जाता. आँख खोलता तो आसपास खूब कौतिक…. आमा, बड़बाज्यु, जेड्जा, ईजा, काखी, बुआ, ददा, दीदी … और-पौर, तलि-कुड़ी, मल-कुड़ी, पूरी बाखई के कई-कई संबोधनों वाले कितने-कितने मानुसों से भरा अपना समाज  …

डलिया बड़े काम की चीज थी. इसमें गाय भैस के लिए घास काट कर लायी जाती, उनके गोठ से निकली खाद इसी में भरकर खेत पहुँचती, खेत से आलू इसी में ढुलकर घर पहुँचते… और घर में नन्हा मेहमान आने पर इसी में गूदड़ी बिछा पालना बन जाता… कुनमुनाने पर डलिया हिलाकर, ‘ता ता’ कहते हुए ताली बजाकर, ‘काबुड़ी-काबुड़ी’ कहते हुए उसे गुदगुदाकर बहलाया जाता. आँख खोलता तो आसपास खूब कौतिक…. आमा, बड़बाज्यु, जेड्जा, ईजा, काखी, बुआ, ददा, दीदी … और-पौर, तलि-कुड़ी, मल-कुड़ी, पूरी बाखई के कई-कई संबोधनों वाले कितने-कितने मानुसों से भरा अपना समाज  …

खिलौने नहीं थे पर खेल अनगिनत…

होश सम्हालते ही अपने इजा-बाज्यू, बुआ-कैंजा या बड़ी दीदी के घुटने से सट कर झूलना और तुतलाते हुए दोहराना वह गीत-
“घुगुती बासुती
को खालो मी खूल
को देलो आम देली
के देली दुद भाता…”

कुछ बड़े हुए तो चाख में बिछी दर्जन भर नन्हीं हथेलियों पर दीदी की ऊँगली से गुदगुदी लगाती ‘अक्कड़-बक्कड़”… सब की नज़रें उसी उँगली के साथ घूमती और उत्सुकता से देखती कि ‘चौखंडी की चिड़िया’ किस हथेली पर थमेगी… फिर एक-एक कर सारी हथेलियाँ पीठ पीछे छुप जातीं और शुरू होता कल्पनाओं की उड़ान भरती कहानियों का दौर. दीदी एक एक से पूछती ‘तुम्हारे हाथ कहाँ हैं? जवाब में हर नन्हा अलहदा कहानी सुनाता. किसी के हाथ जंगल में गाय चराते समय भालू ने खा लिए, तो किसी का गाड़ पार करते हुए मसाण से सामना हो गया, कोई कुकुर ले जा रहे बाघ से भिड़ गया तो हाथ गवाने पड़े… हर एक की कहानी बड़ी उत्सुकता से सुनी जाती और अंत में खिलखिलाते हुए सब अपने हाथ आगे कर नचाने लगते… “ हमार हाथ याँ छन” और सोचते कि हमने दीदी को बुद्धू बना दिया…

पहाड़ के पारंपरिक घर. सभी फोटो गूगल से साभार

खेल यहीं ख़त्म नहीं होता, अब छोटी-छोटी मुट्ठियाँ एक के ऊपर एक चढ़ मीनार बनातीं और उसे ऊपर-नीचे झुलाते हुए सब एक स्वर में गाते–
“च्यूं मुसी च्यूं
घट पीसी ल्यूं
ए मण मडू
द्वि मण ग्युं..”

फिर ‘राइ-मेसी राइ-मेसी’ कहते हुए सब हथेलियाँ आपस में उलझ खिलखिलाने लगतीं…

‘अड्डू’ यानी हथेली बराबर गोल पत्थर का टुकड़ा…

आँगन के बड़े से आयताकार स्लेटी पत्थर पर खड़िया से आठ खाने खींच इसी अड्डू से खेलती हम लडकियाँ. एक पैर पर उछलती, रेखाओं से बनी सरहदों को टाप-टाप कर पार कर जातीं. चचेरी, ममेरी, फुफेरी बहनें खोजी निगाहों से देखतीं कि उछाल कर डाला गया अड्डू सही खाने में पड़ा है या नहीं… पैर किसी रेखा को छू तो नहीं गया …क्योंकि यही गलतियाँ करने पर कोई आउट हो जाता और दूसरी को खेलने का मौका मिलता… कई बार अड्डू जी खुद ही खेल जाते और पहिए की तरह घूमने हुए सरहद पार पहुँच, हमें हरा देते…

जनाब ‘गिड्डू’ तो और निराले… आप इन्हें गेंद का पहाड़ी संस्करण कह सकते हैं. फटे-पुराने कपड़ों को कस बनाया गया ठोस गोलाकार खिलौना… सुई-धागे से सिल गया तो ठीक वरना ऊन से खूब कसकर बाँध दिया जाता. फिर चाहे उसे उछाल-उछाल कर लपकते रहो, चाहे पिठ्ठू पर निशाना लगाओ और पिट्ठू की चिनाई करने वाले को खींचकर मारो. कभी कपड़े धोने वाले मुंगर का जोड़ीदार बनाकर ‘किरकेट’ खेल लो… गिड्डू से कभी हम खेलते, कभी गिड्डू हमसे खेलता… कभी सबेली या पा’ख में अटकता, कभी दाड़िम, नींबू के पेड़ पर लटकता, कभी नीचे के बाड़े में सटकता, कभी लुड़कता हुआ ढलान पर उगी झाड़ियों में जा छिपता… खूब छकाता.

‘आइस-पाइस’ में धप्पा खा आउट हो गए या कभी रोमंची खाकर बच लिए, हरा समंदर खेलते हुए गोपिचंदर की रोटियाँ खा भाग लिए, कोयले से पत्थरों पर लकीरें खींच ‘चील-चील काटा’ किया तो कभी डांसी ढूंग (चकमक पत्थर) रगड़कर चिंगारियाँ निकाल आँखों में चमक भर ली…

माँ की साड़ी की कतरनों से गुड़िया बना उसका ब्याह रचा लिया, खुमानी के पेड़ तले पत्थरों से घर बना लिया, चीड़ के छोटे-बड़े ठीठों से बकरियाँ बना लीं, छोटे-छोटे गोल पत्थर तराश कर ‘दाणी’ यानी गिट्टियाँ बना लीं, पुरानी कापियों के पन्ने फाड़ हवाई जहाज बना कर उड़ा लिए, ‘अंठी’ या पंजी-दस्सी लेकर ‘घुच्ची’ खेल लिए, भेक्कू के पेड़ की नाजुक टहनियों में बैठकर सवारी कर ली, घंतर मारने की प्रतियोगिता यानी किसका फेंका पत्थर कितनी दूर जाएगा…

घर में लालू नाम के कुकुर और पूसी कहलाती बिराव के बच्चे हमारे संग-संग फिरते, सुबह गाय बच्छियों को ‘हकाने’ जंगल तक जाते, फिर पाटी-दवात लेकर इस्कूल, तीसरे पहर झुण्ड बनाकर नौला पहुँच गए और भीगते-भागते पानी भर लाए, शाम को आँगन में ईजा-काखी की साड़ियाँ लपेट कर नाच दिखा दिया, कभी चार हथेलियों ने मिलकर ‘किकली’ खेल ली और गोलगोल घूमते हुए गाया-
‘अखोव कुटी छल्लर-बल्लर
भात पकायो रस
सासु की कमर टूटी
ब्वारिल करी झस’

बरसात के दिनों में अक्सर बहुत सारी छोटी तितलियाँ निकल आतीं… पूरा आँगन भर जाता, उनके पीछे भागते हुए हम गाते-
पुरपुतई घाम दे
मडुए बालड़ धान दे…

कभी बारिश के साथ धूप निकल आए तो ‘घाम-द्यो स्याव’क ब्या’ गाते हुए सियार की शादी रचा लेते. किसी की बारात के उत्सुक दर्शक बन जाते,  होलियों में होलियारों की गाती टोली के साथ आँगन-आँगन फिरते गोले की कतरने इकट्ठी कर लीं, मकर संक्रांति को घुगुते की माला पहन कव्वों को टेर लिया, फूलदेई की पहली शाम दौड़-दौड़ कर टोकरी भर फूल चुन लिए और सुबह सबकी देहरियों को अक्षत-फूल से पूजते हुए गाते-
फूल देई छम्मा देई
दैंणी द्वार भरी भकार…

खतडुआ सजा लिया, हरेले की पहली साँझ को मिट्टी के डिगार (शिव-पार्वती) बनाकर मूर्तिकार हो गए, जन्माष्टमी को कृष्णलीला के पटचित्र बना कलाकारी आजमा ली, मंजीठे की पत्तियाँ चुनकर पीस लीं और हाथों को रचा लिया, हरी पत्ती को हाथ पर रख छाप लिया और सफ़ेद टेटू बना देख खुश हो गए, बसंत-पंचमी को पीला रुमाल रंगा लिया, कभी झोड़े खेलती महिलाओं के साथ कदम मिला गा लिया –
ग्युं खेत न जाए, कमला ग्युं बालि टूटैली …
द्वी लटि झन करिए, कमला धमेली छुटैली

यादों की नदी का बहाव बार-बार पीछे, बहुत पीछे बहा ले जाता है… वर्षों का अंतराल, भौगोलिक दूरियाँ, जीवन में उपजते नित नए जंजाल भी पहाड़ में बीते बचपन के वैभव को धूमिल नहीं कर पाए हैं…  बचपन के बस्ते में पहाड़ का जादूई तिलिस्म है … कौन चाहेगा इसकी कैद से मुक्त होना…

पथरीली उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर दौड़ते तो धड़ाम गिरते भी और घुटने भी छिलते, रास्तों के दोनों तरफ उगे सिस्युण के पत्तों से छू जाते तो बिच्छू के डंक-सा टीसता रहता वह हिस्सा, किल्मोड़े और हिसालू के काँटे भी यदा-कदा खरोंच देते, चौमासे में जौंक चिपक कर खूनमखून कर देती, गर्मी बढ़ते ही साँप निकल कर रास्तों में, बाड़े के बीचों-बीच और कभी-कभी आँगन के किनारे पसरा हुआ दिख जाता, रात के घुप्प अँधेरे में दबे पैर आते बाघ का डर तो कभी अजानी आकृतियों की कल्पना मात्र से सिहर उठते हम… बड़ी रहस्यमय होतीं वे सभी रातें…आकाश में चमचमाते असंख्य तारे, पेड़ों को जगमगाते जुगनू… दूर नदी किनारे के खेतों में रौशनी के टिमटिमाते धब्बे… इन्हीं रातों में सहमे हुए से ईजा से चिपक कर सोना तो कभी छिलुक के झल-मल उजाले के सहारे किसी के घर के जागरण, रत्याली, जागर या रामलीला से लौटना…

यादों की नदी का बहाव बार-बार पीछे, बहुत पीछे बहा ले जाता है… वर्षों का अंतराल, भौगोलिक दूरियाँ, जीवन में उपजते नित नए जंजाल भी पहाड़ में बीते बचपन के वैभव को धूमिल नहीं कर पाए हैं…

बचपन के बस्ते में पहाड़ का जादूई तिलिस्म है … कौन चाहेगा इसकी कैद से मुक्त होना…

(लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय के इन्द्रप्रस्थ कॉलेज के हिंदी विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं) 

 

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