September 20, 2020
किस्से/कहानियां

‘गंगा’

कहानी

  • सीता राम शर्मा ‘चेतन’

रात्रि के आठ बज रहे थे. हमारी कार हिमालय की चोटियों पर रेंगती हुई आगे बढ़ रही थी. नौजवान ड्राइवर मुझ पर झुंझलाया हुआ था – “मैनें आपसे कहा था भाई साहब, यहीं रूक जाओं, आपने मेरी एक ना सुनी, अब इस घाटी में दूर-दूर तक कोई होटल-धर्मशाला है भी या नहीं क्या मालूम, शरीर थक चुका है.” ड्राइवर की बात सुन मित्र झुंझला उठा था “ये किसी की बात मानता ही नहीं. इसका क्या है अकेला है. यहां मेरा पूरा परिवार है. बीवी है, बच्चे है, कहीं कोई हादसा हुआ तो पूरा वंश खत्म हो जाएगा, कोई नाम लेने वाला भी नहीं होगा. देखों तो, बाप रे बाप, यहां से थोड़ी सी गलती से भी अगर गाड़ी का पहिया एक इंच इधर-उधर हो जाए तो हजारों फीट नीचे खाई में जा गिरेगे.”

“आप लोगों को ऐसा लगता था तो रूक जाना था वहीं, मैनें तो बस इतना सोचा था कि चालीस किलोमीटर का रास्ता शेष है, पांच बज रहे हैं आठ बजे तक हम आराम से गंगोत्री पहुंच जाएगें, वहीं रात्रि विश्राम कर सुबह पैदल यात्रा आरम्भ कर देंगे. पर इस जाम ने हमें लेट कर दिया. आप लोग इतना ना डरे, कुछ नहीं होगा, फिर ड्राइवर से कहा था “यार तुम्हे आगे जो भी रहने की पहली जगह दिखे, रोक लेना”

इससे पहले कि वे चुप होते उनकी पत्नी शुरू हो गई थी- “वहीं रूक जाना था, अनजान जगह, पहाड़ी रास्ता, साथ में परिवार, रिस्क नहीं लेना चाहिए था”. उनके साथ उनके वृद्ध पिताजी और फिर मित्र की माताजी सिलसिला जारी रखते बच्चे सभी मुझे दोष दिये जा रहे थे. मैं झुझंला उठा था- “आप लोगों को ऐसा लगता था तो रूक जाना था वहीं, मैनें तो बस इतना सोचा था कि चालीस किलोमीटर का रास्ता शेष है, पांच बज रहे हैं आठ बजे तक हम आराम से गंगोत्री पहुंच जाएगें, वहीं रात्रि विश्राम कर सुबह पैदल यात्रा आरम्भ कर देंगे. पर इस जाम ने हमें लेट कर दिया. आप लोग इतना ना डरे, कुछ नहीं होगा, फिर ड्राइवर से कहा था “यार तुम्हे आगे जो भी रहने की पहली जगह दिखे, रोक लेना”. इससे पहले कि वह आगे कुछ बोलता मैनें सामने देखा था सड़क के किनारे एक 15-16 वर्ष का बच्चा हाथ में लालटेन और टार्च लिये खड़ा था, वह हमारी कार को रूकने का इषारा कर रहा था. मैनें देखा बिजली कटी हुई थी, बायीं तरफ एक पांच-छह कमरों का मकान था जिसके बरामदे में एक लालटेन टंगी हुई थी. मैनें गाड़ी रूकवाई और बिना किसी से कुछ बोले उतरकर उस मकान की ओर बढ़ गया था. गाड़ी के रूकने की आवाज सुन एक बीस-बाईस वर्ष की पहाड़ी लड़की हाथ में टार्च लिये बाहर निकलते हुए लड़के से पूछ रही थी- ‘कितने लोग है’

गंगोत्री यात्रा. सभी फोटो सांकेतिक एवं गूगल से साभार

मैनें करीब जाते हुए कहा था – तीन आदमी है दो औरत और तीन बच्चे है, दो कमरे होगे तो रात निकल जाएगी.

“दो ही कमरे खाली है, आओ देख लो, डबल बेड है बच्चों को एडजस्ट करना होगा.”

मेरे कुछ बोलने से पहले मित्र की पत्नी ने आते हुए कहा था – “कोई बात नहीं, किसी तरह एडजस्ट कर लेगे. लाईट नहीं है क्या”

“अभी-अभी कटी है जी, थोड़ी देर में आ जाएगी”. उसने विश्‍वास दिलाने की कोशिश की थी, जिसकी आवष्यकता हममें किसी को नहीं थी. हमें रूक जाना था, सो रूक गये.

लड़की ने हमारे आर्डर पर आधे घण्टे में अपनी माँ के साथ मिलकर दाल और गर्म-गर्म रोटियाँ खिलायी थी. दाल और रोटी का वह स्वाद ना कभी घर में मिला था ना किसी बड़े रेस्टोरेंट में. सभी खाकर सो चुके थे पर मेरी आंखों में नींद नहीं थी. मित्र की आवाज अभी भी मेरे कानों में गुंज रही थी- “इसका क्या है अकेला है”.

दुनिया भर की खबरों को देखता किसी के भी अच्छे काम मुझे खुशी देते है, ठीक वैसे ही उनकी बुराईयों को देख झुझंलाता हूँ, क्यों ? कहीं ना कहीं शायद उनसे मेरा कोई रिश्ता जरूर है, क्या है ? खोजता हूँ और फिर नहीं भी क्योंकि विष्वास है कि वे भी मेरी तरह मनुष्य है और इसलिए एक रिश्ता है जरूर उनसे. फिर मित्र ने मुझे ऐसा क्यों कहा. मुझे अकेला क्यों समझा.

मैं सोचता रहा क्या सचमुच मैं अकेला हूँ. नहीं घर में मेरी पत्नी, दो बच्चें है माँ-पिताजी, भाई-बहन पूरा परिवार है. नहीं, उनके सिवा भी बहुत लोग है यार दोस्त, परिचित और फिर मेरा शहर, शहर ही क्यों देश, दुनिया क्या यह मेरी नहीं है. बचपन से आज तक मैं तो हर किसी का दुख सुनकर द्रवित, दुखी होता आया हूँ अव्यवस्था घर में हो, शहर में हो, देश में या दुनिया में हो, मैं विचलित होता रहा हूँ. दुनिया भर की खबरों को देखता किसी के भी अच्छे काम मुझे खुशी देते है, ठीक वैसे ही उनकी बुराईयों को देख झुझंलाता हूँ, क्यों ? कहीं ना कहीं शायद उनसे मेरा कोई रिश्ता जरूर है, क्या है ? खोजता हूँ और फिर नहीं भी क्योंकि विष्वास है कि वे भी मेरी तरह मनुष्य है और इसलिए एक रिश्ता है जरूर उनसे. फिर मित्र ने मुझे ऐसा क्यों कहा. मुझे अकेला क्यों समझा.

विचारों की झंझावत में फंसा सोचता रहा था कि तभी घुटन सी महसुस हुई, मैं बरामदे में निकल आया. देखा माँ-बेटी दोनों एक कम्बल में सटी सोने की तैयारी कर रही थी, मुझे देखते ही युवती ने कहा था – कुछ चाहिए क्या साब जी ?

“नहीं, नहीं आपलोग सो जाए, मैं तो बस यूं ही नींद नहीं आ रही थी तो सोचा थोड़ा टहल लूँ.”

“नहीं, नहीं साब जी बाहर मत जाना. लाईट आयी नहीं है और फिर आजकल कुछ जंगली जानवर रात में इधर आ जाते है. अभी कल रात ही यहां से थोड़ा नीचे एक आदमी को घायल कर दिया था, ये तो उसके परिवार वालों ने देख लिया जो बचा लिया उसे.”

“चलो कोई बात नहीं जी”, मैनें बरामदे में रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा था. मैनें देखा युवती मुझे बैठता देख दीवाल के सिरहाने बैठने लगी थी. उसे बैठता देख मैनें कमरे में जाना मुनासिब समझा सो मैनें उठते हुए कहा था- “अरे आप सो जाओ. आराम करो. मैं भीतर चला जाता हूँ.”

“नहीं-नहीं साब जी, आप बैठो, हम कोई थके नहीं है, हम तो दिन में खुब सो लेते है क्योंकि यहां तो रात में ही लोग रूकते है, दिन उगते ही यात्रा पर निकल जाते है.”

मैं बिना कुछ बोले उसकी बातों की सहमति में सिर हिलाता बैठ गया था. मैनें देखा वह एकटक मुझे देखे जा रही थी.

‘ये तुम्हारी माँ है.’

‘जी’ उसने सिर हिलाते हुए कहा था.

और वो लड़का जो सड़क पर हमारी गाड़ी रोक रहा था.

‘नीचे पहाड़ी पर रहता है रोज शाम को यात्रियों को रूकवाकर चला जाता है.’

‘वो तुम्हारा रिश्‍तेदार है.’

“खून के रिश्‍ते में तो नहीं साबजी, पर है तो सभी अपने.”

उसकी बात ने मेरे हृदय में प्यार, स्नेह के शांत पड़े सागर में कंपन ला दिया था. पहली बार मैनें नजरें टिकाये उसे गौर से देखा था. मेरी आँखों के अपनापन को महसुसती वह भी मुझे निहारती रही थी.

“तुम्हारे पिताजी“

“वो नहीं है” उसने आगे बिना इंतजार किये बात काट दी थी.

“नहीं है मतलब?“

…सवारी अच्छी थी उनके बारे में पूरा पता किया, दो दिन यात्रा छोड़ रूके रहे और फिर माँ को यहां मकान बनाने के पैसे देकर चले गये, जाते-जाते कह गये थे, कभी कोई जरूरत हो तो फोन कर लेना. दुनिया में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है साबजी, हम जान भी नही पाते हमारे कितने अपने है…

“एक दुर्घटना के शिकार हो गये, साबजी, गंगोत्री में अपने घोड़े के साथ थे, सवारी ले जा रहे थे कि तभी घोड़ा बिदक गया. सवारी को तो बचा लिया था पर घोड़े को काबू करने के प्रयास में वे खुद भी खाई में जा गिरे, घोड़े के साथ उनकी भी मौत हो गई. सवारी अच्छी थी उनके बारे में पूरा पता किया, दो दिन यात्रा छोड़ रूके रहे और फिर माँ को यहां मकान बनाने के पैसे देकर चले गये, जाते-जाते कह गये थे, कभी कोई जरूरत हो तो फोन कर लेना. दुनिया में अच्छे लोगों की कोई कमी नहीं है साबजी, हम जान भी नही पाते हमारे कितने अपने है.”

एक ही श्‍वास में वह सब कुछ बताती चली गई थी. मैनें समझा शायद हर रोज यात्री इन्हें अकेला जान पूछते होगें, इसलिए वह सब कुछ एक ही श्‍वास में बोल गई थी.

“सॉरी“ मैनें तो यूं ही पूछ लिया था. शायद हर दिन तुम्हें यह सब कुछ बताना पड़ता होगा यात्रियों से.’

वह खिलखिलाकर हंस पड़ी थी- “अरे नहीं साबजी किसी को इतनी फुर्सत ही कहां है, सभी थके-हारे आते है, आर्डर करते है, रहते है और फिर किराया देकर चले जाते है. कुछ तो मनचले होते है जो धर्म करने आते हैं आंखों में पाप लिये और थोड़ा और बढ़ाकर चले जाते है साबजी, उन्हें दुनिया में

सब कुछ बिकाऊ लगता है, गरीबी को चरित्र हीनता का औजार समझते है. उन्हें नहीं मालूम इज्जत उनकी हो या हमारी उसमें कहीं कोई फर्क नहीं है.”

“मैं एकटक देखता जा रहा था उसे, ऐसा लगता था मानों गंगोत्री की पवित्र भूमि पर वर्षों की तपस्या में लीन कोई साधु मुझे जीवन चरित्र, अपनापन का संदेश दे रहा था.

“सच कहती हो तुम, दुनिया में अच्छे-बुरे सभी लोग है.”

“नहीं-नहीं साबजी बुरे कोई नहीं है. दिल के सब अच्छे होते है, बुराई किसी की आत्मा में नहीं होती है, मन में आ जाती है. किसी-किसी को तो परवरिश, संस्कार और माहौल उन्हें ऐसा बना देती है.”

मैं मंत्र-मुग्ध था उसकी बातों से. बेबाक, निश्‍चल बिना रूके वह मुझसे यूं बातें कर रही थी मानो वह वर्षों से मुझे जानती हो, मेरी आंखों के अपनत्व को लालटेन की मध्यम रोशनी में महसुसते हुए उसने पूछा था – “आप कहां से आए हो साबजी”.

“सुना है गंगा आगे जाकर बहुत मैली हो गई है साबजी. नहीं बाबा नहीं. मुझे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए जाना भी नहीं चाहती. उसने कान पकड़ते हुए कहा था. मैनें देखा उसकी आंखों में एक अनजानी बेबसी और दुख की लकीरें उतर आयी थी. गंगा को मैली होती बोलते-बोलते.

“रांची से, झारखण्ड से”

“अच्छा साब जी, वो धोनी भी तो रांची का है.”

“हाँ धोनी को जानती हो तुम”

“जी, साबजी. बहुत अच्छा खेलता है.”

उसकी आंखों में चमक थी. मेरे कुछ बोलने के पहले उसने प्रश्‍न किया था.

“ये सब आपके परिवार के लोग है.”

“दोस्त है और उनका परिवार, मेरा तो बस यूं ही चलते-चलते प्रोग्राम बन गया.”

“अच्छा किया साब जी, माँ के दर्शन हो जाएंगे.”

“तुम कभी इन पर्वतों से नीचे गई हो.”

“नहीं साबजी, ऋषिकेश के आगे नहीं गई और जाना भी नहीं चाहती.”

“क्यों? मैनें विस्मय से पूछा था.

“सुना है गंगा आगे जाकर बहुत मैली हो गई है साबजी. नहीं बाबा नहीं. मुझे अच्छा नहीं लगेगा इसलिए जाना भी नहीं चाहती. उसने कान पकड़ते हुए कहा था. मैनें देखा उसकी आंखों में एक अनजानी बेबसी और दुख की लकीरें उतर आयी थी. गंगा को मैली होती बोलते-बोलते.

“सच कहती हो” और कुछ बोलने के लिए मुंह में शब्द नहीं थे.”

“पर क्या साब जी, वहाँ की सरकार इस पर ध्यान नहीं देती? वहां के लोग कैसे है जो इतनी पवित्र नदी को दुषित कर रहे है?’

मैं चुप था. मेरे पास कोई जवाब नहीं था. मेरी बेबसी को समझ उसने बात बदली थी.

“आप पहली बार आए है साबजी?”

“हाँ”, मैनें राहत की सांस लेते हुए कहा था.

“कैसा लग रहा है साबजी”

“बहुत अच्छा, बार-बार आने को जी चाहेगा अब तो.”

“पर आता कोई नहीं साबजी.”

“तुम्हें कैसे मालूम?” मैं चौंका था.

“माँ के साथ जीना है, इसकी सेवा करनी है, बहुत कष्ट झेले है इसने मेरे लिए”. शादी भी करनी है साब जी, गृहस्थी बसानी है यहीं रहकर, आप जैसे यात्रियों की भीड़ में जहाँ बेगाने होकर भी जाने क्यों सभी अपने से लगते है. सच कहूं साब जी, कभी-कभी ऐसा लगता है मानों कोई पराया नहीं, सब के सब अपने है.”

“दुनिया बहुत बड़ी है साबजी. पैसा खर्च करना है तो फिर कुछ नया क्यों नहीं. कई लोग आते है, कहते है फिर आएगें तो मिलेगे जरूर, पर आज तक कोई दूसरी बार दिखा नहीं.”

“कम उम्र में बहुत सारे अनुभव बटोर लिये है तुमने. अच्छा ये बताओ, क्या सोचती हो अपने बारे में, अपने जीवन के बारे में. मेरे भीतर की झिझक खुल गई थी. सो मैनें बेबाक बिना कुछ सोचे-समझे पूछ डाला था.

“माँ के साथ जीना है, इसकी सेवा करनी है, बहुत कष्ट झेले है इसने मेरे लिए”. शादी भी करनी है साब जी, गृहस्थी बसानी है यहीं रहकर, आप जैसे यात्रियों की भीड़ में जहाँ बेगाने होकर भी जाने क्यों सभी अपने से लगते है. सच कहूं साब जी, कभी-कभी ऐसा लगता है मानों कोई पराया नहीं, सब के सब अपने है.”

बोलते-बोलते उसने आंखें बंद कर ली थी. उसके चेहरे पर मुझे असीम खुषी का अहसास हो रहा था. उसके मुखड़े पर मुझे पूरी धरा घुमती दिखाई दे रही थी. एक अजीब सा आर्कशण था उसके मुखड़े पर जिसमें मैं खोता जा रहा था.

“क्या आपको ऐसा नहीं लगता साबजी” उसनें आंखें खोलते हुए पूछा था.

“बिल्कुल लगता है ठीक तुम्हारी तरह और खासकर तब जब तुम जैसे सच्चे और पवित्र लोगों के पास होता हूँ.”

और फिर सारी रात मैं उसकी बातों में खोया कुर्सी पर जागता- बोलता बैठा रह गया था. सुबह हुई. हम सभी नित्य कर्म से निवृत हो गंगोत्री के लिए प्रस्थान कर गये थे. मैनें देखा मित्र और उनकी पत्नी के साथ सभी गंगोत्री के दर्शन को लालायित थे पर मैं चैन की नींद सोने जा रहा था क्योंकि सारी बात मैनें गंगोत्री के दर्शन किये थे, उसकी पवित्रता को महसूस किया था जो पहाड़ों से नीचे सभ्यता और विकास का दंभ भरते हम शिक्षित मनुष्यों की धरा पर उतरना नहीं चाहती थी.

लौटते वक्त मैनें कार रूकवाई थी. सभी कार में बैठे थे मित्र मुझे जल्दी आने को कह रहे थे और मैं चलता हुआ उसके बरामदे में पहुँचा था जहाँ कोई नहीं था. मैने अंदर झांककर देखा, वो सोई हुई थी. मैनें आवाज दी थी – गंगा. मैनें उससे उसका नाम नहीं पूछा था सो अनायास ही मेरे मुँह से आत्मा के शब्द निकले थे. “जी, जी, साबजी.” वह हड़बड़ा कर उठ बैठी थी. मुझे देखते ही उसने पास में रखा प्लास्टिक का टिफिन बॉक्स उठा लिया था जिसे लेकर वह उठती हुई बोली थी- “यह आपके लिए है साब जी”

मैं चौंका था- “मेरे लिए, पर मैनें तो तुम्हें बोला नहीं था.”

“पर मैनें सुन लिया था साबजी, जानती थी आपके दोस्त नहीं रूकेगें पर आप दुबारा मिलने आयेगें जरूर क्योंकि आपको मेरी ये दुबारा आने वाली हसरत जो पूरी करनी थी. ये लीजिए साबजी इसमें वहीं दाल और रोटी है जो आपने उस रात बड़े चाव से खायी थी.” कहते हुए उसने मेरे हाथ में टिफिन बॉक्स थमा दिया था. एक बार फिर मैं उसके हृदय की पवित्रता के सम्मोहन में डूबा जा रहा था. जाने क्यों मैनें उसे उन रोटियों के पैसे देना उचित नहीं समझा. मैनें अपने हाथ में बंधी घड़ी खोलकर उसे देते हुए कहा था- “इसे अपने हाथ में बांध लेना.”

मैं एकटक गंगा के बहते पानी में तैरते कचड़े को देखता रहा, गंगा के किनारे जहाँ शहर के नालों से आती गंदगी गंगा की पवित्रता को चुनौती दे रही थी, देखते हुए अनायास ही मेरे कानों में गंगा के शब्द गुंजे थे- ‘सुना है गंगा आगे जाकर बहुत मैली हो गयी है साब जी.

“पर मैनें तो आपको कुछ दिया ही नहीं साबजी”

मैने बिना कुछ बोले उसके दिये टिफिन बॉक्‍स को माथे से लगाया था. मैनें चलते समय मुड़कर देखा था उसकी आंखों में आंसू थे, जो अपनत्व के मानवीय अहसास से भरे थे.

चार धाम यात्रा पूरी कर हम हरिद्वार से वापस अपने शहर को लौट रहे थें. नींद खुली तो हम बनारस स्टेशन से आगे बढे थे, थोड़ी ही देर में ट्रेन गंगा के ऊपर बने पुल पर रेंग रही थी. मैं एकटक गंगा के बहते पानी में तैरते कचड़े को देखता रहा, गंगा के किनारे जहाँ शहर के नालों से आती गंदगी गंगा की पवित्रता को चुनौती दे रही थी, देखते हुए अनायास ही मेरे कानों में गंगा के शब्द गुंजे थे- ‘सुना है गंगा आगे जाकर बहुत मैली हो गयी है साब जी. नहीं, बाबा नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगेगा, इसलिए जाना भी नहीं चाहती. पर क्या साब जी वहाँ की सरकार इस पर ध्यान नहीं देती? वहाँ के लोग कैसे है जो…

(लेखक कहानिकार हैं)

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