Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
सरुली और चाय की केतली….

सरुली और चाय की केतली….

किस्से-कहानियां
लघु कथाअमृता पांडेसरुली चाय की केतली से because निकलती भाप को एकटक देख रही थी. पत्थरों का ऊंचा नीचा आंगन, एक कोने पर मिट्टी का बना कच्चा जिसमें सूखी लकड़ियां जलकर धुआं बनकर गायब हो जातीं. चाय उबलकर काढ़ा हो गई थी पर सरुली ना जाने किन विचारों में निमग्न थी. because न जाने कितने वर्षों पुरानी यात्रा तय कर ली थी उसने कुछ ही मिनटों में. बचपन में स्कूल नहीं जा पाई थी. मां खेत में काम पर जाती और जानवरों के लिए चारा लाती. सरुली घर में छोटे भाई बहनों की फौज को संभालती और सयानों की तरह उनका ध्यान रखती थी. प्यारे छोटी-सी उम्र में ही घर के सारे because काम से लिए थे उसने. सोलह वर्ष की कच्ची उम्र में तो इतनी काबिल हो गई थी कि विवाह तय हो गया था उसका. झट मंगनी, पट विवाह हो गया. सरुली का बचपन वैवाहिक ज़िम्मेदारियों की भेंट चढ़ गया. एक पत्नी, गृहणी और बहू से जो अपेक्षाएं होती हैं उन सभी को वह...
लोकतंत्र

लोकतंत्र

कविताएं
भारती आनंदतानाशाही का अंत हुआ, फिर भारत में लोकतंत्र आया. जनता के द्वारा शासन यह, जनता का शासन कहलाया. जनता के हित की ही खातिर, नव नियमों का विधान किया. जन अधिकारों को आगे रखा, संविधान इसे नाम दिया.जन-जन की बात सुनेगा जो, जन-जन के लिए जियेगा जो. उसको ही चुनेंगे अपना शासक, जनता के साथ चलेगा जो. वो अपना ही तो भाई होगा, अपनी हर बात सुनायेगे. जो होगा भारत के हित में, हम काम वही करवायेंगे.मौलिक अधिकार मिले जनता को, जख्म पुराने भर जायेंगे. लोकतंत्र से चलता है भारत, दुनिया को दिखलायेंगे. लिखी जायेगी नई इबारत नया दौर फिर से आयेगा. बनकर कोई भी तानाशाही, अत्याचार न कर पायेगा.सत्तर वर्षो में देखो कैसे बदल गयी है परिभाषा. लोकतंत्र भी बदल गया है, बदल गयी सब अभिलाषा. काम के सारे रंग ढंग बदले,जनप्रतिनिधी हो गये नेताजी. कुछ दलों में हुए विभाजित, कुछ अपने में ही राजी.क्षेत्र...
नै लिख्वार, नै पौध

नै लिख्वार, नै पौध

कविताएं
                            कुछ गढवाली रचना                                दिशा धियाण नवरात्रों बेटी पूजदा                                ना जाणि कै दौ बलात्कार ह्वोणू जे समाज देश मा                                   बेट्यूं इज्जत तार तार ह्वोणू रावण अथा घूमण लग्या                          हर बेटी जांगणी न्यो निसाफ तख राम जी का भेस मा.                       बेटी जन्म ह्वोण किले च पाप.गर्भ बटिन भला बीज डाळा बलात्कारी नीच सोच ना पाळा जन नौनी अपडि होंदि हक्कै भी तनी मांणा दूं बिरांणा नौन्यूं सम्मान कन नौन्याळू घौरै बटि समझा दूं.अश्विनी गौड़, राउमावि पालाकुराली, रूद्रप्रयागअबकि बार मैनत से बणाई सजांई कूडी बांजा पडिगिन चौक तिबार यखुलि छूटी गैन.तुमारी सैती बांज बुराश पैंया मोळिगिन झपझपी घास काटणो हवेगिन.यि बण डाळा पुंगणा देखी देखी थकी गैन तुमारि जग्वाळ ...
बज उठेंगी हरे कांच की चूडियाँ…! 

बज उठेंगी हरे कांच की चूडियाँ…! 

ट्रैवलॉग
मंजू दिल से… भाग-5मंजू कालाचूडियाँ पारंपरिक गहना है,because जिसका प्रयोग अमूनन हर भारतीय नारी करती है और जब तक उनकी कलाइयों पर ये सुंदर-सा गहना सज नहीं जाता, तब तक श्रंगार भला कैसे पूरा होगा! प्यारे हम भारतीय नारियाँ रंग-बिरंगी because चमकीली चूड़ियाँ कलात्मक एव सुरुचिपूर्ण ढंग से पहनकर अपनी कोमल कलाइयों का श्रंगार करती हैं. यह शृंगार शताब्दियों से कुमारियों एवं नारियों को रुचिकर प्रतीत होता है, साथ ही स्वजन-परिजन भी हर्षित होते हैं. हाथ की चार चूड़ियाँ उनके अहिवात को सुरक्षित रखने के लिए ही पर्याप्त हैं. कवि देव के शब्दों में नारियों की प्रभु से चिर प्रार्थना यही है- संग ही संग becauseबसौ उनके अंग अंगन देव तिहरे लूटीए. साथ में राखिए नाथ उन्हें हम हाथ में because चाहती चार चुरिए.. प्यारे बचपन की बात है जब मैं because खरीदारी करने बाजार जाती माँ के साथ, बाजार जिद् करके चली ...
राजनीति में लोकतांत्रिक संस्कार की जरूरत

राजनीति में लोकतांत्रिक संस्कार की जरूरत

समसामयिक
गिरीश्वर  मिश्रराजनीति सामाजिक जीवन की व्यवस्था चलाने की एक जरूरी आवश्यकता है जो स्वभाव से ही व्यक्ति  से मुक्त हो कर लोक की ओर उन्मुख होती है. because दूसरे शब्दों में वह सबके लिए साध्य न हो कर उन बिरलों के लिए ही होती है जो निजी सुख को छोड़ कर लोक कल्याण के प्रति समर्पित होते हैं. स्वतंत्रता संग्राम के दौर में राजनीति में जाना सुख की लालसा से नहीं बल्कि अनिश्चय और जोखिम के साथ देश की सेवा की राह चुनना था. स्वतंत्रता मिलने के बाद धीरे-धीरे राजनीति की पुरानी स्मृति धुंधली पड़ने लगी और नए अर्थ खुलने लगे जिसमें देश. लोक और समाज हाशिए पर जाने लगे और अपना निजी हित प्रमुख होने लगा. यह प्रवृत्ति हर अगले चुनाव में बलवती होती गई और अब सत्ता, अधिकार और अपने लिए धन संपत्ति का अम्बार लगाना ही राजनीति का प्रयोजन होने लगा है.विचारधारा राजनैतिक विचारधारा because और आदर्श तो अब पुरानी या दकियानूसी...
बच्चे की आंखों में जीवनभर की चमक शिक्षक ही ला सकता है

बच्चे की आंखों में जीवनभर की चमक शिक्षक ही ला सकता है

शिक्षा
डॉ. अरुण कुकसाल‘दिवास्वप्नों के मूल में वास्तविक अनुभव हों, तो वे कभी मिथ्या नहीं होते. यह दिवास्वप्न जीवन्त अनुभवों में से उपजा है और मुझको विश्वास है कि प्राणवान, क्रियावान और निष्ठावान शिक्षक इसको वास्तविक स्वरूप में ग्रहण कर सकेंगे.’ -गिजुभाई       पहाड़ (गांधी जी का जो योगदान भारतीय because राजनीति में है, वही योगदान गिजुभाई का भारतीय शिक्षा जगत में है. गिजुभाई ने अपने अध्यापकीय अनुभवों की डायरी ‘दिवास्वप्न’ की प्रस्तावना में उक्त पक्तियां लिखी थी. बाल मनोविज्ञान एवं शिक्षण के क्षेत्र में ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक को एक अनमोल कृति माना जाता है.) पहाड़ शिक्षिका एवं कवियत्री रेखा चमोली की because ‘मेरी स्कूल डायरी’ को गहनता से पढ़ने के बाद इस पुस्तक पर मेरे मन-मस्तिष्क की पहली अभिव्यक्ति गिजुभाई की उक्त पक्तियां ही हैं. इस शैक्षिक डायरी को पढ़ते हुए एक साथ कई किताबों और विषयों को पढन...
वो बचपन वाली ‘साइकिल गाड़ी’ चलाई

वो बचपन वाली ‘साइकिल गाड़ी’ चलाई

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—60प्रकाश उप्रेतीपहाड़ की अपनी एक अलग दुनिया है. because उस दुनिया में बचपन, बसंत की तरह आता है और पतझड़ की तरह चला जाता है लेकिन जब-जब बसंत आता है तो मानो बचपन लौट आता है. बचपन से लेकर जवानी की पहली स्टेज तक हम एक 'साइकिल गाड़ी' चलाते थे. वह हमारी और हम उसकी सवारी होते थे. कभी-कभी तो एक-दो दोस्तों को भी टांग लेते थे. पहाड़ इस "साइकिल गाड़ी" की भी because अपनी कथा है. इसके बिना न स्कूल, न खेत और न आरे-पारे बाखे जाते थे . जहाँ जाओ साइकिल गाड़ी को साथ ले जाते थे. आगे-आगे ये, पीछे-पीछे दौड़ते हुए हम जाते थे. इस कारण कई बार ईजा से डाँट भी खाते थे. कई बार तो ईजा ने "च्वां" (सीधे) साइकिल "फनखेतक पटोम" (घर के नीचे वाला खेत) फेंक भी दी थी. पहाड़हम बस्ता पीठ में टांगते. because घर के सामने वाले अमरूद के पेड़ में लटक रही साइकिल को निकालते और घुर्र-घुर्र चला ...
काला अक्षर भैंस बराबर था मेरे लिए…

काला अक्षर भैंस बराबर था मेरे लिए…

संस्मरण
जवाबदेही की अविस्मरणीय यात्रा भाग-3सुनीता भट्ट पैन्यूलीमेरी हथेली पर ऊंचाई से because टक से दस का सिक्का फेंकने के पीछे मकसद क्या था उस कंडक्टर का? क्या उसकी मनोवृत्ति थी आज तक नहीं समझ पायी मैं किंतु कॉलेज के सफ़र की अविस्मरणीय  स्मृतियों में कंटीली झाड़ में बिच्छु घास सी उग आयी घटना है यह मेरे जीवन में.हथेली कई हादसों की होने कीआवाज़ नहीं because होती है किंतु जिनसे होकर वह गुज़रते हैं यक़ीनन गोलियों के भेदने के उपरांत छिद्र से कर जाती हैं उनके जे़हन में जिन्होंने भोगा  है इस यथार्थ को.हथेली हादसा छोटा सा था या मैं ही because उसे विस्तार दे रही हूं इसका निर्णय आप पाठकों पर छोड़ती हूं. कॉलेज से शाम को घर पहुंच चुकी because थी मैं आज के अनुभव ने अनजाने ही सही पैठ बना ली थी मेरे मष्तिष्क में.कॉलेज मेंअपनी किताबों को गर्व से निहारा और पन्ने दर पन्ने पलटते ही न जा...
आस्थाओं का पहाड़ और बुबू

आस्थाओं का पहाड़ और बुबू

संस्मरण
प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। कोरोना महामारी के कारण हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं।इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ के जीव...
केले के पत्‍तों पर भोजन करना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक!

केले के पत्‍तों पर भोजन करना स्‍वास्‍थ्‍य के लिए लाभदायक!

ट्रैवलॉग
पलाश के पत्तों पर भोजन करना स्वर्ण पात्र में भोजन करने से भी उत्तम है! मंजू दिल से… भाग-4मंजू कालाहमारे देश में सामाजिक अथवा धार्मिक अनुष्ठान सम्पन्न होने के पश्चात इष्ट-मित्रों, रिश्तेदारों को भोजन के लिये आमन्त्रित करना एवं प्रसाद का वितरण हमारी  भोजन पद्धति का एक अंग है. because यद्यपि यह व्यवस्था आज भी बदस्तूर जारी है  तथापि इसका स्वरूप जरूर बदल गया है.  हम पर पश्चिमी सभ्यता का ऐसा मुलम्मा चढ़ा हुआ है कि हम उसका गुणगान करते नहीं  थकते हैं. अपनी पुरानी सांस्कृतिक विरासत को भूलते जा रहे हैं और परिणाम हम सबकी आँखों के सामने है. हमारा प्यारा हिंदुस्तान आज प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है!प्यारे वास्तविकता यह है कि इन सभी के because लिये प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष  रूप से  हम स्वयं ही जिम्मेदार है क्योंकि, प्रकृति ने पृथ्वी को स्वस्थ एवं स्वच्छ रखने के अनेकों साधन प्रदान किये...