November 25, 2020
संस्मरण

आस्थाओं का पहाड़ और बुबू

प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। कोरोना महामारी के कारण हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं।

इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ के जीवन को अनुभव व अनुभूतियों के साथ प्रस्तुत करती है। पहाड़ी जीवन के रोचक किस्सों से भरपूर इस सीरीज की धुरी ‘ईजा’ हैं। ईजा की आँखों से पहाड़ का वो जीवन कई हिस्सों और किस्सों में अभिव्यक्ति पा रहा है। प्रस्तुत है उनके संस्मरणों की 59वीं किस्त…


मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—59

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ परम्पराओं में जीता है. उन परम्पराओं के साथ विश्वास जुड़े रहते हैं. आप खुद को उनसे दूर करने की लाख कोशिश करें लेकिन वो आपके साथ ट्रैवल करते हैं. because आप वैज्ञानिक चेतना से लैस हो जाएं फिर भी उन आस्थाओं से दूर नहीं जा सकते जिनको आप ने जिया हो. पहाड़ के जीवन का बड़ा हिस्सा आस्था और विश्वास पर चलता है. इन्हीं के बीच कई चीजों की भूमिका तय होती है. आज आस्था के इर्दगिर्द अपनी भूमिका बनाने वाले “सुल्फ़ी हॉक और छाव” (छोटा हुक्का) की बात.

हॉक

बुबू (दादा) हुक्का पीते थे. because सुल्फ़ी हॉक तो उनके जेब में हमेशा ही रखी रहती थी. खुद घर में तंबाकू और “झूल” (इस पर आग पकड़ लेती थी) बनाते थे. उनकी जेब में एक “तमकि थेल” (कपड़े की तंबाकू रखने वाली थैली) होती थी. उसी में तंबाकू, झूल, सुल्फ़ी हॉक, ‘डयांसि’ (आग जलाने वाला पत्थर), रखे रहते थे. कभी उनके जेब में माचिस नहीं रहती थी. बाहर होते तो डयांसि से आग जला लेते थे. घर पर होने पर हम उनकी सुल्फ़ी हॉक में गोठ चुल्हन या अँगीठी से ‘कोय्यल'(कोयला) रख लाते थे. बुबू जैसे ही कहते- “नतिया जरा हॉक में कोय्यल धर ल्यां ढैय्” but (पोता नीचे से हुक्के में एक कोयला रख ला). हम चटसे गोठ जाते और चिमटे से एक कोयला उसमें रख लाते थे. ईजा अगर घर पर होती तो उनकी नज़र हम पर ही होती थी. कहीं हम तो सुट्टा नहीं लगा रहे हैं..

हॉक

पढ़ें— पारले-जी ने की ‘विज्ञापन स्ट्राइक’ (‘तुम’- ‘हम’)

बुबू ‘पूछ'(चावल देख कर भूत-भविष्य बताना) करते थे. सुबह से शाम तक पूछ करने वालों का तांता लगा रहता था. because ‘अम्मा'(दादी) की चाय की केतली सुबह चूल्हे में चढ़ती तो फिर रात जाकर ही नीचे उतरती थी. घर से कोई बिना चाय पिए चला गया तो बुबू इसे अपना अपमान समझते थे. इसलिए अम्मा सबको चाय पिलाती थीं. बुबू पूछ करते हुए सुल्फ़ी हॉक पीते ही नाचते थे. यह उनका एक तरीका था. पूछ करने वाले लोगों का अलग- अलग तरीका होता था. हर कोई अपने तरीके से नाचता और बताता था.

हॉक

हमारे घर में लखुड़िया because देवता हैं. वह भी बुबू पर ही नाचते थे. लखुड़िया देवता को बाकायदा तम्बाकू चलता था. इसलिए सुल्फ़ी हॉक और बुबू के जीवन का एक रिश्ता बंध गया था. बुबू बताते थे कि हुक्का पीना भी उन्होंने तब शुरू किया जब उन पर देवता ने अवतार लिया था. फिर एक बार शुरू हुआ तो जीवन भर चलता रहा. 

हॉक

हमारे घर में लखुड़िया देवता हैं. वह भी बुबू पर because ही नाचते थे. लखुड़िया देवता को बाकायदा तम्बाकू चलता था. इसलिए सुल्फ़ी हॉक और बुबू के जीवन का एक रिश्ता बंध गया था. बुबू बताते थे कि हुक्का पीना भी उन्होंने तब शुरू किया जब उन पर देवता ने अवतार लिया था. फिर एक बार शुरू हुआ तो जीवन भर चलता रहा.

हॉक

पढ़ें— जंगल जाते, किम्मु छक कर खाते

हमारे गाँव में एक ‘भिसोंण’ because (भूत) था. वह भी तीन-चार पीढ़ी पुराने बुबू ही थे. उनका इलाका आम का बगीचा था. हम जब भी आम तोड़ने या टीपने जाते थे तो ईजा कहती थीं- “बगीच पन रोये झन हाँ, नतर छाव लागोल” (बगीचे में रोना मत, नहीं तो भूत लग जाएगा). हम पूरी कोशिश करते थे कि बगीचे में रोएं नहीं. कई बार पेड़ पर चढ़ते-उतरते गिर जाते थे. कई बार आम ढूढते हुए सिसोंण लग जाता था लेकिन रोते नहीं थे.

हॉक

अगर बगीचे में कोई रो लिए because या डर गया तो छाव लगना तय होता था. जब भी ऐसा होता तो तेज बुखार आता और डर लगने लग जाता था. यही वो संकेत थे जिनसे समझ लिया जाता था कि बगीचे में गया था. वहीं का लगा होगा. तो जो बगीचे वाले “भिसोंण बुबू” थे उनको भी तंबाकू ही चढ़ता था. यही उनका खाण-दाण था. उनके नाम की “बभूति” लगती और तिमिल के पत्ते में बगीचे के पत्थर पर उनके लिए तम्बाकू छोड़ दिया जाता था. उसके बाद जिसको भी छाव लगा रहता वह धीरे-धीरे ठीक हो जाता था.

हॉक

पारे बाखे और हमारे घर के because बीच में एक जगह थी “बेलु गध्यर”. बेल का पेड़ और गध्यर होने के कारण इसका यह नाम पड़ा. इसी गध्यर से आर-पार जाने का रास्ता था लेकिन गहराई में होने के कारण उस गध्यर से आर-पार कुछ दिखाई नहीं देता था. गध्यर में एक बड़ा सा आम का पेड़ था. इस पेड़ के कारण दिन में भी वहाँ अँधेरा रहता था. इसी पेड़ पर एक “झुपुली अम्मा” का भूत रहता है. ऐसा हमको बचपन से because बताया गया था. रात में बेलु गध्यर पार करना हमारे लिए मौत होती थी.

कितना ही भारी वजन हो because या हम कितने ही थके हों लेकिन बेलु गध्यर दौड़ लगाकर ही पार करते थे. अगर रात में वहाँ चूहे या किसी जंगली जानवर के कारण कोई भी हलचल होती तो हमारा डर के मारे बुरा हाल हो जाता था. इधर हम डरे, उधर झुपाली अम्मा का छाव तुरंत लग जाता था.

हॉक

इस तरह पहाड़ की because दुनिया में बहुत कुछ रचा बसा था. जिसके होने, न होने के कई अर्थ थे. इंसानों के अलावा एक भूतों की दुनिया भी आस-पास बसती थी. सबके अपने नियम और तौर-तरीके होते थे. कोई सिर्फ बभूति में मान जाते थे तो किसी को खिचड़ी देनी पड़ती थी. कोई पूजा मांगता था तो कोई मुर्गे या बकरे की बलि माँगता था.

हॉक

इस तरह पहाड़ की दुनिया में बहुत कुछ रचा बसा था. जिसके होने, न होने के कई अर्थ थे. इंसानों के अलावा एक भूतों की दुनिया भी आस-पास बसती थी. सबके अपने नियम और तौर-तरीके होते थे. कोई सिर्फ बभूति में मान जाते थे तो किसी को खिचड़ी देनी पड़ती थी. because कोई पूजा मांगता था तो कोई मुर्गे या बकरे की बलि माँगता था. बुबू के साथ because जब छल या मसाण पूजने जाता था तो उनसे इस पर बहुत बात होती थी. कई बार तो कहते थे किसी दिन तेरे को दिखा दूँगा. एक-दो बार तो देखने जैसा कुछ घटा भी था. खासकर जल भैरों की पूजा के समय. वह मांसी और नेधरु गध्यर के बीच की बात थी….

हॉक

बुबू हमेशा मुझे बचा कर ले जाते थे. because मेरे अंदर का डर तो वो बहुत पहले निकाल चुके थे. बस चाहते थे कि मैं धीरे-धीरे सब पूजा-पाठ सीख जाऊँ. यही एक बात थी जो ईजा नहीं चाहती थीं. अब तो वो दिन भी बीत गए हैं. गाँव में इंसान नहीं रहे तो भूत भी कम हो गए हैं. because ईजा कई बार कहती हैं-“भूत ले तबे हय जब मैस हय”(भूत भी तभी हुए जब इंसान हुए). अब इंसान तो रहे नहीं गाँव ही भूतहा हो गए हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *