Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
नव वर्ष 2021 हरिद्वार कुम्भ का भी लोकमंगलकारी वर्ष है

नव वर्ष 2021 हरिद्वार कुम्भ का भी लोकमंगलकारी वर्ष है

साहित्‍य-संस्कृति
डॉ. मोहन चंद तिवारीप्रति वर्ष 31 दिसंबर को काल की एक वर्त्तमान पर्याय रात्रि 12 बजे अपने अंत की ओर अग्रसर होती है तो दूसरी पर्याय नए वर्ष के रूप में पदार्पण भी करती है.काल के इसी संक्रमण की वेला को अंग्रेजी केलेंडर के अनुसार नववर्ष का आगमन माना जाता है. इस बार नव वर्ष की संक्रान्ति में आगामी जनवरी के महीने से अप्रैल के महीने तक हरिद्वार कुंभ का भी शुभ संयोग उपस्थित हो रहा है. हालांकि कोरोना संकट के कारण कुम्भ के शाही स्नानों की शुरुआत 11 मार्च से होगी किन्तु कुम्भ स्नान का प्रारम्भ जनवरी महीने के मकर संक्रांति से ही हो जाता है. इसलिए इस नववर्ष 2021 का 'कुम्भ वर्ष' के रूप में भी विशेष महत्त्व है.कुम्भ स्नानदेश में नववर्ष  मनाने की विविधता के बावजूद एक समानता यह है कि भारत के लोग सूर्य की संक्रांति और चन्द्रमा के नक्षत्र विज्ञान की शुभ पर्याय को ध्यान में रखते हुए सौरवर्ष और चान्...
उत्तराखण्ड की वीरांगना मुन्नी पाण्डे की प्रेरणास्पद संघर्षगाथा

उत्तराखण्ड की वीरांगना मुन्नी पाण्डे की प्रेरणास्पद संघर्षगाथा

इंटरव्‍यू
भुवन चन्द्र पन्त1971 के because भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए कुमाऊं रेजीमेन्ट के नायक लीलाम्बर पाण्डे की वीरांगना को आज भारत-पाक युद्ध की स्वर्णजयन्ती (50 वर्ष पूर्ण होने पर) के मौके पर उनके कानियां, रामनगर स्थित आवास पर सम्मानित किया गया. दर्जनों सैन्य वाहनांे के साथ, जब सैन्य अधिकारियों की टोलियां आज कानियां (रामनगर) की गंगोत्री विहार कालोनी में पहुंची तो एक बार कालोनी वासी इस सकते में आ गये कि आज फिर कालोनी का कोई सैनिक शहीद हो गया. because पुष्पमालाओं से सुसज्जित सेना के वाहन और उनके आगे-पीछे सेना के उच्चधिकारियों की गाड़ियों का हुजुम, कालोनी के लोगों को किसी अनहोनी की आशंका जताने को काफी था. लेकिन जल्दी ही इस शंका से पर्दा तब उठा, जब सैनिकों का काफिला गंगोत्री विहार निवासी श्रीमती मुन्नी पाण्डे के आवास पर जाकर ठहरा.मुन्नी पाण्डेये उसी वीरांगना मुन्नी पाण्डे becauseका निवास थ...
नदी कभी वापस नहीं लौटती…

नदी कभी वापस नहीं लौटती…

साहित्‍य-संस्कृति
पुरातन वर्ष एक दस्तावेज़ भी है हमारे अनुभव हमारी स्मृतियों का जिसमें अनगिनत अनगढा, अनसुलझा, so कुछ तुर्श, कुछ सड़ा-गला, कुछ थोड़ा बहुत उपयोगी भी है यह हमें तय करना है कि नवीनता की ड्योढी पर हमें क्या-क्या साथ लेकर पांव रखना है.सुनीता भट्ट पैन्यूलीसमय धारा प्रवाह बहती because अविरल नदी है जिसकी नियति बहना है, जो किसी के लिए नहीं ठहरती, हां विभिन्न कालखंडों में विभाजित विविध घाटों के पड़ावों से टकराकर अपने होने का आभास कराती हुई जा पहुंचती है उस भवसागर में  जिसका प्रारब्ध उस अदृश्य शक्ति ने या विधि के विधान ने सुनिश्चित किया है. जहां न अंत है, न आरंभ है, न अफसोस की गुंजाइश है, न हर्ष का पारावार, न किंतु-परंतु, न सवाल-जवाब, न उल्लसिता की कोई परिभाषा. because सब कुछ छुटता चला जाता है. साथ बहकर चली आती हैं उस नदी के साथ तो वह हैं स्मृति खंड जिसके दांये-बांये से होकर समय रूपी नदी त...
कहां ले जाऊँ…

कहां ले जाऊँ…

किस्से-कहानियां
लधु कथाडॉ. कुसुम जोशी        सवि ने धीरे से कराहते हुये आंखें खोली,  चारों और नजरें घुमाई तो अपने को अस्पताल में पाया. "मैं यहां..कैसे..! " सोचती रही सावि... धीरे-धीरे सब कुछ याद आ रहा था उसे, उसका और जगन का प्रेम राज नहीं रहा,  घर में तूफान उठान में आ चुका था.जगन  सावि ने ठान लिया था कि मौका मिलते ही  जगन से साफ-साफ  बात करेगी.    उसे घर में  अकेला जान, हमेशा की तरह उस दिन जगन आया, अपने प्रेम की कसमें खाता रहा. "जगन या तो तू मुझे यहां से ले चल, नहीं तो मेरा पीछा करना छोड़ दे", सावि ने दो टूक अपना फैसला सुना दिया.जगन सवि की बात सुन जगन दबाव महसूस कर रहा था. बोला, 'ऐसी क्या आफत हो गई कि तू आज ऐसी बात कर रही है. घर में सब पता चल चुका है, चार दिन से में रोज ही पिट रही हूं, मुझे ब्राह्मण कुल की कंलकिनी कहा जा रहा है. बाबू कह रहे है कि "जात और जान दोनों से जायेगी. क्यों...
‘डूबता शहर’ की कथा-व्यथा सच है, पर दफ़्न है

‘डूबता शहर’ की कथा-व्यथा सच है, पर दफ़्न है

टिहरी गढ़वाल
पुरानी टिहरी के स्थापना दिवस, 30 दिसम्बर पर किशोरावस्था से मन-मस्तिष्क में बसी टिहरी को नमन करते हुए अग्रणी साहित्यकार स्वर्गीय ‘बचन सिंह नेगी’ का मार्मिक उपन्यास-डॉ. अरुण कुकसाल"...शेरू भाई! यदि इस टिहरी को डूबना है, तो ये लोग मकान क्यों बनाये जा रहे हैं? शेरू हंसा ‘चैतू! यही तो because निन्यानवे का चक्कर है, जिन लोगों के पास पैसा है,because वे एक का चार बनाने का रास्ता निकाल रहे हैं. डूबना तो इसे गरीबों के लिए है, बेसहारा लोगों के लिये है, उन लोगों के लिए है, जिन्हें जलती आग में हाथ सेंकना नहीं आता. जो सब-कुछ गंवा बैठने के भय से आंतकित हैं.'चैतू ...चैतू सोच में डूब जाता है, soउनका क्या होगा? आज तक रोजी-रोटी ही अनिश्चित थी, अब रहने का ठिकाना भी अनिश्चित हो रहा है.’’ (पृष्ठ, 9-10) टिहरी बांध बनने के बाद because ‘उसका, उसके परिवार और उनका क्या होगा?’ यह चिंता केवल चैतू की...
वरिष्ठ कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल की स्मृति में

वरिष्ठ कवि व पत्रकार मंगलेश डबराल की स्मृति में

साहित्यिक-हलचल
कमलेश चंद्र जोशीवरिष्ठ कवि व साहित्यकार मंगलेश डबराल भौतिक रूप से अब हमारे बीच नहीं रहे लेकिन अपनी कविताओं, साहित्यिक रचनाओं व गंभीर पत्रकारिता के माध्यम से जिस लालटेन को वह जलता हुआ छोड़ गए हैं उसे जलाए रखने और रोशनी बिखेरने का काम वर्तमान व भविष्य की पीढ़ियों के हाथ में है. मंगलेश जी की स्मृति को अमूमन because सभी पत्रकारों, कवियों व साहित्य प्रेमियों ने सोशल, इलैक्ट्रॉनिक व प्रिंट मीडिया के माध्यम से याद किया. कथाकारों, लेखकों व पत्रकारों द्वारा मंगलेश जी के साथ बिताए समय के बहुत से संस्मरण फेसबुक के माध्यम से पढ़ने को मिले जिससे यह समझ में आया कि वह किस कदर जमीन से जुड़े व्यक्ति थे और हमेशा पहाड़ और उसके रौशन होने के सपने को साथ लिये चलते रहे. पत्रकारिता देवेंद्र मेवाड़ी बताते हैं कि दिल्ली में जनसत्ता में नौकरी करते हुए मंगलेश जी बड़े परेशान रहा करते थे. कहते थे दिल्ली महानगर है...
भारतीय ज्ञान परम्परा और भाषा को बंधक से छुड़ाने का अवसर

भारतीय ज्ञान परम्परा और भाषा को बंधक से छुड़ाने का अवसर

शिक्षा
प्रो. गिरीश्वर मिश्र पिछले दिनों काशी में देव दीपावली because के पावन अवसर पर प्रधानमंत्री जी ने देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति को, जिसे तस्करी में चुरा कर एक सदी पहले कनाडा की रेजिना यूनिवर्सिटी के संग्रहालय को पहुंचा दिया गया था, बंधक से छुड़ा कर देश को वापस सौंपे जाने की चर्चा की थी. तब वहां के कुलपति टामस चेज ने बड़ी मार्के की बात कही थी कि ’यह हमारी जिम्मेदारी है कि ऐतिहासिक गलतियों को सुधारा जाय because और उपनिवेशवाद के दौर में दूसरे देशों की विरासत को जो नुकसान  पहुंचा है उसे ठीक करने की हर संभव कोशिश हो’. आशा की जाती है कि इस साल के अंत होते-होते यह मूर्ति अपने मूल स्थान पर पुन: विराजित हो जायगी.कुलपति दरअसल विपन्नता की स्थिति में because अपनी बहुमूल्य संपत्ति को गिरवी रखना और स्थि ति सुधरने पर उसे छुड़ा कर वापिस लाना कोई नई बात नहीं हैं और इसका दस्तूर अभी भी जारी  है. भारत की समृ...
जलवायु परिवर्तन से दुनिया को 2020 में हुई अरबों की हानि: रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन से दुनिया को 2020 में हुई अरबों की हानि: रिपोर्ट

पर्यावरण
निशांतरिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन से प्रभावित दस मुख्य घटनाओं की पहचान की गई है, जिनमें से प्रत्येक में 1.5 बिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है. because इन मुख्य घटनाओं में से नौ 5 बिलियन डॉलर से अधिक के नुकसान का कारण बनीं. बाढ़, तूफान, उष्णकटिबंधीय चक्रवात और आग ने दुनिया भर में हजारों लोगों की जान ले ली. गहन एशियाई मानसून दस सबसे कम खर्चीली घटनाओं में से पांच से पीछे था. रिकॉर्ड तोड़ तूफान के मौसम और आग के कारण अमेरिका सबसे अधिक लागतों से प्रभावित हुआ था. जलवायु क्रिश्चियन एड की एक नई रिपोर्ट, because लागत 2020 की गणना: एक वर्ष की जलवायु टूटने से वर्ष की सबसे विनाशकारी जलवायु आपदाओं में से 15 की पहचान होती है. इन घटनाओं में से दस की लागत 1.5 बिलियन डॉलर या उससे अधिक है. इनमें से नौ में कम से कम 5 बिलियन डॉलर की क्षति होती है. इनमें से अधिकांश अनुमान केवल बीमित घाटे पर आधारित हैं, जिसका अ...
प्रेमचंद की वापसी…

प्रेमचंद की वापसी…

किस्से-कहानियां
व्यंग्यदलजीत कौर स्वर्ग में कई दिन से उथल-पुथल because मची थी. ऐसा पहली बार हुआ था कि स्वर्ग में किसी ने धरना दिया हो. स्वर्ग में किसी ने अन्नजल त्याग दिया हो. यमदूत ने आकर यमराज को बताया- “एक व्यक्ति स्वर्ग छोड़ कर पृथ्वी पर जाना चाहता है. यमराज  ने हैरान हो कर so पूछा- “स्वर्ग छोड़ कर कौन मूर्ख पृथ्वी पर जाना चाहता है ?नरक से जाना चाहे तो बात समझ में आती है.”भ्रमित यमदूत ने बड़े अदब से because नाम लिया- “जी! महापुरुष प्रेमचंद.” यमराज अपने सिहाँसन so से उठ खड़े हुए- “क्या? मुंशी प्रेमचंद? लेखक प्रेमचंद? वही प्रेमचंद जिनकी but अभी-अभी जयंती मनाई गई पृथ्वी पर?” “जी हजूर जी.” because यमदूत लगातार हाँ में सिर हिला रहा था. मगर यमराज को यक़ीन so ही नहीं हो रहा था. उन्होंने फिर पूछा,  कफ़न, पूस की रात, गोदान, निर्मला वाले प्रेमचंद?“वह व्यक्ति जो मरने के इतने वर्ष बाद...
श्रीकोट का ‘गुयां मामा’

श्रीकोट का ‘गुयां मामा’

पौड़ी गढ़वाल
डॉ. अरुण कुकसालमानवीय बसावत में जीवन के because कई रंग दिखाई देते हैं. ये बात अलग है कि कुछ रंगों को हम अपनी सुविधा से सामाजिक मान-प्रतिष्ठा देकर गणमान्य बना देते हैं. और, कुछ रंग सामाजिक जीवन में बिखरे-गुमनाम से यहां-वहां दिखाई देते हैं. वे अपने आपको समेटे, पर पूरी संपूर्णता के साथ मदमस्त जीवन जीते हैं. यद्यपि दुनियादारी में फंसे लोग उनके प्रति बेचारगी और सहानुभूति के भाव से ऊपर नहीं उठ पाते हैं. but लेकिन ऐसे मस्त फक्कडों की जीवंतता सामान्य लोगों को हैरान करती है. जिस दिन वो न दिखे तो उससे उपजा खालीपन मन को कचौटता है. ऐसे ही हैं श्रीकोट के 'गुंया मामा' जो हर शहर-देहात के वो चेहरा हैं जिनसे चंद ही लोग सही पर वे बे-पनाह मोहब्बत और सम्मान करते हैं. भ्रमितफक्कड़ी का मस्तमौला because बादशाह ‘गुयां मामा’ बोलते कम और हंसते ज्यादा है, दुनिया पर और अपने आप पर. बरस 72 में 27 की उमर की उमंग...