November 28, 2020
समाज/संस्कृति

बड़ी खूबसूरती से निरूपित किया है जैव विविधता के सन्तुलन को सनातनी परम्परा में

  • भुवन चन्द्र पन्त

प्रारम्भिक स्तर की कक्षाओं के पाठ्यक्रम में बेसिक हिन्दी रीडर में एक पाठ हुआ करता था, जिसका शीर्षक अक्षरक्षः तो स्मरण नहीं हो पा रहा है, कुछ यों था कि वनस्पति एवं जीव-जन्तु परस्पर एक दूसरे पर निर्भर हैं. तब जैव विविधता जैसे शब्द नहीं खोजे गये थे, लेकिन जिस खूबसूरती से बालमन को वनस्पति एवं जीवजन्तुओं की परस्पर उपयोगिता समझाई गयी थी, उसे जैव विविधता जैसे वजनदार शब्द से समझने से अधिक रोचक था. जैविक विविधता शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग वन्य जीव वैज्ञानिक रेमंड एफ डेशमैन द्वारा 1968 में ’ए डिफरेंट काइंड ऑफ कन्ट्री’ नामक पुस्तक में किया है. पहले बायोलॉजिकल डायवर्सिटी के नाम से because और फिर सन् 1986 के बाद संक्षिप्तिीकरण कर बायोडायवर्सिटी यानी जैव विविधत शब्द चलन में आया. बात जब पर्यावरण व पारिस्थितिकीय की आती है, तो आज हर एक की जुबान पर जैव विविधता शब्द अपनी जगह बना चुका है.

वनस्पति

 यह बात और है कि सामान्य एवं अनपढ़ व्यक्ति के लिए जैव विविधता अब भी एक पहेली ही साबित होता है. सच कहें तो कुदरत की जो भी कृति इस धरती पर हैं, उसमें अनुपयोगी कुछ भी नहीं है. यह बात अलग है कि कुछ का उपयोग हमें प्रत्यक्ष नजर आता है जब कि दूसरे परोक्ष रूप से जीवन के लिए आवश्यक एवं अपरिहार्य हैं. अन्य जीवों की बात छोड़ दीजिए, कल्पना कीजिए कि यदि मनुष्य जिसे होमोसेपियन की श्रेणी में रखा जाता है, because यदि मनुष्य में ही रूप, रंग, आकार में भिन्नता अथवा विविधता न होती सभी एक समान होते तो ये जीवन कितना दुरूह व नीरस हो जाता.

सम्पूर्ण प्रकृति में मनुष्य ही सबसे विवेकशील प्राणी है, लेकिन दुर्भाग्यवश वही एक ऐसा लालची प्राणी है, जो अधिक से अधिक प्रत्यक्ष लाभ अर्जित करने की हवश में सबसे अधिक जैव विविधता व प्रकृति के प्रतिकूल आचरण करता है. जबकि पर्यावरण के संरक्षण में इन्सान से लेकर सूक्ष्मतम जीव चींटी और विशालतम जीव हाथी तथा वनस्पति जगत में हर पेड़-पौधे की अपनी भूमिका व महत्व है.

कुदरत

वनस्पतियां जीव जन्तुओं को भोजन उपलब्ध कराते हैं तो उन्हीं वनस्पतियों के खाने से उत्सर्जित मल पेड़ पौधों को ऊर्जा देता है. वनस्पतियां यदि जीव जन्तुओं के आहार के स्रोत हैं तो जीव जन्तु भी एक दूसरे के भोजन चक्र से परस्पर जुड़े हैं. because चूहा जब घरों में नुकशान करता है तो एक क्षण के लिए आपके जेहन में सवाल आ सकता है कि इस अनुपयोगी जीव को क्यों बनाया गया होगा? लेकिन सोचिए अगर चूहा न होता तो सांप तथा बिल्ली आदि जीवों को अपना भोजन कहां से मिलता. सांप की संख्या अनियंत्रित न हो,  इसके लिए नेवले, चील, बिल्ली आदि का भी उतना ही महत्व है. जंगल के मांसाहारी हिसंक जानवरों को यद्यपि वनस्पतियों से सीधे भोजन प्राप्त नहीं होता, लेकिन ये ही वनस्पतियां शाकाहारी भोजन करने वाले हिरन आदि वन्यजीवों को भोजन उपलब्ध करवाकर मांसाहारी पशुओं के भोजन चक्र का हिस्सा बनती हैं.

भोजन

कौआ, चील, गिद्ध, आदि ऐसे जीव हैं, जो यदि न होते तो न जाने मरे हुए जानवरों से वातावरण कितना प्रदूषित रहता. सुअर जैसे जीव गन्दगी को आहार बनाकर एक तरह से पर्यावरण को because संरक्षित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. प्रकृति ने सृष्टि चक्र कुछ इस तरह रचा, जिससे एक दूसरे को आहार की पूर्ति भी करते हैं और प्रत्येक जीव में संख्यात्मक सन्तुलन को भी बनाये रखते हैं. निष्कर्षतः वनस्पति एवं जीवजन्तुओं की प्रकृति के संरक्षण में उपादेयता में किसी को कमतर नहीं आंका जा सकता. सरल शब्दों में जैव विविधता की यही उपयोगिता है.

कौआ

भगवान विष्णु के दशावतारों मेंbecause मत्स्य से शुरुआत कर बुद्ध तक की विकास यात्रा इस बात को पहले ही पुष्ट कर चुकी है कि सर्वप्रथम जलीय जीव, मत्स्य अवतार जीव विकास का पहला क्रम था, उसके बाद उभयचर (जो जल में और थल में रह सकता है) कछुऐ के रूप में, फिर वाराह केवल थलचर के रूप में, थोड़ा और विकसित होने पर नृसिंह (आधा पशु तथा आधा मनुष्य़) उसके बाद बावन अंगुल का बौना मनुष्य.

कौआ

जैसा कि बता चुके हैं कि जैव विविधता because शब्द बीसंवीं सदी के उत्तरार्द्ध में गढ़ा गया. ऐसा नहीं है कि शब्द गढ़ने से पहले इस दिशा में सोचा ही नहीं गया. जैव विविधता शब्द भले प्रयुक्त न हुआ हो लेकिन वनस्पति एवं जीव-जन्तुओं के परस्पर अन्योन्याश्रित की सोच बहुत पुरानी है.

कौआ

जीवविज्ञानी डार्विन भले उन्नीसवीं सदी because में जीवन के विकास का क्रम खोज पाने में समर्थ हुए हों लेकिन भारत की सनातन संस्कृति की बुनियाद ही जीवन के विकास क्रम को रेखांकित करते हुए रखी गयी. भगवान विष्णु के दशावतारों में मत्स्य से शुरुआत कर बुद्ध तक की विकास यात्रा इस बात को पहले ही पुष्ट कर चुकी है कि सर्वप्रथम जलीय जीव, मत्स्य अवतार जीव विकास का पहला क्रम था, उसके बाद उभयचर (जो जल में और थल में रह सकता है) कछुऐ के रूप में, फिर वाराह केवल थलचर के रूप में, थोड़ा और विकसित होने पर नृसिंह (आधा पशु तथा आधा मनुष्य़) उसके बाद बावन अंगुल का बौना मनुष्य.

कौआ

इस प्रकार वामन अवतार तक तो because शारीरिक विकास का क्रम दर्शाता है, लेकिन उसके बाद मनुष्य की प्रकृति का विकास शनैः शनैः हुआ. त्रेता के राम यदि बारह कलाओं से युक्त थे तो द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण सोलह कलाओं से युक्त थे. कुछ दर के लिए इसे यदि आप मिथकीय तथ्य भी मानें, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि जैव विकास का जो क्रम दर्शाया गया है, आज का विज्ञान भी जीवन का विकास क्रम यही मानता है.

सनातन धर्म के अनुसार 84 लाख because योनियों के बाद पुनः मनुष्य योनि की बात कही गयी है . पद्मपुराण के अनुसार:
‘’जलज नव लक्षाणी, स्थावरः लक्ष विंशति, कृमयोः रूद्रसंख्यकः.
पक्षिणाम् दश लक्षणं, त्रिन्श लक्षाणि पशवः, चतुर लक्षाणि मानवः..’’

अर्थात् 84 लाख योनियों में जलचर 9 because लाख, स्थावर यानी पेड़ पौधे 20 लाख, सरीसृप एवं कीड़े मकौड़े आदि 11 लाख, पक्षी 10 लाख, पशु 30 लाख तथा शेष 4 लाख मानवीय नस्ल शामिल हैं. यहां योनि का आशय स्त्री के जननांग से न होकर प्रजाति से है. क्योंकि इन 84 लाख योनियों में कई अयोनिज भी हैं. यहां 84 लाख योनियों के वर्गीकरण के पीछे केवल ये बताना है कि वनस्पति एवं पेड़ पौधे भी जीवन चक्र का एक अभिन्न हिस्सा हैं.

कौआ

वर्तमान में जैव विविधता को क्षति पहुंचाने के विरूद्ध कठोर कानून बने हैं, लेकिन सनातन संस्कृति के उद्भव के पुरातन काल में जब ईश्वरीय सत्ता पर ही समाज का संचालन होता था तो because भी कानून थे, जो लिखित न होते हुए भी उन्हें स्वेच्छा से इस तरह सर्वग्राह्य बना दिया गया था कि कोई उसके विपरीत आचरण का दुस्साहस कर ही नहीं पाता था.

कौआ

सोचिए, सनातन परम्परा में हजारों- हजार साल पहले वनस्पतियों में भी जीवन को स्वीकार किया और आज वैज्ञानिक इस आधार पर उसमें जीवन स्वीकारते हैं, कि उनका निरन्तर विकास होता है, because वे श्वासोच्छवास करते हैं तथा वंश वृद्धि का गुण उनमें विद्यमान है. वर्तमान में जैव विविधता को क्षति पहुंचाने के विरूद्ध कठोर कानून बने हैं, लेकिन सनातन संस्कृति के उद्भव के पुरातन काल में जब ईश्वरीय सत्ता पर ही समाज का संचालन होता था तो भी कानून थे, जो लिखित न होते हुए भी उन्हें स्वेच्छा से इस तरह सर्वग्राह्य बना दिया गया था कि कोई उसके विपरीत आचरण का दुस्साहस कर ही नहीं पाता था.

कौआ

गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी कृति रामचरित मानस की चैपाई में कहा है- “भय बिनु होई न प्रीति”. सतही तौर पर देखें तो भय और प्रीत दोनों परस्पर विरोधी भाव हैं. लेकिन यदि यह उक्ति ईश्वर because अथवा सर्वोच्च सत्ता से जोड़कर देखें तो शत प्रतिशत यह सटीक बैठती है. निष्काम भाव से सर्वोच्च सत्ता से स्नेह करने वाले तो विरले ही होंगे अन्यथा ईश्वर से हम प्रीत इसलिए करते हैं, कि हमें ईश्वर से भय है- स्वयं के अनिष्ट अथवा अशुभ का भय. यही भय हमें ईश्वरोन्मुख करता है अथवा यों कहें कि ईश्वर से प्रेम करने को विवश करता है. इसलिए सनातन धर्मावलम्बी उन मान्यताओं व सनातन परम्पराओं से विमुख होने का दुस्साहस नहीं कर पाता, जो उसे सनातन परम्पराओं से विरासत में मिली हैं.

कौआ

वेदों में जहां वायु, जल, अग्नि, because वरूण, इन्द्रादि की उपासना को महत्व दिया गया, जो जीवन के लिए अपरिहार्य तत्व थे, तो उत्तर वैदिक वाङ्गमय में ईश्वर तथा उसके विभिन्न अवतारों की पूजा- उपासना की बात आती है. इन अवतारों को आप मिथकीय मानें अथवा हकीकत, यह आपकी आस्था का विषय है.

कौआ

सनातन संस्कृति का ताना-बाना बुनते समय “भय बिन होई न प्रीति” की अवधारणा को आत्मसात् कर ही वेद, पुराण आदि धर्मग्रन्थों का सृजन हुआ प्रतीत होता है. जिसमें प्रकृति के संरक्षण को सर्वोच्च मानकर उसके अनुपालन के लिए धार्मिक आस्था का पुट दिया गया और जिसके विरूद्ध आचरण को अधर्म अथवा पाप माना गया.  वेदों में जहां वायु, because जल, अग्नि, वरूण, इन्द्रादि की उपासना को महत्व दिया गया, जो जीवन के लिए अपरिहार्य तत्व थे, तो उत्तर वैदिक वाङ्गमय में ईश्वर तथा उसके विभिन्न अवतारों की पूजा- उपासना की बात आती है. इन अवतारों को आप मिथकीय मानें अथवा हकीकत, यह आपकी आस्था का विषय है. अगर मिथक मानते हैं तो रचनाकार की दूरदृष्टि कहेंगे और यदि हकीकत मानते हैं तो ईश्वरीय सत्ता का मानवेत्तर जीवों के प्रति प्रेम एवं उनकी उपयोगिता को दर्शाती है.

कौआ

एक बात जो उभरकर सामने आती है, वे ये कि इन सभी देवी-देवताओं के वाहन पशु अथवा पक्षी ही हैं. because इन्हें सर्वशक्तिसम्पन्न व कण-कण में सर्वव्यापी मानते हुए भी जीव जन्तुओं को अपना वाहन बनाने की जरूरत क्यों आ पड़ी? इसके पीछे सनातन संस्कृति की जैव विविधता संरक्षण की दूर दृष्टि नजर आती है. अब देखिये ना, चूहा प्रत्यक्ष रूप में मनुष्य के लिए उपयोगी नहीं है, तो उसकी हिंसा न हो इसलिए गणेश जी का वाहन बना दिया, शेर जैसे हिंसक पशु का वर्तमान वन्य जीव संरक्षण कानून आने से पहले ही इन्सान वजूद मिटा दिया होता यदि दुर्गा के वाहन के रूप में उसे प्रतिस्थापित न किया गया होता.

कौआ

इसी तरह कुत्ते को भैरव से,because मत्स्य, कछुआ तथा वराह को दशावतारों में से, उल्लू जैसे अशुभ पक्षी को लक्ष्मी का वाहन बना दिया, नन्दी (बैल) को भगवान शंकर का वाहन के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए नाग व सांपों की माला के साथ इन विषैले जन्तुओं को पूज्य बना दिया, बन्दर जैसे उत्पाती जीव में हनुमान की छवि, हाथी, कौआ, गरूड़, हंस आदि को देवी देवताओं से जोड़ा गया. गाय हमारे लिए केवल दूध देने तक ही उपयोगी नहीं है, आज विज्ञान भी स्वीकारता है कि गाय एक बहुउपयोगी पशु है. सनातन संस्कृति ने गाय के शरीर में 33 कोटि देवताओं का वास होने की बात यों ही नहीं कह दी. दरअसल गाय के दूध से निर्मित होने वाले विभिन्न पदार्थों के अलावा उसका गोबर तथा गोमूत्र में चिकित्सकीय गुण बताये गये हैं.

कौआ

गाय की रीढ़ में स्थित सूर्यकेतु नाड़ी के because सूर्य के सम्पर्क में आने से स्वर्ण का उत्पादन बताया गया है जो उसके मलमूत्र के माध्यम से विसर्जित होता है तथा सूर्यकेतु नाड़ी हानिकारक विकीरण को समाप्त कर वातातरण को शुद्ध करती है. इसलिए सनातन संस्कृति में गाय को गौमाता का दर्जा देने के साथ उसके रोम रोम में देवताओं का वास उसमें बताया गया. चींटी जो सूक्ष्म जीव है, उसकी हत्या के पाप को भी अन्य जीवों की हत्या के बराबर ठहराकर बड़ी खूबसूरती से सनातन संस्कृति ने जैव विविधता के संरक्षण का संदेश दिया है.

कौआ

बीसवीं सदी के प्रारम्भ में वैज्ञानिक डॉ. जे.सी. बोस ने सन् 1901 में पहली बार दुनिया का ध्यान आकर्षित किया कि पेड पौधे भी अन्य जीवों की तरह है. जब कि सनातन संस्कृति because तो प्रारम्भ से ही 84 लाख योनियों में वनस्पतियों को शामिल करते हुए इनमें जीवन मानते आई है, तभी तो हर शुभ कार्य में “ बनस्पतयः शान्तिः” की कामना की जाती है. वनस्पतियों के संरक्षण के लिए भी सनातन परम्परा में पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बहुउपयोगी पादपों को सीधे धर्म व आस्था से जोड़कर उनके विनाश को महापातक बताया गया है.

कौआ

हमारे उत्तराखण्ड में because मृतक की बारहवीं पर पीपलपानी रस्म की जाती है, और प्रतीक स्वरूप पीपल की टहनी मृतक के नाम पर रोपित कर मृतक की आत्मा की शान्ति के लिए उस पर जल अर्पित किया जाता है. इस टहनी को पीपल के पेड़ से तोड़ने के लिए निःसन्तान व्यक्ति को ही चुना जाता है. जिसकी वंश परम्परा वहीं समाप्त हो रही हो, उसे आने वाली पीढ़ी के लिए पीपल से प्राण वायु की अपेक्षा नहीं रहती.

कौआ

वनस्पति जगत में पीपल एक ऐसा वृक्ष है,because जो सबसे ज्यादा प्राणवायु उत्सर्जित करता है और इस पेड़ को काटना तो दूर टहनी तोड़ना भी पाप माना गया है. हमारे उत्तराखण्ड में मृतक की बारहवीं पर पीपलपानी रस्म की जाती है, और प्रतीक स्वरूप पीपल की टहनी मृतक के नाम पर रोपित कर मृतक की आत्मा की शान्ति के लिए उस पर जल अर्पित किया जाता है. इस टहनी को पीपल के पेड़ से तोड़ने के लिए निःसन्तान व्यक्ति को ही चुना जाता है. जिसकी वंश परम्परा वहीं समाप्त हो रही हो, उसे आने वाली पीढ़ी के लिए पीपल से प्राण वायु की अपेक्षा नहीं रहती.

कौआ

दरअसल सांकेतिक रूप में पीपल की टहनी रोपbecause देना एक आधी-अधूरी रस्म है, जब कि पीपल की पौध लगाने के पीछे तार्किक तथ्य ये है कि मृतक की देह ने अपने जीवनकाल में प्रकृति से जो प्राणवायु (ऑक्सीजन) ली है, उस प्राणवायु का ऋण प्रकृति को चुकता करने के लिए मृतक की ओर से पीपल की पौध लगाने की परम्परा है. इसलिए पीपलपानी की रस्म में मात्र पीपल की टहनी पर जल अर्पण करने के बजाय मृतक के आश्रित मृतक के नाम से पीपल की पौध लगायें और उसकी परवरिश करें.

कौआ

इसी तरह बिल्ब अथवा बेल के वृक्ष में भीbecause भगवान शिव का वास कहा गया है. भगवान शिव को प्रिय बिल्व पत्र में त्रिदल ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के प्रतीक माने गये हैं. दूसरी ओर बिल्व का फल औषधीय गुणों से भरपूर है. विशेषरूप से उदर संबंधी विकारों के लिए बिल्व फल के गूदे का सेवन लाभकारी बताया गया है.

कौआ

बरगद, बड़ अथवा वटवृक्ष को अक्षयवट भी because कहा जाता है, क्योंकि इसमें कभी पतझड़ नही होता. वटवृक्ष में भगवान विष्णु का वास माना जाता है. वटसावित्री अमावास्या को सुहागिन महिलाऐं अपने पति के दीर्घ आयुष्य की कामना के साथ वटवृक्ष से अक्षय सौभाग्य की कामना करती हैं. वहीं वटवृक्ष में भी औषधीय गुण विद्यमान हैं. वटवृक्ष की छाल का काढ़ा मधुमेह के रोगियों के लिए लाभकारी होने के साथ ही रोग प्रतिरोधक शक्ति को बढ़ाने वाला बताया गया है.

कौआ

नीम में मां दुर्गा का वास बताया गया है.because हमारे दैनिक उपयोग में नीम का क्या महत्व है, इसे बताने की आवश्यकता नहीं. शनि की साढ़ेसाती से शान्ति के लिए नीम की लकड़ी से हवन को शीघ्र फलदायी माना गया है.

कौआ

वृक्षों में बांस एक ऐसा वृक्ष है, जिसे अशुभ माना जाता है. बांस की लकड़ी को जलाना वर्जित है. लेकिन इसके पीछे हमारी सनातन परम्परा की वैज्ञानिक सोच नजर आती है. वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि बांस की लकड़ी को जलाने से लेड ऑक्साइड बनता है जो एक खतरनाक नीरो टॉक्सिक है. because दरअसल अगरबत्ती जिसे हम दैनिक पूजा में शामिल करते हैं वह अपना पुरातन स्वरूप खो चुकी है. अगर एक सुगन्धित बनस्पति है, जिसे विशेष पूजा के अवसर पर बत्ती बनाकर जलाने से इसका नाम अगरबत्ती पड़ा लेकिन आज बांस के स्टिक पर कृत्रिम सुगन्धित रसायनों का लेप लगाकर जो अगरबत्ती बनती है, वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.

बांस के इन दुर्गुणों के कारण सनातन संस्कृति ने उसका तिरस्कार नहीं किया, क्योंकि जैव विविधता में इसका भी अपना महत्व है. इसलिए बांस को मृतक की अर्थी का वाहन बना दिया, ताकि इसे विनाश से बचाया जा सके. साथ ही यह भी नियम बना दिया गया कि अर्थी ले जाने वाले बांस को चिता के साथ जलाया न जाय.

कौआ

सनातन परम्परा में वनस्पतियों में because सबसे छोटी दूब से लेकर वटवृक्ष तक तथा जीवों में चींटी से लेकर हाथी तक उनको हमारी धार्मिक आस्था से जोड़कर प्रकारान्तर से जैव विविधता के संरक्षण का संदेश दिया है. हमारी सनातन संस्कृति में बड़ी खूबसूरती से कुछ ऐसी व्यवस्था की गयी है कि सनातन परम्परा में आस्था रखने वाला एक अनपढ़ व्यक्ति भी, जो जैवविविधता के महत्व की वैज्ञानिक सोच भले न रखता हो, कम से कम आस्था के नाम पर जैव विविधता के विनाश की सोच ही नहीं सकता.

कौआ

आम तो सबका प्रिय फल होता है ही इसे भला कौन काटना चाहेगा. लेकिन फल के अलावा आम की लकड़ी का उपयोग हवन में भी किया जाता है. कलश स्थापना में पंचपल्लव में आम की because पत्तियां तथा गृहप्रवेश में आम के पत्तों की माला इसलिए भी उपयोगी है कि इसके पत्ते जल्दी नहीं सूचते. हवन में उपयोग होने वाली हर समिधा का वातावरण की शुद्धता के लिए अपना महत्व है. आम की लकड़ी जलाने से फार्मिक एल्डिहाइड नामक गैस उत्सर्जित करती है, जो खतरनाक विषाणु को वातावरण से नष्ट करती है. इससे यह स्पष्ट होता है कि सनातन परम्परा वैज्ञानिक सोच के कितने करीब है.

कौआ

धतूरा जिसे आयुर्वेद में विषवर्ग का पौधा मानाbecause जाता है, चरक संहिता में इसे कनक कहा गया है. हालांकि धतूरे के सीमित मात्रा में उपयोग औषधीय उपयोग के लिए किया जाता है, लेकिन सनातन परम्परा की खूबसूरती देखिये ऐसे विषैले पौधे को भी भगवान शिव से जोड़कर उसे अर्पित करना कल्याणकारी माना गया है.

कौआ

प्रत्येक शुभ कार्य में गणेश पूजन से शुरुआत होती है, गणेश जी को दूर्वा यानी दूब अर्पित की जाती है. यद्यपि दूब के रस को शक्तिवर्धक बताया गया है, लेकिन गणेश पूजन के लिए दूब की because अनिवार्यता को देखते हुए कम से कम हर सनातनी परम्परा में विश्वास करने वाला दूब की भी उपयोगिता महसूस करेगा. इस प्रकार सनातन परम्परा में वनस्पतियों में सबसे छोटी दूब से लेकर वटवृक्ष तक तथा जीवों में चींटी से लेकर हाथी तक उनको हमारी धार्मिक आस्था से जोड़कर प्रकारान्तर से जैव विविधता के संरक्षण का संदेश दिया है. हमारी सनातन संस्कृति में बड़ी खूबसूरती से कुछ ऐसी व्यवस्था की गयी है कि सनातन परम्परा में आस्था रखने वाला एक अनपढ़ व्यक्ति भी, जो जैवविविधता के महत्व की वैज्ञानिक सोच भले न रखता हो, कम से कम आस्था के नाम पर जैव विविधता के विनाश की सोच ही नहीं सकता.

कौआ

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों, लोकसंस्कृति, लोकपरम्परा, लोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबाद, लखनऊ, रामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

Related Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *