Author: Himantar

हिमालय की धरोहर को समेटने का लघु प्रयास
उत्‍तराखंड : एक मंदिर ऐसा भी जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

उत्‍तराखंड : एक मंदिर ऐसा भी जहां 68 वर्षों से चल रहा है पुराण सप्ताह

लोक पर्व-त्योहार
डॉ. मोहन चंद तिवारीसमूचे उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के अंतर्गत द्वाराहाट स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मन्दिर एक ऐसा मन्दिर है,जहां विगत 68 वर्षों से नागार्जुन ग्रामवासी मिलकर प्रतिवर्ष नियमित रूप से भाद्रपद मास में 2 गते से पुराण ‘सप्ताह’ का आयोजन करते आए हैं,जिसमें अठारह पुराणों में से किसी एक पुराण की कथा का प्रवचन प्रतिवर्ष किया because जाता है. इस वर्ष इस पुराण सप्ताह के अंतर्गत श्री विष्णु महापुराण कथा यज्ञ का आयोजन 18 अगस्त, 2021 से 25 अगस्त तक होगा. ‘श्री विष्णु मन्दिर निर्माण एवं भागवत कथा समिति', ग्राम नागार्जुन द्वारा आयोजित इस कथा-सप्ताह के व्यासाचार्य चनोली ग्राम के प्रसिद्ध कथावाचक श्री गणेशदत्त शास्त्री, साहित्याचार्य विशारद हैं,जो पिछले अनेक वर्षों से नागार्जुन’ के कथा सप्ताहों में व्यासाचार्य का दायित्व निर्वहन करते आए हैं. इसी पुराण सप्ताह के दौरान शास्त्र...
यों ही नहीं कहा गया था प्रताप भैया को पहाड़ का मालवीय

यों ही नहीं कहा गया था प्रताप भैया को पहाड़ का मालवीय

स्मृति-शेष
ग्यारहवीं पुण्यतिथि विशेषभुवन चंद्र पंत कहते हैं कि यदि एक महिला को शिक्षित करोगे तो उसकी आने वाली पूरी पीढ़ी शिक्षित होगी और यदि एक स्कूल खुलेगा तो 100 जेलों के स्वतः दरवाजे बन्द होंगे. शिक्षा सभ्य because समाज का वह प्रवेश द्वार है, जहां से व्यक्तित्व के विकास के सारे दरवाजे खुलते हैं. इसलिए विद्यादान को सर्वोपरि माना गया है. एक विद्यालय खोलना मतलब अनन्त काल तक उसके माध्यम से अनन्त पीढ़ियों का उद्धार. लेकिन यदि आपने सैंकड़ों स्कूल खोलकर समाज को शिक्षित करने का कार्य किया है, तो निःसंदेह इससे बड़ा परोपकार कोई हो नहीं सकता.नैनीतालनैनीताल के प्रताप भैया ने दर्जनों विद्यालय खोलकर ऐसा ही कुछ कर दिखाया, जिससे उन्हें उत्तराखण्ड के मालवीय कहा गया. इन विद्यालयों के प्रारंभिक दौर में घर-धर जाकर चन्दा इकट्ठा करने से लेकर आवश्यक संसाधन जुटाने को लेकर किन कठिनाइयों से गुजरना पड़ा यह तो या उन ...
देबूली का दुःख

देबूली का दुःख

किस्से-कहानियां
नीमा पाठक मार्च का महिना था अभी भी सर्दी बहुत अधिक थी गरम कपड़ों के बिना काम नहीं चल रहा था, रातें और भी ठंडी. करीब रात के दस बजे होंगे आज फिर देबूली खो गई थी, उसका करीब एकbecause हफ्ते से यही क्रम चल रहा था. दिन तो ठीक था, पर रात होते ही वह घर से गायब हो जाती थी. घर के पीछे बांज का घना जंगल था, जंगली जानवर रात होते ही बाहर निकल आते थे और भयंकर आवाजें करते थे,  किसी की भी इतनी  हिम्मत नहीं होती थी कि वह रात में जंगल की तरफ अकेले जाए. पर यह आठ-नौ  साल की  बच्ची  पता नहीं किस हिम्मत से सारी रात अकेले जंगल में गुजार देती है, कोई भी इसे नहीं समझ पा रहा था. संसाधनों लालटेन व टौर्च की रोशनी में ढूढने वाले  बड़ी अधीरता से उसे आवाज दे रहे थे, आवाज से ही उनकी चिंता साफ समझ में आ रही थी लेकिन कभी भी देबुली उनको नहीं मिली. ढूढने के लिए उसकी जवान भाभी और एक दो पड़ोस के आदमी जाते थे. पूरी कोशिश करने प...
उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को मुख्य धारा में लाने के अनूठे प्रयास की हर तरफ हो रही सराहना

उत्तराखंड की क्षेत्रीय भाषाओं को मुख्य धारा में लाने के अनूठे प्रयास की हर तरफ हो रही सराहना

नैनीताल
सोशल मीडिया के माध्यम से कुमाउनी साक्षात्कार के पूरे हुए 125 अंकहिमांतर ब्‍यूरो, हल्‍द्वानी"म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण" श्रृंखला के तहत भिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सफलतापूर्वक आयोजित हो रहे कार्यक्रमों के चर्चित कार्यक्रम "कुमाउनी साक्षात्कार" के 125वां अंक because पिछले दिनों उत्तराखंड के वरिष्ठ लोकगायक श्री नैन नाथ रावल के साथ आयोजित किया गया। नैन नाथ जी का कुमाउनी साक्षात्कार प्रसिद्ध कवि-उद्घोषक श्री हेमंत बिष्ट ने लिया। 100वें अंक में 6 जून को प्रसिद्ध इतिहासकार-पर्यावरणविद, "पहाड़" पत्रिका के सम्पादक डॉ. शेखर पाठक का कुमाउनी साक्षात्कार कई बच्चों ने लिया था। 101वें अंक में महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी का कुमाउनी साक्षात्कार हुआ था।संसाधनोंकोरोना की पहली लहर के दौरान जून 2020 में शुरू किए गए ऑनलाइन कुमाउनी साक्षात्कार "म्योर पहाड़, मेरि पछ्यांण" श्रृ...
‘गिर्दा’: उत्तराखंड आंदोलन के जनकवि और युगद्रष्टा चिंतक भी

‘गिर्दा’: उत्तराखंड आंदोलन के जनकवि और युगद्रष्टा चिंतक भी

स्मृति-शेष
गिर्दा' की 11वीं पुण्यतिथि पर विशेषडॉ. मोहन चंद तिवारी    22 अगस्त को उत्तराखंड आंदोलन के जनकवि, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की 11वीं पुण्यतिथि है. गिर्दा उत्तराखंड राज्य के एक आंदोलनकारी जनकवि थे,उनकी जीवंत कविताएं अन्याय के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा देतीं हैं. वह लोक संस्कृति के इतिहास से जुड़े गुमानी पंत तथा गौर्दा का अनुशरण करते हुए ही राष्ट्रभक्ति पूर्ण काव्यगंगा से because उत्तराखंड की देवभूमि का अभिषेक कर रहे थे. हर वर्ष मेलों के अवसर पर देशकाल के हालातों पर पैनी नज़र रखते हुए झोड़ा- चांचरी के पारंपरिक लोककाव्य को उन्होंने जनोपयोगी बनाया. इसलिए वे आम जनता में ‘जनकवि’ के रूप में प्रसिद्ध हुए.संसाधनों आंदोलनों में सक्रिय होकर कविता करने तथा कविता की पंक्तियों में जन-मन को आन्दोलित करने की ऊर्जा भरने का गिर्दा’ का because अंदाज निराला ही था. उनकी कविताएं बेहद व्यंग्यपूर्ण तथा तीर क...
आखिर क्यों भूल गये हम ‘कालू महर’ को

आखिर क्यों भूल गये हम ‘कालू महर’ को

इतिहास
चन्द्रशेखर तिवारी भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में उत्तराखण्ड के काली कुमाऊं यानि वर्तमान चम्पावत जनपद का अप्रतिम योगदान रहा है. स्थानीय जन इतिहास के आधार पर माना जाता है कि लोहाघाट के निकटवर्ती सुई-बिसुंग इलाके के लोगों की स्वाधीनता संग्राम में बहुत ही सक्रिय भूमिका रही थी. इनमें कालू महर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है. स्थानीय लोग इन्हें प्रमुखतः ’काल्मारज्यू’ के नाम से जानते हैं. कालू महर का जन्म बिसुंग के थुवा महर गांव में 1831 में हुआ था. अपने किशोरावस्था के दौर से ही कालू महर ने बिट्रिश हुकूमत का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया था.संस्कृति1857 में जब देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया तब दुर्गम क्षेत्र होने के कारण उत्तराखण्ड में इसका विशेष प्रभाव तो नहीं पड़ा पर काली कुमाऊं की जनता ने अपने वीर सेनानायक कालू महरा की अगुवाई में विद्रोह कर ब्रिटिश प्रशासन की जडें एक तरह से हिला ही ...
सांस्कृतिक, धार्मिक और पहाड़ी धरोहर की प्रतीक ‘पहाड़ी गागर’

सांस्कृतिक, धार्मिक और पहाड़ी धरोहर की प्रतीक ‘पहाड़ी गागर’

साहित्‍य-संस्कृति
5 ‘ज’ पर निर्भर है पहाड़ी जीवन- शैलीआशिता डोभाल मानव सभ्यता में जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन का महत्वपूर्ण स्थान रहता है यानी कि हमारी जीवन-शैली 5 तरह के ‘ज’ पर निर्भर रहती है और ये सब कहीं न कहीं हमारी आस्था because और धार्मिक आयोजनों के प्रतीक और आकर्षण के केंद्र बिंदु भी होते है और सदियों से ये अपना स्थान यथावत बनाए हुए है।संस्कृति आज आपको पहाड़ की एक ऐसी धरोहर की खूबसूरती से रू-ब-रू करवाने की कोशिश करती हूं जो अपने आप में खूबसूरत तो है, हमारी समृद्ध संस्कृति और संपन्न विरासत को भी because अपने में समाए हुए है. ये महज एक बर्तन नहीं बल्कि हमारी धरोहर है, जिसे हमारे बुजुर्गों ने हमे सौंपा है. ये अपने में कहावतों को भी समाए हुए हैं, ऐसी ही एक धरोहर है जिसका पहाड़ की रसोई में महत्वपूर्ण स्थान है उसका नाम है ‘गागर’.संस्कृति गागर में सागर जैसी कहावत को सुनने से प्रतीत होता है कि...
भिलंगना घाटी के मसीहा : हिमालय गौरव इन्द्रमणि बडोनी

भिलंगना घाटी के मसीहा : हिमालय गौरव इन्द्रमणि बडोनी

टिहरी गढ़वाल
सूर्य प्रकाश सेमवाल पश्चिम के मीडिया ने ज़िंदा और चलते फिरते गाँधी की उपमा जिस सामाजिक, सांस्कृतिक,आध्यात्मिक और राजनीतिक विभूति को दी थी, वह कोई और न ही हिमालयी व्यक्तित्व स्वर्गीय इन्द्रमणि बडोनी थे. यही कारण है कि देश के गांधी की तरह बेशक पहाड़ के गांधी के संकल्पों और मुद्दों को हाशिये पर पहुंचा दिया गया हो लेकिन अपने विराट एवं उदात्त व्यक्तित्व तथा सादगी व सहज व्यवहार के लिए सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए ही नहीं वरन् सामान्य जनमानस के लिए भी सदैव प्रेरणाप्रद एवं वदनीय बने रहेंगे.वाटर हारवैस्टिंग अपने अनुकरणीय आचरण, शैक्षणिक जागरूकता,  कुशल नेतृत्व क्षमता एवं निश्च्छल कार्यशैली के बल पर बडोनी जी ने दलगत व क्षेत्रीय भावना से ऊपर होकर समूचे पहाड़ी क्षेत्र because में अपनी एक विशेष पहचान व साख बनाई थी. वे अपनी कर्मभूमि भिलंगना घाटी के गंगी गाँव से लेकर पौड़ी, चपावत, अल्मोड़ा के...
‘नौला फाउंडेशन’ : लुप्त होते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का अभियान

‘नौला फाउंडेशन’ : लुप्त होते जलस्रोतों को पुनर्जीवित करने का अभियान

जल-विज्ञान
भारत की जल संस्कृति-37डॉ. मोहन चंद तिवारीउत्तराखण्ड में जल-प्रबन्धन-8 लेखमाला के बारे में किंचित्वक्तव्य ('हिमांतर' ई पत्रिका में प्रकाशित 'भारत की जल संस्कृति' के धारावाहिक लेख माला का यह 37 वां और 'उत्तराखंड जल प्रबंधन' का 8वां लेख है. मेरे छात्रों, सहयोगी अध्यापकों और अनेक मित्रों का परामर्श है कि ये जल विज्ञान से सम्बंधित सभी लेख पुस्तकाकार के रूप में प्रकाशित हों. पिछले दस वर्षों में एक शोधकर्त्ता और जल संकट की विभिन्न समस्याओं के प्रति गम्भीरता और संवेदनशीलता की भावना से लिखे गए इन because लेखों में यथा सामर्थ्य जल संस्कृति के ज्ञान-विज्ञान और उसके परम्परागत इतिहास को समेटने का यथा सामर्थ्य प्रयास  किया गया है. मेरे छात्रवर्ग, सहयोगी अध्यापकगण और विद्धान् मित्रों द्वारा समय समय पर इन लेखों का जो संज्ञान लिया गया और अपने महत्त्वपूर्ण विचार प्रकट किए गए, उन सब के प्रति मैं ...
मेरी रसोई : पौष्टिकता से भरपूर हैं पहाड़ी व्‍यंजन

मेरी रसोई : पौष्टिकता से भरपूर हैं पहाड़ी व्‍यंजन

साहित्‍य-संस्कृति
सुनीता भट्ट पैन्यूली किसी भी समाज का दर्पण उसके अवशेषात्मक प्रमाण अथार्त उसकी लोक-संस्कृति, लोकगीत, लोक नृत्य और उसका खान-पान हैं. उस समाज की संस्कृति, परंपराओं और सभ्यताओं की बात करना तब तक अधूरा ज़िक्र है जब तक हम उस विशेष सामाजिक  परिवेश के खान-पान  अथवा ज़ायके का ज़िक्र न करें. खान-पान दरअसल महज़ उदरस्थ करना ही नहीं उसके प्रच्छन्न हमारे पूर्वजों का मनोविज्ञान उनके जीवन की दास्तां भी हैं. खाद्य पदार्थ और उससे बने व्यंजनों की उत्पत्तियों का इतिहास इतना आसान नहीं रहा होगा निश्चित ही इसका कारण संभवतः प्रतिकूल भौगोलिक परिस्थितियों  में भोजन जुटाने की ज़द्दोज़हद, ज़िंदा रहने की प्रत्याशा रही होगी. खान-पान और भोज्य पदार्थ परिचायक भी हैं उस विशिष्ट समाज के भौगोलिक वातावरण उसकी विषमता और उससे सामंजस्यता की जहां शहरों से सुदूर बसाहत,आर्थिक कमज़ोरी और पौष्टिक अन्न की अनुपलब्धता शायद कारण रहा ह...