• डॉ. मोहन चंद तिवारी

समूचे उत्तराखंड में कुमाऊं मंडल के अंतर्गत द्वाराहाट स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मन्दिर एक ऐसा मन्दिर है,जहां विगत 68 वर्षों से नागार्जुन ग्रामवासी मिलकर प्रतिवर्ष नियमित रूप से भाद्रपद मास में 2 गते से पुराण ‘सप्ताह’ का आयोजन करते आए हैं,जिसमें अठारह पुराणों में से किसी एक पुराण की कथा का प्रवचन प्रतिवर्ष किया because जाता है. इस वर्ष इस पुराण सप्ताह के अंतर्गत श्री विष्णु महापुराण कथा यज्ञ का आयोजन 18 अगस्त, 2021 से 25 अगस्त तक होगा. ‘श्री विष्णु मन्दिर निर्माण एवं भागवत कथा समिति’, ग्राम नागार्जुन द्वारा आयोजित इस कथा-सप्ताह के व्यासाचार्य चनोली ग्राम के प्रसिद्ध कथावाचक श्री गणेशदत्त शास्त्री, साहित्याचार्य विशारद हैं,जो पिछले अनेक वर्षों से नागार्जुन’ के कथा सप्ताहों में व्यासाचार्य का दायित्व निर्वहन करते आए हैं. इसी पुराण सप्ताह के दौरान शास्त्री जी ने भागवतपुराण, देवीपुराण, शिवपुराण,वामन पुराण आदि विभिन्न पुराणों की कथाओं का प्रवचन किया है.

नैनीताल

द्वाराहाट से लगभग 10-11 कि.मी.की दूरी पर नागार्जुन (नगार्झण) गांव में स्थित श्री नागार्जुन देव का प्राचीन विष्णु मन्दिर उत्तराखंड के उन प्राचीन ऐतिहासिक मंदिरों में परिगणित है, जिसका उल्लेख स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखण्ड’ में भी मिलता है. उत्तराखंड के पौराणिक भूगोल की दृष्टि से यही स्थान ‘सुरभि’ नदी का उद्गम स्थान है,जो दक्षिण की ओर because बहती हुई विभाण्डेश्वर क्षेत्र में ‘नंदिनी’ नदी से संगम करती है. मान्यता है कि इस पवित्र स्थान में विष्णु भगवान् ‘नागार्जुन’ नाम से विराजमान रहते हैं. स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखण्ड’ में नागार्जुन पर्वत की स्थिति पश्चिमी रामगंगा ‘रथवाहिनी’ नदी के बाईं ओर बताई गई है जहां प्राचीन काल में ‘अर्जुन’ नामक नाग की पूजा होती थी इसलिए इसे ‘नागार्जुन’ कहा जाता है-

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ततस्तु रथवाहिन्या because वामे नागार्जुनो गिरिः.
यत्र चैवार्जुनो नाम नागः सम्पूज्यते द्विजाः..”

मानसखण्ड, 27.12-13

लोकप्रचलित किंवदन्ती के अनुसार प्राचीन काल में यहां घना जंगल था. एक ग्वाला प्रतिदिन अपनी गायों को चराने इस जंगल में आया करता था मगर उसकी एक गाय ऐसी थी जो इस जंगल में स्थित एक शिला के ऊपर अपने थनों का दूध निखार आती थी और घर में दूध नहीं देती थी इसलिए ग्वाला उस गाय से बहुत दुःखी था. because एक दिन ग्वाले ने गुप्त रूप से गाय का पीछा किया. प्रतिदिन की तरह गाय ने जब शिला के ऊपर दूध की धार गिराई तो ग्वाले को गुस्सा आ गया. उसने कुल्हाड़ी से उस शिला पर चोट मारी जिससे शिला का ऊपरी भाग छिन्न-भिन्न हो गया.

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कालान्तर में चन्द्रवंशी राजाओं के शासन काल में राजा उद्योत चन्द पश्चिम दिशा में विजय करने के लिए प्रयाण कर रहे थे तो इसी गांव में ‘राजाटौ’ नामक स्थान पर उनका शिविर पड़ा. रात में राजा को स्वप्न में आज्ञा हुई कि “राजन् यहां घनी झाड़ी के नीचे विष्णु मन्दिर की मूर्ति है.आप यहां पर उनका मन्दिर बना कर पूजा-अर्चना की व्यवस्था करें. because आप की विजय सुनिश्चित है.” प्रातःकाल राजा ने मन्त्रियों के समक्ष अपने स्वप्न को बताया. ढूंढने पर उन्होंने झाड़ी में खण्डित मूर्ति को देखा. राजा ने संकल्प किया कि यदि वे अपने युद्ध अभियान में सफल हुए तो यहां मन्दिर अवश्य बनाएंगे. दैवयोग से राजा उद्योत चन्द अपने युद्ध प्रयाण में विजयी हुए.राजा ने इसी विजय के उपलक्ष्य में यहां मन्दिर बना कर उसकी प्राण प्रतिष्ठा करवाई.राजा ने अपने पुरोहित गंगोली के उप्रेती ब्राह्मणों को यहां भगवान् विष्णु की पूजा-अनुष्ठान के लिए नियुक्त किया.

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नागार्जुन मन्दिर में राजा उद्योतचन्द ने ताम्रपत्र द्वारा अपनी राजाज्ञा का लेखन भी करवाया है जिसमें समीपवर्ती कुछ गांव भी इस मन्दिर को दान में दिए गए है और उस ताम्रपत्र में because इन गांवों की रकम का अंश इस मन्दिर के पुजारियों को देने का प्रावधान भी किया गया है.

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जहां तक द्वाराहाट विकासखंड में स्थित इस पौराणिक मन्दिर की भौगोलिक पृष्ठभूमि है, उसका स्कंदपुराणान्तर्गत ‘मानसखण्ड’ के ‘विभाण्डेश्वरमाहात्म्यम्’ में यह वर्णन मिलता है कि because भगवान् शिव ने हिमालय की चोटियों पर अपने शिरों को रखकर‚ नील पर्वत पर कमर‚ नागार्जुन पर्वत पर दाहिना हाथ, भुवनेश्वर पर्वत पर बांया हाथ और दारुका वन में चरणों को स्थापित कर रखा है –

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शिखरेषु महाभागाः सन्निधाय शिरांसि वै.
कटिं कृत्वा because महादेवः सुपुण्ये नीलपर्वते..
भुजं नागार्जुने because दक्षं वामकं भुवनेश्वरे.
कृत्वा पुण्ये because महाभागश्चरणौ दारुकावने..”
मानसखण्ड, 28.20-21

‘नागार्जुन’ का ‘विभाण्डेश्वर’ तीर्थ के साथ भी घनिष्ठ सम्बन्ध है. ‘नागार्जुन’ नामक स्थान पर ही ‘देवधेनु’ सुरभि because गाय का रूप त्याग कर नदी के रूप में बहने लगी थी और विभाण्डेश्वर महादेव के समीप पहुंची-

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तत्रैव सुरभी पुण्या मया संप्रेषिता सुत.
सरिद्रूपेण लोकानां because पावनार्थं प्रयाति हि॥
नागार्जुनगिरेः पुण्याद् because विनिसृत्य सरिद्वरा.
विभाण्डेशस्थलं पुण्यं because ययौ पापप्रणाशिनी॥”
मानसखण्ड, 29.18-19

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मैं पिछले अनेक वर्षों में ‘नागार्जुन’ मन्दिर में होने वाले धार्मिक आयोजनों का प्रत्यक्षदर्शी भी रह चुका हूं तथा ऐसे कार्यक्रमों के प्रति शोधात्मक रुचि रखने के कारण पिछले वर्षों में इनकी विडियोग्राफी तथा फोटोग्राफी करने का सौभाग्य भी मुझे मिला है. ‘नागार्जुन’ मन्दिर के ऐसे ही आयोजनों मे से सन् 2008 में आयोजित शतचंडी महायज्ञ के because आयोजन की स्मृतियां आज भी मस्तिष्क पटल में ताजा बनी हुईं हैं. बताना चाहुंगा कि आज भी दिल्ली,चंडीगढ़ पटियाला, हरियाणा आदि दूरदराज में बसे उत्तराखंड के प्रवासीजन अपने तीर्थ तुल्य ‘नागार्जुन’ देवस्थान के प्रति अगाध आस्थाभाव रखते हुए इस आयोजन को अपना तन-मन-धन से सहयोग देते आए हैं. यह वर्ष इसलिए भी विशेष गौरवशाली वर्ष है कि नागार्जुन विष्णुमन्दिर का भव्य देवालय बना है. इसके लिए नागार्जुन ग्राम तथा इसके निर्माण में तन-मन- धन से सहयोग देने वाले धर्मप्राण बंधुओं का विशेष अभिनन्दन है.

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तेरह वर्ष पूर्व सन् 2008 के वार्षिक  समारोह के अवसर पर  पुराणकथा के साथ साथ सहस्रचंडी यज्ञ का भी जब भव्य आयोजन हुआ था तब उत्तराखंड के प्रसिद्ध संत मौनी महाराज जी का स्नेहपूर्ण सान्निध्य भी इस  आयोजन को प्राप्त हुआ था. द्वाराहाट, रानीखेत, भिकियासेन के विधायक भी इस समारोह में उपस्थित हुए तथा भारद्वाज because कुटी भासी से परमहंस रामचंद्र दास महाराज जी ने भी इस समारोह की शोभा को बढ़ाया. क्षेत्र के गण्यमान्य साधुसंतों और बुद्धिजीवियों की उपस्थिति से ऐसा प्रतीत होता था मानो कि शिष्टता,अनुशासन और भक्तिभाव की इस त्रिवेणी में श्रद्धालुजन धर्माभिषेक कर रहे हों. इंद्रदेव भी मरुद्गणों के साथ अपनी द्रुतगति से इस शतचंडी महायज्ञ में आहुति देना चाहते थे इसलिए वे भी पुराण सप्ताह के दौरान धाराप्रवाह बरस कर अपनी उपस्थिति दर्ज़ करा रहे थे.

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अनेक मित्रों की जानकारी हेतु मैं इस ‘विष्णु महापुराण कथा-सप्ताह’ के अवसर पर सन् 2008 में शतचंडी महायज्ञ के उपलक्ष्य में आयोजित ऐतिहासिक कलश शोभायात्रा, मंदिर परिक्रमा यात्रा because आदि के दुर्लभ चित्रों को भी अवलोकनार्थ पोस्ट कर रहा हूं,ताकि जन सामान्य भी जान सके कि उत्तराखंड आज भी पुराण सप्ताह आदि धार्मिक आयोजनों को कितने उत्साह और श्रद्धाभाव से करता आया है. आशा है इन चित्रों के माध्यम से इस भागवत कथा समारोह के अवसर पर उत्तराखंड के भव्य तीर्थ नागार्जुन देव और उनकी दिव्य महिमा का दर्शन दूर दराज़ के लोगों को भी हो सकेगा.

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प्राकृतिक आपदाओं के इस संकट काल में, because भगवान् विष्णु स्वरूप दीनबंधु नागार्जुन देव से प्रार्थना है कि वे परम कृपानिधान हम सब दुःखी जनों का कष्टनिवारण करते हुए हमारा कल्याण करें. पहाड़ में अन्न, धन और पशुधन की समृद्धि करते हुए हरियाली व खुशहाली का मार्ग प्रशस्त करें-

नैनीताल

न जातिरूपो न च कर्मरूपो,
न सूक्ष्मरूपो because न महास्वरूपः.
त्वमीश because नागार्जुन दीनबन्धो,
भक्तार्तिहारिन् because भगवन्नमस्ते..”

नैनीताल

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से एसोसिएट प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त हैं. एवं विभिन्न पुरस्कार व सम्मानों से सम्मानित हैं. जिनमें 1994 में ‘संस्कृत शिक्षक पुरस्कार’, because 1986 में ‘विद्या रत्न सम्मान’ और 1989 में उपराष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा द्वारा ‘आचार्यरत्न देशभूषण सम्मान’ से अलंकृत. साथ ही विभिन्न सामाजिक संगठनों से जुड़े हुए हैं और देश के तमाम पत्र—पत्रिकाओं में दर्जनों लेख प्रकाशित।)

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