Tag: उत्तराखंड

ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे

ओ हरिये ईजा..कुड़ी मथपन आग ए गो रे

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—38प्रकाश उप्रेती'ओ...हरिये ईजा ..ओ.. हरिये ईज... त्यूमर कुड़ी मथपन आग ए गो रे' (हरीश की माँ... तुम्हारे घर के ऊपर तक आग पहुँच गई है). आज बात उसी- "जंगलों में लगने वाली आग" की. because मई-जून का महीना था. पत्ते सूख के झड़ चुके थे. पेड़ कहीं से भी खूबसूरत नहीं लग रहे थे. चीड़ के पेड़ों से 'पिरूहु' (चीड़ की घास) झड़ कर रास्तों और जंगलों में फैल गया था. रास्तों में इतनी फिसलन कि चलना मुश्किल हो रहा था. हर जगह पिरूहु ही पिरूहु था. ज्योतिष ईजा जब भी घास काटने जाती 'दाथुल' (दरांती) या लाठी से पिरुहु को रास्ते से हटातीं चलती थीं. यह उनका रोज का काम था. ईजा के साथ सूखी लकड़ी लेने हम भी जाते थे तो ईजा कहती थीं- because "भलि अये हां, इनुपन पिरूहु है रो रडले" (ठीक से आना, इधर चीड़ की घास बिखरी पड़ी है, फिसलना मत). हम संभल-संभल कर चलते थे. कई बार तो 'घस-घस' फिसल भी ...
“खाव” जब आबाद थे

“खाव” जब आबाद थे

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—37प्रकाश उप्रेतीपहाड़ में पानी समस्या भी है और समाधान भी. एक समय में हमारे यहाँ पानी ही पानी था. इतना पानी कि सरकार ने जगह-जगह सीमेंट की बड़ी-बड़ी टंकियाँ बना डाली थी. जब हमारी पीढ़ी सीमेंट की टंकियाँ देख रही थी तो ठीक उससे पहले वाली पीढ़ी मिट्टी के "खाव" बना रही थी. आज बात उसी 'खाव' की. 'खाव' मतलब गाँवों के लोगों के द्वारा जल संरक्षण के लिए बनाए जाने वाले तालाब. बात थोड़ी पुरानी है लेकिन उतनी भी नहीं कि भुलाई और भूली जा सके. हमारे यहाँ कई जगहों के और गाँवों के नाम के साथ खाव लगा है.जैसे- रुचि खाव, खावे ढे, पैसि खाव, और भी कई खाव थे. कई जगहों की पहचान ही खाव से थी. जगहें तो अब भी हैं लेकिन खाव समतल मिट्टी में तब्दील हो गए हैं. सीमेंट ने पानी और खाव दोनों को निगल लिया. वह समय था जब पानी लेने के लिए सुबह-शाम 'पह्यरियों' (पानी लाने वाली महिलाएँ) की लाइ...
जीवन का अँधेरा दूर करने वाला ‘लम्फू’

जीवन का अँधेरा दूर करने वाला ‘लम्फू’

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—36प्रकाश उप्रेतीआज बात रोशनी के उस सीमित घेरे की जहां से अंधेरा छटा. जीवन की पहली किताब उस रोशनी के नाम थी जिसे हम 'लम्फू' कहते थे. 'लम्फू' मतलब लैम्प. वह आज के जैसा लैम्प नहीं था. उसकी रोशनी की अदायगी निराली थी. पढ़ाई से लेकर लड़ाई तक लम्फू हमसफर था. ईजा और लम्फू दोनों रोशनी देते रहे लेकिन उनके इर्द-गिर्द अंधेरा बड़ा घेरा बनाता गया. दिन ढलते ही लम्फू में मिट्टी का तेल डालना, उसकी बत्ती   को ऊपर करना, रोज का नियम सा था. ईजा जब तक 'छन' (गाय-भैंस बांधने की जगह) से आती हम 'गोठ'(घर का नीचे का हिस्सा), 'भतेर' (घर का ऊपर का हिस्सा) में लम्फू जला कर रख देते थे. लम्फू रखने की जगह भी नियत थी. भतेर में वह स्थान 'गन्या' (दीवार का कुछ हिस्सा बाहर को निकला और ऊपर से थोड़ा समतल) होता था. वहाँ से पूरे भतेर में रोशनी पहुँच जाती थी. गोठ में चूल्हे के सामने की दीवार...
राज्य मिलने के बीस साल बाद भी उपेक्षित है जालली सुरेग्वेल क्षेत्र

राज्य मिलने के बीस साल बाद भी उपेक्षित है जालली सुरेग्वेल क्षेत्र

अल्‍मोड़ा
डॉ. मोहन चन्द तिवारीअभी हाल ही में 22, जुलाई, 2020 को जालली क्षेत्र के सक्रिय कार्यकर्त्ता और समाजसेवी भैरब सती ने अमरनाथ, ग्राम प्रधान जालली; मनोज रावत, ग्राम प्रधान ईड़ा; सरपंच दीन दयाल काण्डपाल, मोहन काण्डपाल, नन्दन सिंह, गोपाल दत, पानदेव व महेश चन्द्र जोशी आदि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों के एक शिष्टमंडल की अगुवाई करते हुए जालली क्षेत्र के विकास और वहां उप तहसील के कार्यालय की स्थापना की मांग को लेकर द्वाराहाट तहसील के एसडीएम श्री आर के पाण्डेय से मुलाकात की और उन्हें ज्ञापन भी सौंपा है. जालली क्षेत्रवासियों की एक मुख्य मांग है कि वहां एक साधन संपन्न कार्यालय खोला जाए और तुरंत वहां डाटा आपरेटर की नियुक्ति की जाए, ताकि इस कोरोना काल की चरमराई हुई राज्य परिवहन व्यवस्था के दौर में स्थानीय लोगों को अपने खतोंनी की नकल प्राप्त करने और परिवार रजिस्टर, आय प्रमाण पत्र,स्थायी निवास पत्र, जातिपत...
गोधनी ईजा छाँ कसि फाने: घूर..घवां..

गोधनी ईजा छाँ कसि फाने: घूर..घवां..

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—35प्रकाश उप्रेतीयह हमारे जीवन का वो किस्सा है, जो हर तीसरे और चौथे दिन घटता ही था. इसकी स्मृतियाँ कभी धुँधली नहीं होती बल्कि चित्र बन आँखों में तैरने लगती हैं. वो स्मृतियाँ हैं -'ईजा' (माँ) के 'छाँ  फ़ानने' की. मतलब कि छाँछ बनाने की. ईजा ने भैंस तो हमेशा रखी. कभी एक तो कभी दो, हाल के दिनों में तो चार भी थीं. इसलिए हर तीसरे-चौथे दिन छाँ फानती ही थीं. ईजा 'भतेर' (घर का ऊपर वाला हिस्सा) 'थुमी' (घर के बीच में धुरी के समान लगी मोटी लकड़ी) पर छाँ फानती थी. थुमी पर दो 'ज्योड़' (रस्सी) जिन्हें "नेतण" कहा जाता था, हमेशा बंधे रहते थे. ईजा उनमें 'रअडी' ( एक लंबी लकड़ी जिसके नीचे के सिरे पर तिकोना बनाया होता था) को फंसाकर 'कंटर' (कनस्तर) में छाँ फानती थीं. उसको बीचों-बीच में करना और बैलेंस बनाए रखना भी कला होती थी. तब घर की नई बहू की परीक्षा 'छाँ' फानना आता है...
बादल फटने की त्रासदी से कब तक संत्रस्त रहेगा उत्तराखंड?

बादल फटने की त्रासदी से कब तक संत्रस्त रहेगा उत्तराखंड?

उत्तराखंड हलचल
डॉ. मोहन चन्द तिवारीउत्तराखंड इन दिनों पिछले सालों की तरह लगातार बादल फटने और भारी बारिश की वजह से मुसीबत के दौर से गुजर रहा है.हाल ही में 20 जुलाई को पिथौरागढ़ जिले के बंगापानी सब डिवीजन में बादल फटने से 5 लोगों की मौत हो गई, कई घर जमींदोज हो गए और मलबे की चपेट में आने की वजह से 11 लोगों के बह जाने की खबर है.नदियां उफान पर हैं.इससे पहले 18 जुलाई को भी पिथौरागढ़ जिले में बादल फटने की दर्दनाक घटना हुई है.पहाड़ से अचानक आए जल सैलाब से कई घर दब गए,पांच घर बह गए और तीस घर खतरे की स्थिति में हैं.गोरी नदी में जलस्तर बढ़ने से सबसे ज्यादा नुकसान मुनस्यारी में हुआ.वहां एक पुल पानी में समा गया. आखिर ये बादल कैसे फटते हैं? ये उत्तराखंड के इलाकों में ही क्यों फटते हैं? बादल फटने का मौसम वैज्ञानिक मतलब क्या है? इन तमाम सवालों पर मैं आगे विस्तार से चर्चा करुंगा. लेकिन पहले यह बताना चाहुंगा कि उत्तर...
बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

बाबिल की घास सिर्फ घास नहीं है

संस्मरण
प्रकाश उप्रेती मूलत: उत्तराखंड के कुमाऊँ से हैं. पहाड़ों में इनका बचपन गुजरा है, उसके बाद पढ़ाई पूरी करने व करियर बनाने की दौड़ में शामिल होने दिल्ली जैसे महानगर की ओर रुख़ करते हैं. पहाड़ से निकलते जरूर हैं लेकिन पहाड़ इनमें हमेशा बसा रहता है। शहरों की भाग-दौड़ और कोलाहल के बीच इनमें ठेठ पहाड़ी पन व मन बरकरार है. यायावर प्रवृति के प्रकाश उप्रेती वर्तमान में दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं। कोरोना महामारी के कारण because हुए ‘लॉक डाउन’ ने सभी को ‘वर्क फ्राम होम’ के लिए विवश किया। इस दौरान कई पाँव अपने गांवों की तरफ चल दिए तो कुछ काम की वजह से महानगरों में ही रह गए. ऐसे ही प्रकाश उप्रेती जब गांव नहीं जा पाए तो स्मृतियों के सहारे पहाड़ के तजुर्बों को शब्द चित्र का रूप दे रहे हैं। इनकी स्मृतियों का पहाड़ #मेरे #हिस्से #और #किस्से #का #पहाड़ नाम से पूरी एक सीरीज में दर्ज़ है। श्रृंखला, पहाड़ और वहाँ क...
एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

संस्मरण
भुवन चन्द्र पन्तगुजरे जमाने के साथ ही कई रवायतें अतीत के गर्भ में दफन हो गयी,  इन्हीं में एक है- चिट्ठी-पत्री. एक समय ऐसा भी था कि गांव में पोस्टमैंन आते ही लोगों की निगाहें उस पर टिक जाती कि परदेश में रह रहे बच्चों अथवा रिश्तेदारों की कुशल क्षेम वाला पत्र पोस्टमैन ला रहा होगा. खाकी यूनिफार्म में सिर पर खाकी रंग की ही नुकीली टोपी, जिसमें आगे की ओर एक लाल पट्टी लगी होती, तथा कन्धे पर पोस्ट आफिस का ही एक विशेष बैग लटका होता. अपने इलाके में पोस्टमैन खूब इज्जत पाता था, हर कोई घर आने पर उसे बिना चाय पिलाये घर से नहीं लौटाता. अगर मनीआर्डर लाया हो तो आवभगत पक्की. लाने वाले पत्र के मजमून पर पोस्टमैन के साथ व्यवहार होता, अगर अच्छी खबर लाता तो ग्रामीणों से खूब इज्जत बटोरता, लेकिन यदि कोई बुरी खबर वाला समाचार लाता तो लोगों की नजरों से हमेशा के लिए खटक जाता. शायद यही बात प्रख्यात कथाकार शैलेश मटिय...
च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

च्यला देवी थान हैं ले द्वी बल्हड़ निकाल दिए

संस्मरण
मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—32प्रकाश उप्रेतीआज बात-"उमि" की. कच्चे गेहूँ की बालियों को आग में पकाने की प्रक्रिया को ही 'उमि' कहा जाता था. गेहूँ कटे और उमि न पके ऐसा हो ही नहीं सकता था. उमि पकाने के पीछे का एक भाव 'तेरा तुझको अर्पण' वाला था. साथ ही गेहूँ कटने की खुशी भी इसमें शामिल होती थी. गेहूँ काटना तब एक सामूहिक प्रक्रिया थी. गाँव वाले मिलकर एक -दूसरे के 'ग्यों' (गेहूँ) काटते थे. बाकायदा तय होता था कि "भोअ हमर ग्यों काट ड्यला, आघिन दिन त्यूमर" (कल हमारे गेहूँ काट देंगे, उसके अगले दिन तुम्हारे). सुबह से लेकर शाम तक सब खेत में ही रहते थे. वहीं सबके लिए खाना-पानी-चाय जाती थी. 'पटोक निसा' (खेत की दीवार की तरफ) बैठकर सब साथ में खाते थे. गाँव में जिसकी भी भैंस दूध देने वाली होती थी उनके वहाँ से छाँछ आ जाती थी. छाँछ पीने के बाद ईजा लोग बोलते थे- "गोअ तर है गो, त्यूमर भैंस रोज...
पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

पर्यावरण को समर्पित उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला

साहित्‍य-संस्कृति
अशोक जोशीदेवभूमि, तपोभूमि, हिमवंत, जैसे कई  पौराणिक नामों से विख्यात हमारा उत्तराखंड जहां अपनी खूबसूरती, लोक संस्कृति, लोक परंपराओं धार्मिक तीर्थ स्थलों के कारण विश्व भर में प्रसिद्ध है,  तो वहीं यहां के लोक पर्व भी पीछे नहीं, जो इसे ऐतिहासिक दर्जा प्रदान करने में अपनी एक अहम भूमिका रखते हैं. हिमालयी, धार्मिक व सांस्कृतिक राज्य होने के साथ-साथ देवभूमि उत्तराखंड को सर्वाधिक लोकपर्वों वाले राज्य के रूप में भी देखा जाता है. विश्व भर में कोई त्यौहार जहां वर्ष में सिर्फ एक बार आते हैं तो वही हरेला जैसे कुछ लोक पर्व देवभूमि में वर्ष में तीन बार मनाए जाते हैं. हरेला लोक पर्व उत्तराखंड में मनाया जाने वाला एक हिंदू पर्व है, जो विशेषकर राज्य के कुमाऊं क्षेत्र में अधिक प्रचलित है. कुछ लोगों के द्वारा चैत्र मास के प्रथम दिन  इसे बोया जाता है, तथा नवमी के दिन काटा जाता है. तो कुछ जनों के द्वारा साव...