एक दौर ऐसा भी था- गुजरे जमाने की चिट्ठी-पत्री का

  • भुवन चन्द्र पन्त

गुजरे जमाने के साथ ही कई रवायतें अतीत के गर्भ में दफन हो गयी,  इन्हीं में एक है- चिट्ठी-पत्री. एक समय ऐसा भी था कि गांव में पोस्टमैंन आते ही लोगों की निगाहें उस पर टिक जाती कि परदेश में रह रहे बच्चों अथवा रिश्तेदारों की कुशल क्षेम वाला पत्र पोस्टमैन ला रहा होगा. खाकी यूनिफार्म में सिर पर खाकी रंग की ही नुकीली टोपी, जिसमें आगे की ओर एक लाल पट्टी लगी होती, तथा कन्धे पर पोस्ट आफिस का ही एक विशेष बैग लटका होता. अपने इलाके में पोस्टमैन खूब इज्जत पाता था, हर कोई घर आने पर उसे बिना चाय पिलाये घर से नहीं लौटाता. अगर मनीआर्डर लाया हो तो आवभगत पक्की. लाने वाले पत्र के मजमून पर पोस्टमैन के साथ व्यवहार होता, अगर अच्छी खबर लाता तो ग्रामीणों से खूब इज्जत बटोरता, लेकिन यदि कोई बुरी खबर वाला समाचार लाता तो लोगों की नजरों से हमेशा के लिए खटक जाता. शायद यही बात प्रख्यात कथाकार शैलेश मटियानी को अन्दर तक चोट कर गयी और उन्होंने ‘पोस्टमैन’ कहानी के माध्यम से इस व्यथा को उजागर किया. पहाड़ों तब आम बोलचाल की भाषा में पोस्टमैन को चिट्ठीरसैन नाम से जाना जाता था.

पोस्टमैन. सभी फोटो गूगल से साभार

 

वह चिट्ठी क्या होती थी, लगता साक्षात् लिखने वाला व्यक्ति सामने खड़ा होकर बोल रहा है. आज की तरह वीडियो कॉल की सुविधा तो कल्पना से भी परे थी, टेलीफोन करने के लिए भी पास के शहर दौड़ना पड़ता था. सुबह का मिलाया अर्जेन्ट ट्रंककाल का नंबर शाम तक मिल जाय और ढंग से दो बात हो जाय तो आदमी खुद को धन्य समझता. अगर बहुत ही आवश्यक बात करनी हो तो लाइटनिंग कॉल की सुविधा थी, वह भी आज की तरह सीधे डाइल करके नहीं बल्कि टेलीफोन एक्सचेंज के माध्यम से आपको संबंधित से जोड़ा जा था. उसमें भी यदि इच्छित व्यक्ति से ही आप बात करना चाहें तो पीपी (पर्टीक्यूलर पर्सन) कॉल बुक करनी होती, जिसका अलग से चार्ज होता था. घर का सदस्य अथवा जब फौज के लिए अन्य जगह के लिए विदा होता तो अलविदा के साथ ही एक वाक्य हमेशा जुड़ा रहता, पहुंच कर चिट्ठी भेजना. अब ये बात दीगर है कि उसके पहुंचने के 10-15 रोज बाद जब चिट्ठी पहुंचती तो घर वाले इसी बात पर सन्तोष कर लेते कि वह कुशल से है,  जबकि इन 10-15 दिनों के अन्तराल में कुछ भी घट सकता था. लेकिन उस ओर कोई सोचता भी नहीं था. अगर सोचता भी तो उस चिन्ता के निवारण का कोई दूसरा जरिया भी तो नहीं था. शुक्र है कि उस समय के लोग ज्यादा सुखी व खुश थे, बनिस्पत आज की हर क्षण और हर पल की खबर मोबाइल से मिल जाती है.

त्वरित संदेश के रूप में तार की सुविधा थी. किसी के घर तार आने का सीधा सा मतलब होता था, कोई अशुभ समाचार या अनहोनी. बेतार के तार की ध्वनियों को केवल प्रशिक्षित तार बाबू ही समझ सकता था- खट, खट-खट-खट, खट-खट, इन्हीं ध्वनियों की आवृत्ति के आधार पर तार बाबू शब्दों में लिपिबद्ध करता. इसके लिए उसका विशेष प्रशिक्षण होता था. तार भेजने के लिए सूचना को समझने मात्र को सीमित शब्दों का प्रयोग होता.

त्वरित संदेश के रूप में तार की सुविधा थी. किसी के घर तार आने का सीधा सा मतलब होता था, कोई अशुभ समाचार या अनहोनी. बेतार के तार की ध्वनियों को केवल प्रशिक्षित तार बाबू ही समझ सकता था- खट, खट-खट-खट, खट-खट, इन्हीं ध्वनियों की आवृत्ति के आधार पर तार बाबू शब्दों में लिपिबद्ध करता. इसके लिए उसका विशेष प्रशिक्षण होता था. तार भेजने के लिए सूचना को समझने मात्र को सीमित शब्दों का प्रयोग होता. इस लिहाज से अंग्रेजी के शब्दों में सीमित शब्दों का प्रयोग संभव होता था, जो तार भेजने के लिए ज्यादा उपयुक्त होते थे. क्योंकि तार में शब्दों की संख्या के हिसाब से शुल्क चार्ज होता था. ग्रीटिंग के तार किफायती होते थे, कारण उनमें केवल संख्या जैसे ‘सोलह’ लिखकर तार किया जाता और तार बाबू हर संख्या के लिए निर्धारित कूट के हिसाब से ग्रीटिंग का संदेश लिखकर संबंधित को भेजता . तार साधारण के अलावा एक्सप्रेस तथा जवाबी तार के रूप में होते थे . साधारण तार को पोस्टमैन अपने सर्किल की ड्यूटी के समय ही वितरित करता, जब कि एक्सप्रेस तार को प्राप्त होते ही तार संदेशवाहक को संबंधित को डिलीवर करना होता था, इसकी दरें भी अधिक होती. जवाबी तार में तार करने वाला व्यक्ति उसके जवाब के लिए भी शुल्क स्वयं अदा कर उत्तर की अपेक्षा करता. मोबाइल तथा ईमेल जैसी सुविधाओं के विस्तार स्वरूप पिछले कुछ समय से तार की प्रासंगिकता लगभग खत्म हो चुकी थी, अन्ततः देश में 163 साल पुरानी तार सेवा को 13 जून 2013  को बन्द कर दिया गया और यह  अतीत की यादें मात्र रह गयी.

कहते हैं, जब यातायात के साधन नहीं थे, तो डाक व्यवस्था हरकारों के माध्यम से संचालित होती थी . हरकारे दिन-रात पैदल यात्रा कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक डाक पहुंचाते. उनके पास एक लाठी आत्म सुरक्षा के लिए होती थी, जिसमें घुंघरू बंधे होते थे. ये हरकारे की आईडिन्टिटी भी होती थी, और जंगली जानवरों को डराने की एक संकेत ध्वनि भी. कहा तो यहां तक जाता था कि हरकारे के लिए शेर भी अपना रास्ता छोड़ देता था. बाद में परिवहन साधनों के विस्तार होने पर डाक विभाग की अलग डाक गाड़िया हुआ करती थी, लेकिन यह कार्य शायद घाटे का होने के कारण रोडवेज व केएमओ को यह कार्य सौंप दिया गया.

देश-परदेश से अपनी बात स्वजनों तक पहुंचाने के लिए जब पत्र ही एक मात्र माध्यम हुआ करते थे, तो वे पत्र क्या एक जीवन्त दस्तावेज होते थे. पत्र लेखक समाचारों तथा घटनाओं का जिस वेबाकी से बखान करता, शायद आज औपचारिकता के दौर में वीडियो कॉल में भी हम वह नहीं कह पाते. मुख्य रूप से पोस्टकार्ड, अंतर्देशीय पत्र तथा लिफाफे ही चिट्ठी-पत्री में इस्तेमाल होते. पोस्टकार्ड में स्थानाभाव से कम बातें आती, यदि विस्तार से लिखना हो तो अंतर्देशीय या अलग कागज में लिखकर लिफाफे का इस्तेमाल होता जो बनिस्पत पोस्ट कार्ड से थोड़ा महंगा पड़ता था. लोगों का एक दूसरे के प्रति विश्वास इतना था कि कई गोपनीय बातें खुले पोस्टकार्ड पर लिखी जाती और दूसरे के पत्र को पढ़ने की दखलअन्दाजी का भाव किसी में नही होता. लेखक अपने पैसे का पूरा मोल चुकता करने अथवा कोई महत्वपूर्ण बात लिखने से रह जाने की दशा में आड़े-तिरछे भी लिखकर कोई स्थान कोरा नहीं छूटने देते.

पत्र लेखन का भी एक निश्चित फार्मेट हुआ करता था . पत्र के आरम्भ में शीर्ष पर ऊॅ श्री गणेशाय नमः अथवा ऊॅ ईष्ट देवाय नमः के बाद दाहिने कोने पर शुभस्थान तथा उसके नीचे तारीख अंकित की जाती थी . कभी कभी पत्र के शीर्ष में “सदा भवानी दाहिनी, सिद्धि करो गणेश, पांचों देव रक्षा करे, ब्रह्मा, विष्णु महेश” भी लोग लिख दिया करते थे.

गांव के निरक्षर लोग अपने पत्र लिखवाने अथवा आये हुए पत्र को वाचने के लिए कोई शिक्षित की मदद लेते और उसकी गांव में काफी इज्जत होती थी. लेकिन कुछ शरारती लोग बतायी गयी बात में कुछ अपना भी पुट डाल देते अथवा चिट्ठी वाचन में अपनी ओर से भी कुछ अतिरिक्त वाचन विनोदवश कर देते, यह उनकी मानसिकता होती थी, निरीह, अनपढ़ इन्सान के साथ.

पत्र लेखन का भी एक निश्चित फार्मेट हुआ करता था . पत्र के आरम्भ में शीर्ष पर ऊॅ श्री गणेशाय नमः अथवा ऊॅ ईष्ट देवाय नमः के बाद दाहिने कोने पर शुभस्थान तथा उसके नीचे तारीख अंकित की जाती थी . कभी कभी पत्र के शीर्ष में “सदा भवानी दाहिनी, सिद्धि करो गणेश, पांचों देव रक्षा करे, ब्रह्मा, विष्णु महेश” भी लोग लिख दिया करते थे. पत्र का प्रथम पैराग्राफ सभी का लगभग समान रहता, सिर्फ रिश्ते के अनुसार मित्रवर्ग को श्री 3 मित्रवर इसी प्रकार रिश्ते के अनुरूप श्री के बाद अंकों का प्रयोग होता था, जिनका मतलब तो अब तक नहीं समय पाया, लेकिन एक प्रचलित उक्ति थी –

श्री लिखिए षट् गुरून को, पांच स्वामी, रिपु चारि.
तीन मित्र, दुई भ्रात्य को, एक पुत्र अरू नारि’’

(यानी श्री गुरु के लिए, 5 स्वामी के लिए, 4 शत्रुओं के लिए, 3 मित्रों के लिए, 2 भाइयों के लिए और एक पुत्र व पत्नी के लिए लिखा जाता है.)

इसके उपरान्त पारिवारिक सदस्यों के प्रति रिश्ते के अनुरूप अभिवादन तथा बच्चों को प्यार व शुभाशीष के बचन एक एक कर नाम के साथ लिखे जाते थे .

पत्र का दूसरा पैरा– “अत्र कुशलंच तत्रास्तु’’ से शुरू होता, संस्कृत के साथ हिन्दी में भी लिखा जाता, यहां कुशल से हैं तहां की कुशल भगवान से नेक चाहने की प्रार्थना करते हैं. इसके बाद घर के सदस्यों, विशेष रूप से बुजुर्गों के स्वास्थ्य की  कुशल क्षेम पूछी व बतायी जाती .

तीसरा पैरा पत्र का मुख्य विषय का होता. इसमें कोई खास घटना, शादी के लिए योग्य वर-वधू की तलाश, निमंत्रण, पास-पड़ोस के समाचार, मौसम, आने-जाने का जिक्र तथा घर की धिनाली-पानी का जिक्र रहता,  यानी कुल मिलाकर खास-खास सभी समाचार लिखे जाते थे.

अन्तिम पैराग्राफ में विनम्रता के साथ लिखा जाता कि बाकी आप आप सर्वज्ञ व समझदार है तथा इतिशुभम् के उपरान्त अपना नाम लिखकर पत्र समाप्त किया जाता था.

आजकल जाड़ोंक दिनन में काम धन्ध लैक के नि हैरय्, जाड़ लैक भौत हुण लागि गो. दिन में खै बेर घाम में पसरि रूनु, झिट घड़ी में स्योव ऐ जांछ. फिर भिनेर बिना रूण मुश्किल है जांछ. धिनाली पाणि लैक के न्हातिन. आधिल म्हैण गोरू ब्याणि छ, नानतिनान कैं बिकौद खाण हुणि भेजि दिया. तुमन कैं मालूमै छ अब च्यलि लैक बिउण हैगे, क्वे भल जस लौंड नजरों में व्हल तो बतैया. कबघते मौक लागल तो एक चक्कर इथांक लैक मारि जया.

कुछ लोग अपनी कुमाउनी भाषा में भी पत्र लिखा करते, जिसमें आत्मीयता ज्यादा झलकती. कुमाउनी में पत्र लिखने की कला में हर एक प्रवीण नहीं होते थे, इसलिए कुछ गिने-चुने लोग की कुमाउनी में पत्र लिखा करते थे. कुमाउनी में लिखे गये पत्र की एक बानगी देखिएः-

ऊॅ श्री गणेशाय नमः

शुभस्थान- …………………………….

दिनांक -……………………………….

सिद्धि श्री सर्वोपमा योग्य श्री 3 मित्रवर जोशीज्यू कन मेरी सादर नमस्कार/ पैलागुन. ईज- बाबू कन सादर प्रणाम और नानतिनान कन शुभाशीष व प्यार.

अत्र कुशलंच तत्रास्तु. हम यां कुशल का साथ छूं, आपु लोगनकि कुशल-मंगलकि ईष्ट देव हुणि प्रार्थना करते रूनुं. आपुण तबियत कसि छू. पैलिक स्वदेह को यत्न करला, तब सबनकि पालना होली.

आजकल जाड़ोंक दिनन में काम धन्ध लैक के नि हैरय्, जाड़ लैक भौत हुण लागि गो. दिन में खै बेर घाम में पसरि रूनु, झिट घड़ी में स्योव ऐ जांछ. फिर भिनेर बिना रूण मुश्किल है जांछ. धिनाली पाणि लैक के न्हातिन. आधिल म्हैण गोरू ब्याणि छ, नानतिनान कैं बिकौद खाण हुणि भेजि दिया. तुमन कैं मालूमै छ अब च्यलि लैक बिउण हैगे, क्वे भल जस लौंड नजरों में व्हल तो बतैया. कबघते मौक लागल तो एक चक्कर इथांक लैक मारि जया. बांकि सब सामान्यै है रयीं. चिट्ठीक जवाब जरूर दिया, तुमरि चिट्ठीक इन्तजार मैं रूंल.

इति शुभम्
तुमर मितुर ………….’’

इन पत्रों की आत्मीयता का कोई जवाब नहीं था. पत्र क्या होते थे, लोग अपनी सारी मन की भावनाओं को बिना किसी लाग-लपेट के चिट्ठियों में उड़ेल देते थे, आज की संचार क्रान्ति के दौर में दुनियां सिमट चुकी है, लेकिन दिल दूर होते चले जा रहे हैं.

(लेखक भारतीय शहीद सैनिक विद्यालय नैनीताल से सेवानिवृत्त हैं तथा  प्रेरणास्पद व्यक्तित्वों, लोकसंस्कृति, लोकपरम्परा, लोकभाषा तथा अन्य सामयिक विषयों पर स्वतंत्र लेखन के अलावा कविता लेखन में भी रूचि. 24 वर्ष की उम्र में 1978 से आकाशवाणी नजीबाबाद, लखनऊ, रामपुर तथा अल्मोड़ा केन्द्रों से वार्ताओं तथा कविताओं का प्रसारण.)

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