September 19, 2020
संस्मरण

“खाव” जब आबाद थे

मेरे हिस्से और पहाड़ के किस्से भाग—37

  • प्रकाश उप्रेती

पहाड़ में पानी समस्या भी है और समाधान भी. एक समय में हमारे यहाँ पानी ही पानी था. इतना पानी कि सरकार ने जगह-जगह सीमेंट की बड़ी-बड़ी टंकियाँ बना डाली थी. जब हमारी पीढ़ी सीमेंट की टंकियाँ देख रही थी तो ठीक उससे पहले वाली पीढ़ी मिट्टी के “खाव” बना रही थी. आज बात उसी ‘खाव’ की. ‘खाव’ मतलब गाँवों के लोगों के द्वारा जल संरक्षण के लिए बनाए जाने वाले तालाब.

बात थोड़ी पुरानी है लेकिन उतनी भी नहीं कि भुलाई और भूली जा सके. हमारे यहाँ कई जगहों के और गाँवों के नाम के साथ खाव लगा है.जैसे- रुचि खाव, खावे ढे, पैसि खाव, और भी कई खाव थे. कई जगहों की पहचान ही खाव से थी. जगहें तो अब भी हैं लेकिन खाव समतल मिट्टी में तब्दील हो गए हैं. सीमेंट ने पानी और खाव दोनों को निगल लिया.

वह समय था जब पानी लेने के लिए सुबह-शाम ‘पह्यरियों’ (पानी लाने वाली महिलाएँ) की लाइन लगी रहती थी. हर कोई “नोह्” (जहाँ पानी इकट्ठा रहता है)  गगरी, डिब्बा, कस्यार, तौली लेकर जाता था. नोह् भी ‘छल-छलान’ भरे होते थे. ‘गध्येरों’ में पानी की धार निरंतर बहती रहती थी. पूरे गध्येरे में छोटे-बड़े तकरीबन 12-13 खाव थे. हर खाव में पानी था. बैल के लिए अलग खाव, भैंस के लिए अलग खाव, कपड़े धोने के लिए अलग खाव, ‘स्यर’ में पानी देने के लिए अलग खाव, केकड़े पकड़ने के लिए अलग खाव, मतलब खाव ही खाव थे. पूरे गध्येरे में पानी की मोटी धार और उसकी आवाज गूँजती रहती थी. इधर से उधर हम पानी में से छपम-छपम कर जाते थे.

‘बुबू’ (दादा) भी अकेले अपने सामर्थ्य से जितने खाव बना सकते थे उतने बनाते थे. बरसात के मौसम में कुदाल और फावड़ा लेकर खाव बनाने चल देते थे. हम उनके साथ मिट्टी इधर-उधर फेंकने का काम करते थे. उनको बरसात में पानी से भरे खाव बैंक में जमा पूंजी सी लगती थी. बरसात में जब घर के पास का खाव भर जाता और कई दिनों तक उसमें पानी रहता तो उनके चेहरे के भाव ही अलग होते थे. खाव उनके जीवन का अनिवार्य हिस्सा था. बच्चे खेलते हुए अगर खाव तोड़ दें तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर होता था. ईजा उस डर के मारे हमको खाव में खेलने नहीं देती थीं. जैसे ही खेलने निकलते, कह देती थीं- “खावपन झन खेलिया हां” (खाव के आस-पास मत खेलना). हम भी बुबू के डर से नहीं खेलते थे. उनके घर पर न रहने पर खाव में ही खेलते थे.

गाँव में कितना भी बड़ा काम हो जाए पानी की कमी नहीं होती थी. हर समय और हर मौसम में पानी रहता था. खाव बनाने के लिए सभी गाँव वाले मिलकर जाते थे. बाकायदा एक -एक को बताया जाता था कि कल खाव साफ करने जाना है या नया खाव बनाने चलना है. गाँव के सभी बच्चे और बड़े  समय पर पहुंच जाते थे.

गाँव में कितना भी बड़ा काम हो जाए पानी की कमी नहीं होती थी. हर समय और हर मौसम में पानी रहता था. खाव बनाने के लिए सभी गाँव वाले मिलकर जाते थे. बाकायदा एक -एक को बताया जाता था कि कल खाव साफ करने जाना है या नया खाव बनाने चलना है. गाँव के सभी बच्चे और बड़े  समय पर पहुंच जाते थे. जरूरत के हिसाब से छोटे-बड़े खाव को बनाना और साफ करने का काम होता था. 2-3 महीने में एक बार सफाई का काम होता ही था. ऐसे ही आपसी सहयोग से नोह् भी साफ किया जाता था. नीचे मिट्टी, काई, पत्थर, पत्ते  साफ करके नोह् को चमका दिया जाता था. हमारा नोह् तो हमेशा ‘ओवर फ्लो’ था. वहीं नहाना, पानी भर कर लाना एक पूरी दिनचर्या थी. साथ ही वह गाँव के सभी लोगों के बैठने का सामूहिक अड्डा भी था.

खाव जब पानी से भरे होते थे, तो उनके अंदर की गीली मिट्टी से हम घर बनाते थे. खेल-खेल में मिट्टी का घर बनाना और फिर किसी ताकतवर बच्चे का उसे ढहा देना, बार-बार याद आता है. खाव में ही खेलते हुए एक दूसरे को पानी से छपोड देते थे. जब खाव में पानी नहीं होता तो उसमें कंचे भी खेलते थे. बरसात के दिनों में कागज की नाव खाव में ही छोड़ते थे. जीवन के रंग में खाव, नोह् और पानी ही था. सबकी जिंदगी इन्हीं के बीच खुशहाल थी.

खाव नष्ट हुए तो पानी भी चला गया. गाँव धीरे-धीरे पानी को तरसने लगा. सब जान रहे थे कि सीमेंट ने पानी को निगल लिया लेकिन सरकारी योजना के नाम पर सब खामोश थे. धीरे-धीरे बुबू गए, खाव गए और पानी भी चला गया. अब बची है तो केवल खाव और नोह् की निशानदेही. 

तभी एक दिन गध्येर में सीमेंट की एंट्री हो गई थी. सीमेंट ने खाव की जगह टँकी बनाई . पहले छोटे खाव को तोड़कर उनका पानी टँकी तक पहुंचाया गया फिर नोह् के चारों ओर अंदर-बाहर सीमेंट लगाया गया. सीमेंट से बनी टँकी और नोह् कुछ दिन तो अच्छे लगे लेकिन 3-4 महीने में ही उन्होंने सारे पानी को निगल लिया. पहले नोह् से, फिर गध्येर से पानी सूखता गया. सूखा भी ऐसा कि फिर लौटा नहीं. अब सीमेंट की वो टंकियाँ गध्येर के सीने में बदनुमा दाग़ सी लगती हैं. नोह् अब डराने लगा है.

खाव नष्ट हुए तो पानी भी चला गया. गाँव धीरे-धीरे पानी को तरसने लगा. सब जान रहे थे कि सीमेंट ने पानी को निगल लिया लेकिन सरकारी योजना के नाम पर सब खामोश थे. धीरे-धीरे बुबू गए, खाव गए और पानी भी चला गया. अब बची है तो केवल खाव और नोह् की निशानदेही.

ईजा ने उस निशानदेही के बिना पर ही कुछ बचा लेने की कोशिश जारी रखी है. उन्हें  गध्येर में जहाँ भी थोड़ा पानी दिखाई दे जाता है, वहाँ मिट्टी साफ करके छोटा सा खाव बना देती हैं. कहती हैं- “को जानवर ले गिच्च ढोबिल” (कोई जानवर ही मुँह गीला कर लेगा). ईजा को पानी और जानवर दोनों की चिंता है जोकि हमारी चिंता से कब से बाहर हैं.

आज ईजा से खाव पर बात हो रही थी तो उन्होंने  कहा- “च्यला अब काकें खाव चाह्नि, मेल जरा घरोक पन्हा वो खाव खानि रहो” (बेटा अब किसको खाव चाहिए, मैंने घर के बगल वाला खाव खोदा है). सोच रहा हूँ ईजा गलत तो नहीं कह रही थीं…

अब गाँव में टंकियाँ लग गई हैं लेकिन पानी की समस्या दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है. पहाड़ में नल, पानी का समाधान न पहले रहे न अब हैं. जो था वो तो नष्ट कर दिया. अब न कोई खाव बनाता है और न ही किसी को जरूरत है. अब हर किसी की एक अदत इच्छा होती है कि ‘हमारे घर के आगे नल लग जाए’. उस नल और सीमेंट ने पहाड़ों में पानी की समस्या को विकराल कर दिया है.

आज ईजा से खाव पर बात हो रही थी तो उन्होंने  कहा- “च्यला अब काकें खाव चाह्नि, मेल जरा घरोक पन्हा वो खाव खानि रहो” (बेटा अब किसको खाव चाहिए, मैंने घर के बगल वाला खाव खोदा है). सोच रहा हूँ ईजा गलत तो नहीं कह रही थीं…

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। पहाड़ के सवालों को लेकर मुखर रहते हैं।)

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