
कंडियाल गांव में आज भी जीवित है शेर-भालू का पौराणिक नृत्य
मुखौटे पहनकर जीवंत होती लोककथा
ढोल-दमाऊ की थाप पर पीढ़ियों से निभाई जा रही अनूठी परंपरा, लोकसंस्कृति को सहेज रहे ग्रामीणनीरज उत्तराखंडी, पुरोला/उत्तरकाशीरवांई घाटी की समृद्ध लोकसंस्कृति आज भी अनेक प्राचीन परंपराओं के माध्यम से जीवंत दिखाई देती है. विकासखंड पुरोला के कंडियाल गांव में आज भी मुखौटे पहनकर शेर और भालू का पौराणिक लोकनृत्य प्रस्तुत किया जाता है. यह अनूठा नृत्य गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है और पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा को ग्रामीण आज भी पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ निभा रहे हैं.
गांव में विशेष अवसरों, पारंपरिक उत्सवों और सामुदायिक आयोजनों के दौरान युवक शेर और भालू के रूप में सजे विशेष मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं. ढोल-दमाऊ और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर होने वाला यह नृत्य पूरे वातावरण को उत्साह और रोमांच से भर देता है.
नृत्य के दौरान कलाकार शेर ...









